February 4, 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[उत्तरभाग] -003 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ तीसरा अध्याय भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा से श्रीनारदजी को गानबन्धु, जाम्बवती आदि से गानविद्या की प्राप्ति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे तृतीयोऽध्यायः वैष्णवगीतकथनं अम्बरीषजी बोले — हे मार्कण्डेय ! हे महाप्राज्ञ ! हे महाभाग! भगवान् नारदमुनि ने किस योग के द्वारा गान-विद्या प्राप्त की और उन्होंने किस समय तुम्बुरु की समानता प्राप्त की, यह सब मुझे बताइये; हे महामते ! आप सर्वज्ञ हैं ॥ १-२ ॥ मार्कण्डेयजी बोले — मैंने दिव्य दर्शन वाले नारदजी से यह रहस्य सुना था । उन महातेजस्वी तथा महामति नारद ने मुझे स्वयं बताया था ॥ ३ ॥ तपोनिधि भगवान् नारद ने कष्ट सहते हुए प्राणायाम से श्वास रोककर तुम्बुरुगन्धर्व के गौरव का स्मरण करते हुए दिव्य हजार वर्षों तक अत्यन्त कठोर तपस्या की थी। तत्पश्चात् उन महामुनि नारद ने अन्तरिक्ष में तीव्र ध्वनि वाली यह अद्भुत दिव्य आकाशवाणी सुनी — ‘हे मुनिश्रेष्ठ ! आप यह अत्यन्त कठिन तप किसलिये कर रहे हैं? यदि आपकी मति गान में संलग्न है, तो आप मानसोत्तरपर्वत पर जाकर वहाँ उलूक को देखिये; उसे गानबन्धु कहा गया है। शीघ्र जाइये और इसका दर्शन कीजिये; इससे आप गानवेत्ता हो जायेंगे ‘ ॥ ४–७ ॥ [आकाशवाणी के द्वारा ] ऐसा कहे गये वे वाणीवेत्ताओं में श्रेष्ठ नारदजी आश्चर्यचकित होकर मानसोत्तरपर्वत पर गानबन्धु उलूक के पास गये। गानबन्धु के चारों ओर गन्धर्व, किन्नर, यक्ष तथा अप्सराओं के समूह यत्र-तत्र बैठे हुए थे। वह पक्षी (उलूक) वहाँ प्रसन्नतापूर्वक बैठे हुए मधुर कण्ठस्वर वाले गन्धर्व आदि को गानविद्या की शिक्षा दे रहा था ॥ ८-१०१/२ ॥ तदनन्तर नारदजी को देखकर उन्हें प्रणाम करके गानबन्धु ने स्वागत के द्वारा उचितरूप से उनका सत्कार किया और उनसे कहा — ‘हे महामते ! आप भगवन् यहाँ किसलिये आये हैं ? हे ब्रह्मन् ! मुझसे आपका कौन-सा कार्य है; आप बतायें, मैं आपकी क्या सेवा करूँ ?’ ॥ ११-१२१/२ ॥ नारदजी बोले — हे परम बुद्धिसम्पन्न उलूकेन्द्र ! सुनिये; मैं अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त यथार्थ रूप से बताऊँगा । पूर्वकाल में एक अत्यन्त विलक्षण घटना घटी थी । हे विद्वन्! मैं बीते युग में नारायण के पास गया हुआ था; किंतु वे विष्णु मेरा तिरस्कार करके तुम्बुरु को प्रसन्नतापूर्वक बुलाकर भगवती लक्ष्मी के साथ उत्तम गान सुनने लगे। ब्रह्मा आदि सभी देवता उस स्थान से निष्कासित कर दिये गये, किंतु कौशिक आदि को नहीं निकाला गया और वे सुखपूर्वक वहाँ बैठकर गानयोग से श्रीहरि की आराधना करके गाणपत्य को प्राप्त हुए। इसी कारण से मैं दु:ख से पीड़ित होकर तप करने के लिये यहाँ आया हूँ ॥ १३–१७ ॥ मैंने जो कुछ दान किया है, यज्ञ किया है, कथा- श्रवण किया है और [सद्ग्रन्थों का] अध्ययन किया है — वह सब भगवान् विष्णु के माहात्म्य युक्त गानयोग की सोलहवीं कला के भी तुल्य नहीं है । हे द्विज ! यह सोचकर मैंने उसके लिये एक हजार दिव्य वर्षों तक कठोर तपस्या की । हे विहंगम ! तत्पश्चात् आपको उद्देश्य करके उत्पन्न हुई एक आकाशवाणी मैंने सुनी — ‘हे देवर्षे! हे ब्रह्मन् ! यदि गान में तुम्हारा अनुराग है तो गानबन्धु उलूक के पास जाओ; वहाँ शीघ्र ही तुम इसका ज्ञान प्राप्त कर लोगे।’ उसीसे प्रेरित होकर मैं आपके पास यहाँ आया हूँ। हे अव्यय ! मैं क्या करूँ? मैं आपका शिष्य हूँ, अतः मेरी रक्षा कीजिये ॥ १८-२२ ॥ गानबन्धु बोला — हे नारद! हे महामते ! पूर्वकाल में मेरे साथ जो घटित हुआ है, उसे आप सुनें; यह अत्यन्त आश्चर्य से भरा हुआ, सभी पापों को दूर करने वाला तथा मंगलकारी है ॥ २३ ॥ प्राचीनकाल में भुवनेश – इस नाम से प्रसिद्ध एक धर्मपरायण राजा हुआ। हजार अश्वमेधयज्ञ तथा दस हजार वाजपेययज्ञ के द्वारा ब्राह्मणों को करोड़ों गायों, सुवर्ण, वस्त्र, रथों, हाथियों, कन्याओं तथा अश्वों का दान देकर उस राजा ने पृथ्वी का पालन करते हुए अपने राज्य में गानयोग के द्वारा भगवान् श्रीहरि की उपासना करने से लोगों को रोक दिया था। ‘यदि कोई गानयोग से भगवान् की उपासना करेगा तो वह निश्चितरूप से मेरा वध्य होगा, उस परम पुरुष की स्तुति केवल वेदमन्त्रों से ही की जानी चाहिये । गानयोग के द्वारा केवल स्त्रियाँ ही सर्वत्र श्रीहरि का नित्य गान करें और जो सूत तथा मागध लोग हैं, वे गीत करायें’ — ऐसी आज्ञा देकर महान् तेजस्वी राजा भुवनेश राज्य-शासन करने लगा ॥ २४-२८१/२ ॥ उस राजा के पुर के निकट हरिमित्र – इस नाम से विख्यात एक ब्राह्मण रहता था; वह विष्णुभक्त तथा सभी प्रकार के [ राग-द्वेष आदि ] द्वन्द्वों से रहित था । नदी के तट पर आकर सम्यक् प्रकार से श्रीहरि की मनोहर प्रतिमा का अर्चन करके घृत, दधि, अनेकविध मिष्टान्न, खीर तथा पूआ का नैवेद्य अर्पण कर उन्हें दण्डवत् प्रणामकर एकाग्रचित्त होकर वह ईश्वर में आसक्त मन वाला होकर अत्यन्त प्रेमपूर्वक ताल-स्वर-लय से युक्त हरि-गान किया करता था ॥ २९-३२१/२ ॥ तदनन्तर राजा के आदेश से उसके अनुचर वहाँ आ गये। उसके पूजन आदि का समस्त सामान चारों ओर फेंककर उस ब्राह्मण को पकड़कर उन्होंने सम्यक् प्रकार से उसे राजा को सौंप दिया ॥ ३३-३४ ॥ तदनन्तर अत्यन्त दुष्टबुद्धि वाले राजा ने उस द्विजश्रेष्ठ को डाँट फटकारकर और उसका धन आदि सब कुछ छीनकर उसे राज्य से बाहर निकाल दिया । [ब्राह्मण हरिमित्र के द्वारा पूजित वहाँ पर गिरी हुई] हरि- प्रतिमा का हरण करके उसे लेकर म्लेच्छलोग चले गये ॥ ३५१/२ ॥ तब सभी लोकों में पूजित होता हुआ वह राजा बहुत समय बाद मृत्यु को प्राप्त हुआ । [ यमलोक पहुँचकर ] क्षुधा से पीड़ित तथा खिन्नमनस्क राजा ने अत्यन्त दुःखी होकर यमराज से कहा — ‘हे देव! मुझ स्वर्गप्राप्त को भी सदा भूख तथा प्यास सता रही है; मैंने ऐसा कौन-सा पाप किया है ? हे यम ! मैं क्या करूँ ?’ ॥ ३६-३८ ॥ यम बोले — तुमने अज्ञानमोहित होने के कारण वासुदेव में अनुरक्त रहने वाले हरिमित्र के प्रति पूर्व में बहुत बड़ा पाप किया था। हे राजन् ! भगवान् वासुदेव की अर्चना आदि के लिये हरिमित्र के प्रति तुमने जो पाप किया है, उसी पाप के कारण तुम्हें निरन्तर भूख का रोग संतप्त कर रहा है। तुम्हारा सारा दान, यज्ञ आदि विनष्ट हो गया है। हे नराधिप ! गीत वाद्य से युक्त होकर हरि- गान करने वाले महामति हरिमित्र को बुलाकर तुमने उसका धन छीन लिया, साथ ही तुम्हारे अनुचरों ने वासुदेव-प्रतिमा के पास में विद्यमान समस्त उपहार आदि को नष्ट कर दिया; इस प्रकार तुम्हारी आज्ञा से ही उन्होंने पाप किया । हे नृपश्रेष्ठ ! [ तुमने आज्ञा दे रखी थी कि ] ‘कोई भी ब्राह्मण श्रीहरि के कीर्तिगान के बिना ही उनकी उपासना करे और गानयोग के द्वारा उनका यशोगान न करे’ — अतः तुमने पाप किया है। इससे तुम्हारा सम्पूर्ण लोक नष्ट हो गया है; अतः अब तुम पर्वत के कोटर में जाओ और वहाँ पहले से पड़े हुए अपने शव को नोच- नोचकर नित्य खाते हुए निवास करो। क्षुधा से व्याकुल होकर उस पर्वत-कोटर में नित्य अपने शव को खाते हुए तुम जबतक मन्वन्तर रहेगा, तबतक उसी घोर नरक में पड़े रहो। तदनन्तर मन्वन्तर बीत जाने पर तुम पृथ्वी पर जन्म लोगे। [विभिन्न योनियों में जन्म लेते हुए पुन: ] बहुत समय के बाद मनुष्ययोनि में जन्म लेकर तुम ज्ञान प्राप्त करोगे ॥ ३९–४६१/२ ॥ गानबन्धु बोला — ऐसा कहकर विद्वान् यम वहीं अन्तर्धान हो गये और ऐश्वर्यशाली हरिमित्र अपने बान्धवगणों को साथ लेकर गणाधिपों से स्तुत होता हुआ विमान से विष्णुलोक चला गया ॥ ४७-४८ ॥ राजा भुवनेश भूख-प्यास से युक्त होकर अपने शव को नित्य खाता हुआ इसी पर्वत के कोटर में पड़ा रहता था ॥ ४९ ॥ मैंने उस राजा को वहाँ देखा और उसने ही मुझे यह सब बताया था। यह देखकर तथा सब कुछ जानकर मैं सूर्य के समान प्रभा वाले विमान से जाते हुए तथा देवताओं से घिरे हुए हरिमित्र के पास गया। इन्द्रद्युम्न के अनुग्रह से मुझे उत्तम आयु प्राप्त हुई है। हे सुव्रत! उसी के प्रभाव से मैंने हरिमित्र का दर्शन किया है ॥ ५०-५११/२ ॥ उन्हीं के ऐश्वर्य के प्रभाव से गानविद्या के प्रति मेरा मन आकृष्ट हुआ। हे मुने! साठ हजार वर्षों तक मैं किन्नरों के साथ गान का अभ्यास करता रहा, तब गानयोग से मेरी जिह्वा पवित्र होकर स्पष्ट हो गयी, तत्पश्चात् मैं गान की शिक्षा लेने लगा और उससे भी दुगुने समय में मेरी यह जिह्वा गानयोग से परिपूर्ण हो गयी। इस प्रकार [गान का अभ्यास करते हुए ] दस मन्वन्तर बीत गये: अन्त में मैं गान का आचार्य हो गया। वहाँ पर पहले गन्धर्व आदि और बाद में ये किन्नरों के समुदाय मुझे आचार्य मानकर [मेरे पास ] आने लगे ॥ ५२-५५१/२ ॥ हे तपोधन । गानविद्या तपस्या से कभी भी प्राप्त नहीं की जा सकती, अतः श्रवण-अभ्यास से युक्त होकर आप मुझसे गानविद्या प्राप्त करें । हे मुनिश्रेष्ठ ! भगवान् वासुदेव को नमस्कार करके उस गान को सुनिये। तब ऐसा कहे गये वे मुनि नारद उसे प्रणाम करके गानाभ्यास करने लगे ॥ ५६-५७१/२ ॥ मार्कण्डेयजी बोले — उलूक के द्वारा ऐसा कहे गये मुनिश्रेष्ठ नारद शिक्षाक्रम से युक्त होकर उससे गान सीखने लगे। उस समय गानबन्धु उलूक ने [ नारदजी से ] कहा — अब आप लज्जा से रहित हो जाइये ॥ ५८-५९ ॥ उलूक बोला — स्त्री-संसर्ग में, गीत में, द्यूत में, व्याख्यान देने में, व्यवहार में, आहार में अर्थोपार्जन में तथा आय-व्यय में मनुष्य को सदा लज्जा का त्याग कर देना चाहिये। शरीर के अंगों को सिकोड़कर, बहुत आवरण आदि से शरीर को ढककर, हाथ हिला-हिलाकर, मुँह को विकृत रूप से खोलकर और जिह्वा को निकालकर कभी नहीं गाना चाहिये। हाथ ऊपर उठाकर ऊपर की ओर दृष्टि करके, अपने अंगों को देखते हुए तथा दूसरे का अवलोकन करते हुए कभी नहीं गाना चाहिये । ताल देने के लिये और उठने के लिये कटि का आश्रय प्रशस्य नहीं होता है। हे महामते । गानयोग में हास, रोष, कम्प तथा अनवधानता — ये सभी रूप प्रशस्त नहीं माने जाते । मुने ! एक हाथ से ताल दे पाना सम्भव नहीं हो सकता है। भूख से पीड़ित, भयभीत तथा तृष्णा से व्याकुल मनुष्य को गानयोग नहीं करना चाहिये; अन्धकार में कभी नहीं गाना चाहिये । गाने वाले को इसी प्रकार के अन्य कार्य भी नहीं करने चाहिये ॥ ६०-६६१/२ ॥ मार्कण्डेयजी बोले — इस प्रकार उसके द्वारा कहे गये भगवान् नारदने बताये गये गान-लक्षणों के द्वारा हजार दिव्य वर्षों तक गीत की शिक्षा प्राप्त की। इससे वे गीत- प्रस्तार आदि में पूर्ण पारंगत हो गये और वीणावादन आदि में ज्ञानसम्पन्न होकर सभी स्वरभेदों के ज्ञाता बन गये, मुनिश्रेष्ठ नारद ने स्वरों के छियालीस हजार एक सौ भेद-प्रभेदों को जान लिया । तभी से गन्धर्वों तथा किन्नरों के समूह मुनि नारद से मिलकर अत्यन्त प्रेम से भर जाते थे ॥ ६७-७० ॥ मुनि ने गानबन्धु उलूक से कहा — आपके सान्निध्य में आकर आपसे श्रेष्ठ गान प्राप्त करके मैं गानविद्या में निष्णात हो गया हूँ; आप निश्चय ही गीतविशारद हैं। हे ध्वांक्षशत्रो! हे महाप्राज्ञ ! हे आचार्य ! मैं आपकी क्या सेवा करूँ? ॥ ७११/२ ॥ गानबन्धु बोला — हे ब्रह्मन्! ब्रह्मा के एक दिन में चौदह मनु व्यतीत होते हैं। तत्पश्चात् तीनों लोक जलाप्लावित हो जाते हैं । हे महामुने ! ब्रह्मा के दिन के समाप्तिपर्यन्त मेरी आयु हो तथा मेरा परम कल्याण हो; आपके द्वारा मन से ऐसी कामना की जाय — हे मुनिश्रेष्ठ ! यही मेरी दक्षिणा है ॥ ७२-७३१/२ ॥ नारदजी बोले — कल्प के व्यतीत होने पर आप गरुड़ होंगे। हे महाप्राज्ञ ! आपका कल्याण हो, आप मुझ पर प्रसन्न हों; अब मैं प्रस्थान करूँगा ॥ ७४ ॥ मार्कण्डेयजी बोले — ऐसा कहकर नारदजी भी श्वेतद्वीप में विराजमान जनार्दन वासुदेव के पास चले गये और वहाँ गीत गाने लगे। उसे सुनकर लक्ष्मीकान्त भगवान् विष्णु ने नारद से कहा — हे नारद! आप आज भी गीतों का गान करने में तुम्बुरु से विशिष्ट नहीं हैं। आप जब उनसे विशिष्ट होंगे, उस समय को मैं बता रहा हूँ । आप गानबन्धु से शिक्षा प्राप्त करके गानतत्त्व के ज्ञाता हो गये हैं ॥ ७५–७७१/२ ॥ हे महामते ! मैं वैवस्वत मनु के अट्ठाईसवें द्वापरयुग के अन्त में देवकी के गर्भ से वसुदेव के पुत्र के रूप में कृष्ण नाम से यदुवंश में अवतीर्ण होऊँगा । उस समय मेरे पास आकर आप ठीक-ठीक स्मरण कराइयेगा; तब मैं आपको तुम्बुरु के समान ही अतिशय गान से सम्पन्न तथा महाव्रत से युक्त कर दूँगा । तबतक आप यथानुकूल देव- गन्धर्वयोनियों में समुचित रूप से शिक्षा प्रदान कीजिये — ऐसा कहकर वे [भगवान् विष्णु ] अन्तर्धान हो गये ॥ ७८–८११/२ ॥ तदनन्तर वीणावादन में संलग्न रहने वाले, देवतुल्य, तपस्या की निधि तथा वासुदेव में पूर्णरूप से आसक्त वे देवर्षि नारद सभी आभरणों से विभूषित होकर अपने कन्धे पर वीणा धारण करके सभी लोकों में विचरने लगे । वरुण, यम, अग्नि, इन्द्र, कुबेर, वायु तथा ईशान — इन देवताओं की सभा में पहुँचकर धर्मनिष्ठ तथा वीणावादन में कुशल वे नारद भगवान् श्रीहरि का गान करते थे ॥ ८२-८५ ॥ तदनन्तर गन्धर्वों तथा अप्सराओं से पूजित होते हुए वे किसी समय ब्रह्मलोक को प्राप्त हुए। वहाँ गायन-वादन में विशारद हाहा – हूहू नामक दो दिव्य श्रेष्ठ गन्धर्व ब्रह्मा के गायक के रूप में सदा विद्यमान रहते थे। वहाँ उन दोनों के साथ में बैठकर भगवान् श्रीहरि का गान करते हुए महातेजस्वी मुनिश्रेष्ठ नारद ब्रह्माजी के द्वारा पूजित हुए ॥ ८६–८८ ॥ समस्त लोकों के पितामह उन ब्रह्मा को प्रणाम करके नारदजी सभी लोकों में इच्छानुसार विचरण करने लगे ॥ ८९ ॥ तदनन्तर बहुत समय के बाद वे महामुनि नारद गन्धर्व तुम्बुरु के घर पहुँचकर वीणा लेकर के वहीं स्थित होकर गाने लगे। षड्ज आदि जो सात प्रथम स्वर माने गये हैं, वे वहाँ साक्षात् विद्यमान थे; उन्हें [तुम्बुरु के घर में] क्रीड़ा करते देखकर भगवान् नारद बड़ी शीघ्रता से वहाँ से निकल गये ॥ ९०-९१ ॥ तत्पश्चात् महान् बुद्धि से सम्पन्न महामुनि नारद परिश्रम के साथ बहुत समय तक गान सीखते रहे। गानविद्या में पारंगत वे नारद सातों स्वरों की अंगनाओं का अवलोकन करते हुए सदा वीणा धारण किये गान- साधना में रत रहते थे; किंतु उनकी वीणा की तन्त्रियाँ उन स्वरांगनाओं को प्राप्त न कर सकीं ॥ ९२-९३ ॥ तदनन्तर रैवतकपर्वत पर आकर श्रीकृष्ण को प्रणाम करके महामुनि नारद ने उन्हें वह सब बताया, जो श्वेतद्वीप में पूर्वकाल में भगवान् विष्णु ने श्रेष्ठ गानयोग के विषय में उनसे कहा था ॥ ९४ ॥ उसे सुनकर श्रीकृष्ण ने जाम्बवती से हँसते हुए कहा — हे भद्रे ! इन मुनिवर [नारद] – को वीणा-गान की विधिपूर्वक शिक्षा प्रदान करो। तब ‘ठीक है’ श्रीकृष्ण से हँसते हुए ऐसा कहकर वे मुनि को सम्यक् प्रकार से शिक्षा देने लगीं ॥ ९५-९६१/२ ॥ तत्पश्चात् एक वर्ष पूर्ण हो जाने पर वे माधव के पास आकर उन्हें प्रणाम करके उनके सामने खड़े हो गये। तब केशव ने फिर कहा — अब आप सत्यभामा के पास आइये और इनसे विधिपूर्वक शिक्षा प्राप्त कीजिये । तब ‘ठीक है’ — ऐसा कहकर वे मुनि सत्यभामा को प्रणाम करके गान करने लगे। उन सत्यभामा ने भी उन्हें गानशिक्षा प्रदान की। तब एक वर्ष पूर्ण हो जाने पर [ रुक्मिणी से शिक्षा लेने के लिये] पुनः वासुदेव के द्वारा नियुक्त किये गये वे विद्वान् नारद रुक्मिणी के भवन में गये ॥ ९७–९९१/२ ॥ तब वहाँ की अंगनाओं और दासियों ने उन मुनिश्रेष्ठ से कहा — हे मुने! इतने समय तक गाते हुए भी आप महान् परिश्रम के स्वर का ज्ञान नहीं कर सके। तत्पश्चात् नारदमुनि ने उन देवी रुक्मिणी से भी पूरे तीन वर्षों तक साथ शिक्षा प्राप्त की और वे [उत्तम ] गान करने लगे; तब स्वरांगनाएँ महामुनि नारद की वीणा के तारों में आकर स्थित हो गयीं ॥ १००-१०२ ॥ तदनन्तर अपरिमेय आत्मा को धारण करने वाले स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण ने महामुनि को बुलाकर उन्हें सर्वश्रेष्ठ गानविद्या की शिक्षा प्रदान की। तब मुनिश्रेष्ठ नारद तुम्बुरु से भी अधिक ज्ञानसम्पन्न हो गये। वे देवर्षि जनार्दन श्रीकृष्ण को प्रणाम करके [आनन्दमग्न होकर ] नृत्य करने लगे ॥ १०३-१०४ ॥ तदनन्तर भगवान् हृषीकेश ने हँसकर कहा — हे महामुने ! अब आप गानविद्या में सब कुछ जान गये हैं; अब आप मेरे सान्निध्य में रहकर गान किया कीजिये । आपने यह अपना अभिलषित प्राप्त कर लिया है। अब आप भी तुम्बुरु के साथ मेरे लोक में सम्यक् प्रकार से नित्य गान कीजिये ॥ १०५-१०६ ॥ तब [ श्रीकृष्णके द्वारा ] ऐसा कहे गये वे मुनि यथेच्छ विचरण करने लगे। हे नृपश्रेष्ठ ! जब श्रीकृष्ण भुवननायक शिव की पूजा करने लगते थे, उस समय [ श्रीकृष्णरूप] उन श्रीहरि के आदेश से स्वरों के महाज्ञानी महामुनि नारद रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती और श्रीकृष्ण के साथ शंकरजी का स्तुति गान करते थे ॥ १०७-१०८१/२ ॥ [ सूतजी बोले — ] हे श्रेष्ठ मुनिगण ! मैंने आप लोगों को मुनि नारद की गानविद्या प्राप्ति का यह क्रम बतला दिया। [मार्कण्डेयजी ने कहा — ] हे राजन् ! वासुदेव की स्तुति का अत्यधिक गान करने वाला ब्राह्मण श्रीहरि का सालोक्य प्राप्त कर लेता है; किंतु रुद्र का स्तुतिगान करने वाला उससे भी अधिक श्रेष्ठ भगवत्सारूप्य प्राप्त कर लेता है । इसके विपरीत किसी अन्य का गान करने वाला नरक में जाता है। मन, वाणी तथा कर्म से वासुदेव में ही अनुरक्त होकर उनकी स्तुति का गान करने वाला तथा उसे सुनने वाला उन्हीं को प्राप्त होता है, अतः गानविद्या को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है ॥ १०९–११२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत उत्तरभाग में ‘वैष्णवगीतकथन’ नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३ ॥ Content is available only for registered users. 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