श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-147
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
एक सौ सैंतालीसवाँ अध्याय
दैवी, आसुरी और राक्षसी प्रकृति
अथः सप्तचत्वारिंशादधिकशततमोऽध्यायः ।
गणेशगीता – “उपदेशयोगो” नाम दशमोऽध्यायः

श्रीगणेशजी बोले — दैवी, आसुरी, राक्षसी- तीन प्रकार की मनुष्यों की प्रकृति होती है, उनके फल और चिह्न संक्षेप से अब तुम्हारे लिये वर्णन करता हूँ ॥ १ ॥ दैवी प्रकृति मुक्ति को सिद्ध करती है, आगे की दोनों बन्धन में डालती हैं। इनमें पहले दैवी प्रकृति के चिह्न कहता हूँ, उन्हें तुम सुनो ॥ २ ॥ चुगली न करना, दया, अक्रोध, अचपलता, धैर्य, सरलता, तेज,  अभय, अहिंसा, क्षमा, शौच, निरभिमानिता इत्यादि चिह्न दैवी प्रकृति के समझने चाहिये। अब आसुरी के चिह्न सुनो ॥ ३ ॥ हे राजन्! अतिवाद, अभिमान, दर्प, अज्ञान और क्रोध – ये आसुरी प्रकृति के चिह्न हैं ॥ ४ ॥ [राक्षसी प्रकृति के ये चिह्न हैं- ] निष्ठुरता, मद, मोह, अहंकार, गर्व, द्वेष, हिंसा, क्रूरता, क्रोध, उद्धतता, विनयहीनता, दूसरों के नाश के निमित्त अभिचारकर्म, क्रूर कर्मों में प्रीति । श्रेष्ठ पुरुषों के वाक्य में अविश्वास, अपवित्रता, कर्मों का न करना, वेद, भक्त, देवता, मुनि, श्रोत्रिय, ब्राह्मण तथा स्मृति और पुराण की निन्दा करना, पाखण्ड- वाक्यों में विश्वास, दुष्टों तथा मलिन पुरुषों की संगति करना ॥ ५–८ ॥ पाखण्डसहित कर्म करना, दूसरे की वस्तुओं को पाने की इच्छा, अनेक कामनाओं से युक्त होना, सदा झूठ बोलना, दूसरे का उत्कर्ष न सहना, दूसरे के कृत्य को नष्ट करना इत्यादि बहुत सारे दूसरे भी राक्षसी प्रकृति के गुण हैं ॥ ९-१० ॥

पृथ्वी और स्वर्गलोक में ये सब गुण रहते हैं। जो लोग मेरी भक्ति से रहित हैं, वे ही राक्षसी प्रकृति को प्राप्त होते हैं। हे राजन्! जो इस तामसी प्रकृति का आश्रय लेते हैं, वे रौरव नरक को प्राप्त होते हैं और वहाँ अकथनीय दुःख को भोगते हैं ॥ ११-१२ ॥ हे राजन् ! वे तमोगुणी लोग दैववश नरक से निकलकर भूलोक में हीन जातियों में जन्मान्ध, पंगु, कुबड़े और दीन होकर जन्म लेते हैं ॥ १३ ॥ पापाचरणवाले तथा मुझमें भक्ति न करने वाले पतित होते हैं, परंतु मेरे भक्त चाहे किसी भी योनि में जन्म लें, नष्ट नहीं होते, उनका उद्धार हो जाता है ॥ १४ ॥

हे राजन्! यज्ञ से अथवा दूसरे कर्मों से स्वर्ग की प्राप्ति होती है, जो सकाम पुरुषों को सुलभ है, परंतु मुझमें भक्ति होना दुर्लभ है ॥ १५ ॥ मूर्ख लोग मोहजाल तथा अपने कर्मों से बन्धन में पड़ते हैं, वे मैं ही हन्ता, मैं ही कर्ता, मैं ही भोक्ता हूँ- ऐसा कहा करते हैं। मैं ही ईश्वर, मैं शासक, मैं जानने वाला, मैं सुखी हूँ — इस प्रकार की मति मनुष्यों को नरक में ले जाती है ॥ १६-१७ ॥ इस कारण तुम इस (तामसी प्रकृति) – को छोड़कर दैवी प्रकृति का आश्रय करो और दृढ़ चित्त से मेरी निरन्तर भक्ति करो ॥ १८ ॥

हे राजन्! वह भक्ति भी सात्त्विकी, राजसी और तामसी – इन भेदों से तीन प्रकार की है। जिस भक्ति से देवताओं का भजन किया जाता है, वह कल्याणकारिणी सात्त्विकी भक्ति कही गयी है। जन्म-मृत्यु देने वाली भक्ति राजसी कही गयी है, जिसमें सर्वभाव से यक्ष और राक्षसों की ही पूजा होती है ॥ १९-२० ॥ जो लोग वेदविधान से रहित, क्रूरता, अहंकार तथा दम्भसहित हैं, जो प्रेतभूतादिकों को भजते हैं और कामुक कर्म करते हैं तथा दुराग्रहपूर्वक अपने शरीर और उसमें स्थित मुझे भी क्लेश पहुँचाते हैं, उनकी यह तामसी भक्ति नरक देने वाली है ॥ २१-२२ ॥ काम, लोभ, क्रोध, दम्भ- ये नरक के चार महाद्वार हैं, इस कारण इनको त्यागना चाहिये ॥ २३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘योगोपदेशवर्णन’ नामक एक सौ सैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४७ ॥

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