श्रीलिङ्गमहापुराण -[उत्तरभाग] -006
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
छठा अध्याय
भगवान् विष्णु से अलक्ष्मी (ज्येष्ठा–दरिद्रा ) तथा लक्ष्मी का प्रादुर्भाव एवं लक्ष्मी तथा दरिद्रा के निवासयोग्य स्थानों का वर्णन
श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे षष्ठेऽध्यायः
अलक्ष्मीवृत्तं

ऋषिगण बोले —  देवों के भी देव धीमान् विष्णु का मायावी होना तो हम लोगों ने सुन लिया । हे लोमहर्षण ! अब आप हम लोगों को यथार्थरूप से यह बतायें कि देवदेव जनार्दन से ज्येष्ठा (अलक्ष्मी) की उत्पत्ति कैसे हुई ? ॥ ११/२

सूतजी बोले —  आदि तथा अन्त से रहित, ऐश्वर्यशाली, प्रभुतासम्पन्न तथा जगत् के स्वामी नारायण विष्णु ने प्राणियों को व्यामोह में डालने के लिये इस जगत् को दो प्रकार का बनाया है। उन महातेजस्वी विष्णु ने ब्राह्मणों, वेदों, सनातन वैदिक धर्मों, श्री तथा श्रेष्ठ पद्मा की उत्पत्ति करके एक भाग किया और अशुभ तथा ज्येष्ठा अलक्ष्मी, वेदविरोधी अधम मनुष्यों तथा अधर्म का निर्माण करके एक दूसरा भाग किया ॥ २–४१/२

हे श्रेष्ठ द्विजगण ! भगवान् जनार्दन ने पहले अलक्ष्मी का सृजन करके ही पद्मा (लक्ष्मी) – का सृजन किया है, इसीलिये अलक्ष्मी ज्येष्ठा कही गयी हैं । अमृत की उत्पत्ति के समय महाभयंकर विष निकलने के पश्चात् पहले वे ज्येष्ठा अशुभ अलक्ष्मी उत्पन्न हुई, ऐसा सुना गया है। उसके अनन्तर विष्णुभार्या लक्ष्मी पद्मा आविर्भूत हुईं ॥ ५–७ ॥ तब [लक्ष्मी विवाह से पूर्व ] दुःसह नामक विप्रर्षि ने उस अशुभा ज्येष्ठा के साथ विवाह किया तथा उसको परिगृहीत देख स्वयं को परिपूर्ण माना; तब वे मुनि प्रसन्नचित्त होकर उसके साथ लोक में विचरण करने लगे। हे विप्रो ! जिस स्थान पर विष्णु तथा महात्मा शिव के नाम का घोष तथा वेदध्वनि होती थी, हवन का धूम दीखता था अथवा अंगों में भस्म धारण किये हुए लोग रहते थे, वहाँ पर वह अलक्ष्मी भयातुर होकर अपने दोनों कान बन्द करके इधर-उधर भागती हुई जाती थी । उस ज्येष्ठा को इस प्रकार के स्वभाव वाली देखकर मुनि दुःसह उद्विग्न हो उठे ॥ ८-११ ॥

इसके बाद वे महामुनि उसके साथ घोर वन में जाकर कठोर तप करने लगे। वे सोचने लगे कि कन्या का प्रतिग्रह भविष्य में नहीं करूँगा — ऐसा कहकर और प्रतिज्ञा करके वे ऋषि योगज्ञान परायण हो गये। [किसी समय ] उन विशुद्धात्मा योगीश्वर मुनि ने वहाँ पर आते हुए मार्कण्डेयजी को देखा। उन महात्मा मुनि को प्रणाम करके ऋषि दुःसह ने कहा — हे भगवन्! मेरी यह भार्या मेरे साथ कभी नहीं रहेगी । हे विप्रर्षे! मैं क्या करूँ; अपनी इस भार्या के साथ कहाँ जाऊँ और कहाँ न जाऊँ ? ॥ १२–१५१/२

मार्कण्डेयजी बोले —  हे दु:सह ! सुनो, अकीर्ति सर्वत्र अशुभ से युक्त रहती है; यह अतुलनीय अलक्ष्मी ‘ज्येष्ठा’ – इस नाम से पुकारी जाती है ॥ १६१/२

जहाँ नारायण के भक्त, वेदमार्ग का अनुसरण करने वाले, रुद्रभक्त, महात्मागण तथा भस्म से अनुलिप्त शरीर वाले लोग सदा रहते हों, वहाँ तुम कभी भी प्रवेश मत करना । ‘हे नारायण! हे हृषीकेश ! हे पुण्डरीकाक्ष ! हे माधव ! हे अच्युतानन्त ! हे गोविन्द ! हे वासुदेव ! हे जनार्दन! हे रुद्र ! हे रुद्र ! हे रुद्र !’ शिव को बार-बार नमस्कार है, शिवतर को नमस्कार है, शंकर को सर्वदा नमस्कार है, हे महादेव ! हे महादेव ! हे महादेव ! – ऐसा कहते रहने वाले; आप उमापति, हिरण्यपति, हिरण्यबाहु तथा वृषांक को सदा बार-बार नमस्कार है, हे नृसिंह ! हे वामन! हे अचिन्त्य ! हे माधव ! – ऐसा जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र प्रसन्न होकर नित्य बोलते रहते हैं; उनके धन-आदि गृहों में, उद्यान में तथा गोष्ठों में कभी भी प्रवेश मत करना; क्योंकि विकराल अग्नि-ज्वालाओं तथा हजारों सूर्यों के समान तेजोमय अत्यन्त उग्र विष्णुचक्र उन लोगों के अमंगल का सदा नाश कर देता है ॥ १७-२४ ॥

जिस घर में स्वाहाकार तथा वषट्कार होता हो तथा जहाँ पर सामवेद की ध्वनि होती हो, उसे छोड़कर अन्यत्र चले जाना। जो लोग नित्य वेदाभ्यास में संलग्न हों, नित्यकर्म में तत्पर हों तथा वासुदेव की पूजा में रत हों, उन्हें दूर से ही त्याग देना ॥ २५-२६ ॥ जिनके घर में अग्निहोत्र तथा शिवलिङ्ग का पूजन होता हो और जिनके घरों में वासुदेव तथा भगवती चण्डिका की मूर्ति विराजमान हो, समस्त पापों से रहित उन लोगों को छोड़कर दूर चले जाना । हे दु:सह ! जो लोग नित्य तथा नैमित्तिक यज्ञों के द्वारा महेश्वर की आराधना करते हैं, उन्हें छोड़कर तुम इसके साथ अन्यत्र चले जाना। जो लोग वैदिकों, ब्राह्मणों, गौओं, गुरुओं, अतिथियों तथा रुद्रभक्तों की नित्य पूजा करते हैं, उनके पास मत जाना ॥ २७–२९१/२

दुःसह बोला — हे मुनिश्रेष्ठ ! जिस स्थान में मेरा प्रवेश हो सके; उसे आप मुझे बतायें, जिससे आपके वचन से मैं भयरहित होकर इनके घर में सदा प्रवेश करूँ ॥ ३०१/२

मार्कण्डेयजी बोले —  जिसके घर में वैदिकों, द्विजों, गौओं, गुरुओं तथा अतिथियों की पूजा न होती हो और जहाँ पति-पत्नी एक-दूसरे के विरोधी हों, उसके घर में तुम निर्भय होकर अपनी भार्या के साथ प्रवेश करो। जहाँ पर देवाधिदेव महादेव तथा तीनों भुवनों के स्वामी भगवान् रुद्र की निन्दा होती हो, वहाँ तुम भयरहित होकर प्रवेश करो ॥ ३१-३२१/२

जहाँ भगवान् वासुदेव के प्रति भक्ति न हो; जहाँ सदाशिव न स्थापित हों; जहाँ मनुष्यों के घर में जप – होम आदि न होता हो, भस्म – धारण न किया जाता हो, पर्व पर विशेष करके चतुर्दशी तथा कृष्णाष्टमी तिथि पर रुद्रपूजन न होता हो, लोग सन्ध्योपासन के समय भस्म धारण न करते हों; जहाँ पर लोग चतुर्दशी के दिन महादेव का यजन न करते हों, जहाँ लोग विष्णु के नाम- संकीर्तन से विमुख हों; जहाँ लोग दुष्टात्मा वाले पुरुषों के साथ रहते हों; जहाँ ब्राह्मण तथा विकृत मन वाले मनुष्य ‘कृष्ण को नमस्कार है, परमेष्ठी शर्व को नमस्कार है’- ऐसा नहीं कहते हों, वहीं पर तुम अपनी भार्या के साथ सदा प्रवेश करो ॥ ३३–३७ ॥ जहाँ वेदध्वनि, गुरुपूजा आदि न होते हों, उन स्थानों पर और पितृकर्म ( श्राद्ध आदि ) – से विमुख लोगों के यहाँ अपनी भार्यासहित निवास करो । जिस घर में रात्रि-वेला में [ लोगों के बीच ] परस्पर कलह होता हो, वहाँ तुम भयमुक्त होकर इसके साथ निरन्तर निवास करो ॥ ३८-३९ ॥

जिसके यहाँ शिवलिङ्ग का पूजन न होता हो तथा जिसके यहाँ जप आदि न होते हों, अपितु रुद्रभक्ति की निन्दा होती हो, वहीं पर तुम निर्भय होकर प्रवेश करो। जिस घर में अतिथि, श्रोत्रिय (वैदिक), गुरु, विष्णुभक्त और गायें न हों, वहाँ तुम अपनी भार्यासहित निवास करो ॥ ४०-४१ ॥ जहाँ बालकों के देखते रहने पर उन्हें बिना दिये ही लोग भक्ष्य पदार्थ स्वयं खा जाते हों, उस स्थान पर तुम प्रसन्न होकर सपत्नीक प्रवेश करो। महादेव अथवा भगवान् विष्णु का पूजन न करके तथा विधिपूर्वक हवन न करके जहाँ लोग रहते हों, वहाँ तुम सदा निवास करो ॥ ४२-४३ ॥ जिस घर में या देश में पापकृत्य में संलग्न रहने वाले, मूर्ख तथा दयाहीन लोग रहते हों, वहाँ पर तुम प्रवेश करो । घर और घर की चहारदीवारी को तोड़ने वाली अर्थात् घर की मान-मर्यादा को भंग करने वाली, दुःशीलता के कारण किसी भी प्रकार प्रसन्न न होने वाली गृहिणी जिस घर में हो, उस घर में प्रसन्न मन से सदा निवास करो ॥ ४४-४५ ॥

जहाँ काँटेदार वृक्ष हों, जहाँ निष्पाव (सेम आदि)-की लता हो और जहाँ पलाश का वृक्ष हो, वहाँ तुम अपनी पत्नी सहित निवास करो। जिनके घरों में अगस्त्य, आक आदि दूध वाले वृक्ष, बन्धुजीव (गुलदुपहरिया)-का पौधा, विशेषरूप से करवीर, नन्द्यावर्त (तगर) और मल्लिका के वृक्ष हों, उनके घरों में तुम पत्नी के साथ प्रवेश करो। जिस घर में अपराजिता, अजमोदा, निम्ब, जटामांसी, बहुला (नील का पौधा), केले के वृक्ष हों, वहाँ पर तुम सपत्नीक प्रवेश करो। जहाँ ताल, तमाल, भल्लात (भिलावा), इमली, कदम्ब और खैर के वृक्ष हों, वहाँ तुम अपनी भार्या के साथ प्रवेश करो। जिनके घरों में बरगद, पीपल, आम, गूलर तथा कटहल के वृक्ष हों, उनके यहाँ तुम अपनी भार्या के साथ निवास करो। जिसके निम्बवृक्ष में, बगीचे में अथवा घर में कौवों का निवास हो और जिसके घर में दण्डधारिणी तथा कपालधारिणी स्त्री हो, उसके यहाँ तुम निवास करो ॥ ४६–५११/२

जिस घर में एक दासी, तीन गायें, पाँच भैंसे, छः पत्नी सहित घोड़े और सात हाथी हों, वहाँ तुम अपनी भार्यासहित प्रवेश करो। जिस घर में प्रेतरूपा तथा डाकिनी काली- प्रतिमा स्थापित हो और जहाँ भैरव मूर्ति हो, वहाँ तुम अपनी पत्नी के साथ प्रवेश करो। जिस घर में भिक्षुबिम्ब आदि हो, वहाँ तुम यथेच्छ निवास करो। सोने, बैठने, भोजन तथा भ्रमण के समयों में जिनकी वाणी (जिह्वा) सदा भगवान् श्रीहरि के नामों का उच्चारण नहीं करती, उनका घर सपत्नीक तुम्हारे निवास करने के लिये मैं बता रहा हूँ ॥ ५२-५६ ॥ जहाँ दम्भपूर्ण आचार में निरत रहने वाले, श्रुति तथा स्मृति से विमुख रहने वाले, विष्णुभक्ति से विहीन, महादेव की निन्दा करने वाले, नास्तिक तथा शठ लोग हों, वहाँ पर तुम पत्नीसहित निवास करो ॥ ५७१/२

जो लोग भगवान् शिव को सबसे श्रेष्ठ नहीं कहते हैं और इन्हें साधारण समझते हैं, उनके यहाँ तुम भार्या सहित निवास करो। कलुषित मन वाले जो लोग ‘ब्रह्मा, भगवान् विष्णु तथा सभी देवताओं के स्वामी इन्द्र – ये रुद्र के प्रसाद से आविर्भूत हैं’ – ऐसा नहीं कहते हैं और ब्रह्मा, भगवान् विष्णु तथा इन्द्र को इनके समान कहते हैं; साथ ही जो मूढ़ तथा अज्ञानी लोग सूर्य को खद्योत कहते हैं – उनके गृह, क्षेत्र तथा आवास में तुम सदा इसके साथ निवास करो और पूर्ण रूप से अनन्यबुद्धि होकर उनके घर में भोग करो ॥ ५८–६११/२

जो मूर्ख तथा अज्ञानी लोग अकेले ही पका हुआ अन्न खाते हैं और स्नान आदि मंगलकार्यों से विहीन रहते हैं, उनके घर में तुम प्रवेश करो। जो स्त्री शौचाचार से विमुख हो, देहशुद्धि से रहित हो तथा सभी [ भक्ष्याभक्ष्य ] पदार्थों के भक्षण में तत्पर रहती हो, उसके घर में तुम नित्य निवास करो ॥ ६२-६३१/२  ॥

जो गृहस्थ मानव स्वयं मलिन मुख वाले, गन्दे वस्त्र धारण करने वाले तथा मलयुक्त दाँतों वाले हैं, उनके घर में तुम प्रवेश करो। जो लोग अपना पैर नहीं धोते, सन्ध्या के समय शयन करते हैं और सन्ध्यावेला में भोजन करते हैं, उनके घर में तुम निवास करो। जो मूर्ख मनुष्य बहुत भोजन करते हैं, अत्यधिक पान करते हैं और जुआ – सम्बन्धी वार्ता करने तथा उसके खेलने में तत्पर रहते हैं, उनके घर में तुम प्रवेश करो ॥ ६४–६६१/२

जो लोग ब्राह्मण के धन का हरण करते हैं, अपात्रों का पूजन करते हैं और शूद्रों का अन्न खाते हैं, उनके घर में तुम प्रवेश करो। जो मनुष्य मद्यपान में संलग्न रहते हैं, पापपरायण हैं, मांस भक्षण में तत्पर रहते हैं और परायी स्त्रियों में आसक्त रहते हैं, उनके घर में तुम निवास करो ॥ ६७-६८१/२

जो लोग पर्व के अवसर पर भगवान्‌ की पूजा में संलग्न नहीं रहते, दिन में तथा सन्ध्या के समय मैथुन करते हैं, उनके घर में तुम निवास करो। जो लोग कुत्ते तथा मृग की भाँति पीछे से मैथुन करते हैं और जल में मैथुन करते हैं, उनके यहाँ अपनी भार्यासहित तुम निवास करो। जो नराधम रजस्वला स्त्री के साथ अथवा चाण्डाली के साथ अथवा कन्या के साथ अथवा गोशाला में सम्भोग करता है; उसके घर में तुम निवास करो। अधिक कहने से क्या लाभ! जो लोग नित्यकर्म से विमुख तथा रुद्रभक्ति से रहित हैं, उनके घर में तुम प्रवेश करो । कृत्रिम साधनों से सम्पन्न होकर जो मनुष्य स्त्री के पास जाता है और स्त्रीसंसर्ग करता है, उसके यहाँ तुम अपनी भार्यासहित प्रवेश करो ॥ ६९–७३१/२

सूतजी बोले —  ऐसा कहकर वे ऐश्वर्यशाली तथा ब्रह्मतुल्य ब्रह्मर्षि [ मार्कण्डेय ] मुनि अपने नेत्र धोकर वहीं पर अन्तर्धान हो गये । तत्पश्चात् [ मार्कण्डेयऋषि के द्वारा ] बताये गये स्थानों, विशेष करके देवों के भी देव विष्णु की निन्दा में लगे रहने वाले लोगों के यहाँ वे मुनिश्रेष्ठ दुःसह अपनी भार्यासहित पहुँचे। किसी समय [एक तड़ाग देखकर ] दुःसहमुनि ने ये जो ज्येष्ठा नाम से कही गयी हैं, उनसे यह कहा —  तुम इस तड़ाग के तट पर आश्रम में स्थित पीपलवृक्ष में रहो; मैं रसातल में प्रवेश करूँगा। अपने दोनों के निवासयोग्य स्थान देखकर मैं तुम्हारे पास पुनः आ जाऊँगा । उनके ऐसा कहने पर उस ( ज्येष्ठा) – ने उनसे कहा —  हे महाभाग ! मैं क्या खाऊँगी; मुझे कौन बलि प्रदान करेगा? ॥ ७४–७८१/२

उसके ऐसा कहने पर मुनि ने उससे कहा —  जो स्त्रियाँ बलियों (भोज्यपदार्थों) तथा पुष्प – धूप से तुम्हारा पूजन करती हैं, उनके घर में तुम प्रवेश मत करना ॥ ७९१/२

ऐसा कहकर वे बिल-मार्ग से पाताल में प्रविष्ट हुए। वे मुनि आज भी उस जलसंस्तर में निमग्न हैं और वह अशुभा अलक्ष्मी ग्राम, पर्वत आदि बाह्य स्थानों में रह रही है ॥ ८०-८१ ॥

संयोगवश किसी समय उस अलक्ष्मी ने देवों के भी देवेश तथा तीनों लोकों के स्वामी विष्णु को लक्ष्मी के साथ देख लिया; तब अलक्ष्मी ने उन जनार्दन से कहा —  हे प्रभो ! हे महाबाहो ! मेरे पति मुझे छोड़कर इस बिल में प्रविष्ट हो गये हैं। हे जगन्नाथ! मैं अनाथ हूँ, अतः आप मुझे आजीविका प्रदान करें; आपको नमस्कार है ॥ ८२-८३ ॥

सूतजी बोले —  [ ज्येष्ठा के द्वारा ] ऐसा कहे गये जनार्दन, देवेश्वर, माधव तथा मधुसूदन भगवान् विष्णु उस ज्येष्ठा अलक्ष्मी से हँसकर कहने लगे ॥ ८४ ॥

श्रीविष्णु बोले —  जो लोग अनघ शर्व, शंकर, नीललोहित भगवान् रुद्र तथा [ समस्त ] लोकों को उत्पन्न करने वाली माता पार्वती की और मेरे भक्तों की निन्दा करते हैं, उनका धन तुम्हारा ही है। जो लोग महादेव की निन्दा करके मेरा पूजन करते हैं, मेरे वे भक्त निश्चय ही अज्ञानी तथा अभागे हैं; उनका भी धन तुम्हारा है। जिनकी आज्ञा से तथा कृपा से मैं (विष्णु) तथा ब्रह्मा सदा क्रियाशील रहते हैं, उनका तिरस्कार करके जो लोग मेरा पूजन करते हैं, वे मेरे विद्वेषी हैं; वे मेरे भक्त बिलकुल नहीं हैं, अपितु वे मदोन्मत्त हैं और मेरा भक्त होने का पाखण्ड करते हैं, उनका भी घर, धन, खेत तथा इष्टापूर्त (यज्ञ आदि तथा तालाब, कुआँ खुदवाने का पुण्य कार्य) सब कुछ तुम्हारा है ॥ ८५–८८१/२

सूतजी बोले —  ऐसा कहकर उन अलक्ष्मी को विदा करके भगवान् जनार्दन अलक्ष्मी के क्षय की सिद्धि के लिये लक्ष्मी के साथ रुद्र का जप करने लगे। अतः हे मुनीश्वरो ! सभी विष्णुभक्तों को चाहिये कि वे पूर्ण प्रयत्न से उस अलक्ष्मी को नित्य-निरन्तर बलि प्रदान करें; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये। हे द्विजो ! सभी स्त्रियों को अनेक प्रकार के बलि-उपचारों से सदा [ ज्येष्ठा- अलक्ष्मी की] पूजा करनी चाहिये ॥ ८९–९१ ॥

जो [ मनुष्य ] इस अलक्ष्मी – वृत्तान्त को पढ़ता है अथवा सुनता है अथवा श्रेष्ठ द्विजों को सुनाता है, वह पापरहित तथा लक्ष्मीवान् हो जाता है और [ शुभ] गति प्राप्त करता है ॥ ९२ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें ‘अलक्ष्मीवृत्त’ नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६ ॥

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