December 5, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-152 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ एक सौ बावनवाँ अध्याय अमात्यों का राजसभा में जाकर हेमकण्ठ को राजा के आगमन की सूचना देना और उसी प्रसंग में राजा सोमकान्त के ऊपर हुए गणपति – अनुग्रह आदि का वर्णन करना अथः द्विपञ्चाशदुत्तरशततमोऽध्यायः हेमकण्ठदर्शनं सूतजी बोले — [विमान में बैठे हुए] राजा सोमकान्त ने ऊपर से ही अपनी राजधानी देवपुर का अवलोकन किया और वहाँ के मुख्यद्वार, अट्टालिका आदि की स्वर्णिम कान्ति को देखकर बड़े प्रसन्न हुए ॥ १ ॥ तदुपरान्त [महारानी] सुधर्मा ने रमणीय सभाभवन को देखकर अपने पुत्र का स्मरण किया और स्नेह के कारण गद्गद वाणी से कहने लगीं — ‘मेरा पुत्र हेमकण्ठ भद्रासन- पर बैठा होगा और आज वर्षभर की अवधि पूर्ण होने से वह हम माता-पिता की प्रतीक्षा कर रहा होगा। हे स्वामिन्! हे कृपानिधे! आपको [वहाँ जाकर] उसे अवश्य ही दर्शन देना चाहिये।’ तब पत्नी की ऐसी बात को सुनकर राजा चिन्तित हो उठे ॥ २-४ ॥ राजा बोले — मेरा पुत्र हेमकण्ठ पता नहीं इस समय जीवित होगा या मर चुका होगा। मैंने उससे कहा था कि वर्षभर के बाद तुम मुझे देख सकोगे। मैंने कभी असत्य भाषण नहीं किया, किन्तु इस असत्य से बचकर अब कैसे निकलूँ? इस समय न तो मैं [पुत्र के पास ] जा पा रहा हूँ और न ही परमपद (गणपतिधाम ) – को त्यागने में ही सक्षम हो पा रहा हूँ। ये दोनों बातें अर्थात् परमधामगमन और पुत्र से भेंट – परस्पर विरोधी हैं, अतः इन दोनों का साथ-साथ पूर्ण होना कठिन है — ऐसा [कहते हुए] राजा फूट-फूटकर रोने लगे ॥ ५-६१/२ ॥ उन दोनों (राजा-रानी) – को शोकाकुल देखकर दूत उन नृपश्रेष्ठ से कहने लगे — [राजन्!] आप दोनों का रोदन सुनकर हमको बड़ी दया आ रही है। हम लोग अभी क्षणभर में यहीं विमान को उतार देते हैं, आप अपने पुत्र को देखकर शीघ्रता से चले आइये। आप लोगों (की समस्या)-का समाधान करके हमें भी अत्यन्त सन्तुष्टि होगी ॥ ७–८११/२ ॥ तदुपरान्त दूतों ने देवपुर के उत्तरी भूभाग में विमान को उतार दिया। गणेशपुराण श्रवणरूप पुण्य के कारण आये उस विमान ने अपनी प्रभा से नगर को आच्छादित कर लिया तथा वाद्यध्वनियों से उसे गुँजा दिया ॥ ९-१० ॥ तदुपरान्त [राजा के अमात्य ] सुबल और ज्ञानगम्य ने राजा तथा दूतों को नमस्कार किया और [उनसे अनुमति लेकर] उस हेमकण्ठ को समस्त वृत्तान्त बतलाने के लिये वहाँ जा पहुँचे ॥ ११ ॥ उन्होंने क्षणभर में भद्रासन पर विराजमान हेमकण्ठ को देखा, जो अमात्यों, नागरिकों एवं सन्नद्ध [अस्त्र-शस्त्रादि से संयुक्त] महाबली वीरशिरोमणियों से घिरा हुआ उत्तम नृत्य का अवलोकन कर रहा था ॥ १२१/२ ॥ तभी हेमकण्ठ के मन्त्रियों की दृष्टि [सहसा ] सुबल और ज्ञानगम्य पर पड़ी। [ मन्त्रियों के संकेत पर] सभी वीर और मन्त्रिगणसहित हेमकण्ठ उठ खड़ा हुआ। वे सब लोग ज्ञानगम्य और सुबल का आलिंगन करने के लिये सम्भ्रमपूर्वक वहाँ जा पहुँचे ॥ १३-१४ ॥ जब उन सभी की आपसी भेंट मुलाकात हो गयी, तब परमहर्षित राजपुत्र हेमकण्ठ उनके पास गया और रोमांचित होता हुआ उनसे कहने लगा — ‘मन्त्रियो ! मेरे माता-पिता सकुशल हैं या नहीं। उन दोनों को छोड़कर आप लोग अकेले ही यहाँ कैसे चले आये ?’ ऐसा कहकर हेमकण्ठ ने उन दोनों को उत्तम आसन पर बैठाया और वस्त्र, चन्दन, आभूषण, फल, ताम्बूल, सुवर्ण आदि से पूजन किया ॥ १५–१७ ॥ [पूजन के उपरान्त वह पुनः कहने लगा कि] उन दोनों (माता-पिता) – के न होने के कारण मेरे प्राण सर्वदा कण्ठ में ही अटके रहते हैं। मैं रातों-दिन उन्हीं के बारे में सोचा करता हूँ, उनके अतिरिक्त और कोई बात मेरे मन में आती ही नहीं है। मेरे पिताश्री ने मुझसे पहले ऐसा कहा था कि एक बार दर्शन देने अवश्य आऊँगा, अतः वे अपनी उस बात को मिथ्या कैसे होने देंगे ? ॥ १८-१९ ॥ वे दोनों (मन्त्री) बोले — हे नृप ! व्यर्थ में चिन्ता मत करो, तुम्हारे माता-पिता सकुशल हैं। उन दोनों के पुण्य प्रभाव को तीनों लोकों में कौन जान सकता है ? ॥ २० ॥ जब आपसे अनुमति लेकर हम चारों लोग (दो मन्त्री, राजा और रानी) नगर से निकले तो सुकुमार होने के कारण आपके पिता को अत्यन्त कष्ट का अनुभव होने लगा। उनके कमल तुल्य चरण रक्तरंजित हो गये। वे क्षुधा से अत्यधिक पीड़ित रहने लगे, उन महाराज को कन्द, मूल, फलादि से सन्तृप्ति नहीं होती थी ॥ २१-२२ ॥ आपकी माता की भी वैसी ही दशा हो गयी। वे दोनों उस समय [सुखपूर्वक ] एक डग भी नहीं चल पाते थे। विशाल और मनोरम सरोवर दिखायी पड़ा। [वहाँ का हम सभी बहुत समय तक भटकते रहे, तब हमें एक परिसर] वृक्षों तथा लताओं के कारण [ अत्यन्त ] शीतल था। अतः महाराज वहीं विश्राम करने लगे और रानी सुधर्मा थकी होने पर भी उनके पैर दबाती रहीं ॥ २३-२४ ॥ [इधर जब] हम लोग कन्द-मूल आदि लेने के लिये निकले हुए थे, इसी बीच में वहाँ पर मुनीश्वर च्यवन जल लेने के लिये आये और उन्होंने दोनों (महाराज एवं महारानी ) – को देखा। मुनीश्वर ने [बातचीत के द्वारा] उन दोनों के हार्दिक अभिप्राय को जाना और अपने आश्रम की ओर चले गये। तबतक बहुत-से कन्द-मूल-फलादि को लेकर हमलोग भी लौट आये ॥ २५-२६ ॥ [इसके उपरान्त च्यवनमुनि के पिता महर्षि भृगु की आज्ञा से] हम सभी लोग उनके आश्रम में गये, जहाँ मुनि ने हमारा प्रचुर सत्कार किया। [उन लोगों ने] हमें षड्रसयुक्त भोजन कराया, जिससे हमें अत्यधिक विश्राम मिला। इसके उपरान्त महर्षि भृगु और महाराज सोमकान्त परस्पर बातचीत करने लगे। तब महाराज ने अपना समस्त वृत्तान्त उन मुनिवर को सुना दिया ॥ २७-२८ ॥ तदुपरान्त मुनिवर ध्यान के द्वारा [जान करके ] उनका पूर्वजन्म बतलाने लगे और करुणावश होकर [पूर्वजन्म के] पाप तथा उसकी शान्ति का उपाय भी उन्होंने बतलाया। हे नृप! राजा के [पूर्वजन्म के] पाप को सुनकर हम लोग भयभीत हो उठे और महाराज [उसकी सत्यता के विषय में] सन्देह करने लगे। वे उसपर सन्देहपूर्वक विचार कर ही रहे थे कि तभी उनके शरीर से श्वेत वर्ण के पक्षी निकले और वे राजा को नोचने लगे। उनके चंचुप्रहार से महाराज व्याकुल होकर गिर पड़े तथा ‘रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये’ – इस प्रकार मुनि से प्रार्थना करने लगे। राजा की प्रार्थना को सुनकर मुनि ने कृपापूर्वक उनकी ओर देखा। मुनि के अवलोकनमात्र से क्षणभर में वे पक्षी अन्तर्धान हो गये ॥ २९-३२ ॥ तदुपरान्त महाराज अंजलि बाँधकर मुनि के समक्ष बैठ गये और कृपानिधि भृगु मुनि ने राजा के महापाप को जान लेने के उपरान्त उनको भक्तिभाव से एक वर्षपर्यन्त गणेशपुराण का श्रवण कराया ॥ ३३१/२ ॥ मुनि ने सर्वप्रथम गणपति के एक सौ आठ नामों से अभिमन्त्रित जल राजा के ऊपर छिड़ककर अपनी तपस्या के प्रभाव से राजा के शरीर से एक ऐसे भयानक पुरुष को बाहर निकाला, जिसके केश आकाश तक लम्बे थे, जिह्वा लटक रही थी और जो भूख से अत्यन्त पीड़ित था ॥ ३४-३५ ॥ उसने भृगुमुनि से भोजन की याचना की, तो मुनि ने कहा कि यह जो सामने सूखा हुआ विशाल आम्रवृक्ष है, तुम उसी का भक्षण करो। तब जैसे ही उस पुरुष ने आम्रवृक्ष का स्पर्श किया, वैसे ही वह क्षणभर में भस्म हो गया। उसके बाद [जब धीवररूपधारी पापपुरुष ने पुनः भोजन माँगा तो] मुनि ने धीवर से कहा कि इसे (भस्म को) ही खाओ। तब वह पुरुष मुनि के भय के कारण उसी भस्म में विलीन हो गया ॥ ३६-३७ ॥ इसके बाद मुनि ने राजा से कहा — हे भूमिपाल ! पुराणश्रवण के इस महान् पुण्य को [जलरूप प्रतीक के माध्यम से] तुम वृक्ष की भस्म में तबतक प्रतिदिन डालते रहो, जबतक कि भस्म के स्थान पर पहले के जैसा दूसरा आम्रवृक्ष उत्पन्न न हो जाय । हे राजेन्द्र ! ऐसा होते ही तुम दिव्य शरीरवाले हो जाओगे ॥ ३८-३९ ॥ दोनों मन्त्रियों ने कहा — हे नृप ! [मुनि ने जैसा कहा था,] महाराज ने वैसा ही किया । वे प्रतिदिन स्नान करके बहुत देर तक कथाश्रवण करते और इसके बाद भक्तिपूर्वक वह पुण्यफल उस भस्म में डाल देते। जब ऐसा करते-करते एक वर्ष बीत गया और गणेशपुराण की कथा भी पूर्ण हो गयी, तो वहाँ पहले की भाँति फूलों- फलों से लदा हुआ एक वृक्ष उत्पन्न हो गया तथा महाराज भी दिव्य कान्ति से समन्वित और सूर्य – चन्द्रमा के समान तेजोमय हो गये ॥ ४०–४११/२ ॥ [ इस प्रकार के दिव्य नैरुज्यलाभ के कारण कृतज्ञतावश] जबतक महाराज मुनि का स्तवन करते अर्थात् उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापन करते, तबतक एक विमान वहाँ पर आया। उसमें नृत्य-गान हो रहा था और वह वाद्यों की ध्वनि से गूँज रहा था । गणेशजी के दूतों से युक्त वह विमान आश्रम के निकट आ पहुँचा। हे नाथ ! उस विमान की शोभा का अवलोकन करके हम दोनों के नेत्र सफल हो गये ॥ ४२-४३१/२ ॥ आपके पिता के पुण्यों की अधिकता के कारण गजाननदेव की आज्ञा से उन दूतों ने आपके पिता महाराज सोमकान्त को विमान में बैठा लिया और महाराज के संकेत से दूतों ने हम लोगों को भी प्रसन्नतापूर्वक विमान में बैठाया। महारानी सुधर्मा भी भृगु मुनि से आज्ञा प्राप्तकर विमान में आरूढ़ हो गयीं ॥ ४४-४५ ॥ [गणपतिधाम को जाते समय मार्ग में] जैसे ही देवपुर दिखायी पड़ा, [आपके माता-पिता को] वैसे ही आपका स्मरण हो आया। हे नृप ! इसीलिये नगर के उत्तरी भूभाग में विमान को उतारा गया है। आपके माता-पिता आपको देखना चाहते हैं, इसीलिये हमलोग आपको बताने के लिये यहाँ आये हैं । उनके दर्शनार्थ आप शीघ्र चलिये, अन्यथा वे लोग चले जायँगे ॥ ४६-४७ ॥ उन (मन्त्रियों) की ऐसी बातें पूर्णरूप से सुनकर राजा को रोमांच हो आया, वह रोने लगा और अपने माता-पिता को देखने की उत्कण्ठा के कारण मन्त्रियों को आगे करके त्वरापूर्वक वह दौड़ने लगा। नागरिकों और सेवकों से घिरा, आँसू बहाता हुआ तथा गिरते हुए आभूषणों वाला वह हेमकण्ठ गणेशजी के दूतों से युक्त विमान के समीप क्षणभर में जा पहुँचा ॥ ४८-४९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड के अन्तर्गत ‘हेमकण्ठदर्शन’ नामक एक सौ बावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १५२ ॥ Content is available only for registered users. 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