श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-150
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
एक सौ पचासवाँ अध्याय
व्यासमुनि को गणपतिदेव का साक्षात्कार और उनसे वर की प्राप्ति
अथः पञ्चाशदुत्तरशततमोऽध्यायः
व्यासानुग्रहसिद्धिक्षेत्रवर्णनं

सोमकान्त ने कहा — हे भृगुजी ! उन महात्मा व्यासजी के समक्ष गजाननदेव किस रूप में प्रादुर्भूत हुए, वह सब बतलाइये, क्योंकि उस (के श्रवण ) – से पापनाश होता है ॥ १ ॥

भृगुजी बोले — हे भूमिप ! जिस प्रकार गजाननदेव व्यासजी के समक्ष प्रादुर्भूत हुए थे, वह सब वृत्तान्त मैं बता रहा हूँ, उसका तुम आदरपूर्वक श्रवण करो। [जिस समय वे प्रकट हुए, उस समय] गजाननदेव ने रक्तवर्ण की पुष्पमाला, रक्तवस्त्र तथा रक्तगन्धानुलेपन धारण कर रखा था। सिन्दूर के लेपन के कारण उनका मस्तक अरुणाभ था । कमल के समान नेत्रों वाले गणपति अनेक सूर्यों के समान प्रतिभासित हो रहे थे। वे [कानों में] दिव्य कुण्डल, [बाहुयुगल में] बाजूबन्द, [मस्तक पर] मुकुट, [हाथों में कंकण] तथा [ यज्ञोपवीत के रूप में] शेषनाग को धारणकर शोभित हो रहे थे ॥ २-४ ॥ मुनि ने जब गणपति के ऐसे रूप को देखा तो आँखें मूँद लीं, वे भयभीत होकर काँप उठे और मन्त्र का चिन्तन करते हुए मूर्च्छित हो गये। [जब उनकी मूर्च्छा दूर हुई ] तब गजानन ने कहा — ‘हे मुनिसत्तम ! भयभीत मत होइये । हे मुने! जिसका आप अहर्निश चिन्तन करते हैं और जो ब्रह्मा आदि देवताओं के लिये भी अगम्य है, वह मैं तुमको वर प्रदान करने के लिये तुम्हारे समीप आया हूँ’ ॥ ५–६१/२

भृगुजी बोले — इस प्रकार की मधुरवाणी सुनकर मुनिश्रेष्ठ व्यासजी बड़े प्रसन्न हुए। गजाननदेव के चरणों में अपना मस्तक रखकर वे बारम्बार कहने लगे कि मैं धन्य हूँ, मेरे माता-पिता धन्य हैं, मेरी तपस्या धन्य है, यह पृथिवी धन्य है और [तपोवन के ये] वृक्ष धन्य हैं; क्योंकि सर्वरूप, गुणातीत, समस्त प्रपंच के आश्रय, चिदानन्दघन, अनन्त और सभी कारणों के परमकारण [आप गजानन]-का मैंने साक्षात्कार किया है । वरप्रद गजानन का इस प्रकार स्तवन करके वे उनसे प्रार्थना करने लगे ॥ ७–९ ॥

मुनि बोले — हे देवेश ! मेरी समस्त भ्रमबुद्धि को दूर करके आप मुझे अपने प्रति स्थिर भक्तिभाव प्रदान कीजिये। मैं जिस प्रकार अठारह महापुराणों के प्रणयन में समर्थ हो सकूँ और आपका भी गुणगान करने में सक्षम हो सकूँ, वैसा [कृपापूर्ण] विधान कीजिये । हे अनघ ! यदि आप प्रसन्न हैं तो मेरे हृदय में निवास कीजिये ॥ १०–१११/२

गजानन बोले — वत्स! तुमने जो प्रार्थना की है, वह सब आज ही पूर्ण हो जायगी । व्यास नाम वाले मुनिवर ! आप सबके मान्य, सभी पवित्रों को भी पवित्र करने वाले, अपरोक्ष ज्ञान (अद्वैत बोध ) – से सम्पन्न तथा गुरुओं के भी गुरु होंगे। आप प्रसिद्धि, सद्गुण, कीर्ति तथा श्री के विषय में नारायण के तुल्य होंगे। हे मुनीश्वर ! आप अठारह पुराणों तथा उतने ही उपपुराणों के प्रणेता बनेंगे। आपने पूर्वकाल में दम्भवश मेरा स्मरण -पूजन नहीं किया था, यही कारण है कि आपकी वाणी आश्चर्यजनक रीति से स्तम्भित हो गयी। हे अनघ ! अब आप ब्रह्माजी के मुख से मेरा माहात्म्य सुन लिया है, जिसके कारण इस समय आपका समस्त [ दम्भजनित] पाप विलीन हो चुका है। अब मैं तुम्हारे अन्तःकरण में [निर्मल बोध के रूप में] प्रविष्ट हो रहा हूँ ॥ १२–१६१/२

भृगुजी बोले — ऐसा कहकर वे विभु व्यासमुनि के अन्तःकरण में प्रविष्ट हो गये । [ गणपति के प्रवेश करते ही] मुनिवर व्यासजी ने करोड़ों सूर्यों के जैसा अतुलनीय तेज प्राप्त कर लिया । वह [गणपति का] तेज सभी दिशाओं को उद्भासित करने लगा। तदुपरान्त व्यासजी ने गजानन की एक विशाल मूर्ति बनवायी और उसे देवप्रासाद (देवमन्दिर) – में स्थापित कर दिया तथा उसका विविध उपचारों से पृथक्-पृथक् (उपचारों के क्रमभेद से) पूजन किया ॥ १७–१९ ॥ यह सिद्धिक्षेत्र सभी लोगों के नेत्रों को पवित्र करने वाला, शुभावह तथा मन्त्रानुष्ठान में तत्पर जनों को अनेकविध सिद्धियाँ देने वाला होगा — ऐसा कहकर तथा उन गणपतिदेव से अनुज्ञा प्राप्तकर नारायणस्वरूप व्यासदेव ने [वहाँ से प्रस्थान किया और अपने आश्रम में आकर ] ब्रह्माजी के मुख से सुने गये उस गणेशपुराण का महर्षि वैशम्पायन को श्रवण कराया। इसके अनन्तर वह पुराण भूतल पर विख्यात हुआ ॥ २०-२११/२

हे नृप ! उसी पुराण को समग्ररूप में आज मैंने तुम्हें सुनाया है। हे नृपसत्तम! इसके सदृश पवित्र करने वाला कोई अन्य साधन तीनों लोकों में नहीं है। यह सभी लोगों को परमानन्द की प्राप्ति कराने वाला है ॥ २२-२३ ॥ हे सोमकान्त! तुम्हें इस पुराण का प्रवचन कभी दुष्टों से नहीं करना चाहिये और विनयशील भक्तों को प्रयत्नपूर्वक अवश्य ही सुनाना चाहिये। मैं तो इसका निरन्तर स्मरण और पारायण किया करता हूँ। हे राजसत्तम! तुम पर करुणा होने के कारण मैंने इसे सुनाया है। तुमको गजाननदेव का निरन्तर ध्यान, स्मरण तथा [उनके मन्त्र का] जप करते रहना चाहिये ॥ २४-२५ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड के अन्तर्गत ‘व्यासानुग्रह – सिद्धिक्षेत्रवर्णन’ नामक एक सौ पचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १५० ॥

Content is available only for registered users. Please login or register

Please follow and like us:
Pin Share

Discover more from Vadicjagat

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.