श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-144
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
एक सौ चौवालीसवाँ अध्याय
गणेशगीता – श्रीगणेशजी का राजा वरेण्य से उपासना-योग का वर्णन करना
चतुर्थोचत्वारिंशादधिकशततमोऽध्यायः ।
गणेशगीता – “उपासना योगो” नाम सप्तमोऽध्याय

वरेण्य बोले — हे गजानन ! शुक्ला गति और कृष्णा गति किसको कहते हैं, ब्रह्म क्या है और संसृति क्या है, यह सब आप मुझसे कृपाकर कहिये ॥ १ ॥

श्रीगणेशजी बोले — अग्नि, ज्योति और दिवास्वरूपा शुक्लगति होती है, जो कि उत्तरायण है। चन्द्र, ज्योति, धूम और रात्रिस्वरूपा कृष्णगति दक्षिणायन कही गयी है। ये दोनों गतियाँ कर्मानुसार जीवों को ब्रह्म और संसार की प्राप्ति में कारण हैं । यह सब दृश्य और अदृश्य जगत् प्रपंच ब्रह्म ही है – ऐसा जानो ॥ २-३ ॥ पंचमहाभूतों को क्षर कहते हैं, उसके अनन्तर अक्षर है, इन दोनों का अतिक्रमणकर जो स्थित है, उसे शुद्ध सनातन ब्रह्म जानो ॥ ४ ॥ अनेक जन्मों की सम्भूति ( आवागमन) – को संसृति कहते हैं, इस संसृति को वे प्राप्त होते हैं, जो मुझे नहीं मानते। जो ध्यान, पूजन और पंचामृतादि उपचारों से सम्यक् प्रकार से मेरी उपासना करते हैं, वे परब्रह्म को प्राप्त होते हैं ॥ ५-६ ॥

स्नान, वस्त्र, अलंकार, उत्तम गन्ध, धूप, दीप, नैवेद्य, फल, ताम्बूल, दक्षिणा आदि से भक्तिपूर्वक एकचित्त से जो मेरी पूजा करता है, मैं उसके मनोरथ को पूर्ण करता हूँ। इस प्रकार प्रतिदिन भक्तिपूर्वक मेरे भक्त को मेरी पूजा करनी चाहिये ॥ ७-८ ॥ अथवा स्थिरचित्त से मानसीपूजा करे। अथवा फल, पत्र, पुष्प, मूल, जल आदि से जो यत्नपूर्वक मेरी पूजा करता है, वह इष्ट फल को प्राप्त करता है। तीनों प्रकार की पूजा में मानसी पूजा श्रेष्ठ है ॥ ९-१० ॥ वह भी यदि कामनारहित होकर की जाय तो अति उत्तम है। ब्रह्मचारी, गृहस्थ अथवा वानप्रस्थ या संन्यासी अथवा कोई भी व्यक्ति हो, जो मेरी केवल पूजा ही करता है अर्थात् अन्य साधन नहीं करता, वह भी सिद्धि को प्राप्त होता है। मुझे छोड़कर और मुझसे द्वेषकर जो अन्य किसी देवता का भक्ति से पूजन करता है। हे राजन्! वह भी मेरी ही पूजा करता है, किंतु विधिपूर्वक नहीं। जो अन्य देवता का अथवा मेरा पूजन करके अन्य के प्रति द्वेष करता है, वह सहस्र कल्पवर्ष तक नरक में पड़कर सदा दुःख भोगता है ॥ ११–१३१/२

[पूजनार्थ उद्यत साधक] सर्वप्रथम भूतशुद्धि करके फिर प्राणायाम करे। फिर चित्त की वृत्तियों का निरोध करके न्यास करे, पहले अन्तर्मातृकान्यास करके फिर बहिर्मातृकान्यास तथा षडंगन्यास करे ॥ १४-१५ ॥ इसके उपरान्त मूलमन्त्र का न्यास करके ध्यान करे और  स्थिर चित्त से गुरुमुख से सुने हुए मन्त्र का जप करे। फिर देवता के निमित्त जप को निवेदन कर अनेक स्तोत्रों से स्तवन करे। इस प्रकार से जो मेरी उपासना करता है, वह सनातनी मुक्ति को प्राप्त होता है ॥ १६-१७ ॥ जो मनुष्य उपासना से हीन है, उसे धिक्कार है और उसका जन्म वृथा है। यज्ञ, औषध, मन्त्र, अग्नि, आज्य, हवि और हुत – यह सब मेरा ही स्वरूप है ॥ १८ ॥

ध्यान, ध्येय, स्तुति, स्तोत्र, नमस्कार, भक्ति, उपासना, वेदत्रयी से जानने योग्य, पवित्र, पितामह का पितामह- सब मैं ही हूँ ॥ १९ ॥ ओंकार, पावन, साक्षी, प्रभु, मित्र, गति, लय, उत्पत्ति, पोषक, बीज, शरण, इसी प्रकार असत्, सत्, मृत्यु, अमृत, आत्मा, ब्रह्म, दान, होम, तप, भक्ति, जप, स्वाध्याय – यह सब मैं ही हूँ ॥ २०-२१ ॥ यह जो कुछ भी करे, वह सब मुझे निवेदन कर दे। मेरा आश्रय ग्रहण करने वाले स्त्री, दुराचारी, पापी, क्षत्रिय – वैश्य – शूद्रादि भी मुक्त हो जाते हैं, फिर मेरे भक्त द्विजाति की तो बात ही क्या है ? मेरा भक्त मेरी इन विभूतियों को जानकर कभी नष्ट नहीं होता ॥ २२-२३ ॥ मेरे प्रभव (उत्पत्ति) और मेरी विभूतियों को देवता और ऋषि भी नहीं जानते। मैं अनेक विभूतियों से विश्व को व्याप्त करके स्थित हूँ । जो-जो इस लोक में श्रेष्ठतम हैं, वे सब मेरी विभूति हैं – ऐसा समझो ॥ २४-२५ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘उपासनायोग का वर्णन’ नामक एक सौ चौवालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४४ ॥

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