श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-005
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
पाँचवाँ अध्याय
अदिति की तपस्या से प्रसन्न गणेशजी का उनके पुत्ररूप में जन्म ग्रहण करने की स्वीकृति देना
अथः पञ्चमोऽध्यायः
अदितिवरप्राप्तिवर्णनं

ब्रह्माजी बोले — [हे व्यास!] कश्यप [ऋषि] मेरे ही मानस पुत्र हैं, जो अत्यन्त बुद्धिमान्, पुण्यशाली, धर्मशील, तपस्वी, जितेन्द्रिय, अत्यन्त दयावान्, संसार मे सभी के दुःखों और शोक का शमन करने वाले, ध्यान में स्थित होकर भूत-भविष्य और वर्तमान को जान लेने वाले, मानसिक संकल्प से सृष्टि और संहार कर सकने वाले, वेदान्त के पारगामी विद्वान्, सम्पूर्ण शास्त्रों के तात्त्विक अर्थ का ज्ञान रखने वाले तथा मिट्टी के ढेले और सुवर्ण में तुल्यबुद्धि रखने वाले हैं ॥ १-३ ॥ अदिति उनकी ज्येष्ठ पत्नी थी, जो उन्हें अत्यन्त प्रिय थी। वह सम्पूर्ण [शुभ] लक्षणों से सम्पन्न थी, तीनों लोकों में उसका सौन्दर्य अनुपमेय था । वह अपने पातिव्रत के तेज से तीनों लोकों को भस्म कर सकने में सक्षम थी। शेषनाग भी अपने सहस्र मुखों से जिसके गुणों का वर्णन करने में समर्थ नहीं हैं। [श्रेष्ठ ] गुणों की प्राप्ति के लिये अष्ट नायिकाएँ भी जिसकी सेवा करती थीं। इन्द्रादि देवगणों को जिस पापरहिता ने जन्म दिया था, वह मूलप्रकृतिरूपा [देवी] वहाँ उस रूप में (मुनिपत्नी के रूप में) निवास करती थी । उसने किसी समय अपने प्रसन्न मनवाले पति से प्रसन्नतापूर्वक कहा — ॥ ४-७ ॥

हे स्वामिन्! मैं कुछ पूछना चाहती हूँ, कृपा करके उसे बतलायें; क्योंकि हे प्रभो! किसी सदाचारिणी स्त्री की पति के अतिरिक्त कोई अन्य गति नहीं होती ॥ ८ ॥

कश्यपजी बोले — हे कल्याणकारिणि ! हे निष्पाप प्रिये ! तुमने उचित ही कहा है; तुम्हारे मन में जो भी [प्रश्न] हो, उसे तुम सम्यक् रूप से पूछो, मैं उसे बतलाऊँगा ॥ ९ ॥

अदिति बोली — इन्द्रादि देवगणों को तो मैंने पुत्ररूप में प्राप्त किया है, किंतु जो परमात्मा चिदानन्द परात्पर ईश्वर हैं, वे जब मुझे पुत्ररूप में प्राप्त हों, तो मेरा मन शान्त हो; मेरे मन में उनकी सेवा करने की इच्छा है। आप उस उपाय को बतलायें, जिससे वे [परम प्रभु] मेरे पुत्र हों और मेरा मन कृतकृत्य हो ॥ १०-१११/२

मुनि बोले — हे महाभाग्यशालिनि! तुमने बहुत उचित प्रश्न किया है, तुम्हारी बात मुझे अत्यन्त सन्तुष्टि देने वाली है ॥ १२ ॥ जैसे प्यासे व्यक्ति को जल और भूखे को भोजन सन्तुष्टिकारक होता है, वैसे ही हे देवि! तुम्हारी [ यह ] बात मुझे अत्यन्त सन्तुष्टि देने वाली है ॥ १३ ॥ किंतु हे देवि ! बिना पुण्य के परमात्मा कैसे अपने पुत्र बनेंगे, अतः मैं तुमको उपाय बताता हूँ, उसे हृदय में स्थिर करो ॥ १४ ॥ हे प्रिये ! जो इन्द्रियातीत [ परमात्मा] श्रुतियों और ब्रह्मादि देवताओं के लिये भी अगोचर, निर्गुण, निरहंकार, निष्काम और अद्वितीय है, जो माया का विषय नहीं है, माया को नचाने वाला है, मायावियों को भी मोहित करने वाला है, माया से परे होते हुए भी माया का आधार है, कारणातीत है, माया का विस्तार करने वाला है, जगत्प्रपंच के कारण का भी कारण है-वह अनुष्ठान के बिना साकार स्वरूप में कैसे आ सकता है? ॥ १५–१७ ॥

अदिति बोली — हे महामुने! मुझे इस समय किसका ध्यान करना चाहिये, कौन-सा अनुष्ठान करना चाहिये और किस मन्त्र से करना चाहिये ? वह मुझे बताइये ॥ १८ ॥

ब्रह्माजी बोले — [हे व्यास!] अदिति के इस प्रकार पूछने पर कश्यपमुनि ने उसे [गणेशजी के ] पंचाक्षर नाममन्त्र का उपदेश दिया, जो प्रारम्भ में ‘ॐ काररूप पल्लव से युक्त, चतुर्थी विभक्ति से समन्वित और अन्त में ‘नमः’ पद वाला था। उन्होंने ध्यानसहित एवं न्यास और देवता से युक्त पुरश्चरण की सम्पूर्ण विधि को उसे बतलाया ॥ १९-२० ॥ हे ब्रह्मन्! तब उसने परम प्रसन्नतापूर्वक अपने पति कश्यपजी को प्रणाम किया और आदरपूर्वक उनका पूजन किया। तदनन्तर उनसे आज्ञा लेकर वृक्षों और लताओं से संयुक्त तथा वायु एवं अन्य उपद्रवों से रहित स्थानवाले वन में तपस्या के लिये चली गयी ॥ २१-२२ ॥

वहाँ वह अदिति स्नान करके पवित्र वस्त्र धारणकर सुन्दर आसन पर बैठ गयी और चित्तवृत्तियों का निरोधकर संयत मन से देवाधिदेव गणेशजी का ध्यान करती हुई, यथाविधि न्यास करके गणेशजी का स्मरण करती हुई उनके परम मन्त्र का जप करने लगी ॥ २३-२४ ॥ अपनी मानसिक वृत्तियों को गणेशजी के अतिरिक्त अन्य किसी में न ले जाने वाली वह उनके दर्शन की अभिलाषा से निराहार रहते हुए तथा वायुमात्र का भक्षण करते हुए उनके ध्यान और मन्त्रजप में संलग्न रहती थी । उसके तप के प्रभाव से सभी प्राणी वैररहित हो गये थे । [उसके तप से] पराभूत सभी देवता यही चिन्ता करते थे कि ये न जाने क्या प्राप्त करेंगी ! ॥ २५-२६ ॥

अदिति ने इस प्रकार सौ वर्षों तक महान् तपस्या की। उसके अनेक प्रकार के कष्टों तथा स्त्री होते हुए भी उस प्रकार के धैर्य को देखकर करोड़ों सूर्यों के समान प्रभावाले तेज:पुंज गणाधिपति भगवान् विनायक उसके सम्मुख प्रकट हो गये ॥ २७-२८ ॥

वे हाथी के सदृश मुखवाले, दस भुजाओं से युक्त और कुण्डलों से सुशोभित थे । कामदेव से भी अधिक सुन्दर शरीरवाले वे सिद्धि और बुद्धि से समायुक्त थे । वे [कण्ठ में] वर्षाजल से उत्पन्न मोतियों की माला, [हाथ में ] परशु, [कमर में] सोने की करधनी धारण किये हुए थे और उनके [ललाट पर] कस्तूरी का तिलक लगा हुआ था। उन्होंने नाभिदेश पर सर्प धारण कर रखा था और उन [मंगलमय प्रभु]-के [ श्रीविग्रह पर] दिव्य वस्त्र सुशोभित थे ॥ २९-३०१/२

उस महान् तेजोराशि को अपने सम्मुख देखकर अदिति भयभीत हो काँपने लगीं, उन्होंने अपने नेत्र मूँद लिये और वे मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ीं ॥ ३११/२

जप और ध्यान भूलकर वे अपने मन में यह चिन्ता करने लगीं कि मेरे सम्मुख यह कौन आ गया ? यह क्या अद्भुत घटना घटी है! मैं अपना जप और ध्यान भी भूल गयी हूँ! कहीं ये वही परमेश्वर तो नहीं हैं, [जिनका मैं ध्यान करती हूँ] अपने महान् तेज से दिशाओं को आलोकित करते हुए मुझे वर देने के लिये आये हैं — इस प्रकार जब वे व्याकुल थीं, तभी भगवान् गणेश उनसे बोले — ॥ ३२-३४ ॥

विनायक बोले — हे देवि! तुम दिन-रात मन में जिसका ध्यान करती हो, मैं वही हूँ। तुम्हारी निष्ठा और दुष्कर तपस्या देखकर तुम्हें वर देने के लिये आया हूँ । हे सुव्रते! तुम्हारे इस तप से मैं सन्तुष्ट हूँ, तुम्हारे हृदय में जिन-जिन वरों की कामना हो, वे मुझसे माँग लो, मैं उन्हें दूँगा ॥ ३५-३६ ॥

ब्रह्माजी कहते हैं — [हे व्यास!] तब उन गणेशजी के वचन सुनकर अदिति स्वस्थ हुई। विनम्र भाववाली उसने दोनों हाथ जोड़कर विनायक को प्रणाम किया और जो मन से अतर्क्य हैं, ऐसे उन देवाधिदेव गणेशजी से वह कहने लगी — ॥ ३७१/२

अदिति बोली — हे अखिलेश्वर ! आप ही इस विश्व की संरचना करते हैं, इसका पालन करते हैं और इसका संहार करने वाले भी आप ही हैं। आप नित्य हैं, निरंजन हैं, भगवान् हैं, निर्गुण हैं, अहंकार से रहित हैं, विविध रूप धारण करने वाले हैं, शाश्वत हैं, योग द्वारा जानने योग्य हैं, तथा अखिल मनोरथों की पूर्ति करने वाले हैं ॥ ३८-३९ ॥ हे विनायक ! इस समय आप सौम्य स्वरूप धारणकर वर प्रदान करें। हे देवेश्वर ! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और यदि आप वर देना चाहते हैं, तो हे भगवन्! आप मेरी पुत्रता को प्राप्त करें, इसीसे मैं कृतकृत्य होऊँगी। तभी मैं आपकी सेवा कर पाऊँगी, तभी सज्जनोंकी रक्षा होगी और तभी दुष्टजन विनाश को प्राप्त करेंगे। साथ ही लोगों की कृतकृत्यता भी होगी ॥ ४०–४११/२

विनायक बोले — मैं तुम्हारे पुत्ररूप में जन्म ग्रहण करूँगा, साधुजनों की रक्षा करूँगा, दुष्टों का संहार करूँगा और तुम्हारी भी सम्पूर्ण मनोकामनाओं को पूर्ण करूँगा ॥ ४२१/२

ब्रह्माजी बोले — ऐसा कहकर देवाधिदेव वे विनायक अन्तर्धान हो गये और वह अदिति महर्षि कश्यप के पास गयी और सारा वृत्तान्त उन्हें बताया ॥ ४३१/२

अदिति बोली — आपकी आज्ञा से मैं तपस्या करने के लिये वन में गयी और मैंने वहाँ महान् तप किया। तदनन्तर वे भगवान् गजानन महान् प्रकाशपुंज के रूप में मुझे वर प्रदान करने के लिये आये । उनका वह स्वरूप देखकर मैं भयभीत हो गयी, तब मैंने उन विनायकदेव की प्रार्थना की ॥ ४४-४५ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! उन्होंने मुझे विविध प्रकार के वर प्रदान किये। तदनन्तर वे गजानन ‘तुम्हारे पुत्र के रूप में जन्म ग्रहण करूँगा’ – ऐसा कहकर अन्तर्धान हो गये । हे मुने! तब मैं आपके प्रभाव से सफल मनोरथ वाली होकर अपने आश्रम में आ गयी ॥ ४६१/२

ब्रह्माजी बोले — हे मुनीश्वर ! इस प्रकार उसके द्वारा कथित वरदान-सम्बन्धी अमृतमय वचनों को सुनकर वे मुनिश्रेष्ठ कश्यपजी अत्यन्त प्रसन्न हुए और अत्यन्त प्रीति के साथ उन्होंने देवी अदिति के साथ रमण किया । उस समय वे दोनों वैसे ही आनन्दित हुए जैसे कि अमृतपान से आनन्द की प्राप्ति होती है ॥ ४७-४८ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत क्रीडाखण्ड में ‘आश्रमाभिगम’ नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५ ॥

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