December 5, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-151 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ एक सौ इक्यावनवाँ अध्याय गणेशपुराण के श्रवण से राजा की रोगनिवृत्ति और गणपति के द्वारा प्रेषित विमान पर आरूढ़ होकर परमधामगमन अथः एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः सोमकान्तविमानप्राप्ति वर्णनं सूतजी बोले — राजा सोमकान्त मुनीश्वर भृगु से इस प्रकार नित्यप्रति कथाश्रवण करते और कथाश्रवण के पुण्य की भावना करके सूखे आम्र के मूल में जल डाल देते। जब ऐसा करते हुए उनको एक वर्ष व्यतीत हो गया, तब वह आम्रवृक्ष पुराणश्रवणजनित पुण्य के प्रभाव से [नूतन] पल्लव, मंजरी और फलों के कारण अतीव कान्तिमय तथा शोभासम्पन्न हो गया ॥ १-२ ॥ वे सोमकान्त कुष्ठ व्याधि से मुक्त और दिव्य कान्ति सम्पन्न हो गये। उनका शरीर व्रणरहित हो गया, शरीर से निकलने वाली दुर्गन्ध समाप्त हो गयी और उत्तम गन्ध आने लगी। राजा सोमकान्त को दसों दिशाओं में फैलती हुई उत्तम गन्ध से युक्त, दिव्यदेह, कोटि-कोटि चन्द्रमाओं के सदृश आह्लादक, सूर्यतुल्य तेजस्वी और विषादशून्य देखकर लोग विस्मय में पड़ गये कि अरे ! यह तो वैसा अर्थात् गलित कुष्ठ के कारण विकृत शरीर वाला था, फिर यह गणेशपुराण की दोषहारिणी महिमा के प्रभाव से कैसे ऐसा अर्थात् नीरोग और सुदर्शन हो गया है ? ॥ ३-५ ॥ भृगुजी बोले — हे नृपशार्दूल! यह उपलब्धि तो तुम्हें पुराणश्रवण के कारण ही हुई है। अब तुम जाओ, जब वर्षभर की लम्बी अवधि से उत्कण्ठित अपने पुत्र, मन्त्रिगण और प्रजाजनों को देखोगे तो बड़ी प्रसन्नता होगी ॥ ६१/२ ॥ सूतजी बोले — महर्षि भृगु की ऐसी बातें सुनकर राजा सोमकान्त उनके चरणों में गिर पड़े और मानो आनन्दसागर में डूबे हुए-से वे कहने लगे ॥ ७१/२ ॥ राजा बोले — हे मुने! मैंने आज आपके तप की अद्भुत महिमा का दर्शन किया और पुराणश्रवण के महत्त्व का भी अनुभव किया, जिसके कारण कुष्ठ से गलती देह वाला मैं पतित व्यक्ति भी दिव्य शरीर वाला हो गया। हे मुनिसत्तम ! इस [दिव्य] देह का निर्माण करने वाले [सच्चे] माता-पिता तो आप ही हैं । [आपकी कथा का प्रभाव कुछ ऐसा है कि] रसहीन आम्रवृक्ष भी फल- पुष्पादि से युक्त हो गया। इसलिये मैं आपको छोड़कर जाना ही नहीं चाहता, अब मुझे पुत्र (आदि बन्धु- बान्धवों) तथा प्रजाजनों से क्या प्रयोजन है ? राजा के इस कथन को सुनकर महर्षि भृगु पुनः कहने लगे ॥ ८-११ ॥ भृगुजी बोले — हे जनेश्वर ! जन्मान्तरीय पुण्यों के प्रभाव से तुमने मेरे द्वारा वर्णित इस श्लाघनीय पुराण का श्रवण किया, जिसके कारण तुम्हारा पाप नष्ट हो गया । [वास्तव में] इस गणेशपुराण की महिमा का वर्णन कर ही कौन सकता है ? अब तुम अपने नगर को प्रस्थान करो और मेरा स्मरण करते रहना ॥ १२-१३ ॥ जब वे लोग इस प्रकार संवाद कर रहे थे, तभी उन्होंने एक विशाल विमान देखा, जो करोड़ों सूर्यों के समान तेजोमय था ॥ १४ ॥ भृगुजी बोले — हे नृप ! तुम्हारे लिये ही यह अद्भुत विमान आया है। अब तुम इस पर आरूढ़ हो जाओ और गणपति का सान्निध्य पाने के लिये प्रस्थान करो। हे राजन्! जिस विमान को मुनीश्वर साधनानुष्ठानादि के द्वारा भी नहीं प्राप्त कर पाते, उसे तुमने पुराणश्रवण के कारण हुए गणपति के अनुग्रह से पा लिया है ॥ १५-१६ ॥ जब वे लोग इस प्रकार वार्तालाप कर रहे थे, तभी विमान क्षणभर में भूतल पर आ पहुँचा। उसमें विनायक के गण विद्यमान थे। चार भुजाओं से युक्त वे गण मुकुट, बाजूबन्द, हार आदि आभूषणों से अलंकृत थे। उन्होंने दिव्य चन्दनानुलेपन तथा दिव्याम्बर धारण किया था । उनके हाथों में कमल तथा परशु शोभायमान थे । [ उस विमान में गणों के साथ] नृत्य करती हुई किन्नरकन्याएँ थीं और मृदंग, ताल (एक विशिष्ट वाद्य) तथा करताल बजाते हुए किन्नर थे, जो गायन कर रहे थे। यह देखकर राजा सोमकान्त पुनः कहने लगे ॥ १७–१९ ॥ राजा बोले — हे मुनीश्वर ! हे ब्रह्मन् ! मैंने यद्यपि विमानों की चर्चा तो अनेक बार सुनी थी, किन्तु उसे प्रत्यक्ष देख पाने का सौभाग्य तो आज आपके तपोबल के कारण ही मुझे मिला है। आपकी महिमा का वर्णन बारम्बार बहुत-से मुखों से होता रहा है, जिसे मैं अपने कानों से सुनता आया हूँ, किंतु आपसे पुराणश्रवण करके मैंने उसका आज स्वयं अनुभव भी कर लिया है ॥ २०-२१ ॥ जब राजा इस प्रकार कह रहे थे, तभी वे दूत विमान से उतरे और प्रणाम करके राजा सोमकान्त से कहने लगे कि हे शुद्धात्मन् ! तुमने पुराणश्रवणादि से जो पुण्य अर्जित किया है, उसके कारण परात्पर गजाननदेव ने तुम्हारा स्मरण किया है। उन्हीं की आज्ञा से हम दूत लोग पवित्र कीर्ति वाले तुमको ले जाने के लिये विमान लेकर आये हैं। अब तुम उस उत्तमोत्तम गणपतिलोक के लिये प्रस्थान करो। उन गजानन का दर्शन करके तुम जन्म-मरण से मुक्त हो जाओगे और वहाँ गणपतिदेव के समीप जाकर उनके अनुग्रह से तुम आत्यन्तिक सुख प्राप्त करोगे ॥ २२–२५ ॥ दूतों की वे बातें सुनकर राजा को देह का भान न रहा और सारा शरीर रोमांचित हो गया। वे गद्गद वाणी में बोले — ‘हे निष्पाप दूतो! चराचर विश्व की सृष्टि करने वाले, निर्गुण, गुणों को [सृष्टि हेतु] क्षुब्ध करने वाले, विश्व के प्रधान कारण, दीनरक्षक, परात्पर उन गजाननदेव ने कृपापूर्वक मेरा स्मरण किया है । ब्रह्मा आदि देवगण जिनका स्वरूपसाक्षात्कार नहीं कर पाते और जो अनन्त तथा सनक आदि परमर्षिगण ध्यानावस्थित होकर भी गुणों से परिपूर्ण हैं, उन्होंने मेरे लिये यह उत्तम विमान भेजा है ॥ २६-२८१/२ ॥ जो परम मायावी, नानाविध अवतार धारण करने वाले तथा अनेकानेक रूपों वाले हैं, उन गजाननदेव ने मेरा किसलिये स्मरण किया, यह बात आश्चर्यजनक है?’ ॥ २९१/२ ॥ राजा ने इस प्रकार [दूतों से] कहकर महर्षि भृगु को नमस्कार किया और उनसे कहा — [हे मुनीश्वर!] आपके अनुग्रह के कारण और आपकी आज्ञा से अब मैं गजानन के विमान पर आरूढ़ होकर दूतों के साथ प्रस्थान कर रहा हूँ, आप [कभी] मेरा विस्मरण नहीं कीजियेगा ॥ ३०-३१ ॥ सूतजी बोले — राजा के कथन को सुनकर सम्भ्रमविह्वल महर्षि भृगु के नेत्र आनन्दाश्रुपूरित हो गये, उनका शरीर रोमांचित हो उठा। भृगुजी ने राजा को कण्ठ से लगा लिया और कहने लगे — ‘हे नृपते ! मैं बड़ा ही भाग्यहीन ब्राह्मण हूँ। तुमने उत्तम पुण्यफल प्राप्त किया है। गणेशलोक में पहुँचकर मुझको कभी भूल मत ‘जाना’ ॥ ३२-३३ ॥ इस प्रकार [अपने-अपने मनोभावों को एक-दूसरे से] कहकर राजा सोमकान्त और महर्षि भृगु एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए [आश्रम से] बाहर निकले। [तदुपरान्त ] परमप्रसन्न राजा ने उन मुनिवर भृगु को नमस्कार किया और दूतों के कथन के कारण उतावले-से होकर उस ‘विमान में आरूढ़ हो गये। [राजा की पत्नी] सुधर्मा तथा [राजा के अनुगामी] दोनों अमात्य भी उस उत्तम विमान पर आरूढ़ हुए। इसके बाद वे दूत भी विमान में आरूढ़ हो गये। [विमान में बज रहे ] वाद्यों के घोष ने दिग्दिगन्त को व्याप्त कर लिया । विमान की शोभा को देखकर राजा सोमकान्त आनन्दमग्न हो गये ॥ ३४–३६ ॥ राजा सोचने लगे कि यह अवसर मुझे जन्मान्तरीय पुण्य के ही कारण प्राप्त हुआ है। इसके अनन्तर महर्षि भृगु के देखते-देखते विमान आकाश में उड़ चला ॥ ३७ ॥ इस पार्थिव शरीर से सर्वोत्कृष्ट पद की प्राप्ति को देखकर राजा अत्यन्त विस्मित हुए और दूतों को प्रणाम करके उस परम-धाम की ओर चल पड़े ॥ ३८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड के अन्तर्गत ‘सोमकान्त को विमानप्राप्ति का वर्णन’ नामक एक सौ इक्यावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १५१ ॥ Content is available only for registered users. 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