November 21, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-124 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ एक सौ चौबीसवाँ अध्याय सिन्धु-वध के अनन्तर माता-पिता तथा पत्नी का करुण विलाप, पत्नी दुर्गा का सती होना, पिता चक्रपाणि के द्वारा मयूरेश की स्तुति और उनसे गण्डकीनगर में चलने के लिये प्रार्थना करना, शिव-पार्वती तथा गणों एवं मुनियोंसहित मयूरेश का गण्डकीनगर के लिये प्रस्थान अथः चतुर्विंशत्युत्तरशततमोऽध्यायः सिन्धुनिरुद्धदेवगणमोचनं ब्रह्माजी बोले — युद्धभूमि में दैत्यराज सिन्धुके गिर जाने पर जो बचे हुए योद्धा थे, वे वापस गण्डकीनगर में चले आये और यहाँ उन्होंने देखा कि दैत्य सिन्धु की माता उग्रा, पत्नी दुर्गा तथा उसके पिता चक्रपाणि अत्यन्त चिन्तामग्न तथा बहुत व्याकुल होकर पड़े हुए थे, उस समय उन लोगों को अनेक प्रकार के अपशकुन भी दिखायी देने लगे ॥ १-२ ॥ उन्होंने देखा कि कोई व्यक्ति अशुभ की सूचना देता हुआ उत्तर की ओर सिर करके सोया हुआ है। कोई अपने दोनों घुटनों के बीच सिर रखकर बैठा था और बिना कुछ बोले चुपचाप हिलता हुआ-सा प्रतीत हो रहा था ॥ ३ ॥ कोई स्त्री खिन्न-सी होकर अपनी ठुड्डी में हथेली को टिकाकर बैठी हुई है, उसी समय यमदूतों के समान कुछ दूत वहाँ आये, उन दूतों का मुख अत्यन्त मुरझाया हुआ था, उनकी स्थिति दयनीय थी, वे कुछ बोल नहीं रहे थे, मौन थे। उनसे पूछे जाने पर उनमें से कुछ दूसरे दूतों ने युद्ध में जो हुआ, वह समाचार बताते हुए कहा ॥ ४-५ ॥ दूत बोले — असंख्य महान् वीरों का वध करने के अनन्तर दैत्यराज सिन्धु हम बालकों को असहाय छोड़कर स्वर्ग को प्राप्त हो गये हैं, इसी कारण उनके विरह में हम लोग रो रहे हैं। देवताओं को मरा हुआ देखकर पार्वती का पुत्र वह मयूरेश अत्यन्त क्रुद्ध होकर युद्धस्थल में आया, उसने अपने अस्त्रों के द्वारा दैत्यराज सिन्धु के अस्त्रों को रोककर तीक्ष्ण परशु को छोड़ा । उस परशु के आघात से सिन्धु मृत्यु को प्राप्त होकर भूमि पर गिर पड़े ॥ ६-७१/२ ॥ वहाँ उन दैत्य सिन्धु के सभी सैनिक तथा नगरनिवासीजन भी मूर्च्छित हो गये ॥ ८ ॥ दूतों के मुख से इस प्रकार की बात सुनकर वे सभी रोने लगे । दैत्य सिन्धु की पत्नी दुर्गा अत्यन्त विलाप करने लगी और जोर-जोर से सिर पीटने लगी ॥ ९ ॥ उसके केश बिखर गये, वह अपने मुख को बार-बार पीटने लगी, उसके आभूषण गिर गये थे । उस समय सिन्धुदैत्य की माता उग्रा, पिता चक्रपाणि तथा समस्त पुरवासी रो-रोकर अपने हाथ से मुख पीटने लगे। वे अपना सिर जमीन पर पटक-पटककर जोर-जोर से चिल्लाते हुए भूमि पर लोटने लगे ॥ १०-११ ॥ कोई-कोई दुखी होकर धूल को अपने मुख पर तथा सिर पर उछालने लगा, कोई अपनी हथेली के पृष्ठभागों को दाँत से काटने लगा और उनसे जमीन पीटने लगा । स्त्रियाँ अपनी अँगुलियों को तोड़-मरोड़कर गिरिजा के पुत्र उस मयूरेश को शाप देने लगीं ॥ १२ ॥ उग्रा बोली — [ हे वत्स!] मैंने विविध प्रकार के प्रयत्नों, कठोर तपस्या, भगवान् सूर्य की प्रसन्नता, उन्हें नमन करने, उनकी स्तुति करने, विविध प्रकार के उपवासों तथा सभी प्रकार के दानों को देने के अनन्तर बहुत समय के बाद किसी प्रकार तुम्हें प्राप्त किया है, अरे शूर! अरे मानी ! इस समय तुम्हें कौन ले गया है ? ॥ १३ ॥ तुम्हारे तीनों लोकों के नायक होने से मैं भी तीनों लोकों में प्रशंसनीय थी, लेकिन अब इस समय लोग मुझे ‘तुम भाग्यहीन हो’ इस प्रकार कहकर उलाहना देंगे ॥ १४ ॥ पूर्वकाल में तुमने यमराज को जीत लिया था, फिर आज कैसे उनसे मिलना हो गया है ? हे पुत्र ! आज पुनः तुमने उसको कैसे नहीं जीत लिया ? ॥ १५ ॥ हे पुत्र ! तुम्हारे स्वर्गलोक चले जाने पर पार्वती के पुत्र उस मयूरेश की इच्छा पूर्ण हो गयी है। मुझसे बिना पूछे ही तुम सुख देने वाले उस स्वर्गलोक को क्यों चले गये हो? हे पुत्र! मुझे दुखी देखकर तुम किस प्रकार सन्तोष प्राप्त कर सकोगे ? हे पुत्र ! जब तुम गर्जना करते थे तो भयभीत होकर मेघ गरजना छोड़ देते थे, किंतु हे पुत्र! वही आज तुम रणांगण में कैसे शान्त होकर गिरे पड़े हो ? ॥ १६-१७१/२ ॥ दुर्गा बोली — वेदों के विधान के अनुसार विधाता ने हम दम्पती का शरीर दो होने पर भी एक तो बनाया है, किंतु उस मूढ़बुद्धि ब्रह्मा ने प्राणों की एकता क्यों नहीं बनायी ? सौभाग्य के अभिमान से गर्वित होकर मैं अपने सामने शची तथा सावित्री को भी कुछ नहीं गिनती थी, फिर वही आज मैं विधवा कैसे हो गयी हूँ ? [हे स्वामिन्!] आप जब अपने हाथ से मेरे अंगों में कस्तूरी तथा चन्दन का लेप लगाते थे, तभी मेरे अंग शीतल होते थे, किंतु इस समय शोकाग्नि के द्वारा वे सभी अंग दग्ध हो रहे हैं, उन्हें आप शीतलता प्रदान करें ॥ १८-२१ ॥ पहले तो आप मेरे बिना अणुमात्र विष का भी सेवन नहीं करते थे, फिर आप आज मेरे बिना स्वर्ग के उस सुख का कैसे भोग कर रहे हैं ? ॥ २२ ॥ जो सज्जन होते हैं, सबके साथ समान व्यवहार करने वाले होते हैं, वे बिना अपराध के अपने सेवक की उपेक्षा नहीं करते हैं, फिर आप क्यों मेरी उपेक्षा कर रहे हैं ? देवताओं का भी अन्त करने वाले हे स्वामिन्! आपने पूर्वकाल में बिना गुणों की अपेक्षा रखते हुए मुझसे विविध प्रकार का निश्छल प्रेम किया है, फिर इस समय उस अवर्णनीय प्रेम का परित्याग कर आप क्यों चले गये हैं ? ॥ २३-२४ ॥ ब्रह्माजी बोले — तदनन्तर तपोवृद्ध तथा ज्ञानवृद्ध-जन यह कठोर वचन कहकर उनको समझाने लगे कि धर्मशास्त्र को जानने वाले विद्वान् मृत्यु के अनन्तर रोने की प्रशंसा इसलिये नहीं करते हैं कि मित्र तथा सम्बन्धीजनों के जो आँसू निकलते हैं, वे निश्चित ही प्रेत के मुख में पड़ते हैं, अतः उस मृत व्यक्ति का हित करने वाले दयावान् को चाहिये कि उस प्रेत के लिये जो हितकारी कर्म है, उसे सम्पन्न करे ॥ २५-२६ ॥ विचार करने पर यह सुनिश्चित होता है कि उन कृपालु, निर्गुण, चिदानन्दघन, ब्रह्मस्वरूप मयूरेश ने दैत्य सिन्धु को भी मोक्ष ही प्रदान किया है। संसार का कल्याण करने वाले उन मयूरेश ने जीवों पर दया करने के लिये ही शरीर धारण किया है और उन्होंने युद्ध में सन्मुख उस सिन्धु का वध करके उसे मोक्ष प्रदान किया है ॥ २७-२८ ॥ आत्मा अनादि है, निर्गुण है और नित्य है, इसलिये उसकी न तो मृत्यु होती है और न कभी उसका जन्म ही होता है, ऐसा वेद में निश्चित किया गया है ॥ २९ ॥ व्यक्ति अपने स्वार्थवश ही मृत व्यक्ति के लिये रोता है, वह उसका हित नहीं चाहता। असंख्य प्राणियों के भार को वहन करने वाली पृथ्वी, कूर्म, वराह तथा पृथ्वी को धारण करने वाले शेषनाग – ये सब प्रेत का भार सहन नहीं कर पाते। वृद्धजनों द्वारा इस प्रकार से कहा जाने पर वे लोग तब शोकमुक्त हुए ॥ ३०-३१ ॥ तदनन्तर दैत्य सिन्धु की माता उग्रा, पिता चक्रपाणि, अपनी सखियों के साथ भार्या दुर्गा तथा गण्डकीनगर के निवासी जन — ये सभी शोक करते हुए युद्धस्थल में गये । वहाँ उन्होंने रणभूमि में पड़े हुए सिन्धु को देखा, जिसे सेवक पंखा झल रहे थे, उसका मुखरूपी कमल फैला हुआ था और उसके नेत्र सफेद हो चुके थे ॥ ३२-३३ ॥ उसके शरीर से रक्त प्रवाहित हो रहा था और दुर्गन्ध भी आ रही थी। वहाँ मांसभक्षी पक्षी तथा हिंसक पशु भरे हुए थे। उसके माता-पिता, पत्नी तथा वे सभी नगरनिवासी उसे चारों ओर से घेरकर बैठ गये, वे अत्यन्त दुखी तथा शोक से व्याकुल थे ॥ ३४ ॥ अपने स्वामी दैत्य सिन्धु का सिर अपनी गोद में रख करके उसकी भार्या दुर्गा बड़े जोर से चिल्लाती हुई शोक मनाने लगी। हे नाथ! पहले मैं अपने दोनों हाथों से आपके पैर दबाया करती थी, किंतु यहाँ लोगों के सामने ऐसा करना सम्भव नहीं है, अतः हे प्राणनायक! हे वीर ! आप उठें, शत्रु के जिन्दा रहते आप कैसे निद्रा में सो गये हैं ? ॥ ३५-३६ ॥ तदनन्तर अपने पति के मुख में अपना मुख रखकर वह विलाप करते हुए हाहाकार करने लगी। तब वृद्धजनों एवं ज्ञानीजनों ने उसे ऐसा करने से रोका। तत्पश्चात् दैत्य सिन्धु की माता उग्रा तथा पिता चक्रपाणि- दोनों उसके मुख को धोने लगे और फिर उससे बोले — अरे वत्स ! उठो, शत्रुगणों के जीवित रहते, क्यों सो रहे हो ? ॥ ३७-३८ ॥ वज्र धारण करनेवाले देवराज इन्द्र के वज्र से आहत हुए के समान तुम भूमि पर गिरे पड़े हो। इस समय उस छोटे-से बालक मयूरेश के साथ युद्ध करने पर तुम कैसे भूमि पर गिर पड़े? ॥ ३९ ॥ तुमने तो अपनी भौंहों के इशारे मात्र से यमराज को भी जीत लिया था, फिर तुम आज कैसे उस यम के वश में आ गये? हे विभो ! हमारे हृदय को आनन्द प्रदान करने वाले कुछ वचनों को तो तुम बोलो ॥ ४० ॥ हे अनघ! पूर्वकाल में जिसके शब्द से तीनों लोक भी काँप उठते थे, फिर आज हे अमन्द पराक्रम वाले वही तुम वह शब्द क्यों नहीं बोल रहे हो ? ॥ ४१ ॥ हम लोगों ने तुम्हारा कोई ऐसा अपराध भी नहीं किया है कि जिस कारण तुम मौन हो गये हो । लगता है कि तुम क्रोध के कारण ही अपनी समस्त सेना के साथ हमसे कुछ नहीं बोल रहे हो । जिसने अपनी कान्ति से कामदेव को भी जीत लिया था, वही तुम आज किस प्रकार विह्वलता को प्राप्त हो रहे हो? ॥ ४२१/२ ॥ तदनन्तर विद्वज्जनों तथा वृद्धजनों ने अनेक प्रकार के उदाहरणों द्वारा रोते हुए उन उग्रा तथा चक्रपाणि आदि को आश्वस्त किया और धीरज बँधाया। साथ ही यह भी कहा कि जो मर गया है, उसके पीछे स्वयं मर जाना ठीक नहीं है, क्या दशरथ के पुत्र श्रीराम परलोक में नहीं गये? क्या अपने पराक्रम के बल पर शत्रुओं को जीतने के अनन्तर रघुश्रेष्ठ श्रीराम परलोक नहीं गये । अन्य और भी सैकड़ों राजा उनके लिये युद्धभूमि में मृत्यु को प्राप्त हुए और अब वे अनेक प्रकार की अपनी कीर्ति को स्थापित करके स्वर्गलोक में सुखपूर्वक स्थित हैं ॥ ४३–४५ ॥ ब्रह्माजी बोले — तदनन्तर उन सभी ने विल्व तथा चन्दन की लकड़ी से उसका दाहसंस्कार किया । पतिव्रता के गुणों से सम्पन्न उसकी भार्या दुर्गा उसी के साथ सती हो गयी । तदनन्तर दैत्य सिन्धु के पिता चक्रपाणि नगरनिवासियों के साथ मयूरेश के समीप में गये, उन्होंने उन्हें नमस्कार किया और फिर हाथ जोड़कर वे धीरे-धीरे उनकी स्तुति करने लगे ॥ ४६-४७ ॥ राजा बोले — हे विभो ! आप निर्गुण हैं, परमात्मा हैं, सम्पूर्ण चर एवं अचर जगत् की गति हैं, आप वेदत्रयी के द्वारा गम्य नहीं हैं, सत्त्वादि तीनों गुणों के स्वामी हैं, निर्मल स्वरूप वाले हैं और सम्पूर्ण जगत् के स्वामी हैं। आपकी माया के कारण ही मोहित देवता आपको भलीभाँति नहीं जान पाते हैं । हे प्रभो ! आज आपके दर्शन से मैं धन्य हो गया हूँ और ये सभी गण्डकी-नगर में निवास करने वाले भी धन्य हो गये हैं ॥ ४८-४९ ॥ ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार राजा के द्वारा स्तुत किये गये, सभी शास्त्रों के तत्त्वार्थ को जानने वाले एवं कृपासिन्धु देव मयूरेश अत्यन्त प्रसन्नता के साथ बोले ॥ ५० ॥ देव बोले — हे चक्रपाणे! आपका पुत्र मृत्यु को प्राप्त हो गया है, आप मुझसे वर माँग लें ॥ ५०१/२ ॥ राजा बोले — हे देवेश्वर ! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और यदि आप मुझे वर देना चाहते हैं, तो आप हम लोगों के घर में पधारिये और इस गण्डकीनगरी को पवित्र कीजिये ॥ ५११/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — राजा का इस प्रकार का वचन सुनकर मयूरेश ने मोर पर आरूढ़ होकर चक्रपाणि के नगर गण्डकी को प्रस्थान किया। उनके पीछे-पीछे भगवान् शंकर तथा माता पार्वती भी गये। उन सभी के आगे-आगे वे सभी गण तथा मुनिगण प्रसन्नमन होकर चल रहे थे। समस्त वाद्यों की ध्वनि के साथ वे सभी उस गण्डकीनगर की ओर गये, जो विविध प्रकार की ध्वजाओं और पताकाओं से सुसज्जित था और जहाँ के मार्ग जल आदि के छिड़काव से स्वच्छ किये गये थे ॥ ५२-५४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘मयूरेश का गण्डकीनगरी के लिये प्रस्थान का वर्णन’ नामक एक सौ चौबीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२४ ॥ Content is available only for registered users. 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