श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-18
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-अष्टादशोऽध्यायः
अठारहवाँ अध्याय
तुलसी को स्वप्न में शंखचूड़ का दर्शन, ब्रह्माजी का शंखचूड़ तथा तुलसी को विवाह के लिये आदेश देना
शङ्‌खचूडेन सह तुलस्याः सङ्‌गतिवर्णनम्

श्रीनारायण बोले — [हे नारद!] एक समय की बात है — वृषध्वज की नवयौवनसम्पन्न कन्या तुलसी अत्यन्त सन्तुष्ट तथा प्रसन्नचित्त होकर शयन कर रही थी ॥ १ ॥ उसी समय कामदेव ने उस पर अपने पाँचों बाण चला दिये । पुष्प तथा चन्दन से अनुलिप्त अंगों वाली वह कन्या कामदेव के पुष्प – बाण से परितप्त हो गयी । उसका सारा अंग पुलकित हो उठा, उसके शरीर में कँपकँपी होने लगी और उसकी आँखें लाल हो गयीं । वह क्षणभर में सूख जाती थी और दूसरे क्षण में मूर्च्छित हो जाती थी, पुनः क्षणभर में उद्विग्न हो उठती थी और फिर क्षणभर में सुखदायक तन्द्रा से युक्त हो जाती थी । वह क्षणभर में उत्तप्त हो जाती थी और फिर तुरंत प्रसन्न हो जाती थी । क्षणभर में सचेत हो जाती थी और क्षण में विषादग्रस्त हो जाती थी । वह कभी शय्या से उठती हुई, कभी क्षणभर में पास में ही टहलती हुई, क्षणभर में उद्वेगपूर्वक घूमती हुई और क्षणभर में बैठती हुई दिखायी पड़ती थी और फिर क्षणभर में ही अत्यन्त उद्विग्न होकर अपनी शय्या पर पुनः सो जाती थी ॥ २-६ ॥ पुष्प तथा चन्दन से सुसज्जित शय्या उसे काँटों- जैसी लगने लगी, दिव्य सुख और सुन्दर फल तथा जल उसके लिये विषतुल्य हो गये । उसे अपना भव्य भवन बिल के समान, शरीर के कोमल वस्त्र अग्नि के समान और मस्तक का सिन्दूर दुःखदायी व्रण के समान लगने लगा ॥ ७-८ ॥

थोड़ी देर में तन्द्रा की अवस्था में उस साध्वी तुलसी ने सुन्दर वेष धारण किये हुए, अपने सभी अंगों में चन्दन लगाये हुए तथा रत्नमय आभूषणों से अलंकृत एक सुन्दर युवा अवस्था वाले, मुसकानयुक्त तथा परम रसिक पुरुष को देखा । माला से सुशोभित वह युवक उसके मुखकमल का पान करने के लिये उसकी ओर आ रहा था, वह निरन्तर रतिक्रीड़ा- सम्बन्धी कथाएँ कह रहा था और मधुर मधुर बोल रहा था तथा सहसा अपनी भुजाओं में आलिंगित करके शय्या पर विहार कर रहा था । कुछ ही क्षणों में वह चला गया और फिर पास आ गया। इसके बाद पुनः जाते हुए उस युवक से तुलसी ने कहा — ‘हे प्राणनाथ ! आप कहाँ जा रहे हैं ? बैठ जाइये ।’ तत्पश्चात् जाग जाने पर वह तुलसी बार – बार विलाप करने लगी । हे नारद! इस प्रकार युवावस्था को प्राप्त कर वह तुलसी वहीं पर स्थित रही ॥ ९–१३ ॥

शंखचूड़ जैगीषव्यमुनि से श्रीकृष्ण का मनोहर मन्त्र प्राप्त करके और उस मन्त्र को पुष्कर क्षेत्र में सिद्ध करके महान् योगी हो गया था। सभी मंगलों का भी मंगल करने वाले उस कवच को गले में बाँधकर और ब्रह्माजी से ‘जो तुम्हारे मन में अभिलषित हो, वह पूर्ण हो जाय ‘ – ऐसा वर प्राप्तकर वह शंखचूड़ भी ब्रह्मा की आज्ञा से बदरीवन आ गया ॥ १४-१५१/२

हे मुने! तुलसी ने आते हुए शंखचूड़ को देख लिया। वह नवयौवन से सम्पन्न था, उसकी कान्ति कामदेव के समान थी, उसका वर्ण श्वेत चम्पा की आभा के समान था, वह रत्नमय आभूषणों से सुशोभित था, उसका मुखमण्डल शरत्पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान था, उसके नेत्र शरत्कालीन कमलसदृश थे, वह अमूल्य रत्नों से निर्मित विमान पर विराजमान था, वह अत्यन्त मनोहर था, दो रत्नमय कुण्डलों से उसका गण्डस्थल शोभायमान था, उसने पारिजात पुष्पों की माला धारण कर रखी थी, उसका मुखमण्डल मुसकान से भरा हुआ था और उसका सर्वांग कस्तूरी, कुमकुम से युक्त तथा सुगन्धित चन्दन से अनुलिप्त था — ऐसे शंखचूड़ को अपने पास देखकर वस्त्र से अपना मुख ढँककर मुसकराती हुई तथा कटाक्ष के साथ बार-बार उसकी ओर देखती हुई तुलसी ने नवमिलन के कारण लज्जावश अपना मुख नीचे की ओर झुका लिया ॥ १६–२१ ॥ उसका चन्द्रसदृश मुख शरत्पूर्णिमा के चन्द्रमा को भी लज्जित कर रहा था, बहुमूल्य रत्नों से निर्मित नूपुरों की पंक्ति से वह सुशोभित हो रही थी, सर्वोत्तम मणि से निर्मित तथा सुन्दर शब्द करती हुई करधनी से वह सुशोभित हो रही थी, वह मालती के पुष्पों की माला से सम्पन्न केशपाश धारण किये हुई थी, उसने बहुमूल्य रत्नों से बने हुए मकराकृत कुण्डल अपने कानों में धारण कर रखे थे, चित्रमय दो कुण्डलों से उसका गण्डस्थल सुशोभित था, सर्वोत्तम रत्नों से निर्मित हार के द्वारा उसके वक्ष:स्थल का मध्यभाग उज्ज्वल दिखायी दे रहा था, रत्नमय कंकण – केयूर – शंख आदि आभूषणों से वह सुशोभित थी। रत्नजटित दिव्य अँगूठियाँ उसकी अँगुलियों को सुशोभित कर रही थीं — ऐसी भव्य, रमणीय, सुशील, सुन्दर तथा साध्वी तुलसी को देखकर वह शंखचूड़ उसके पास बैठ गया और मधुर वाणी में उससे कहने लगा ॥ २२–२६१/२  ॥

शंखचूड़ बोला — हे मानिनि ! हे कल्याणि ! हे सर्वकल्याणदायिनि ! तुम कौन हो और किसकी कन्या हो ? तुम समस्त स्त्रियों में धन्य तथा मान्य हो । हे सुन्दरि ! स्तब्ध हुए मुझ सेवक से वार्तालाप करो ॥ २७-२८ ॥

शंखचूड़ का यह वचन सुनकर सुन्दर नेत्रोंवाली तथा कामयुक्त तुलसी उस कामपीड़ित शंखचूड़ से मुसकराते हुए तथा नीचे की ओर मुख झुकाकर कहने लगी ॥ २९ ॥

तुलसी बोली — मैं धर्मध्वज की पुत्री हूँ और इस तपोवन में तपस्या करने के निमित्त एक तपस्विनी के रूप में रह रही हूँ। आप कौन हैं ? आप यहाँ से सुखपूर्वक चले जाइये । श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न पुरुष उच्च कुल में उत्पन्न किसी अकेली साध्वी कन्या के साथ एकान्त में बातचीत नहीं करते — ऐसा मैंने श्रुति में सुना है ॥ ३०-३१ ॥ जो नीच कुल में उत्पन्न है तथा धर्मशास्त्र के ज्ञान से वंचित है और जिसे श्रुति का अर्थ सुनने का कभी अवसर नहीं मिला, वह दुराचारी व्यक्ति ही कामासक्त होकर परस्त्री की कामना करता है । स्त्री ऊपर से बड़ी मधुर दिखायी देती है, किंतु सदा अभिमान में चूर रहती है, पुरुष के लिये विनाशक होती है, वह विष से परिपूर्ण ऐसे घट के सदृश होती है, जिसके मुख पर अमृत लगा हुआ हो, स्त्री का हृदय छुरे की धार के समान तीक्ष्ण होता है, किंतु ऊपर से वह सदा मधुर बातें करती है, स्त्री अपना ही प्रयोजन सिद्ध करने में सदा तत्पर रहती है, अपने कार्य की सिद्धि के लिये ही वह स्वामी के वश में रहती है, अन्यथा वह सदा वश में न रहने वाली है, स्त्री का हृदय अत्यन्त दूषित रहता है और उसके मुखमण्डल तथा नेत्रों से सदा प्रसन्नता झलकती रहती है ॥ ३२–३५ ॥

श्रुतियों तथा पुराणों में जिन स्त्रियों का चरित्र अत्यन्त दूषित बताया गया है; बुरे विचार वाले व्यक्ति को छोड़कर ऐसा कौन विद्वान् तथा बुद्धिमान् होगा, जो उन पर विश्वास कर सकता है ॥ ३६ ॥ उनका कौन शत्रु है और कौन मित्र ? वे नित्य नये-नये पुरुष की कामना करती हैं । वे किसी भी सुन्दर वेषयुक्त पुरुष को देखकर उसे मन-ही-मन चाहने लगती हैं ॥ ३७ ॥ वे बाहर से अपना हित साधने के लिये अपने सतीत्व का प्रयत्नपूर्वक प्रदर्शन करती हैं, किंतु वास्तव में सदा कामातुर रहती हैं । मन को आकृष्ट करने वाली वे स्त्रियाँ कामदेव का आधारस्तम्भ होती हैं ॥ ३८ ॥ स्त्री बाहर से छलपूर्वक [ अपने को वासनावृत्ति से रहित दिखाती हुई ] अपने प्रेमी को सन्तप्त करती है, किंतु मन में समागम की अभिलाषा रखती है। वह बाहर से अत्यन्त लज्जित दीखती है, किंतु एकान्त में अपने प्रेमी के साथ हास-परिहास करती है ॥ ३९ ॥ रति का सुयोग न मिलने पर मानिनी स्त्री कुपित हो जाती है और कलह करने लगती है । यथेच्छ सम्भोग स्त्री प्रसन्न रहती है और स्वल्प सम्भोग से दुःखी हो जाती है ॥ ४० ॥ स्त्री स्वादिष्ट भोजन और शीतल जल की अपेक्षा सुन्दर, रसिक, गुणी तथा युवक पति की ही आकांक्षा अपने मन में रखती है ॥ ४१ ॥

स्त्री अपने पुत्र से भी अधिक स्नेह रसिक पुरुष पर रखती है। वह सम्भोग में कुशल प्रेमी को अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय समझती है ॥ ४२ ॥ स्त्री वृद्ध तथा सम्भोग करने में अक्षम पुरुष को शत्रु के समान समझती है और वह अत्यन्त कुपित होकर उस पुरुष के साथ सदा कलह करती रहती है । जिस प्रकार सर्प चूहे पर झपटता है, उसी प्रकार स्त्री वैसे पुरुष को बात-बात पर खाने दौड़ती है। नारी दुःसाहस की मूर्ति तथा सर्वदा समस्त दोषों की  आश्रयस्थली है ॥ ४३-४४ ॥ ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि देवताओं के लिये भी स्त्री दुःसाध्य है। मोहस्वरूपिणी नारी तपस्या के मार्ग में अर्गला दण्ड के समान और मोक्ष के द्वार पर कपाट के समान बाधक होती है। वह भगवान् ‌की भक्ति में बाधा डालने वाली तथा सभी प्रकार की माया की पिटारी है । वह संसाररूपी कारागार में सदा जकड़े रखने के लिये जंजीर के समान है । स्त्री इन्द्रजालस्वरूप तथा स्वप्न के समान मिथ्या कही गयी है । स्त्री बाह्य सौन्दर्य तो धारण करती है, किंतु इसके भीतरी अंग अत्यन्त कुत्सित रहते हैं । स्त्री का शरीर विष्ठा – मूत्र- पीब आदि का आधार, मलयुक्त, दुर्गन्धि – दोष से परिपूर्ण, रक्तरंजित तथा अपवित्र रहता है। पूर्व समय में ब्रह्मा ने स्त्री का सृजन मायावी पुरुषों के लिये मायास्वरूपिणी के रूप में, मुमुक्षुजनों के लिये विषस्वरूपिणी के रूप में तथा उसकी कामना करने वालों के लिये अदृश्यरूपिणी के रूप में किया था ॥ ४५–४९ ॥

हे नारद! उस शंखचूड़ से ऐसा कहकर जब तुलसी चुप हो गयी, तब उसने हँसकर कहना आरम्भ किया ॥ ५० ॥

शंखचूड़ बोला — हे देवि! तुमने जो कुछ कहा है, वह सब असत्य नहीं है, किंतु अब मुझसे भी कुछ सत्य तथा कुछ असत्य के विषय में सुन लीजिये ॥ ५१ ॥ विधाता ने सबको मोहित करने वाला नारी रूप [ वास्तविक और अवास्तविक ] दो प्रकार से रचा है — वास्तविक रूप प्रशंसनीय और दूसरा रूप निन्दनीय है । लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा, सावित्री, राधा आदि आद्या शक्तियाँ सृष्टि की सूत्ररूपा हैं, इन्हीं से सृष्टि का प्रारम्भ हुआ है ॥ ५२-५३ ॥ इन देवियों के अंश से प्रकट स्त्री रूप वास्तविक कहा गया है; वह श्रेष्ठ, यशोरूप तथा समस्त  मंगलों का कारण है। शतरूपा, देवहूति, स्वधा, स्वाहा, दक्षिणा, छायावती, रोहिणी, वरुणानी, शची, कुबेर की पत्नी, अदिति, दिति, लोपामुद्रा, अनसूया, कोटभी, तुलसी, अहल्या, अरुन्धती, मेना, तारा, मन्दोदरी, दमयन्ती, वेदवती, गंगा, मनसा, पुष्टि, तुष्टि, स्मृति, मेधा, कालिका, वसुन्धरा, षष्ठी, मंगलचण्डी, धर्मपत्नी मूर्ति, स्वस्ति, श्रद्धा, शान्ति, कान्ति, क्षान्ति, निद्रा, तन्द्रा, क्षुधा, पिपासा, सन्ध्या, दिवा, रात्रि, सम्पत्ति, धृति, कीर्ति, क्रिया, शोभा, प्रभा और शिवा ये देवियाँ जो स्त्रीरूप में प्रकट हैं, वे प्रत्येक युग में श्रेष्ठ मानी गयी हैं ॥ ५४–६० ॥

जगदम्बा की कला कलांश से उत्पन्न जो स्वर्ग की दिव्य अप्सराएँ हैं, उन्हें अप्रशस्त तथा सम्पूर्ण लोकों में पुंश्चलीरूप कहा गया है ॥ ६१ ॥ स्त्रियों का जो सत्त्व – प्रधान रूप है, वही सर्वथा समीचीन है। अपने प्रभाव के कारण वे ही उत्तम तथा साध्वीस्वरूप स्त्रियाँ सम्पूर्ण लोकों में प्रशंसित हैं । उन्हीं को ‘वास्तवरूपा’ कहना चाहिये, ऐसा विद्वान् पुरुष कहते हैं । रजोरूप और तमोरूप की कलाओं के भेद से अनेक प्रकार की स्त्रियाँ प्रसिद्ध हैं ॥ ६२-६३ ॥ रजोगुण का अंश जिनमें प्रधान है, वे मध्यम श्रेणी की हैं और वे भोगों में आसक्त रहती हैं सुखभोग के वशीभूत होकर वे सदा अपने ही कार्य में संलग्न रहती हैं। वे कपटयुक्त, मोहकारिणी तथा धर्म के अर्थ से पराङ्मुख रहती हैं; अतः रजोगुण- प्रधान स्त्री में साध्वीभाव कभी नहीं उत्पन्न हो सकता है, विद्वान् लोग इसे स्त्रियों का मध्यमरूप कहते हैं ॥ ६४-६५१/२

तमोरूप दुर्निवार्य है, बुद्धिमान् पुरुषों ने इस रूप को ‘अधम’ कहा है । [ हे देवि! तुमने जो कहा है कि ] उत्तम कुल में उत्तम विद्वान् पुरुष निर्जन, जलविहीन तथा एकान्त स्थान में किसी परस्त्री से कुछ भी नहीं पूछता है यह तो उचित ही है, किंतु हे शोभने ! मैं तो इस समय ब्रह्मा की आज्ञा से ही तुम्हारे पास आया हूँ और गान्धर्वविवाह की विधि के अनुसार तुम्हें पत्नीरूप में ग्रहण करूँगा ॥ ६६–६८ ॥ देवताओं को सन्त्रस्त करने वाला शंखचूड़ मैं ही हूँ। मैं दनुवंश में उत्पन्न हुआ हूँ । विशेष बात यह है कि पूर्व – जन्म में मैं श्रीहरि के साथ उनके पार्षदरूप में रहने वाले आठ गोपों में सुदामा नामक एक गोप था। देवी राधिका के शाप से इस समय मैं दानवेन्द्र बन गया हूँ ॥ ६९-७० ॥ कृष्ण के मन्त्र के प्रभाव के कारण मैं पूर्वजन्म की सभी बातें जानता हूँ। तुम्हें भी अपने पूर्वजन्म की बातों का स्मरण होगा कि तुम उस समय तुलसी थी और श्रीहरि ने तुम्हारे साथ विहार किया था और वही तुम राधिका के कोप के कारण भारत – भूमि पर उत्पन्न हुई हो । उस समय मैं तुम्हारे साथ रमण करने के लिये बहुत लालायित था, किंतु राधिका के भय के कारण ऐसा नहीं हुआ ॥ ७१-७२ ॥

हे महामुने ! इस प्रकार कहकर जब वह शंखचूड़ चुप हो गया, तब प्रसन्नता से युक्त तुलसी ने हँसते हुए कहना आरम्भ किया ॥ ७३ ॥

तुलसी बोली — इस प्रकार के [सद्विचार सम्पन्न] विज्ञ पुरुष ही विश्व में सदा प्रशंसित होते हैं । कोई स्त्री काम से प्रेरित होकर ऐसे ही पति की सदा अभिलाषा रखती है ॥ ७४ ॥ आप-जैसे उत्तम विचार वाले पुरुष से मैं निश्चित ही इस समय पराजित हो गयी हूँ । निन्दनीय तथा अपवित्र पुरुष तो वह होता है, जो स्त्री के द्वारा जीत लिया गया हो ॥ ७५ ॥ पितृगण, देवता तथा बान्धव ये सब लोग स्त्री के द्वारा पराभूत व्यक्ति की निन्दा करते हैं तथा माता-पिता एवं भ्राता भी स्त्रीजित मनुष्य की मन-ही- मन निन्दा करते रहते हैं ॥ ७६ ॥ शास्त्रों में विहित है कि जन्म और मृत्युजनित अशौच से ब्राह्मण दस दिनों में, क्षत्रिय बारह दिनों में, वैश्य पन्द्रह दिनों में, शूद्र एक मास में तथा वर्णसंकर अपनी मातृकुल परम्परा के आचार के अनुसार शुद्ध हो जाते हैं, किंतु स्त्री से पराजित व्यक्ति सर्वदा अपवित्र रहता है और चितादहन के काल में ही वह शुद्ध होता है ॥ ७७-७८ ॥

स्त्रीजित् मनुष्य पितर उसके द्वारा प्रदत्त पिण्ड तथा तर्पण को इच्छापूर्वक ग्रहण नहीं करते और देवता भी उसके द्वारा अर्पित पुष्प, जल आदि को स्वीकार नहीं करते हैं ॥ ७९ ॥ जिसके मन को स्त्रियों ने हर लिया हो; उसके ज्ञान, तप, जप, होम, पूजन, विद्या अथवा यश से क्या प्रयोजन ! ॥ ८० ॥ आपकी विद्या का प्रभाव जानने के लिये ही मैंने आपकी परीक्षा की है; क्योंकि कोई स्त्री किसी पुरुष की सम्यक् परीक्षा करके ही पतिरूप में उसका वरण करती है ॥ ८१ ॥ जो मनुष्य गुणहीन, वृद्ध, अज्ञानी, दरिद्र, मूर्ख, रोगी, नीच, परम क्रोधी, अत्यन्त कटुवचन बोलने वाले, पंगु, अंगहीन, अन्धे, बहरे, जड़, गूँगे, नपुंसकतुल्य तथा पापी वर को अपनी कन्या देता है, वह ब्रह्महत्या के पाप का भागी होता है ॥ ८२–८४ ॥ शान्त, गुणी, युवक, विद्वान् तथा सदाचारी वर को अपनी पुत्री अर्पण करने से मनुष्य को दस यज्ञों का फल प्राप्त होता है ॥ ८५ ॥ कोई कन्या का पालन-पोषण करके यदि उसे बेच देता है, तब धन के लोभ से कन्या का विक्रय करने वाले उस मनुष्य को ‘कुम्भीपाक’ नरक में जाना पड़ता है। वहाँ पर वह पापी भोजन के रूप में कन्या के मल-मूत्र का ही भक्षण करता है और चौदहों इन्द्रों की स्थितिपर्यन्त कीड़े तथा कौवे उसे नोचते रहते हैं तदनन्तर वह फिर से जन्म प्राप्त करता है और अनेक रोगों से ग्रस्त रहता है। वह दिन-रात मांस ढोता है और मांस-विक्रय करता रहता है, यह निश्चित है । हे तपोनिधे! इस प्रकार कहकर देवी तुलसी चुप हो गयी ॥ ८६–८८१/२

ब्रह्मा बोले — हे शंखचूड़ ! तुम इसके साथ क्या बातचीत कर रहे हो ? गान्धर्व – विवाह की विधि के अनुसार अब तुम इसे स्वीकार कर लो; क्योंकि तुम पुरुषों में रत्न हो और यह साध्वी तुलसी भी स्त्रियों में रत्न है। एक प्रवीण स्त्री का एक प्रवीण पुरुष के साथ संयोग बड़ा कल्याणकारी होता है । हे राजन् ! निर्बाध तथा दुर्लभ सुख को पाकर भला कौन उसका त्याग करता है । जो मनुष्य विरोधरहित सुख का त्याग कर देता है, वह पशु है, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ८९-९११/२

[इसके बाद ब्रह्माजी ने तुलसी से कहा —] हे सति ! तुम ऐसे गुणी और समस्त देवताओं, असुरों तथा दानवों का दमन करने वाले पति की क्या परीक्षा ले रही हो? जिस प्रकार विष्णु के पास लक्ष्मी, श्रीकृष्ण के पास राधिका, मुझ ब्रह्मा के पास सावित्री, भगवान् शिव के पास भवानी, भगवान् वराह के पास धरा, यज्ञ के पास दक्षिणा, अत्रि के पास अनसूया, नल के पास दमयन्ती, चन्द्रमा के पास रोहिणी, कामदेव के पास साध्वी रति, कश्यप के पास अदिति, वसिष्ठ के पास अरुन्धती, गौतम के पास अहल्या, कर्दम के पास देवहूति, बृहस्पति के पास तारा, मनु के पास शतरूपा, यज्ञ के पास दक्षिणा, अग्नि के पास स्वाहा, इन्द्र के पास शची, गणेश के पास पुष्टि, स्कन्द (कार्तिकेय) – के पास देवसेना और धर्म के पास साध्वी मूर्ति पत्नीरूप से प्रतिष्ठित हैं; उसी प्रकार तुम भी शंखचूड़ की सौभाग्यवती प्रिया बन जाओ और हे सुन्दरि ! अपने इस सुन्दर प्रियतम के साथ विभिन्न स्थानों पर अपनी इच्छा के अनुसार निरन्तर विहार करो। अन्त में तुम गोलोक में पुनः भगवान् श्रीकृष्ण को तथा वैकुण्ठ में चतुर्भुज श्रीविष्णु को प्राप्त करोगी ॥ ९२-१०० ॥

॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत नौवें स्कन्ध का ‘शंखचूड़ के साथ तुलसी का संगतिवर्णन ‘ नामक अठारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १८ ॥

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