December 30, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -010 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ दसवाँ अध्याय योगसिद्धि प्राप्त पुरुषों के लक्षण, साधुधर्म का स्वरूप, भगवान् शिव के साक्षात्कार के उपायों का वर्णन तथा भक्तिभाव में श्रद्धा की महत्ता श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे दशमोऽध्यायः भक्तिभावकथनं सूतजी बोले — हे उत्तम ब्राह्मणो ! संत, जितेन्द्रिय, साक्षात् द्विजाति (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ), धर्मज्ञ, साधु, आचार्य, शिवात्मा, दयावान्, तपस्वी, संन्यासी, वैराग्य-परायण, ज्ञानी, मनपर नियन्त्रण रखने वाले, दानी, उदार, मनसा वाचा कर्मणा सत्यवादी, अलुब्ध, योगपरायण, श्रुतियों तथा स्मृतियों के वेत्ता, श्रुतियों तथा स्मृतियों का अनुकरण करने वालों का विरोध न करने वाले लोगों पर महेश्वर प्रसन्न रहते हैं ॥ १-३१/२ ॥ सत् शब्द का अर्थ ब्रह्म होता है । जो अन्त में उस ब्रह्म को पा लेते हैं, वे ब्रह्मसायुज्य को प्राप्त होते हैं, इसीलिये ऐसे महात्मा संत कहे जाते हैं ॥ ४१/२ ॥ दस इन्द्रियों के विषयभोगों में तथा पूर्ववर्णित आठ प्रका रके ऐश्वर्यरूप साधनों की अप्राप्ति से जो न तो क्रोध करते हैं और न उनकी प्राप्ति से हर्ष का अनुभव करते हैं, वे जितात्मा कहे गये हैं ॥ ५१/२ ॥ सामान्य तथा विशेष पदार्थों के साथ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यों का सम्बन्ध विशेष होने से ही ये द्विजाति कहे गये हैं ॥ ६१/२ ॥ स्वर्ग आदि का सुख प्रदान करने वाले श्रुति – स्मृति- प्रतिपादित वर्णाश्रम धर्म का ज्ञान रखने से व्यक्ति धर्मज्ञ कहा जाता है ॥ ७१/२ ॥ विद्या की साधना करने के कारण गुरु का हित करने वाला ब्रह्मचारी साधु तथा विहित कर्मों की साधना करने वाला गृहस्थ साधु कहा जाता है । वन में तपस्या की साधना करने से वैखानस साधु एवं योग की साधना करने तथा यतिधर्म में परायण होने से व्यक्ति यति साधु कहा जाता है। इस प्रकार अपने-अपने आश्रमों के धर्मों का साधन करने से गृहस्थ, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ तथा यति — ये सभी साधु कहे गये हैं ॥ ८-१०१/२ ॥ धर्म तथा अधर्म — ये दोनों शब्द क्रिया के वाचक कहे गये हैं। कुशल कर्म को धर्म तथा अकुशल कर्म को अधर्म कहा गया है ॥ १११/२ ॥ महत्तायुक्त यह धर्म शब्द धारण के अर्थ में कहा गया है तथा अधारण ( धारण न करने) को उद्देश्य करके कृत कर्म अधर्म कहा जाता है ॥ १२१/२ ॥ जिससे अभीष्ट की प्राप्ति हो, उसे आचार्यलोग धर्म कहते हैं तथा जिससे अनिष्ट फल की प्राप्ति हो, उसे आचार्यलोग अधर्म कहते हैं ॥ १३१/२ ॥ वृद्ध, निर्लोभी, जितेन्द्रिय, दम्भ न करने वाले, पूर्ण विनम्र, सरल स्वभाव वाले लोगों को आचार्य कहा जाता है ॥ १४१/२ ॥ जो स्वयं आचरण करता है तथा सभी को आचार में नियोजित करता है एवं शास्त्रों के अर्थों का परिशीलन करता है; वह आचार्य कहा जाता है ॥ १५१/२ ॥ वेदों का श्रवण करने से श्रौत तथा शास्त्रों के अर्थों का स्मरण करने से स्मार्त कहा जाता है। वेदविहित यज्ञ आदि करने वाला श्रौत तथा वर्णाश्रमसम्बन्धी नियमों का पालन करने वाला स्मार्त कहा जाता है ॥ १६१/२ ॥ किसी के द्वारा पूछने पर देखे गये अनुरूप (कथनयोग्य) तथा अननुरूप (कथन के अयोग्य) विषय को बिना छिपाये अभिव्यक्त करने को लिङ्गपुराण के अनुसार सत्य कहा गया है ॥ १७१/२ ॥ ब्रह्मचर्य, मौन, निराहार, अहिंसा तथा सर्वविध शान्ति को तप कहा गया है ॥ १८१/२ ॥ जो पुरुष सदा अपने ही हित तथा अहित की भाँति सभी प्राणियों के हिताहित का ध्यान रखता है; उसकी यह निरन्तर बनी रहनेवाली वृत्ति पूर्णतः दया कही गयी है ॥ १९१/२ ॥ क्रम से न्यायपूर्वक अर्जित अभीष्टतम द्रव्य गुणी को ही दिया जाना चाहिये । दाता के द्वारा प्रदत्त दान का यही लक्षण है। वह दान भी कनिष्ठ, मध्यम तथा श्रेष्ठ – तीन प्रकार का होता । करुणापूर्वक प्राणियों के निमित्त धन का विभाग करना मध्यम दान है ॥ २०-२११/२ ॥ श्रुतियों तथा स्मृतियों से विहित वर्णाश्रमसम्बन्धी तथा शिष्टाचार के अनुकूल जो धर्म है, वह साधुधर्म कहा जाता है ॥ २२१/२ ॥ मायायुक्त कर्मफल का त्याग करने वाला शिवात्मा कहा जाता है तथा सभी आसक्तियों से निवृत्त प्राणी युक्त-योगी कहा जाता है ॥ २३१/२ ॥ अनासक्त तथा पुनः पुनः जन्म – मृत्यु के भय से भीत होकर विषयभोगों की नश्वरता पर विचार करके सभी ओर से प्रलोभन दिये जाने पर भी जो अलुब्ध बना रहता है, वह संयमी कहा जाता है ॥ २४१/२ ॥ अपने लिये अथवा दूसरे के लिये जिस व्यक्ति की इन्द्रियाँ मिथ्या प्रवृत्त नहीं होतीं, वह शम के लक्षणों वाला कहा जाता है ॥ २५१/२ ॥ जो अनिष्ट अर्थात् प्रतिकूल विषयों पर उद्विग्न नहीं होता तथा अनुकूल विषयों की प्राप्ति पर हर्षित:नहीं होता; वह प्रीति, संताप तथा विषाद से रहित हो जाता है । उसकी यह विनिवृत्ति ही विरक्तता (विराग) कही जाती है ॥ २६१/२ ॥ निषिद्ध कर्मोंसहित विहित कर्मों में दोष-गुण बुद्धि का न्यास (त्याग) ही संन्यास है और इष्ट और अनिष्ट कर्मों का भलीभाँति छोड़ना ही न्यास है ॥ २७१/२ ॥ अव्यक्त अर्थात् प्रकृति से लेकर परमाणुपर्यन्त इस जड जगत् के सभी पदार्थों से ईश्वर को पृथक् जानना हो वास्तविक ज्ञान है ॥ २८१/२ ॥ हे श्रेष्ठ द्विजो ! इस प्रकार के ज्ञान तथा भक्ति (श्रद्धा) – से सम्पन्न पुरुष के ऊपर भगवान् शंकर अवश्य प्रसन्न होते हैं; इसमें कोई संशय नहीं है और वास्तव में यही धर्म है ॥ २९१/२ ॥ ‘परम गुह्य रहस्य क्या है’ अब मैं आप लोगों को वह बताता हूँ । सर्वव्यापी परमेश्वर शिव में भक्ति रखनी चाहिये। उस भक्ति से युक्त प्राणी नि:संदेह मुक्ति प्राप्त कर लेता है ॥ ३०१/२ ॥ पात्रता न होने पर भी उनकी परम भक्ति से युक्त प्राणी के विविध अज्ञानरूप अन्धकारों को दूर करके महेश्वर शिव उसपर प्रसन्न हो जाते हैं; इसमें संदेह नहीं है ॥ ३११/२ ॥ ज्ञान, अध्यापन, होम, ध्यान, यज्ञ, तप, वेद, दान, अध्ययन — ये सभी शिव की भक्ति प्राप्त करने के साधन हैं; इसमें लेशमात्र भी संदेह नहीं है ॥ ३२१/२ ॥ हे मुनीश्वरो ! हजारों चान्द्रायण तथा सैकड़ों प्राजापत्यव्रतों, मासपर्यन्त किये गये उपवासों तथा अन्य अनुष्ठान आदि की अपेक्षा शिवभक्ति ही श्रेष्ठ है ॥ ३३१/२ ॥ भगवान् शिव की भक्ति से हीन प्राणी स्वर्गादि की प्राप्ति के लिये अनेकविध कर्मजाल में फँसकर गहन गिरि- गुहारूपी इस मृत्युलोक में बार-बार गिरते रहते हैं, किंतु भक्तिभाव से युक्त प्राणी मुक्त हो जाता है ॥ ३४१/२ ॥ हे द्विजो! भगवान् शिव के भक्तों के दर्शनमात्र से प्राणियों को स्वर्ग आदि लोक सहज ही सुलभ हो जाते हैं तो फिर साक्षात् शिवभक्तों के विषय में क्या कहना ! इस वास्तविकता में कोई संदेह नहीं है ॥ ३५१/२ ॥ ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र तथा अन्य देवता शिवभक्ति के द्वारा ही उत्तम पद को प्राप्त हुए हैं। इसी प्रकार मुनियों का भी बल तथा सौभाग्य शिवभक्ति के ही कारण है ॥ ३६१/२ ॥ हे ऋषियो ! प्राचीन काल में देवाधिदेव पिनाकी शंकर ने उमा को लक्ष्य करके वाराणसी में उनसे जिस मधुर प्रसंग का वर्णन किया था, वही मैं भी आप लोगों से कह रहा हूँ ॥ ३७१/२ ॥ अविमुक्त क्षेत्र वाराणसीपुरी में आकर भगवान् शिव के साथ विराजमान भगवती रुद्राणी ने उन भगवान् रुद्र से यह पूछा ॥ ३८१/२ ॥ देवी श्रीपार्वती ने कहा — हे महादेव! तप, विद्या, योग आदि किस साधन से आप वश में होते हैं, पूजित होते हैं तथा दर्शन देते हैं ? हे प्रभो ! मुझे बताइये ॥ ३९१/२ ॥ सूतजी बोले — उन पार्वती का वचन सुनकर बालचन्द्रमा को तिलकरूप में धारण करने वाले शिव ने पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान मुख वाली पार्वती की ओर देखकर हँसते हुए उनसे कहा — ॥ ४०१/२ ॥ पूर्व में चिरकाल तक कैलास पर पार्वतीसहित मुझे रहते हुए देखकर हिमालय की पत्नी मेना द्वारा [ अपना स्थान होना चाहिये — इस प्रकार ] कही गयी वाणी को स्मरणकर सदाशिव बोले — हे देवि ! हे विलासिनि ! क्या तुम स्थान हेतु अपनी माता के द्वारा कहे गये वचनों को भूल गयी हो ? अब तुमने परम रम्य काशीपुरी को पा लिया है, अतः निश्चिन्त होकर अब तुम प्रश्न करने योग्य हो ॥ ४१-४२१/२ ॥ प्रश्न करने वालों में श्रेष्ठ हे पार्वति ! जिस प्रकार ब्रह्मात्मक तत्त्व जानने के लिये इस समय तुमने मुझसे प्रश्न किया है, उसी प्रकार प्राचीन काल में पितामह ब्रह्मा ने भी मुझसे पूछा था ॥ ४३१/२ ॥ हे कल्याणि ! श्वेतकल्प में श्वेतवर्ण सद्योजात नाम वाले, रक्तकल्प में रक्तवर्ण वामदेव नामवाले, पीत-कल्प में पीतवर्ण तत्पुरुष नामवाले, कृष्णकल्प में कृष्ण- वर्ण अघोर नामवाले तथा विश्वरूपकल्प में विश्वरूप ईशान नामवाले मुझ ईश्वर को देखकर ब्रह्माजी ने मुझसे कहा ॥ ४४-४५१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — हे वामदेव ! हे तत्पुरुष ! हे अघोर! हे सद्योजात! हे महेश्वर! हे देवदेव ! महादेव! मैंने गायत्री – उपासनासे आपका दर्शन किया है ॥ ४६१/२ ॥ हे महादेव! आप किस प्रकार वशमें होते हैं? हे दयानिधे! आपका ध्यान कहाँ करना चाहिये ? आप देवी पार्वतीके द्वारा दृश्य तथा पूज्य हैं। हे शंकर! कृपा करके मुझे बताइये ॥ ४७१/२ ॥ भगवान् श्रीशंकर [ पार्वतीसे ] बोले — तब मैंने ब्रह्माजी से कहा कि हे कमलोद्भव पितामह! मैं केवल श्रद्धा से वश में किया जा सकता हूँ और आपने तथा विष्णु ने समुद्र में जिस लिङ्ग का दर्शन किया था, उसीमें सबको मेरा ध्यान करना चाहिये ॥ ४८१/२ ॥ द्विजों (ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य ) — को पवित्र सद्योजात आदि पाँच मन्त्रों से मेरे पंचमुखरूप की पूजा करनी चाहिये। हे अण्डज ! हे जगद्गुरो ! आज आपने उसी भक्ति से ही मेरा दर्शन प्राप्त किया है ॥ ४९१/२ ॥ हे देवेशि! उन पितामह ने भावपूर्वक मुझ ईश्वर को अपने हृदय में देखा और जब उन्होंने मुझसे यह कहा कि आपमें मेरी अचल भक्ति हो, तब मैंने पूर्व काल में उन्हें वह भक्तिभाव प्रदान कर दिया । अतः हे श्रेष्ठ पर्वत की पुत्री पार्वती! मात्र श्रद्धा से ही भक्त मुझे वश में कर सकता है तथा मेरा दर्शन कर सकता है ॥ ५०-५१ ॥ द्विजों को लिङ्ग में ही श्रद्धापूर्वक सदा मेरी पूजा करनी चाहिये और इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं होना चाहिये। श्रद्धा ही परम सूक्ष्म धर्म है। श्रद्धा ही ज्ञान, हवन, तप, स्वर्ग तथा मोक्ष आदि का फल प्रदान करती है और इसी श्रद्धा से भक्त सदा मेरा साक्षात् दर्शन प्राप्त कर सकते हैं ॥ ५२-५३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘भक्तिभावकथन’ नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १० ॥ Content is available only for registered users. 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