December 4, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-149 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ एक सौ उनचासवाँ अध्याय ब्रह्माजी के द्वारा व्यासदेव की जिज्ञासा का समाधान, कलियुगवर्णन एवं कलियुग के अन्त में गणपति का अवतीर्ण होकर धर्म-संस्थापन अथः एकोनपञ्चाशदुत्तरशततमोऽध्यायः मुनिविसर्जनं ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार से [देवताओं, ऋषियों तथा राजाओं से] पूजित होकर विभु गजानन उस राजपूजित सदन (राजसदन नामक स्थान)-में भक्तों की कामनाओं को पूर्ण करते हुए निवास करने लगे ॥ १ ॥ मुनि ने कहा — हे देव! आपने विनायक के महिमा वर्णन के प्रसंग में विभिन्न प्रकार के कथानकों का निरूपण किया है। उन्होंने वरेण्य के भवन में अवतीर्ण होकर विघ्नासुर अर्थात् सिन्दूरासुर का वध किया। हे चतुरानन! गजानन की गजमुख-प्राप्ति का आपने वर्णन किया और इसी प्रसंग में पार्वतीजी के गर्भ से गजाननरूप से गणपति के आविर्भाव का भी आपने निरूपण किया है। इसके कारण मैं सन्देह में पड़ गया हूँ । आपके अतिरिक्त सन्देहों को नष्ट करने वाला तीनों लोकों में दूसरा कोई नहीं है ॥ २-४ ॥ ब्रह्माजी बोले — हे व्यास ! विभु गजानन नानाविध शक्तियों से सम्पन्न हैं, अतः उनके विषय में सन्देह नहीं करना चाहिये। वे स्वेच्छावश कल्पों के भेद से भिन्न- भिन्न रूपों में अवतीर्ण हुआ करते हैं ॥ ५ ॥ कभी वे भगवान् शंकर के मुख से, कभी उनके क्रोधावेश से, कभी पार्वतीजी के तेज से, तो कभी उनके उदर से और कभी उनके शरीर के मैल (उबटन) – से अवतीर्ण हुए हैं। उनका स्वरूप कभी तो दो मुखों वाला प्रकट हुआ और कभी पाँच एवं छः मुखों से युक्त दृष्टिगोचर होता रहा है। कभी वे दो भुजाओं से समन्वित होते हैं, तो कभी [चार भुजाओं, छः भुजाओं और कभी] दश भुजाओं, द्वादश भुजाओं और सहस्र भुजाओं से भी शोभित होते हैं। सभी आगमग्रन्थ उनके नानाविध ध्येय स्वरूपों का निर्देश करते हैं । हे मुने ! [इसलिये] प्रभु गजानन के सम्बन्ध में तुम्हें विस्मय या संशय नहीं करना चाहिये ॥ ६-८१/२ ॥ लिंगपुराण में शिव से ब्रह्मा और विष्णु की उत्पत्ति बतायी गयी है। स्कन्दपुराण में ब्रह्मा के नेत्रों से शिव का प्रादुर्भाव वर्णित है। विष्णु शिव का ध्यान करते हैं और शिव भी विष्णु के ध्यान में निरत रहते हैं । वे प्रभु शिव पंचाक्षर मन्त्र के साथ तारक मन्त्र का उपदेश करते हैं । भगवान् शंकर ने सौ करोड़ श्लोकों में रामचरित [का प्रणयन किया और उस] -को तीन भागों में विभक्तकर [ एक-एक भाग स्वर्ग तथा पाताल में रखा और तीसरे भाग के सहित] तारकमन्त्र ( रामनाम ) – को पृथिवीलोक में स्थापित किया। यह सृष्टि कभी शिव से, कभी विष्णु से, कहीं देवी से, कहीं सूर्य से, कहीं गजानन से तो कहीं [निर्गुण निराकार] ब्रह्म [की सिसृक्षा] – से उत्पन्न बतायी गयी है। ये सभी परस्पर विरोधी बातें शास्त्रसम्मत हैं। इनमें जो सन्देह करता है, वह निश्चय ही नरकगामी होता है ॥ ९-१३१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — हे मुने! इस प्रकार द्वापरयुग की समस्त [लीला] कथा मैंने आपको बतलायी, अब मैं कलियुग से सम्बन्धित कथा का वर्णन करूँगा ॥ १४१/२ ॥ हे मुने! कलियुग के आ जाने पर लोग सदाचार से च्युत तथा असत्यभाषी हो जायँगे। ब्राह्मण स्नान-सन्ध्या तथा वेदाभ्यास का परित्याग कर देंगे। उनकी यजन, याजन तथा दानकृत्यों में प्रवृत्ति नहीं होगी और वे दुष्ट पुरुषों से अत्यन्त गर्हित दान ग्रहण करेंगे, सभी लोग दूसरे के कलंक की चर्चा करेंगे, निन्दा में तत्पर रहेंगे और परस्त्रियों के साथ अनुचित व्यवहार करेंगे ॥ १५–१७ ॥ वे लोग सब प्रकार से कर्तव्यों का परित्याग कर देंगे और प्रत्येक स्थिति में अवश्य ही विश्वासघात करेंगे। अवैध कार्यों को सफल बनाने के लिये वे मिथ्या शपथ ग्रहण करेंगे। हे मुनीश्वर ! उस समय धरातल पर मेघ कहीँ भी [भलीभाँति] वर्षा नहीं करेंगे। महानदियों के तटवर्ती भूभाग भी कृषि के उपयोग में लिये जायँगे। जो बलवान् होगा, वह निर्बल के धन का बलात् अपहरण कर लेगा और उससे दूसरे दो लोग मिलकर हरण करेंगे तथा ऐसे ही उन दो बलवानों से तीन (अथवा अधिक) लोग बलपूर्वक [धन आदि] छीन लेंगे ॥ १८-२०१/२ ॥ कलियुग में शूद्र वेदाभ्यास करेंगे और ब्राह्मण शूद्रोचित कर्मों में प्रवृत्त हो जायँगे । क्षत्रिय वैश्यों के और वैश्य शूद्रों के लिये विहित [जीविका-सम्बन्धी ] कर्मों का सम्पादन करेंगे। ब्राह्मण चाण्डाल तक से दान ग्रहण करेंगे ॥ २१-२२ ॥ [कलियुग के] विचारशून्य लोग धनहीन [और शोकवश] हाहाकार करने वाले होंगे। वे अपनी आवश्यकताओं को सामने रखकर दूसरों से धन की याचना करेंगे और [ लौटाने के समय ] कहेंगे कि हमने तो तुमसे तनिक-सा भी धन नहीं लिया है। लोग रिश्वत लेकर झूठी गवाही देंगे और सज्जनों की निन्दा तथा दुर्जनों से मित्रता करेंगे। द्विज व्यर्थ में ही [पशुओं को मारकर ] मांस का भक्षण करेंगे ॥ २३-२५ ॥ [ कलियुग में] सत्पुरुषों का उन्मूलन और दुराचारियों का अभ्युदय देखा जायगा । लोग देवताओं की अर्चना का त्याग करके ऐन्द्रिक अर्थात् इन्द्रजाल सम्बन्धिनी (जादू- टोना) विद्याओं का आश्रय लेंगे। वे भूत-प्रेत-पिशाचादि की उपासना में दत्तचित्त रहेंगे। ब्राह्मण भाँति-भाँति के वेष धारण करके अपना उदर-भरण करने लगेंगे। कुछ क्षत्रिय अपने कुलोचित आचार से भ्रष्ट होकर भिक्षावृत्ति से भी जीवन निर्वाह करेंगे। लोग व्रत-नियमादि का अल्पमात्र भी अनुपालन नहीं करेंगे ॥ २६-२८ ॥ पृथ्वी पर रहने वाले लोग वर्णसांकर्य को जन्म देने वाले कार्यों को करने लगेंगे और पतिव्रताएँ अपने पातिव्रत्यधर्म से च्युत हो जायँगी। सभी [वर्णाश्रमी] लोग म्लेच्छों के समान पराये धन का अपहरण करने वाले, दयाशून्य, कुमार्गगामी तथा सर्वदा सत्य से रहित व्यवहार करने वाले हो जायँगे ॥ २९-३० ॥ भूमि में सस्य अर्थात् फसल नहीं उगेगी और वृक्ष नीरस हो जायँगे। कन्याएँ पाँच- च-छः वर्ष की आयु में ही प्रसव करने लगेंगी। कलियुग में मनुष्यों की परमायु सोलह वर्ष होगी अर्थात् उनकी अधिकतम सोलह वर्ष ही जीने की अवधि होगी । तीर्थ और देवालय अपने दिव्य स्वरूप को अन्तर्हित कर लेंगे ॥ ३१-३२ ॥ जब इस प्रकार पाप बढ़ने लगेगा और धर्म क्षीण होता जायगा, तो देवगण [ यज्ञ-यागादि के अभाव में] भूखों मरने लगेंगे। तब स्वाहाकार, स्वधाकार, वषट्कारादि [के माध्यम से जो हविष्य देवता प्राप्त करते थे, उस] – के अभाव के कारण भयाकुल हुए देवगण अनामय गजाननदेव की शरण में जायँगे ॥ ३३-३४ ॥ वे सभी विघ्नों का नाश करने वाले उन देवेश्वर गजानन का भाँति-भाँति से स्तवन और अभिवन्दन करेंगे तथा प्रार्थना करेंगे। देवताओं की ऐसी प्रार्थना का पूर्णतः विचार करने के उपरान्त भगवान् गजानन अवतार ग्रहण करेंगे। उस समय उनके सूप के जैसे कान होंगे और वे धूम्रवर्ण नाम से विख्यात होंगे ॥ ३५-३६ ॥ क्रोध से मानो जलते हुए भगवान् गजानन तब हाथ में खड्ग लेकर नीलवर्ण अश्व पर आरूढ़ होंगे और अपनी इच्छा के अनुरूप अनेक रूपों वाली सेना का निर्माण करेंगे। वे बिना प्रयत्न किये [अपने संकल्पबल से] बड़े- बड़े अस्त्र-शस्त्रों को प्रकट करेंगे और सेना के सहयोग तथा अपने तेज से उन महाम्लेच्छों का वध करेंगे। उस समय गजाननदेव उन सारे लोगों का वध करेंगे, जो म्लेच्छों के जैसा आचरण कर रहे होंगे ॥ ३७-३८१/२ ॥ वे देवेश्वर [वनों और] कन्दराओं में छिपे तथा वन के कन्द-मूल, फल खाकर जीवन निर्वाह करने वाले ब्राह्मणों को बुलवायेंगे और उन्हें समादृत करके भूमिदान करेंगे तथा समस्त जनता को सत्कर्मनिरत एवं सज्जन बनायेंगे अर्थात् लोगों को अनुशासित कर नैतिक जीवन जीने की शिक्षा देंगे ॥ ३९-४० ॥ तब (उनके ऐसा करने पर) सम्पूर्ण विश्व धर्ममर्यादा में आबद्ध हो जायगा और सत्ययुग का प्रारम्भ होगा । गजाननदेव इस प्रकार धूम्रवर्णावतार के द्वारा धर्ममर्यादा की स्थापना करने के अनन्तर अन्तर्धान हो जायँगे ॥ ४१ ॥ हे अनघ व्यासजी! इस प्रकार मैंने महात्मा विघ्नेश्वर के चारों युगों में होने वाले नाम तथा रूप तुमको बतलाये और उनके चित्र-विचित्र लीलाकृत्यों का भी सम्पूर्ण रूप से वर्णन किया, जिनका केवल श्रवण करने से भी सभी प्राणी मोक्ष प्राप्त करते हैं ॥ ४२-४३ ॥ गजाननदेव के स्वरूप अन्तहीन हैं, अतः [उनका समग्रतया] वर्णन कर पाना मेरी शक्ति के बाहर है। जिनकी महिमा का वर्णन करने में चारों वेद कुण्ठित हो जाते हैं, वहाँ मेरी अथवा मेरे जैसे किसी अन्य व्यक्ति की तो बात ही क्या है ? [हे व्यासजी !] अब आप अनुष्ठान के लिये प्रस्थान कीजिये और मैं भी अपने [सृष्टि-] प्रपंच को सम्हालता हूँ ॥ ४४-४५ ॥ भृगुजी बोले — हे सोमकान्त ! ब्रह्माजी के मुख से सभी पापों का नाश करने वाली कथा का श्रवण करके व्यासजी बड़े प्रसन्न हुए और उनसे कहने लगे ॥ ४६ ॥ मुनि बोले — इस परम अद्भुत आख्यान को सुनकर मैं तृप्त नहीं हो पा रहा हूँ । आपका मुझ पर बड़ा अनुग्रह हुआ है, मैं धन्य हो गया हूँ; क्योंकि गणपतिचरित्र- मूलक इस कथानक के माध्यम से आपने मेरे सभी सन्देह दूर कर दिये । इसे बारम्बार सुनकर भी मुझे वैसे ही तृप्ति नहीं मिल रही है, जैसे अमृत कितना ही पिया जाय, तृप्ति नहीं होती ॥ ४७-४८ ॥ इस आख्यान के श्रवणमात्र से जन्म-जन्मान्तर में अर्जित पाप भी नष्ट हो जाते हैं तथा सभी अभिलाषाएँ पूर्ण हो जाती हैं। इस पुराण को सुनने का अवसर मनुष्यों को पूर्वकृत पुण्यों के कारण ही मिलता है । सर्वसिद्धिप्रद यह पुराण दुर्जन को सुनाने योग्य नहीं है ॥ ४९-५० ॥ भृगुजी बोले — इस प्रकार कहकर व्यासजी ने स्वयम्भू ब्रह्माजी को प्रणाम किया और उनकी परिक्रमा करके तपस्या हेतु आज्ञा प्राप्त की, तत्पश्चात् वे उत्तम वन की ओर चल पड़े। जहाँ पर कन्द, फलादि सुलभ थे, निर्मल जल था। जहाँ वायु की प्रबलता नहीं थी और न अग्नि अथवा घाम का ही भय था । ऐसे [उत्तम तप: ] स्थान पर आसनस्थ होकर एकाग्र चित्त से व्यासजी [गणपति के] एकाक्षर मन्त्र (गं) – का जप करने लगे । जब तपस्या करते-करते व्यासमुनि के बारह वर्ष बीत गये, तब भगवान् गजानन उनके समक्ष प्रकट हुए ॥ ५१-५३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड के अन्तर्गत ‘मुनिविसर्जन’ नामक एक सौ उनचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४९ ॥ Content is available only for registered users. 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