श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-37
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
सैंतीसवाँ अध्याय
शिवजी द्वारा हनुमान्रूप में प्रकट होने की बात बताना, विष्णु का महाराज दशरथ के घर में राम, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न के रूप में प्रकट होना, लक्ष्मी का सीता के रूप में तथा अन्य देवगणों का ऋक्ष, वानर आदि रूपों में प्रकट होना
अथः सप्तत्रिंशत्तमोऽध्यायः
महादेवनारदसंवादे श्रीरामावतारचरित्रवर्णनं

श्रीमहादेव जी बोले — भगवती के ऐसे वचन सुनकर नेत्रों में आह्लाद भरे हुए भगवान् विष्णु ने उन्हें भक्तिपूर्वक पुनः प्रणाम किया तथा ब्रह्माजी को साथ लेकर भगवान् शिव से ऐसा कहा — ॥ १-२ ॥

श्रीभगवान् बोले — देवाधिदेव ! विश्वनाथ ! भगवती जगदम्बा ने आपके समीप जैसा कहा है आपने वह सुना ही है। शंकर ! अब उस दुर्बुद्धि रावण के संहार हेतु जो आप मेरी सहायता करना चाहते हैं, महेशान ! वह मुझे बताइए ॥ ३-४ ॥

शिवजी बोले — मधुसूदन ! मैं वानाररूप से पवनपुत्र होकर जन्म लूँगा और आपकी यथोचित सहायता करूँगा। मधुसूदन ! विशाल महासागर को लाँघकर और आपकी पत्नी की खोज करके मैं सदा के लिए आपका प्रेमभाजन बनूँगा। विष्णु ! और भी आपकी प्रसन्नता को बढ़ाने वाले अत्यन्त कठिन और दारुण कार्यों को सम्पन्न करूँगा। जब मैं लङ्का में सूक्ष्म वानररूप से प्रवेश करूँगा तब स्वयं लङ्केश्वरी देवी निश्चय ही लङ्का का त्याग कर देंगी। मैंने वह बता दिया जिस प्रकार की सहायता मैं करूँगा, क्या वह ब्रह्माजी और आपकी प्रसन्नता के लिए होगी? ॥ ५-९ ॥

श्रीमहादेव जी बोले — सदाशिव के ऐसा कहने पर हर्ष से परिपूर्ण मन वाले महाबाहु भगवान् विष्णु ने ब्रह्मा जी का ध्यान किया और ब्रह्माजी को देखा ॥ १० ॥ तब ब्रह्माजी ने भी भगवान् विष्णु की इच्छा को जानकर हँसते हुए निर्विकार भगवान् नारायण से ऐसा कहा — ॥ ११ ॥

ब्रह्माजी बोले — देव ! मैं आपकी सहायता के लिए अपने अंश से ऋक्षयोनि में महाबल तथा पराक्रम से युक्त होकर पहले ही जन्म ले चुका हूँ, मैं आपके हित में निरन्तर आपको अच्छी सलाह दूंगा। धर्मराज स्वयं लङ्का में उस दुरात्मा राक्षसराज रावण के भाई विभीषण के रूप में जन्म ले चुके हैं। देव ! वे भी अपने भाई का साथ छोड़कर आपके सहायक बनेंगे। आप शीघ्र ही मनुष्यरूप में अवतार लें और इस चराचर जगत् की रक्षा करें ॥ १२-१५ ॥

श्रीमहादेव जी बोले — इस प्रकार भगवान् विष्णु ने परमेश्वरी जगदम्बा की प्रार्थना करके भूलोक पर महाराज दशरथ के घर में जन्म लिया ॥ १६ ॥ मुनीश्वर ! वे स्वयं एक ही चार रूपों में महाराज दशरथ के यहाँ महाबली राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के रूप में प्रकट हुए, जो पराक्रम के साथ ही अत्यन्त रूप-सौन्दर्य की राशि भी थे ॥ १७१/२

महामते ! श्रीराम और भरत दोनों दूर्वादल की श्याम आभा से युक्त थे और दूसरे दो – लक्ष्मण और शत्रुघ्न स्वर्ण के समान गौर छवि वाले थे। मुनिवर ! बाल्यकाल से ही शुभ लक्षणों से युक्त लक्ष्मण सदैव श्रीराम के और शत्रुघ्न श्रीभरत के अनुगामी थे ॥ १८-१९१/२

भगवती लक्ष्मी भी महाराज जनक के घर में परम सुन्दरी कन्या के रूप में पृथ्वीतल पर अवतरित हुई। ब्रह्मा अपने अंश से ऋक्ष योनि में महाबुद्धिमान् जाम्बवान् के रूप में विख्यात हुए। इसी प्रकार भगवान् शिव अपने अंश से अवतार लेकर महाबल और पराक्रम से युक्त पवनपुत्र हनुमान् के रूप में विख्यात हुए। वे किष्किन्धा नगरी में रहते हुए वानरराज के मन्त्री बने। महामति नारदजी ! अन्य देवगण भी इसी प्रकार ऋक्ष और वानर के रूप में प्रकट होकर वनप्रान्त में रहते हुए रामरूप में भगवान् विष्णु के अवतार ग्रहण की प्रतीक्षा करने लगे ॥ २०-२४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीमहाभागवत महापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में ‘श्रीरामावतार चरित्र वर्णन’ नामक सैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३७ ॥

Content is available only for registered users. Please login or register

Please follow and like us:
Pin Share

Discover more from Vadicjagat

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.