श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-002
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
दूसरा अध्याय
देवान्तक और नरान्तक की तपस्या से प्रसन्न होकर शिव का प्रकट होना और उन्हें वरदान देना
अथः द्वितीयोऽध्यायः
देवान्तकनरान्तकवरप्राप्तिवर्णनं

व्यासजी बोले — हे ब्रह्मन् ! उन दोनों (नरान्तक और देवान्तक)- ने उस (पंचाक्षरी महाविद्या) -का अनुष्ठान कहाँ और कैसे किया ?  आदरपूर्वक पूछने वाले मुझसे वह सब विस्तारपूर्वक कहिये ॥ १ ॥

ब्रह्माजी बोले — हे व्यास ! तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया। देवान्तक और नरान्तक ने उस अनुष्ठान को [जिस प्रकार ] किया, वह सब मैं अब तुमसे कहता हूँ । माता-पिता की आज्ञा लेकर वे दोनों (देवान्तक और नरान्तक) अनेक प्रकार के वृक्षों और लताओं से भरे हुए एक ऐसे अत्यन्त सघन वन में चले गये, जहाँ वायु की भी गति अवरुद्ध हो जाती थी ॥ २-३ ॥ वह वन वापियों एवं सरोवरों से समन्वित तथा पुष्पों एवं पल्लवों से सुशोभित था । वहाँ पर्वतों की विशाल गुफाएँ तथा अनेक प्रकार की प्रस्तर – शिलाएँ थीं ॥ ४ ॥

वहाँ रहते हुए उन दोनों ने महान् तपस्या प्रारम्भ कर दी। वहाँ वे दोनों एक अँगूठे पर स्थित होकर मन को एकाग्र रखते हुए नारदजी द्वारा उपदिष्ट मंगलमयी पंचाक्षरी विद्या का जप करते थे और भगवान् शंकर का ध्यान करते थे। ऐसा करते हुए वे दोनों एक हजार वर्षों तक निराहार रहे, [तत्पश्चात् ] दो हजार वर्षों तक उन्होंने मात्र वायु का ही भक्षण किया, [तदनन्तर] एक सहस्र वर्षपर्यन्त वे दोनों सूखे पत्तों का आहार करते रहे ॥ ५-७ ॥ इस प्रकार [पंचाक्षरी महाविद्या का] जप करते हुए उन दोनों को दस सहस्र वर्ष बीत गये, तब उनकी इस महान् तपस्या से उनके तेज में बहुत वृद्धि हो गयी ॥ ८ ॥ [उनके उस तेज से] सूर्य मन्द किरणों वाले हो गये थे और उनका प्रकाश क्षीण प्रतीत होता था । उन दोनों (देवान्तक और नरान्तक ) – का शरीर भस्म से लेपित था, उन्होंने व्याघ्रचर्म, गजचर्म और अक्षमाला धारण कर रखी थी। वे दोनों उषाकाल में पुष्पों और  पल्लवों से भगवान् शम्भु का पूजन करते थे । हे वत्स ! उन दोनों के अद्भुत तेज के प्रभाव से उस तपोवन में सिंह और हाथी आदि जन्मजात शत्रुता वाले प्राणी भी वैररहित हो गये थे ॥ ९-१०१/२

उनके इस प्रकार के तप से प्रसन्न पाँच मुखों और तीन नेत्रोंवाले भगवान् शंकर ने उन्हें [दर्शन दिये ] । उनके दस भुजाएँ थीं, वामभाग में अपर्णा (पार्वतीजी) विराजमान थीं, शिरोभाग में गंगाजी [की धारा ] शोभायमान थीं और उन्होंने अपने दाहिने हाथ में डमरु ले रखा था ॥ ११-१२ ॥ नागहार से समायुक्त उनके गले में रुण्डमाला सुशोभित हो रही थी। नीलिमा से युक्त कण्ठवाले वे वृषभ पर आरूढ़ थे और अपनी प्रभा से आकाश को प्रकाशित कर रहे थे। अनेक प्रकार के अलंकारों से युक्त और गौर वर्ण के शरीर वाले उन्होंने चन्द्रमा को सिर पर धारण कर रखा था — ऐसे परमात्मा (शिव) – को देखकर वे दोनों अत्यन्त हर्ष को प्राप्त हुए ॥ १३-१४ ॥

[पहले तो] वे दोनों [हर्षातिरेक से] नृत्य करने लगे, तत्पश्चात् उन्होंने [भगवान् शिव को] साष्टांग प्रणाम किया, तदनन्तर उन दोनों ने उन देवाधिदेव से कहा — हे देव! हम दोनों के माता-पिता धन्य हैं, हमारे जन्म, नेत्र, तप, कुल और शरीर धन्य हैं, जो [हम ] आप महेश्वर का दर्शन कर रहे हैं ॥ १५-१६ ॥ आप वेदान्त के द्वारा भी अगोचर और अगम्य हैं, आपके वर्णन में वाणी आदि इन्द्रियाँ भी उपावृत हो (लौट) जाती हैं, आगम और छहों शास्त्र भी आपको जानने में कुण्ठित अर्थात् असफल हो जाते हैं, आप , मन की सीमा से परे हैं ॥ १७ ॥ आपकी स्तुति करने में सहस्र मुखवाले शेषनाग और सनकादि मुनिगण भी सक्षम नहीं हैं । आप सम्पूर्ण जगत् के स्रष्टा, पालनकर्ता और संहारक हैं। आप रंक को राजा और राजा को रंक कर देते हैं, आप सर्प को कंगन और कंगन को सर्प बना देते हैं । आप निर्धन को धनी और धनवान्‌ को निर्धन कर देते हैं ॥ १८-१९१/२

उन दोनों की इस प्रकार की वाणी सुनकर उमापति महादेवजी बोले — ‘तुम दोनों को साधुवाद है। मैंने तुम्हारे अमृततुल्य वचनों का प्रसन्नतापूर्वक श्रवण किया। मैं तुम दोनों की तपस्या से प्रसन्न होकर पार्वतीसहित वृषारूढ़ हो ध्यानरत तुम दोनों को वर देने आया हूँ। तुम दोनों मुझसे अपने अभीष्ट वर माँग लो’ ॥ २०-२११/२

ब्रह्माजी बोले — [हे व्यास!] तब अन्धकासुर के शत्रु भगवान् शिव के इन वचनों को सुनकर उन दोनों- नरान्तक और देवान्तक ने हर्षगद्गद वाणी में कहा कि ‘हे देवेश्वर! हे सर्वेश्वर! हे जगदीश्वर ! यदि आप प्रसन्न हैं, यदि हमें वरदान देना चाहते हैं और हम दोनों पर अनुग्रह करना चाहते हैं, तो देवताओं, राजाओं, यक्षों, राक्षसों, पिशाचों, मानवों, सर्पों, गन्धर्वों, अप्सराओं, किन्नरों, सभी अस्त्र-शस्त्रों, वन्य और ग्राम्य पशुओं, ग्रहों-नक्षत्रों, भूतों, दानवों, असुरों, कृमियों और कीड़ों-मकोड़ों आदि से भी दिन या रात्रि में आपकी कृपा से हम दोनों की मृत्यु कदापि न हो । हे जगदीश ! हमें त्रैलोक्य का राज्य और अपने चरणों की भक्ति भी प्रदान करें’ ॥ २२–२७ ॥

ब्रह्माजी बोले — तब उन दोनों भक्तों के तप से प्रसन्न शूलपाणि वृषध्वज भगवान् शंकर उनके द्वारा माँगे जाने वाले सभी वरदानों को सुनकर उनसे बोले — ॥ २८ ॥

शिवजी बोले — जो भी अभिलषित वरदान [तुम दोनों ने] माँगे हैं, वे तुम्हें वैसे ही प्राप्त होंगे, उसमें अन्यथा कुछ भी नहीं होगा। तुम्हें किसी से भय नहीं रहेगा, सब प्रकार से तुम मृत्यु से रहित रहोगे और तुम्हें त्रैलोक्य का राज्य प्राप्त होगा। सबका अन्त कर देने वाले यमराज भी तुम दोनों से भयभीत रहेंगे। ऐसा कहकर भगवान् शंकर ने अभय प्रदान करने वाला अपना करकमल उन दोनों के सिर पर रखा ॥ २९-३० ॥

[तदनन्तर] उन दोनों को अभीष्ट वरदान देकर भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये । वे दोनों भी उनकी पूजा, परिक्रमा और वन्दनाकर उनसे अनुज्ञा ले उनके अन्तर्धान होने पर अपने घर चले आये। उन दोनों ने प्रसन्नतापूर्वक अपने अत्यन्त प्रसन्न माता-पिता को प्रणाम किया ॥ ३१-३२ ॥

[तत्पश्चात्] उन दोनों ने माता-पिता का आलिंगनकर कर उनसे अपना सारा वृत्तान्त कहा। तब पिता ने उन दोनों का मस्तक सूँघकर प्रसन्नतापूर्वक कहा — ‘तुम दोनों को भगवान् शंकर का दर्शन प्राप्त होने और सुन्दर वर प्राप्त होने से तुम्हारा जन्म और कुल पवित्र हो गया और तुम दोनों ने महान् यश का अर्जन किया ॥ ३३-३४ ॥ हे पुत्रो ! तुम्हारा वृत्तान्त सुनकर मेरे अंग शीतल ( पुलकित) हो गये हैं और मुझे अमृतपानसदृश परम तृप्ति का अनुभव हो रहा है, इसमें सन्देह नहीं है ‘ ॥ ३५ ॥

तदनन्तर माता द्वारा अभ्यंजन (तेल- उबटन, स्नानादि) कराये जाने के बाद उन दोनों ने पिता और वेदशास्त्र के विद्वान् ब्राह्मणों के साथ अनेक प्रकार के सुन्दर स्वाद वाले अन्नों (व्यंजनों) – ) – का भोजन किया ॥ ३६ ॥ तदनन्तर माता ने अनेक प्रकार के अलंकारों और आभूषणों से दोनों पुत्रों को अलंकृत किया तथा ब्राह्मणों का पूजन किया। फिर उनसे बहुत-से आशीर्वाद प्राप्त करके उन्हें प्रणामकर विदा किया। तत्पश्चात् उन दोनों [देवान्तक और नरान्तक] – ने [सुखपूर्वक ] रात बितायी ॥ ३७ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत क्रीडाखण्ड में ‘वरप्राप्ति का वर्णन’ नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २ ॥

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