August 5, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-44 ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ चौवालीसवाँ अध्याय श्रीराम द्वारा भगवती की स्तुति, प्रसन्न होकर जगदम्बा द्वारा विजय की आकाशवाणी करना, कुम्भकर्ण का युद्धभूमि में प्रवेश तथा श्रीराम के साथ उसका घोर युद्ध अथः चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः श्रीमहादेवनारदसंवादे श्रीराम कुम्भकर्णयोर्युद्धवर्णनं ॥ श्रीराम कृत कात्यायनी स्तुति ॥ ॥ श्रीराम उवाच ॥ नमस्ते त्रिजगद्वन्द्ये संग्रामे जयदायिनि । प्रसीद विजयं देहि कात्यायनि नमोऽस्तु ते ॥ १ ॥ सर्वशक्तिमये दुष्टरिपुनिग्रहकारिणि । दुष्टजृम्भिणि संग्रामे जयं देहि नमोऽस्तु ते ॥ २ ॥ त्वमेका परमा शक्तिः सर्वभूतेष्ववस्थिता । दुष्टं संहर संग्रामे जयं देहि नमोऽस्तु ते ॥ ३ ॥ रणप्रिये रक्तभक्षे मांसभक्षणकारिणि । प्रपन्नार्तिहरे युद्धे जयं देहि नमोऽस्तु ते ॥ ४ ॥ खट्वाङ्गासिकरे मुण्डमालाद्योतितविग्रहे । ये त्वां स्मरन्ति दुर्गेषु तेषां दुःखहरा भव ॥ ५ ॥ त्वत्पादपङ्कजाद्दैन्यं नमस्ते शरणप्रिये । विनाशय रणे शत्रून् जयं देहि नमोऽस्तु ते ॥ ६ ॥ अचिन्त्यविक्रमेऽचिन्त्यरूपसौन्दर्यशालिनि । अचिन्त्यचरितेऽचिन्त्ये जयं देहि नमोऽस्तु ते ॥ ७ ॥ ये त्वां स्मरन्ति दुर्गेषु देवीं दुर्गविनाशिनीम् । नावसीदन्ति दुर्गेषु जयं देहि नमोऽस्तु ते ॥ ८ ॥ महिषासृक्प्रिये संख्ये महिषासुरमर्दिनि । शरण्ये गिरिकन्ये मे जयं देहि नमोऽस्तु ते ॥ ९ ॥ प्रसन्नवदने चण्डि चण्डातुरविमर्दिनि । संग्रामे विजयं देहि शत्रुञ्जहि नमोऽस्तु ते ॥ १० ॥ रक्ताक्षि रक्तदशने रक्तचर्चितगात्रके । रक्तबीजनिहन्त्री त्वं जयं देहि नमोऽस्तु ते ॥ ११ ॥ निशुम्भशुम्भसंहन्त्रि विश्वकर्त्रि सुरेश्वरि । जहि शत्रून् रणे नित्यं जयं देहि नमोऽस्तु ते ॥ १२ ॥ भवान्येतज्जगत्सर्वं त्वं पालयसि सर्वदा । रक्ष विश्वमिदं मातर्हत्वैतान् दुष्टराक्षसान् ॥ १३ ॥ त्वं हि सर्वगता शक्तिर्दुष्टमर्दनकारिणि । प्रसीद जगतां मातर्जयं देहि नमोऽस्तु ते ॥ १४ ॥ दुर्वृत्तवृन्ददमनि सद्वृत्तपरिपालिनि । निपातय रणे शत्रूञ्जयं देहि नमोस्तु ते ॥ १५ ॥ कात्यायनि जगन्मातः प्रपन्नार्तिहरे शिवे । संग्रामे विजयं देहि भयेभ्यः पाहि सर्वदा ॥ १६ ॥ श्रीराम जी बोले — त्रिलोकवन्दनिया ! युद्ध में विजय देनेवाली ! कात्यायनी ! आपको बार-बार नमस्कार है। मुझ पर प्रसन्न हों और मुझे विजय प्रदान करें। सर्वशक्तिमयी, दुष्ट शत्रुओं का निग्रह करनेवाली, दुष्टों का संहार करनेवाली भगवती ! संग्राम में मुझे विजय प्रदान करें, आपको नमस्कार है। आप ही सभी प्राणियों में निवास करनेवाली पराशक्ति हैं, संग्राम में दुष्ट राक्षस का संहार करें और मुझे विजय प्रदान करें, आपको नमस्कार है। युद्ध-प्रिये ! शरणागत की पीड़ा हरनेवाली ! [जगदम्बा ! ] युद्ध में मुझे विजय प्रदान करें, आपको नमस्कार है ॥ १-४ ॥ हाथ में खटवाङ्ग तथा खड्ग धारण करनेवाली एवं मुण्डमाला से सुशोभित विग्रहवाली भगवती ! विषम परिस्थितियों में जो आपका स्मरण करते हैं, उनका दुख हरण कीजिए। शरणागतप्रिये ! आप अपने चरणकमल के अनुग्रह से दीनता का नाश कीजिए, युद्धक्षेत्र में शत्रुओं का विनाश कीजिए और मुझे विजय प्रदान कीजिए, आपको नमस्कार है, पुनः नमस्कार है। आपका पराक्रम, रूप, सौन्दर्य तथा चरित्र अपरिमित होने के कारण सम्पूर्ण रूप से चिन्तन का विषय बन नहीं सकता। आप स्वयं भी अचिन्त्य है। मुझे विजय प्रदान कीजिए, आपको नमस्कार है। जो लोग विपत्तियों में दुर्गति का नाश करने वाली आप भगवती का स्मरण करते हैं, वे विषम परिस्थितियों में दुःखी नहीं होते। आप मुझे विजय प्रदान कीजिए, आपको नमस्कार है ॥ ५-८ ॥ युद्ध में महिषासुर का मर्दन करने वाली तथा शरण ग्रहण करने योग्य हिमालयसुता ! आप मुझे विजय प्रदान कीजिए, आपको नमस्कार है। चण्डासुर का नाश करने वाली प्रसन्नमुखी चण्डिके ! युद्ध में शत्रुओं का संहार कीजिए और मुझे विजय प्रदान कीजिए, आपको नमस्कार है। रक्तवर्ण की नेत्र वाली, रक्तरञ्जित दन्तपङ्क्तिवाली तथा रक्त से लिप्त शरीरवाली भगवती ! आप रक्तबीज का संहार करने वाली हैं, आप मुझे विजय प्रदान करें, आपको नमस्कार है। निशुम्भ तथा शुम्भ का संहार करनेवाली, जगत् की सृष्टि करने वाली सुरेश्वरी ! आप नित्य युद्ध में शत्रुओं का संहार कीजिए और मुझे विजय प्रदान कीजिए, आपको नमस्कार है ॥ ९-१२ ॥ भवानी ! आप सर्वदा इस जगत् का पालन करती हैं। माता ! आप इन दुष्ट राक्षसों को मारकर इस विश्व की रक्षा कीजिए। दुष्टों का संहार करने वाली भगवती ! आप सबमें विद्यमान रहने वाली शक्ति स्वरूपा हैं। जगन्माता ! प्रसन्न होइए, मुझे विजय प्रदान कीजिए, आपको नमस्कार है। दुराचारियों का दमन करनेवाली तथा सदाचारियों का सम्यक् पालन करने वाली भगवती ! युद्ध में शत्रुओं का संहार कीजिए और मुझे विजय प्रदान कीजिए, आपको नमस्कार है। शरणागतों का दुःख दूर करनेवाली, कल्याण प्रदान करने वाली जगन्माता कात्यायनी ! युद्ध में मुझे विजय प्रदान कीजिए और भय से सदा रक्षा कीजिए ॥ १३-१६ ॥ श्रीमहादेव जी बोले — मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार उन महात्मा श्रीराम के द्वारा भगवती की स्तुति किए जाने पर सहसा आकाशवाणी हुई — ॥ १७ ॥ रघुश्रेष्ठ ! आप भय मत कीजिए। शीघ्र ही आप महाबलशाली और पराक्रमी राक्षसों को मारकर लङ्का को जीतेंगे। शत्रुसूदन ! सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने बिल्ववृक्ष की छाया में मेरी पूजा की है, अतः मैं आपको अभीष्ट वर प्रदान करूँगी ॥ १८-१९ ॥ मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार की आकाशवाणी सुनकर रघुश्रेष्ठ श्रीराम अपनी विजय को सुनिश्चित समझने लगे ॥ २० ॥ इस प्रकार भगवान् श्रीराम के सोचते-ही-सोचते कुछ ही समय में राक्षसों के साथ महाबलशाली कुम्भकर्ण युद्धभूमि में आ गया। उसकी घोर गर्जना से वन और पर्वत सहित सम्पूर्ण पृथ्वी काँपने लगी तथा समुद्र विक्षुब्ध हो उठा। उन राक्षसों के रथ, घोड़ों और हाथियों की घोर गर्जना तथा वायुवेगशाली योद्धाओं के बलप्रयोग से उठी हुई वायु से पृथ्वी काँप उठी। हाथ में अस्त्र लिए हुए उस महाबली दुर्धर्ष कुम्भकर्ण को देखकर सभी वानर भय से व्याकुल हो उठे दिशा-विदिशाओं में स्थित हो गए ॥ २१-२४ ॥ तदनन्तर श्रीराम ने भयदायक उस राक्षस को आते हुए देखकर देवी को प्रणाम कर बाएँ हाथ में धनुष ले लिया ॥ २५ ॥ वह राक्षस भी पैर तथा हाथ के प्रहार से वानरों का मर्दन करके और अन्य वानरों का भक्षण करते हुए श्रीराम के सामने आ गया। वह बलवान् राक्षस भी दूर्वादल के समान आभावाले, श्यामवर्ण वाले, राक्षसों का नाश करने वाले, महान् भुजावाले, हाथ में अस्त्र लिए हुए तथा नीलकमल दल के समान नेत्रवाले, क्षोभरहित, अनुजसहित रघुश्रेष्ठ को युद्ध क्षेत्र में देखकर युगान्तकारी बादल की तरह गर्जना करने लगा ॥ २६-२८ ॥ मुनिश्रेष्ठ ! रघुश्रेष्ठ श्रीराम भी प्रसन्न होकर ब्रह्माण्ड को क्षुब्ध करने वाली घोर गर्जना करने लगे, तदनन्तर युद्ध आरम्भ हो गया ॥ २९ ॥ एक-दूसरे पर विजय प्राप्त करने की इच्छा से छोड़े गए ब्रह्मास्त्रजालों से उन दोनों में महान् युद्ध हुआ, जो देवताओं तथा राक्षसों के लिए अत्यन्त दुर्लभ था। संग्राम में विजय की इच्छा रखने वाले महापराक्रमी वानरों का बलशाली राक्षस-सैनिकों के साथ घोर युद्ध हुआ ॥ ३०-३१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में ‘श्रीराम-कुम्भकर्णयुद्धवर्णन’ नामक चवालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४४ ॥ Content is available only for registered users. 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