August 1, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-23 ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ तेईसवाँ अध्याय भगवती का काली रूप में भगवान् शंकर को दर्शन देना, भगवान् शंकर द्वारा काली के चरण कमलों को हृदय में धारण कर उनका ध्यान करना तथा सहस्रनाम (ललितासहस्रनामस्तोत्र) — द्वारा देवी की स्तुति अथ त्रयोविंशोध्यायः श्रीमहादेवनारदसंवादे शिववक्त्रनिर्गतं ललितासहस्रनामस्तोत्रं श्रीमहादेवजी बोले — नारद ! भगवान् शंकर के तृतीय नेत्र से निकली हुई वह अग्नि पुनः कभी भी उनके पास जा नहीं सकीं ॥ १ ॥ मुने ! वह अग्नि बडवा के रूप में होकर सम्पूर्ण पृथ्वी को जलाने लगी । तब ब्रह्माजी ने आकर उस बडवारूपिणी अग्नि को लेकर समुद्र से प्रार्थना कर उसके जल में स्थापित कर दिया । कामदेव के शोक से मोहित होकर सभी देवता भी अपने-अपने स्थान को चले गये ॥ २-३ ॥ उस निर्जन कानन में जगन्माता सुमुखी पार्वती ने कामदेव की पत्नी ‘रति’ को आश्वासन दिया कि तुम्हारे स्वामी पुनः जीवित हो जाएँगे । तदनन्तर उन्होंने भगवान् महादेव से कहा — ॥ ४-५ ॥ श्रीदेवी जी बोलीं — देव ! मुझ आदिशक्ति प्रकृति को पत्नी के रूप में पाने के लिए आपने बहुत दिनों तक कठिन तपस्या की, फिर आपने कामदेव को क्यों नष्ट कर दिया? काम के नष्ट हो जाने पर आपको पत्नी से क्या प्रयोजन है? काम का नाश करना तो योगियों का धर्म है ॥ ६-७ ॥ श्रीमहादेवजी बोले — पार्वती की इस प्रकार की वाणी को सुनकर भगवान् शंकर उस समय चकित हो गये और उन्होंने ध्यान करके हिमालय पुत्री को आद्या प्रकृति के रूप में जाना । तब हर्ष से प्रफुल्लित होते हुए उन्होंने आँखें बंद कर लीं और फिर सर्वलोकसुन्दरी पार्वती को देखकर बोले — ॥ ८-९ ॥ अपनी लीला से अवतीर्ण आपको मैं पूर्णा प्रकृति के रूप में जानता हूँ । आपको ही प्राप्त करने के लिए इस निर्जन कानन में बहुत दिनों से मैं तपस्यारत हूँ । आज मैं कृतकृत्य हूँ, जो आप साक्षात् परात्परा को सुन्दर अङ्गोंवाली अपनी प्रिया सती के समान अपने सामने देख रहा हूँ ॥ १०-११ ॥ श्रीदेवीजी बोलीं — आपके सुन्दर प्रेमभाव से सन्तुष्ट हुई मैं गिरिराज हिमवान् के घर में जन्म लेकर पुनः आपको पतिरूप में प्राप्त करने के लिए आपके समीप आयी हूँ । जो जिस भाव से भक्तिपूर्वक मेरी प्रार्थना करता है, मैं उसी भाव से उसके मनोरथ पूर्ण करती हूँ । शम्भो ! मैं वही सती हूँ, जो दक्ष के महायज्ञ में आपको छोड़कर चली गयी थी । मैं ही काली, भीमा और त्रैलोक्यमोहिनी हूँ ॥ १२-१४ ॥ शिवजी बोले — यदि आप ही मेरी प्राणप्रिया सुलोचना सती हैं तो जिस प्रकार प्रजापति दक्ष के महायज्ञ के नाश के लिए महामेघ के समान कान्तिमती, भयंकररूपिणी, दिगम्बरा काली के रूप में प्रकट हुई थीं, अपने उसी स्वरुप को हमें दिखाइये ॥ १५-१६ ॥ श्रीमहादेवजी बोले — मुनिश्रेष्ठ ! भगवान् शम्भु के ऐसा कहने पर वे गिरिराज पुत्री पूर्व की भाँति चिकने काजल के समान कान्तिवाली साक्षात् कालीरूप से प्रकट हो गयीं ॥ १७ ॥ वे दिगम्बरा थीं, उनके शरीर से रक्त टपक रहा था और उनकी भयानक आँखें फैली हुई थीं, उनके वक्षःस्थल पर पुष्ट, उन्नत उरोज शोभा पा रहे थे, पैरों तक लटके हुए लम्बे केशपाश से उनका स्वरुप भयानक प्रतीत होता था, लपलपाती हुई जीभ और चमकते दाँत तथा नखों से वे उसी प्रकार सुशोभित थीं, जैसे आकाशमण्डल में अनेक चन्द्रमाओं के उदय होने से मेघमाला सुशोभित हो । घुटनों तक लटकती हुई अत्यन्त विशाल चञ्चल मुण्डमाला से वे उसी प्रकार सुशोभित हो रही थीं, मानो महामेघों की घनघोर घटा छायी हुई हो । चार लम्बी भुजाओं से वे ज्योतिर्मयी सुशोभित हो रहीं थीं और नानावर्णों के रत्नों से जटित मुकुट को धारण करने से उनका मस्तक शोभायमान था ॥ १८-२११/२ ॥ महामुने ! रोमांचित शरीर वाले प्रसन्नात्मा भगवान् शंकर ने उन्हें देखकर भक्तिपूर्वक गद्गद वाणी में ऐसा कहा — ॥ २२१/२ ॥ बहुत दिनों तक आपसे अलग रहने के कारण यह मेरा हृदय विरह से दग्ध हो गया है । आप महेश्वरी मेरे हृदय में रहने वाली अन्तर्यामिनी शक्ति हैं । आपके चरणकमलों को मैं अपने हृदय में धारण कर तथा उनकी आराधना करके आपके विरह से संतप्त हृदय को पुनः शीतल करूँगा ॥ २३-२५ ॥ परम योग में स्थित हुए भगवान् शिव ऐसा कहकर भूमि पर लेट गये और उनके चरणकमल को हृदय पर धारण कर लिया । ध्यान के आनन्द में मग्न शिव चेष्टाशून्य होकर शवरूप में स्थित हो गये और परम आदरपूर्वक घूर्णित नेत्रों से उन्हें देखने लगे । पुनः भगवान् शंकर अपने एक अंश से पञ्चवक्त्ररूप में सामने स्थित होकर हाथ जोड़कर सहस्रनाम द्वारा परमेश्वरी काली की स्तुति करने लगे ॥ २६-२८ ॥ शिवजी बोले — अनाद्या, परमा, विद्या, प्रधाना,प्रकृति, परा, प्रधानपुरुषाध्या, प्रधानपुरुषेश्वरी, प्राणात्मिका, प्राणशक्ति, सर्वप्राणहितैषिणी, उमा, उत्तमकेशिनी, उत्तमा, उन्मत्तभैरवी, उर्वशी, उन्नता, उग्रा, महोग्रा, उन्नतस्तनी, उग्रचण्डा, उग्रनयना, महोग्रदैत्यनाशिनी, उग्रप्रभावती, उग्रवेगा, अनुग्रप्रमर्दिनी, उग्रतारा, उग्रनयना, ऊर्ध्वस्थाननिवासिनी, उन्मत्तनयना, अत्युग्रदन्ता, उत्तुङ्गस्थलालया, उल्लासिनी, उल्लासचित्ता, उत्फुल्लनयनोज्ज्वला ॥ २९-३३ ॥ उत्फुल्लकमलारूढ़ा, कमला, कामिनी, कला, काली, करालवदना, कामिनी, मुखकामिनी, कोमलाङ्गी, कृशाङ्गी, कैटभासुरमर्दिनी, कालिन्दी, कमलस्था, कान्ता, काननवासिनी, कुलीना, निष्कला, कृष्णा, कालरात्रिस्वरूपिणी, कुमारी, कामरूपा, कामिनी, कृष्णपिङ्गला, कपिला, शान्तिदा, शुद्धा, शंकरार्धशरीरिणी, कौमारी, कार्तिकी, दुर्गा, कौशिकी, कुण्डलोज्ज्वला, कुलेश्वरी, कुलश्रेष्ठा, कुन्तलोज्ज्वलमस्तका, भवानी, भाविनी, वाणी, शिवा, शिवमोहिनी, शिवप्रिया, शिवाराध्या, शिवप्राणैकवल्लभा, शिवपत्नी, शिवस्तुत्या, शिवानन्दप्रदायिनी, नित्यानन्दमयी, नित्या, सच्चिदानन्दविग्रहा, त्रैलोक्यजननी, शम्भुहृदयस्था, सनातनी ॥ ३४-४० ॥ सदया, निर्दया, माया, शिवा, त्रैलोक्यमोहिनी, ब्रह्मादि-त्रिदशाराध्या, सर्वाभीष्टप्रदायिनी, ब्रह्माणी, ब्रह्मगायत्री, सावित्री, ब्रह्मसंस्तुता, ब्रह्मोपास्या, ब्रह्मशक्ति, ब्रह्मसृष्टिविधायिनी, कमण्डलुकरा, सृष्टिकर्त्री, ब्रह्मस्वरूपिणी, चतुर्भुजात्मिका, यज्ञसूत्ररूपा, दृढ़व्रता, हंसरुढा, चतुर्वक्त्रा, चतुर्वेदाभिसंस्तुता, वैष्णवी, पालनकरी, महालक्ष्मी, हरिप्रिया, शङ्खचक्रधरा, विष्णुशक्ति, विष्णुस्वरूपिणी, विष्णुप्रिया, विष्णुमाया, विष्णुप्राणैकवल्लभा ॥ ४१-४५ ॥ योगनिद्रा, अक्षरा, विष्णुमोहिनी, विष्णुसंस्तुता, विष्णुसम्मोहनकरी, त्रैलोक्यपरिपालिनी, शङ्खिनी, चक्रिणी, पद्मा, पद्मिनी, मुशलायुधा, पद्मालया, पद्महस्ता, पद्ममालाविभूषिता, गरुडस्था, चारुरूपा, सम्पद्रूपा, सरस्वती, विष्णुपार्श्वस्थिता, विष्णुपरमाह्लाददायिनी, सम्पत्ति, सम्पदाधारा, सर्वसम्पत्प्रदायिनी, श्रीविद्या, सुखदा, सौख्यदायिनी, दुःखनाशिनी, दुःखहन्त्री, सुखकरी, सुखासीना, सुखप्रदा, सुखप्रसन्नवदना, नारायणमनोरमा ॥ ४६-५० ॥ नारायणी, जगद्धात्री, नारायणविमोहिनी, नारायणशरीरस्था, वनमालाविभूषिता, दैत्यघ्नी, पीतवसना, सर्वदैत्यप्रमर्दिनी, वाराही, नारसिंही, रामचन्द्रस्वरूपिणी, रक्षोघ्नी, काननावासा, अहल्याशापमोचिनी, सेतुबन्धकरी, सर्वरक्षःकुलविनाशिनी, सीता, पतिव्रता, साध्वी, रामप्राणैकवल्लभा, अशोककाननावासा, लङ्केश्वरविनाशिनी, नीति, सुनीति, सुकृति, कीर्ति, मेधा, वसुन्धरा, दिव्यमाल्यधरा, दिव्या, दिव्यगन्धानुलेपना ॥ ५१-५५ ॥ दिव्यवस्त्रपरीधाना, दिव्यस्थाननिवासिनी, माहेश्वरी, प्रेतसंस्था, प्रेतभूमिनिवासिनी, निर्जनस्था, श्मशानस्था, भैरवी, भीमलोचना, सुघोरनयना, घोरा, घोररूपा, घनप्रभा, घनस्तनी, वरा, श्यामा, प्रेतभूमिकृतालया, खट्वाङ्गधारिणी, द्वीपिचर्माम्बरसुशोभना, महाकाली, चण्डवक्त्रा, चण्डमुण्डविनाशिनी, उद्यानकाननावासा, पुष्पोद्यानवनप्रिया, बलिप्रिया, मांसभक्ष्या, रुधिरासवभक्षिणि भीमरावा, साट्टहासा, रणनृत्यपरायणा ॥ ५६-६० ॥ असुरासृक्प्रिया, तुष्टा, दैत्यदानवमर्दिनी, दैत्यविद्राविणी, दैत्यमथनी, दैत्यसूदनी, दैत्यघ्नी, दैत्यहन्त्री, महिषासुरमर्दिनी, रक्तबीजनिहन्त्री, शुम्भासुरविनाशिनी, निशुम्भहन्त्री, धूम्राक्षमर्दिनी, दुर्गहारिणी, दुर्गासुरनिहन्त्री, शिवदूती, महाबला, महाबलवती, चित्रवस्त्रा, रक्ताम्बरा, अमला, विमला, ललिता, चारुहासा, चारुत्रिलोचना, अजेया, जयदा, ज्येष्ठा, जयशीला, अपराजिता, विजया, जाह्नवी, दुष्टजृम्भिणी, जयदायिनी ॥ ६१-६५ ॥ जगद्ऱक्षाकरी, सर्वजगच्चैतन्यकारिणी, जया, जयन्ती, जननी, जनभक्षणतत्परा, जलरूपा, जलस्था, जप्यजापकवत्सला, जाज्वल्यमाना, यज्ञाशा, जन्मनाशविवर्जिता, जरातीता, जमन्माता, जगद्रूपा, जगन्मयी, जंगमा, ज्वालिनी, जृम्भास्तम्भिनी, दुष्टतापिनी, त्रिपुरघ्नीत्रिनयना, महात्रिपुरतापिनी, तृष्णाजाति, पिपासा, बुभुक्षा, त्रिपुरप्रभा, त्वरिता, त्रिपुटा, त्र्यक्षा, तन्वी, तापविवर्जिता, त्रिलोकेशी, तीव्रवेगा, तीव्रा, तीव्रबलालया ॥ ६६-७० ॥ निःशङ्का, निर्मलाभा, निराङ्तका, अमलप्रभा, विनीता, विनया, अभिज्ञा, विशेषज्ञा, विलक्षणा, वरदा, वल्लभा, विद्युत्प्रभा, विनयशालिनी, बिम्बोष्ठी, विधुवक्त्रा, विवस्त्रा, विनयप्रभा, विश्वेशपत्नी, विश्वात्मा, विश्वरूपा, बलोत्कटा, विश्वेशी, विश्ववनिता, विश्वमाता, विचक्षणा, विदुषी, विश्वविदिता, विश्वमोहनकारिणी, विश्वमूर्त्ति, विश्वधरा, विश्वेशपरिपालिनी, विश्वकर्त्री, विश्वहर्त्री, विश्वपालनतत्परा, विश्वेशहृदयावासा, विश्वेश्वरमनोरमा ॥ ७१-७५ ॥ विश्वहा, विश्वनिलया, विश्वमाया, विभूतिदा, विश्वा, विश्वोपकारा, विश्वप्राणात्मिका, विश्वप्रिया, विश्वमयी, विश्वदुष्टविनाशिनी, दाक्षायणी, दक्षकन्या, दक्षयज्ञविनाशिनी, विश्वम्भरी, वसुमती, वसुधा, विश्वपावनी, सर्वातिशायिनी, सर्वदुःखदारिद्रयहारिणी, महाविभूति, अव्यक्ता, शाश्वती, सर्वसिद्धिदा, अचिन्त्या, अचिन्त्यरूपा, केवला, परमात्मिका, सर्वज्ञा, सर्वविषया, सर्वोपरिपरायणा, सर्वस्यार्तिहरा, सर्वमंगला, मंगलप्रदा ॥ ७६-८० ॥ मंगलार्हा, महादेवी, सर्वमङ्गलदायिका, सर्वान्तरस्था, सर्वार्थरूपिणी, निरंजना, चिच्छक्ति, चिन्मयी, सर्वविद्या, सर्वविधायिनी, शान्ति, शान्तिकरी, सौम्या, सर्वसर्वप्रदायिनी, शान्ति, क्षमा, क्षेमकरी, क्षेत्रज्ञा, क्षेत्रवासिनी, क्षणात्मिका, क्षीणतनु, क्षीणांगी, क्षीणमध्यमा, क्षिप्रगा, क्षेमदा, क्षिप्ता, क्षणदा, क्षणवासिनी, भूतानां वृत्ति, भूतानां निवृत्ति, भूतानां प्रवृत्ति, वृत्तलोचना, व्योममूर्ति, व्योमसंस्था, व्योमालयकृताश्रया, चन्द्रानना, चन्द्रकान्ति, चन्द्रार्धाङ्कितमस्तका ॥ ८१-८५ ॥ चन्द्रप्रभा, चन्द्रकला, शरच्चन्द्रनिभानना, चन्द्रात्मिका, चन्द्रमुखी, चन्द्रशेखरवल्लभा, चन्द्रशेखरवक्षःस्था, चन्द्रलोकनिवासिनी, चन्द्रशेखरशैलस्था, चञ्चला, चंचलेक्षणा, छिन्नमस्ता, छागमांसप्रिया, छागबलिप्रिया, ज्योत्स्ना, ज्योतिर्मयी, सर्वज्यायसी, जीवनात्मिका, सर्वकार्यनियन्त्री, सर्वभूतहितैषिणी, गुणातीता, गुणमयी, त्रिगुणा, गुणशालिनी, गुणैकनिलया, गौरी, गुह्यगोपकुलोद्भवा, गरीयसी, गुरुरता, गुह्यस्थाननिवासिनी ॥ ८६-९० ॥ गुणज्ञा, निर्गुणा, सर्वगुणार्हा, गुह्यकाम्बिका, गलज्जटा, गलत्केशा, गलद्रुधिरचर्चिता, गजेन्द्रगमना, गन्त्री, गीतनृत्यपरायणा, गमनस्था, गयाध्यक्षा, गणेशजननी, गानप्रिया, गानरता, गृहस्था, गृहिणी, परा, गजसंस्था, गजारुढ़ा, ग्रसन्ती, गरुडासना, योगस्था, योगिनीगम्या, योगचिन्तापरायणा, योगिध्येया, योगिवन्द्या, योगलभ्या, युगात्मिका, योगिज्ञेया, योगयुक्ता, महायोगेश्वरेश्वरी, योगानुरक्ता, युगदा, युगान्तजलप्रभा ॥ ९१-९५ ॥ युगानुकारिणी, यज्ञरूपा, सूर्यसमप्रभा, युगान्तानिलवेगा, सर्वयज्ञफलप्रदा, संसारयोनि, संसारव्यापिनी, सकलास्पदा, संसारतरुनिःसेव्या, संसारार्णवतारिणी, सर्वार्थसाधिका, सर्वा, संसारव्यापिनी, संसारबन्धकर्त्री, संसारपरिवर्जिता, दुर्निरीक्ष्या, सुदुष्प्राप्या, भूति, भूतिमती, अत्यन्तविभवारूपा, महाविभवरूपिणी, शब्दब्रह्मस्वरूपा, शब्दयोनि, परात्परा, भूतिदा, भूतिमाता, भूति, तन्द्री, विभूतिदा ॥ ९६-१०० ॥ भूतान्तरस्था, कूटस्था, भूतनाथप्रियाङ्गना, भूतमाता, भूतनाथा, भूतालयनिवासिनी, भूतनृत्यप्रिया, भूतसङ्गिनी, भूतलाश्रया, जन्ममृत्युजरातीता, महापुरुषसङ्गता, भुजगा, तामसी, व्यक्ता, तमोगुणवती, त्रितत्त्वतत्त्वरूपा, तत्त्वज्ञा, तत्त्वकप्रिया, त्र्यम्बका, त्र्यम्बकरता, शुक्ला, त्र्यम्बकरूपिणी, त्रिकालज्ञा, जन्महीना, रक्ताङ्गी, ज्ञानरूपिणी, अकार्या, कार्यजननी, ब्रह्माख्या, ब्रह्मसंस्थिता, वैराग्ययुक्ता, विज्ञानगम्या, धर्मस्वरूपिणी ॥ १०१-१०५ ॥ सर्वधर्मविधानज्ञा, धर्मिष्ठा, धर्मतत्परा, धर्मिष्ठपालनकरी, धर्मशास्त्रपरायणा, धर्मा, अधर्मविहीना, धर्मजन्यफलप्रदा, धर्मिणी, धर्मनिरता, धर्मिणामिष्टदायिनी, धन्या, धी, धारणा, धीरा, धन्वनी, धनदायिनी, धनुष्मती, धरासंस्था, धरणिस्थितिकारिणी, सर्वयोनि, विश्वयोनि, अपांयोनि, अयोनिजा, रुद्राणी, रुद्रवनिता, रुद्रैकादशरूपिणी, रुद्राक्षमालिनी, रौद्री, भुक्तिमुक्तिफलप्रदा, ब्रह्मोपेन्द्रप्रवन्द्या, नित्यं मुदितमानसा ॥ १०६-११० ॥ इन्द्राणी, वासवी, ऐन्द्री, विचित्रा, ऐरावतस्थिता, सहस्रनेत्रा, दिव्याङ्गा, दिव्यकेशविलासिनी, दिव्याङ्गना, दिव्यनेत्रा, दिव्यचन्दनचर्चिता, दिव्यालङ्करणा, दिव्यश्वेतचामरवीजिता, दिव्यहारा, दिव्यपदा, दिव्यनूपुरशोभिता, केयूरशोभिता, हृष्टा, हृष्टचित्तप्रहर्षिणी, सम्प्रहृष्टमना, हर्षप्रसन्नवदना, देवेन्द्रवन्द्यपादाब्जा, देवेन्द्रपरिपूजिता, रजसा, रक्तनयना, रक्तपुष्पप्रिया, रक्ताङ्गी, रक्तनेत्रा, रक्तोत्पलविलोचना ॥ १११-११५ ॥ रक्ताभा, रक्तवस्त्रा, रक्तचन्दनचर्चिता, रक्तेक्षणा, रक्तभक्ष्या, रक्तमत्ता, उरगाश्रया, रक्तदन्ता, रक्तजिह्वा, रक्तभक्षणतत्परा, रक्तप्रिया, रक्ततुष्टा, रक्तपानसुतत्परा, बन्धूककुसुमाभा, रक्तमाल्या, रक्तानुलेपना, स्फुरद्रक्ताञ्चिततनु, स्फुरत्सूर्यशतप्रभा, स्फुरन्नेत्रा, पिङ्गजटा, पिङ्गला, पिङ्गलेक्षणा, बगला, पीतवस्त्रा, पीतपुष्पप्रिया, पीताम्बरा, पिबद्रक्ता, पीतपुष्पोपशोभिता, शत्रुघ्नी, शत्रुसम्मोहजननी, शत्रुतापिनी ॥ ११६-१२० ॥ शत्रुप्रमर्दिनी, शत्रुवाक्यस्तम्भनकारिणी, उच्चाटनकरी, सर्वदुष्टोत्सारणकारिणी, शत्रुविद्राविणी, शत्रुसम्मोहनकरी, विपक्षमर्दनकरी, शत्रुपक्षक्षयङ्करी, सर्वदुष्टघातिनी, सर्वदुष्टविनाशिनी, द्विभुजा, शूलहस्ता, त्रिशूलवरधारिणी, दुष्टसंतापजननी, दुष्टक्षोभप्रवर्धिनी, दुष्टानां क्षोभसम्बद्धा, भक्तक्षोभनिवारिणी, दुष्टसंतापिनी, दुष्टसंतापपरिमर्दिनी, संतापरहिता, भक्तसंतापपरिनाशिनी ॥ १२१-१२५ ॥ अद्वैता, द्वैतरहिता, निष्कला, ब्रह्मरूपिणी, त्रिदशेशी, त्रिलोकेशी, सर्वेशी, जगदीश्वरी, ब्रह्मेशसेवितपदा, सर्ववन्द्यपदाम्बुजा, अचिन्त्यरूपचरिता, अचिन्त्यबलविक्रमा, सर्वाचिन्त्यप्रभावा, स्वप्रभावप्रदर्शिनी, अचिन्त्यमहिमा, अचिन्त्यरूपसौन्दर्यशालिनी, अचिन्त्यवेशशोभा, लोकाचिन्त्यगुणान्विता, अचिन्त्यशक्ति, दुश्चिन्त्यप्रभावा, चिन्त्यरूपिणी, योगचिन्त्या, महाचिन्तानाशिनी, चेतनात्मिका, गिरिजा, दक्षजा, विश्वजनयित्री, जगत्प्रसू ॥ १२६-१३० ॥ संनम्या, प्रणता, सर्वप्रणतार्तिहरा, प्रणतैश्वर्यदा, सर्वप्रणता, अशुभनाशिनी, प्रणतापन्नाशकरी, प्रणताशुभमोचनी, सिद्धेश्वरी, सिद्धसेव्या, सिद्धचारणसेविता, सिद्धिप्रदा, सिद्धिकरी, सर्वसिद्धगणेश्वरी अष्टसिद्धिप्रदा, सिद्धगणसेव्यपदाम्बुजा, कात्यायनी, स्वधा, स्वाहा, वषड्वौषट्स्वरूपिणी, पितृणां तृप्तिजननी, कव्यरूपा, सुरेश्वरी, हव्यभोक्त्री, हव्यतुष्टा, पितृरूपा, असितप्रिया, कृष्णपक्षप्रपूज्या, प्रेतपक्षसमर्पिता ॥ १३१-१३५ ॥ अष्टहस्ता, दशभुजा, अष्टादशभुजान्विता, चतुर्दशभुजा, असंख्यभुजवल्लीविराजिता, सिंहपृष्ठसमारूढ़ा, सहस्रभुजराजिता, भुवनेशी, अन्नपूर्णा, महात्रिपुरसुन्दरी, त्रिपुरा, सुन्दरी, सौम्यमुखी सुन्दरलोचना, सुन्दरास्या, शुभदंष्ट्रा, सुभ्रू, पर्वतनन्दिनी, नीलोत्पलदलश्यामा, स्मेरोत्फुल्लमुखाम्बुजा, सत्यसंधा, पद्मवक्त्रा, भ्रूकुटीकुटिलानना, विद्याधरी, वरारोहा, महासंध्यास्वरूपिणी, अरुन्धती, हिरण्याक्षी, सुधूम्राक्षी, शुभेक्षणा ॥ १३६-१४० ॥ श्रुति, स्मृति, कृति, योगमाया, पुण्या, पुरातनी, वाग्देवता, वेदविद्या, ब्रह्मविद्यास्वरूपिणी, वेदशक्ति, वेदमाता, वेदाद्या, परमागति, आन्वीक्षिकी, तर्कविद्या, योगशास्त्रप्रकाशिनी, धूमावती, वियन्मूर्ति, विद्युन्मालाविलासिनी, महाव्रता, सदानन्दनन्दिनी, नगनन्दिनी, सुनन्दा, यमुना, चण्डी, रुद्रचण्डी, प्रभावती, पारिजातवनावासा, पारिजातवनप्रिया, सुपुष्पगन्धसंतुष्टा, दिव्यपुष्पोपशोभिता, पुष्पकाननसद्वासा, पुष्पमालाविलासिनी ॥ १४१-१४५ ॥ पुष्पमाल्यधरा, पुष्पगुच्छालङ्कृतदेहिका, प्रतप्तकाञ्चनाभासा, शुद्धकाञ्चनमण्डिता, सुवर्णकुण्डलवती, स्वर्णपुष्पप्रिया, नर्मदा, सिन्धुनिलया, समुद्रतनया, षोडशी, षोडशभुजा, महाभुजगमण्डिता, पातालवासिनी, नागी, नागेन्द्रकृतभूषणा, नागिनी, नागकन्या, नागमाता, नगालया, दुर्गापत्तारिणी, दुर्गदुष्टग्रहनिवारिणी, अभया, आपन्निहन्त्री, सर्वापत्परिनाशिनी, ब्रह्मण्या, श्रुतिशास्त्रज्ञा, जगतां कारणात्मिका ॥ १४६-१५० ॥ निष्कारणा, जन्महीना, मृत्युञ्जयमनोरमा, मृत्युञ्जयहृदावासा, मूलाधारनिवासिनी, षट्चक्रसंस्था, महती, महोत्सवविलासिनी, रोहिणी, सुन्दरमुखी, सर्वविद्याविशारदा, सदसद्वस्तुरूपा, निष्कामा, कामपीडिता, कामातुरा, काममत्ता, ककाममानससत्तनु, कामरूपा, कालिन्दी, कचालम्बितविग्रहा, अतसीकुसुमाभासा, सिंहपृष्ठनिषेदुषी, युवती, यौवनोद्रिक्ता, यौवनोद्रिक्तमानसा, अदिति, देवजननी, त्रिदशार्तिविनाशिनी ॥ १५१-१५५ ॥ दक्षिणा, अपूर्ववसना, पूर्वकालविवर्जिता, अशोका, शोकरहिता, सर्वशोकनिवारिणी, अशोककुसुमाभासा, शोकदुःखक्षयङ्करी, सर्वयोषित्स्वरूपा, सर्वप्राणिमनोरमा, महाश्चर्या, मदाश्चर्या, महामोहस्वरूपिणी, महामोक्षकरी, मोहकारिणी, मोहदायिनी, अशोच्या, पूर्णकामा, पूर्णा, पूर्णमनोरथा, पूर्णाभिलषिता, पूर्णनिशानाथसमानना, द्वादशार्कस्वरूपा, सहस्त्रार्कसमप्रभा, तेजस्विनी, सिद्धमात्रा, चन्द्रानयनरक्षणा ॥ १५६-१६० ॥ अपरा, अपारमाहात्म्या, नित्यविज्ञानशालिनी, विवस्वती, हव्यवाहा, जातवेदःस्वरूपिणी, स्वैरिणी, स्वेच्छाविहरा, निर्बीजा, बीजरूपिणी, अनन्तवर्णा, अनन्ताख्या, अनन्तसंस्था, महोदरी, दुष्टभूतापहन्त्री, सद्वृत्तपरिपालिका, कपालिनी, पानमत्ता, मत्तवारणगामिनी, विन्ध्यस्था, विन्ध्यनिलया, विन्ध्यपर्वतवासिनी, बन्धुप्रिया, जगद्बन्धु, पवित्रा, सपवित्रिणी, परा, अमृता, अमृतकला, अपमृत्युविनाशिनी, महारजतसंकाशा, रजताद्रिनिवासिनी ॥ १६१-१६५ ॥ काशीविलासिनी, काशीक्षेत्ररक्षणतत्परा, योनिरूपा, योनिपीठस्थिता, योनिस्वरूपिणी, कामालसितचार्वङ्गी, कटाक्षक्षेपमोहिनी, कटाक्षक्षेपनिरता, कल्पवृक्षस्वरूपिणी, पाशाङ्कुशधरा, शक्ति, धारिणी, खेटकायुधा, बाणायुधा, अमोघशस्त्रा, दिव्यशस्त्रा, अस्त्रवर्षिणी, महास्त्रजालविक्षेपविपक्षक्षयकारिणी, घण्टिनी, पाशिनी, पाशहस्ता, पाशाङ्कुशायुधा, चित्रसिंहासनगता, महासिंहासनस्थिता, मन्त्रात्मिका, मन्त्रबीजा, मन्त्राधिष्ठातृदेवता ॥ १६६-१७० ॥ सुरूपा, अनेकरूपा, विरूपा, बहुरूपिणी, विरूपाक्षप्रियतमा, विरूपाक्षमनोरमा, विरूपाक्षा, कोटराक्षी, कूटस्था, कूटरूपिणी, करालास्या, विशालास्या, धर्मशास्त्रार्थपारगा, अध्यात्मविद्या, शास्त्रार्थकुशला, शैलनन्दिनी, नगाधिराजपुत्री, नगपुत्री, नगोद्भवा, गिरीन्द्रबाला, गिरिशप्राणतुल्या, मनोरमा, प्रसन्ना, चारुवदना, प्रसन्नास्या, प्रसन्नदा, शिवप्राणा, पतिप्राणा, पतिसम्मोहकारिणी, मृगाक्षी, चंचलापाङ्गी, सुदृष्टि, हंसगामिनी ॥ १७१-१७५ ॥ नित्यं कुतूहलपरा, नित्यानन्दा, अभिनन्दिता, सत्यविज्ञानरूपा, तत्त्वज्ञानैककारिणी, त्रैलोक्यसाक्षिणी, लोकधर्माधर्मप्रदर्शिनी, धर्माधर्मविधात्री, शम्भुप्राणात्मिका, परा, मेनकागर्भसम्भूता, मैनाकभगिनी, श्रीकण्ठाकण्ठहारा, श्रीकण्ठहृदयस्थिता, श्रीकण्ठकण्ठजप्या, नीलकण्ठमनोरमा, कालकूटात्मिका, कालकूटभक्षणकारिणी, महाकालप्रिया, कालकलनैकविधायिनी, अक्षोभ्यपत्नी, संक्षोभनाशिनी [देवी !] आपको बार-बार नमस्कार है ॥ १७६-१८० ॥ श्रीमहादेवजी बोले — मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार सहस्रनाम से स्तुति करने पर गिरिराजपुत्री पार्वती जी ने शंकर जी से यह बात कही — ॥ १८१ ॥ श्रीदेवीजी बोलीं — मैं आपके लिए ही गिरिराज के पुत्री भाव को प्राप्त हुई हूँ । आप मेरे प्राण के समान पति हैं तथा मैं आपकी अनन्य अर्धाङ्गिनी हूँ । आपने मेरे लिए दीर्घकाल तक कठिन तपस्या की है और मैं तपस्या के द्वारा आराधित होकर पुनः आपको पति रूप में प्राप्त करूँगी ॥ १८२-१८३ ॥ श्रीमहादेवजी बोले — आप श्रेष्ठतम आराध्या, सभी की माता तथा पराप्रकृति हैं । इस जगत् में आपके लिए कोई भी आराध्य नहीं है । आप अपने कृपापरवत्ता आदि गुणों से मेरे ऊपर अनुग्रह करें । शिवे ! मैं इसी वर के लिए आपसे प्रार्थना करता हूँ ॥ १८४-१८५ ॥ जहाँ-जहाँ आपका यह सुन्दर कालीरूप स्थापित हो, वहाँ मेरे हृदय पर भी कल्याणकारी उस रूप की स्थापना हो और जगदम्बिके ! आप इस संसार में शववाहना महाकाली के नाम से विख्यात होंगी । आप मुझ पर प्रसन्न होइए ॥ १८६-१८७ ॥ श्रीमहादेवजी बोले — भगवान् शंकर के द्वारा इस प्रकार कहने पर प्रलयकालीन मेघ के समान कान्तिमान भगवती काली “ऐसा ही हो’ — इस प्रकार कहकर पुनः गौरी के रूप में पूर्ववत परिणत हो गयीं ॥ १८८ ॥ जो व्यक्ति भगवान् श्रीशंकर के द्वारा कहे गये देवी के इस सहस्रनाम स्तोत्र का भक्तिपूर्वक पाठ करता है, वह देवी के सारूप्य मोक्ष को प्राप्त करता है । जो व्यक्ति गन्ध, पुष्प, धूप और दीप से महेश्वरी की आराधना कर यह स्तोत्र पढ़ता है, वह परम पद को प्राप्त करता है ॥ १८९-१९० ॥ जो व्यक्ति अनन्यभाव से इस स्तोत्र के द्वारा देवी की प्रतिदिन स्तुति करता है, उसे सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं । राजा उसके वशीभूत हो जाते हैं, सभी शत्रु नष्ट हो जाते हैं और सिंह, बाघ आदि सभी हिंसक प्राणि तथा चोर आदि उसको देखने मात्र से दूर से ही भाग जाते हैं । वह अनुल्लंघनीय आज्ञा वाला हो जाता है तथा सर्वत्र महान् कल्याण को प्राप्त करता है । अन्त में दुर्गाजी की स्मृति को प्राप्त कर स्वयं देवी का अंश हो जाता है ॥ १९१-१९४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभागवत महापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में “शिववक्त्रविनिर्गत-ललितासहस्रनामस्तोत्र’ नामक तेईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २३ ॥ Content is available only for registered users. 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