November 29, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-139 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ एक सौ उनतालीसवाँ अध्याय गणेशगीता – कर्मयोग अथः नवत्रिशदधिकशततमोऽध्यायः गणेशगीता – कर्मयोगोनाम द्वितीयोऽध्यायः वरेण्य ने कहा — हे भगवन्! आपने ज्ञाननिष्ठा और कर्मनिष्ठा दोनों का वर्णन किया, आप दोनों में से एक निश्चयकर जो कल्याणदायक हो, उसे कहिये ॥ १ ॥ श्रीगजानन बोले — हे प्रिय ! मेरे द्वारा पूर्वकाल में [सांख्ययोग तथा वैधयोग (कर्मयोग) नामवाली] दो स्थितियाँ (साधनक्रम) बतलायी गयीं। इस चराचर जगत् में सांख्ययोगियों अर्थात् आत्मा-अनात्मा के विवेक में समर्थ जनों के लिये बुद्धियोग और कर्मी (कर्मनिष्ठ गृहस्थ आदि) जनों के लिये वैधयोग (कर्मयोग) अनुष्ठेय है। वैध (विधिविहित स्वधर्मपालनादिरूप) कर्मों का अनुष्ठान न करने से कोई व्यक्ति निष्क्रिय नहीं होता अर्थात् निष्कर्मता को प्राप्त नहीं हो सकता । हे राजन् ! केवल कर्मों के ही त्याग देने से सिद्धि नहीं होती ॥ २-३ ॥ किसी दशा में, क्षणमात्र भी बिना कर्म किये कोई नहीं रह सकता है। प्रकृति के स्वाभाविक तीनों गुण सबको अवश्य ही कर्म कराते हैं ॥ ४ ॥ जो कर्म करने वाला, इन्द्रियों को रोककर मन-ही- मन इन्द्रियों के विषयों का स्मरण करता है, उस इन्द्रियलोलुप दुरात्मा को तुच्छ आचार वाला कहा जाता है ॥ ५ ॥ हे राजन्! जो मन से इन्द्रियों का संयम करके कर्मेन्द्रियों से निष्काम कर्मयोग का अनुष्ठान करता है, वही श्रेष्ठ पुरुष है ॥ ६ ॥ कर्म न करने से तो बिना फल की कामना किये कर्म करना भी श्रेष्ठ है, कारण कि सब कर्मों का त्याग करने से तो शरीर-यात्रा भी नहीं हो सकती ॥ ७ ॥ जो प्राणी कर्मों का फल मुझमें समर्पण नहीं करते, वे बन्धन में पड़ते हैं, इस कारण से निष्काम कर्म का अनुष्ठान करते हुए उसका फल निरन्तर मुझे अर्पण करके कर्मबन्धन का नाश करना चाहिये। जो कर्म मेरे निमित्त किये जाते हैं, वे कहीं और कभी बन्धन के कारण नहीं होते, किंतु जो वासनापूर्वक (फलासक्तिपूर्वक) किये गये कर्म हैं, वे ही बलात् प्राणी को बाँधते हैं ॥ ८-९ ॥ पूर्वकाल में मैंने यज्ञकर्मों के ही साथ-साथ ब्राह्मणादि वर्णों को रचकर कहा — हे मनुष्यो ! तुम यज्ञ से वृद्धि को प्राप्त होओ, यह यज्ञ कल्पवृक्ष के समान तुम्हारी इष्टसिद्धि को देने वाला हो ॥ १० ॥ तुम देवताओं को अन्न से तृप्त करो, देवता तुमको (वर्षा आदि से) प्रसन्न करें, इस प्रकार परस्पर वृद्धि करते हुए वे देवगण और तुम मनुष्यो ! श्रेष्ठ तथा सुस्थिर स्थान को प्राप्त करें ॥ ११ ॥ देवता प्रसन्न होकर मनोवांछित अभीष्टों को पूर्ण करते हैं, उन देवताओं के दिये पदार्थों से उनकी आराधना किये बिना जो मनुष्य भोग भोगता है, वह चोर है ॥ १२ ॥ जो देवाराधनरूप यज्ञ करके अवशिष्ट अन्न का भोजन करते हैं, वे सभी पापों से मुक्त होते हैं और जो अपने निमित्त ही भोजन बनाते हैं, वे पापी मानो पाप का ही भोजन करते हैं। अन्न से ही प्राणी उत्पन्न होते हैं, अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है, वर्षा यज्ञ से उत्पन्न होती है और विहित कर्म से यज्ञ की उत्पत्ति होती है ॥ १३-१४ ॥ कर्म ब्रह्मा से उत्पन्न होता है और ब्रह्मा मुझसे उत्पन्न होते हैं – इस कारण हे राजन् ! आप इस यज्ञ में और विश्व में स्थित मुझे ही जानिये ॥ १५ ॥ इस आवागमनरूपी संसारचक्र से बुद्धिमानों को पार जाना उचित है, हे राजन् ! जो अधम प्राणी है, वह इसमें इन्द्रियों की क्रीडा से सुख मानता है ॥ १६ ॥ जो अन्तरात्मा में प्रीति करने वाला है, वही आत्माराम और सबका प्यारा है, जो प्राणी आत्मतृप्त है, उसे किसी बात की इच्छा नहीं रहती ॥ १७ ॥ इस प्रकार का प्राणी कार्याकार्य करके भी शुभ-अशुभ फल को नहीं प्राप्त होता तथा सम्पूर्ण प्राणियों में इसका कभी कुछ भी साध्य नहीं होता ॥ १८ ॥ हे राजन्! इसलिये प्राणियों को आसक्तिरहित होकर कर्म करना उचित है, जो आसक्त होता है, उसकी दुर्गति होती है और अनासक्त मुझे प्राप्त हो जाता है ॥ १९ ॥ [हे राजन्!] प्राचीन काल में कर्म करके बहुत से राजर्षि और ब्रह्मर्षि परमसिद्धि को प्राप्त हुए हैं । लोकसंग्रह के निमित्त अनासक्त होकर कर्म करना उचित है ॥ २० ॥ जो कर्म महान् पुरुष करते हैं, वही कर्म अन्य सब करते हैं, वे जिसको प्रमाण मानते हैं, दूसरे भी उसी को मानते हैं। हे राजन्! मुझे कोई वस्तु स्वर्गादि में भी दुर्लभ नहीं है और मैं कर्म करके किसी अप्राप्त वस्तु को प्राप्त करने की भी इच्छा नहीं करता हूँ, फिर भी मैं कर्म करता हूँ और हे महामते! यदि मैं आलसी तथा स्वच्छन्द होकर कर्म न करूँ तो सभी वर्ण कर्म छोड़कर केवल मेरा अनुगमन करने लगेंगे ॥ २१–२३ ॥ तब मेरे ऐसा करने से सब वर्ण आचारभ्रष्ट होकर नष्ट हो जायँगे। इससे इस संसार का नाश करने वाला और वर्णसंकर को उत्पन्न करने वाला भी मैं ही होऊँगा ॥ २४ ॥ जिस प्रकार से कामना वाले लोग अज्ञान से सदा कर्म करते रहते हैं, इसी प्रकार विद्वान् को उचित है कि लोकसंग्रह के निमित्त आसक्तिरहित होकर वह कर्म करता रहे। अज्ञान से कर्म करने वालों की भेदबुद्धि का त्याग करे तथा योगयुक्त होकर कर्म करता हुआ वे सब कर्म मुझे अर्पण कर दे ॥ २५-२६ ॥ [हे राजन्!] अविद्या और गुणों के वशीभूत हो निरन्तर कर्म करने में लगा हुआ व्यक्ति अहंकार से मूढ़ होकर अपने को कर्ता बताता है । जो कोई आत्मज्ञ जब सत्त्वादि गुणों तथा उनके कर्मों के विभाग को इस प्रकार जानते हैं कि इन्द्रियाँ ही अपने विषयों में वर्तमान हैं, तो वे ऐसा जानकर कर्म में लिप्त नहीं होते ॥ २७-२८ ॥ सत्त्व, रज, तम — इन तीन गुणों से मोहित हुए प्राणी फल की इच्छा से कर्म करते हैं, उन आत्मद्रोहियों को सर्वज्ञ पुरुष कर्ममार्ग से चलायमान न करे और स्वयं भी आसक्त न हो। इस प्रकार पण्डित को उचित है कि मुझमें ही नित्य नैमित्तिक कर्म को अर्पण कर दे तो वह अहंता और ममता बुद्धि का त्याग करके परमगति को प्राप्त हो जाता है ॥ २९-३० ॥ ईर्ष्या न करने वाले जो भक्तिमान् मनुष्य मेरे कहे हुए इस शुभ मार्ग का अनुष्ठान करते हैं, वे सब कर्मों से ही मुक्त हो जाते हैं। जो अज्ञान से चित्त के नष्ट होने के कारण इस मार्ग का अनुष्ठान नहीं करते हैं, उन ईर्ष्यालु, मूर्ख और नष्टबुद्धियों को मेरा शत्रु जानो ॥ ३१-३२ ॥ जब ज्ञानवान् भी अपने स्वभाव के अनुसार चेष्टा करता है और उसी स्वभाव का अनुगमन करता है तो ऐसे में किसी भी प्रकार का नियन्त्रण व्यर्थ है ॥ ३३ ॥ कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों के विषयों में काम और क्रोध उत्पन्न होते हैं, इनके वश में नहीं होना चाहिये, कारण कि ये ही प्राणी के शत्रुरूप हैं ॥ ३४ ॥ अपना धर्म यदि गुणरहित हो तो भी अच्छा है और दूसरे का धर्म गुणयुक्त होने से भी भला नहीं, अपने धर्म में मरना भी परलोक में कल्याणकारी है, परंतु दूसरे का श्रेष्ठ धर्म भी भय प्रदान करता है ॥ ३५ ॥ वरेण्य ने कहा — हे गणेशजी ! प्राणी जो पाप करता है, वह किसके द्वारा प्रेरित होता है ? इच्छा नहीं होने पर भी बलात् किससे प्रेरित होता हुआ वह पापाचरण करता है? ॥ ३६ ॥ श्रीगणेशजी बोले — रजोगुण और तमोगुण से उत्पन्न हुए ये काम और क्रोध ही दो महापापी हैं। ये लोगों को अपने वश में करते हैं, इन्हीं दोनों को तुम महान् शत्रु जानो। जिस प्रकार माया जगत् को ढकती है, जैसे भाप जल को और जैसे वर्षाकाल का मेघ सूर्य को ढक लेता है, इसी प्रकार काम और क्रोध ने सबको ढक लिया है ॥ ३७-३८ ॥ महाबली, सदैव द्वेष करने वाले और कभी पूरा न हो सकने वाले इस इच्छारूप काम ने ही बुद्धिमानों के ज्ञान को भी ढक रखा है ॥ ३९ ॥ यह काम बुद्धि, मन तथा इन्द्रियों के आश्रित होकर रहता है, उन्हीं से ज्ञान को आच्छादित करके यह ज्ञानियों को भी मोहित करता है। अतः पहले मन के सहित इन्द्रियों को वश में करके ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले इस मनोभव पापी काम को जीतना चाहिये ॥ ४०-४१ ॥ स्थूल देह से इन्द्रियाँ परे हैं, इन्द्रियों से परे मन है, मन से परे बुद्धि है और बुद्धि से परे आत्मा है ॥ ४२ ॥ इस प्रकार बुद्धि से आत्मा को जानकर, बुद्धि से ही मन को स्थिर करके कामरूपी शत्रु को मारकर परम पद को प्राप्त करना चाहिये ॥ ४३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘कर्मयोग’ नामक एक सौ उनतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३९ ॥ श्रीगणेशपुराणे क्रीडाखण्डे नवत्रिशदधिकशततमोऽध्यायः Content is available only for registered users. 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