श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -103
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
एक सौ तीनवाँ अध्याय
भगवान् शिव एवं पार्वती के विवाह की मांगलिक कथा तथा विवाह के अनन्तर भगवान् शिव का काशी- आगमन और पार्वती को मुक्तिक्षेत्र काशी की महिमा बताना
श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे त्र्यधिकशततमोऽध्यायः
पार्वतीविवाहवर्णनं

सूतजी बोले — [ हे ऋषियो!] इसके बाद ब्रह्मा ने हाथ जोड़कर महादेव महेश्वर को प्रणाम करके यह कहा — ‘हे देव ! अब विवाह कीजिये ‘ ॥ १ ॥

उन परमेष्ठी ब्रह्मा का वह वचन सुनकर भूतपति शिव ने लोकेश [ब्रह्मा] – से कहा —  ‘जो आपकी इच्छा हो’ ॥ २ ॥

हे सुव्रतो ! ब्रह्मा ने महेश के विवाह के लिये उसी क्षण रत्नमय, दिव्य तथा सुन्दर नगर का निर्माण किया ॥ ३ ॥ इसके बाद अदिति, दिति, साक्षात् दनु, कद्रु, सुकालिका, पुलोमा, सुरसा, सिंहिका, विनता, सिद्धि, माया, क्रिया, साक्षात् देवी दुर्गा, सुधा, स्वधा, वेदमाता सावित्री, रजनी, दक्षिणा, द्युति, स्वाहा, स्वधा, मति, बुद्धि, ऋद्धि, वृद्धि, सरस्वती, राका, कुहू, सिनीवाली, देवी अनुमती, धरणी, धारणी, इला, शची, नारायणी — ये सब एवं अन्य सभी देवमाताएँ तथा देवपलियाँ ‘शंकर का विवाह हो रहा है ‘ – ऐसा सोचकर आनन्दमग्न होकर [ वहाँ ] गयीं। सभी उरग, गरुड़, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर, गण, समुद्र, पर्वत, मेघ, मास, संवत्सर, वेद, मन्त्र, यज्ञ, स्तोम, धर्म, हुंकार, प्रणव हजारों प्रतिहार, करोड़ों दिव्य अप्सराएँ तथा उनकी परिचारिकाएँ और समस्त द्वीपों तथा देवलोकों में जो भी नदियाँ हैं, वे सब स्त्री का रूप धारण करके प्रसन्नचित्त होकर वहाँ गयीं। सभी लोकों से नमस्कृत महाभाग गणेश्वर भी यह शंकर का विवाह है’ — यह सोचकर प्रसन्नता से युक्त हो वहाँ आये ॥ ४–१२ ॥

शंख के समान वर्ण वाले गणेश्वर [अपने] करोड़ों गणों के साथ पहुँचे। केकराक्ष दस करोड़ गणों के साथ, विद्युत आठ करोड़ गणों के साथ, विशाख चौंसठ करोड़ गणों के साथ, पारयात्रिक नौ करोड़ गणों के साथ, श्रीमान् सर्वान्तक छः करोड़ गणों के साथ, विकृतानन भी छ: करोड़ गणों के साथ, गणों में श्रेष्ठ ज्वालाकेश बारह करोड़ गणों के साथ, श्रीमान् समद सात करोड़ गणों के साथ, दुन्दुभ आठ करोड़ गणों के साथ, कपालीश पाँच करोड़ गणों के साथ, उत्तम संदारक छ: करोड़ गणों के साथ और गण्डक तथा कुम्भक करोड़ों-करोड़ों गणों के द्विज ! सर्वश्रेष्ठ गणेश्वर विष्टम्भ आठ करोड़ साथ आये ॥ १३–१६ ॥ गणों के साथ और पिप्पल तथा सन्नाद एक-एक हजार करोड़ गणों के साथ आये। आवेष्टन [ नामक गणेश्वर ] आठ करोड़ गणों के साथ, चन्द्रतापन सात करोड़ गणों के साथ और गणेश्वर महाकेश हजार करोड़ गणों के साथ आये ॥ १७-१८ ॥ पराक्रमशाली [गणेश्वर] कुण्डी तथा शुभ पर्वतक बारह करोड़ गणों के साथ और काल, कालक तथा महाकाल सौ करोड़ गणों के साथ आये । आग्निक सौ करोड़ गणों के साथ तथा अग्निमुख एक करोड़ गणों के साथ आये। उसी प्रकार आदित्यमूर्धा तथा धनावह [नामक गणेश्वर] भी एक करोड़ गणों के साथ आये ॥ १९-२० ॥

सन्नाम तथा कुमुद सौ करोड़ गणों के साथ आये। अमोघ, कोकिल तथा सुमन्त्रक करोड़ – करोड़ गणों के साथ आये। दूसरे गणेश्वर काकपाद साठ करोड़ गणों के साथ, प्रभुतासम्पन्न सन्तानक साठ करोड़ गणों के साथ और महाबल, मधु, पिंग तथा पिंगल नौ करोड़ गणों के साथ आये। नील, देवेश तथा पूर्णभद्र नब्बे करोड़ गणों के साथ और महाबलशाली चतुर्वक्त्र सत्तर करोड़ गणों के साथ आये । वे सभी देव अपने बीस सौ हजार करोड़ गणों से घिरे हुए वहाँ भगवान् शंकर के पास पहुँचे ॥ २१–२४ ॥ प्रमथ [अपने] हजार करोड़ भूतों तथा तीन करोड़ गणों के साथ आये । वीरभद्र चौंसठ करोड़ गणों के साथ और रोमज करोड़ों गणों के साथ आये। करण बीस करोड़ गणों के साथ और केवल, शुभ, पंचाक्ष, शतमन्यु तथा मेघमन्यु भी नब्बे करोड़ गणों के साथ आये । काष्ठकूट, सुकेश तथा वृषभ चौंसठ करोड़ गणों के साथ और भगवान् सनातन विरूपाक्ष भी चौंसठ करोड़ गणों के साथ आये। इसी प्रकार तालकेतु, षडास्य, पंचास्य, सनातन, संवर्तक, चैत्र, साक्षात् प्रभु लकुलीश, लोकान्तक, दीप्तास्य, प्रभु दैत्यान्तक, मृत्युहत्, कालहा, काल, मृत्युंजयकर, विषाद, विषद, विद्युत, प्रभु कान्तक, देव, भृंगी, रिटि, श्रीमान् देवदेवप्रिय, अशनि, भासक तथ सहस्रपात् चौंसठ करोड़ गणों के साथ आये । ये सब तथा अन्य असंख्य महाबली गणेश्वर भी वहाँ आये। वे सभी हजार हाथों वाले, जटा मुकुट धारण किये हुए, मस्तक पर चन्द्ररेखा से विभूषित, नीलकण्ठ वाले, तीन नेत्रों वाले, हार-कुण्डल – केयूर मुकुट आदि से अलंकृत, ब्रह्मा-इन्द्र – विष्णु के समान प्रतीत होने वाले, अणिमा आदि सिद्धियों से युक्त थे; करोड़ों सूर्यों के सदृश आभा वाले पाताललोक में विचरण करने वाले तथा सभी लोकों में निवास करने वाले वे गणेश्वर वहाँ आये । तुम्बुरु, नारद, हाहा, हुहू एवं साम गान करने वाले भी रत्नों तथा वाद्ययन्त्रों को लेकर उस पुर में आये ॥ २५-३५ ॥

देवताओं द्वारा स्तुत तथा तपोधन बहुत-से ऋषिगण प्रसन्नचित्त होकर विवाहसम्बन्धी पवित्र मन्त्रों का उच्चारण करने लगे ॥ ३६ ॥ इस प्रकार पूर्णरूप से सबके उपस्थित हो जाने पर विष्णु ने स्वयं पवित्र मुसकान वाली पार्वती को अलंकृत करके तथा स्वयं उन्हें ला करके पुर में प्रवेश कराया। तदनन्तर ब्रह्मा ने देवताओं के स्वामी नारायण विष्णु से सभा में कहा — ‘हे प्रभो! पहले आप इन रुद्र के बाएँ अंग भवानी तथा देवताओं के साथ उत्पन्न हुए और मैं इनके दाहिने अंग से उत्पन्न हुआ। मेरे अंशस्वरूप पर्वतराज हिमालय वास्तव में इस यज्ञ के लिये ही उत्पन्न किये गये हैं। इन पार्वती ने परमेष्ठी [ शिव] – की माया से हिमवान् की पुत्री के रूप में जन्म लिया है। अतः ये सभी लोकों की, आपकी तथा मेरी भी धात्री (जननी) हैं और श्रौतस्मार्त प्रवृत्ति के लिये विवाह के उद्देश्य से यहाँ आये हुए ये रुद्र सबके धाता (जनक) हैं। चूँकि पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश, चन्द्र, सूर्य, आत्मा तथा पवन शिव के ही विग्रहस्वरूप हैं, अतः इन रुद्रदेव की [इन्हीं ] मूर्तियों से ही जगत् उत्पन्न हुआ है। तथापि हिमवान् के तथा मेरे वचन से शुक्ल-कृष्ण-लोहित वर्ण वाली मायारूपा इन पार्वती को उन शिव के निमित्त प्रदान कर देना चाहिये ; [ हे विष्णो!] आप भी प्रकृतिरूप हैं। पर्वतराज के साथ यह सम्बन्ध आपके लिये भी कल्याणप्रद है । मैं पद्मकल्प में आपके नाभिकमल से उत्पन्न हुआ था; अतः आप मेरे अंशस्वरूप इन हिमालय के तथा मेरे भी गुरु हैं’ ॥ ३७–४४१/२

सूतजी बोले — [ हे ऋषियो ! ] तब उन देवदेव जनार्दन ने ब्रह्मा से कहा — ‘ठीक है ।’ तब देवतागण, सभी मुनि तथा देवदेव शिव प्रसन्न हो गये । तदनन्तर कमल के समान नेत्रवाले उन विद्वान् पद्मनाभ विष्णु ने उठकर उन [ पार्वती ] को प्रणाम करके अपने हाथों से शिव के दोनों चरणों को धोकर अपने, ब्रह्मा के तथा हिमालय के सिर पर जल छिड़का । ‘ [ हे शिव!] आपकी नित्यसम्बन्धिनी ये [ पार्वती ] विवाह-विधि की सिद्धि के लिये ही मेना से उत्पन्न हुई हैं; ये मेरी छोटी बहन हैं’ ऐसा कहकर विष्णु ने उन पार्वती को देवेश्वर के लिये जलसहित समर्पित करके स्वयं अपने को भी उन देव के लिये जलसहित समर्पित कर दिया ॥ ४५-४८१/२

इसके बाद सभी वेदों के अर्थों में पारंगत श्रेष्ठ मुनियों ने कहा — ‘ विचार करने पर वस्तुतः ये महादेव शिव ही दाता, गृहीता, द्रव्य तथा फल सब कुछ हैं और इन्हीं की माया से यह जगत् स्थित है’ — ऐसा कहकर प्रसन्नता से रोमांचित उन सभी ने शिवजी को प्रणाम किया ॥ ४९-५०१/२

उस समय आकाशचारी सिद्धों तथा चारणों ने पुष्पवृष्टि की, देवताओं की दुन्दुभियाँ बजने लगीं और अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। सभी वेदों ने शरीर धारण करके ब्रह्मा तथा मुनियों के साथ उन देवदेव उमापति महेश्वर को प्रणाम किया ॥ ५१-५२१/२

लज्जा से भरी हुई देवी पार्वती को देखकर शिव तृप्त नहीं होते थे और दूषणरहित शरीर वाली वे [पार्वती] भी देवदेव वृषभध्वज को देखकर तृप्त नहीं होती थीं। तब शिव ने विष्णु से कहा —‘मैं वरदाता हूँ।’ इस पर उन्होंने भी शंकर से कहा — ‘आपमें मेरी भक्ति बनी रहे; मुझपर प्रसन्न होइये ।’ तब शिव ने उन्हें ब्रह्मत्व प्रदान किया। इसके बाद ब्रह्मा ने पुनः प्रभु से प्रार्थना करते हुए कहा —  ‘मैं उपाध्याय (आचार्य) – के पद स्थित होकर अग्नि में हवन करता हूँ और यदि आप आज्ञा दें, तो जो विधि अभीतक नहीं की गयी है, उसे सम्पन्न करूँ’ ॥ ५३-५६ ॥

तब जगत् के स्वामी देवदेव शंकर ने उन देव ब्रह्मा से कहा — ‘हे सुरश्रेष्ठ! जो-जो अभीष्ट हो, उसे आप इच्छानुसार कीजिये। हे देवदेव ! हे पितामह! मैं [आपके] समस्त वचन का पालन करूँगा’ ॥ ५७१/२

तदनन्तर [ उन्हें] प्रणाम करके प्रसन्नचित्त परम प्रभु लोकपितामह ब्रह्मा ने शिव तथा देवी [पार्वती ] के हाथों को [ परस्पर] मिला दिया। स्वयं अग्निदेव हाथ जोड़े हुए वहाँ उपस्थित हुए । [ साक्षात् ] मूर्तिमान् होकर उपस्थित वैवाहिक श्रौत महामन्त्रों के द्वारा यथोक्त विधि से हवन करने के अनन्तर विष्णु के द्वारा लाये गये लाजा (धान का लावा) – का भी यथाक्रम हवन करके विविध गोदानों से विप्रों की पूजाकर पुनः तीन बार अग्निदेव की प्रदक्षिणा कराकर उनके मिले हुए हाथ को मुक्त कराकर भगवान् ब्रह्मा ने प्रसन्न मन से सभी देवताओं, ऋषियों तथा मनुष्यों के साथ देवदेव उमापति को प्रणाम किया ॥ ५८–६२१/२

तत्पश्चात् उन दोनों को पाद्य जल देकर और शम्भु को आचमन, मधुपर्क तथा गौ प्रदान करके पुनः शिव को प्रणाम करके भगवान् ब्रह्मा, इन्द्र आदि देवताओं के साथ स्थित हो बैठ गये ॥ ६३-६४ ॥ समस्त भृगु आदि मुनियों तथा सूर्य आदि ग्रहों ने अक्षतों तथा तिल-तण्डुलों से वृषभध्वज का अर्चन करके उनकी स्तुति की ॥ ६५ ॥ तत्पश्चात् वे रुद्र शिव ब्रह्मोक्त समस्त [ वैवाहिक ] कृत्य सम्पन्न करके तथा अग्नि को अपने में आरोपित करके सभी लोकों के हित के लिये उन पार्वती के साथ वहाँ से प्रस्थित हुए ॥ ६६ ॥

जो [व्यक्ति ] पवित्र होकर प्रसन्नतापूर्वक शिव के विवाह-आख्यान को पढ़ता अथवा सुनता है अथवा वेद- वेदांग में पारंगत शुद्ध द्विजों को सुनाता है, वह गणपति पद प्राप्त करके शिव के साथ आनन्दित होता है । जहाँ भी ब्राह्मणों द्वारा इस विवाह-प्रसंग को कहा जाता है, वहाँ पर शिवजी विराजमान रहते हैं, इसमें सन्देह नहीं है। अतः हे द्विजो! विधिवत् उनकी पूजा करके इस आख्यान को अवश्य कहना चाहिये। हे उत्तम ब्राह्मणो ! श्रेष्ठ द्विजों तथा क्षत्रियों के विवाह में इस अत्युत्तम सम्पूर्ण शिवविवाह-प्रसंग का कीर्तन करना चाहिये ॥ ६७-६९१/२

तब विवाह कर लेने के उपरान्त महाकान्तिसम्पन्न शिवजी [अपने] गणों, नन्दी तथा देवी पार्वती के साथ दिव्य वाराणसीपुरी में आये ॥ ७०-७१ ॥ इसके बाद हर्षयुक्त मुखमण्डल वाली भवानी अविमुक्त (वाराणसी) में सुखपूर्वक आसीन वृषभध्वज को प्रणाम करके [उस] क्षेत्र का माहात्म्य पूछने लगीं ॥ ७२ ॥ तब अर्धचन्द्र को तिलकरूप में धारण करने वाले शिवजी उत्तम क्षेत्र माहात्म्य का वर्णन करने लगे — ‘हे सुरेशानि! मेरे द्वारा अविमुक्तक्षे त्रका माहात्म्य विस्तारपूर्वक नहीं कहा जा सकता है; यह क्षेत्र ऋषियों द्वारा पूजित है । हे देवि! मैं अविमुक्तक्षेत्र में होने वाले पुण्यफल का वर्णन कैसे करूँ, जहाँ पर मरने वाले पापियों की एक ही जन्म में मुक्ति हो जाती है। [लोगों द्वारा ] अन्यत्र किया गया पाप वाराणसी में नष्ट हो जाता है और वाराणसी में किया गया पाप पिशाच योनि रूपी नरक की प्राप्ति कराने वाला होता  है। हजारों पाप करके मनुष्यों के लिये पिशाचत्व श्रेष्ठ है, किंतु काशीपुरी के बिना स्वर्ग में हजार बार इन्द्रपद प्राप्त करना भी श्रेष्ठ नहीं है । जहाँपर भगवान् त्रिविष्टप, विभु विश्वेश्वर तथा कृत्तिवास ओंकारेश [ सदा ] विराजमान हैं, उस काशी में मरने वालों का पुनर्जन्म नहीं होता’ ॥ ७३–७७१/२

इस प्रकार संक्षेप में क्षेत्र का माहात्म्य कहकर गणेश्वरों को विदा करके चन्द्रशेखर ने पार्वती को [ अपना ] उद्यान दिखाया। भगवान् गजानन विनायक दैत्यों को विघ्न उत्पन्न करने के लिये तथा देवताओं का विघ्न दूर करने के लिये वहीं पर उत्पन्न हुए थे। [हे ऋषियों!] मैंने आप लोगों को कथा का सम्पूर्ण उत्तम तथा सुन्दर तत्त्व संक्षेप में बता दिया, जैसा कि मैंने व्यासजी की कृपा से सुना था ॥ ७८- ८१ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘पार्वतीविवाहवर्णन’ नामक एक सौ तीनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०३ ॥

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