February 3, 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -107 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ एक सौ सातवाँ अध्याय शिवभक्त उपमन्यु की कथा तथा उमामहेश्वर द्वारा उस पर अनुग्रह करना श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सप्ताधिकशततमोऽध्याय उपमन्युचरितं ऋषिगण बोले — हे सूतजी ! पूर्वकाल में उपमन्यु ने महेश्वर से गणाधिप पद प्राप्त करके पुनः क्षीरसागर को कैसे प्राप्त किया; आप इस समय बताने की कृपा कीजिये ॥ १ ॥ सूतजी बोले — [ हे ऋषियो !] इस प्रकार काली को उत्पन्न करके त्रिनेत्र शिव के चले जाने पर उपमन्यु ने तपस्या के द्वारा उनकी पूजा करके फल प्राप्त किया था ॥ २ ॥ हे श्रेष्ठ द्विजो ! ‘उपमन्यु’ – इस नाम से प्रसिद्ध एक मुनि थे; कुमार के समान तेजस्वी उन्होंने किसी समय स्वेच्छानुसार खेलते हुए [अपने] मामा के आश्रम में थोड़ा-सा दूध पी लिया, तब ईर्ष्या के कारण उनके मामा के पुत्र ने उत्तम दुग्ध का पान किया ॥ ३-४ ॥ तब इच्छानुसार दुग्ध पीकर उसे पास में खड़ा देखकर उपमन्यु ने अपनी माता से कहा — हे मातः ! हे महाभागे ! हे तपस्विनि ! आप मुझको गाय का दुग्ध दीजिये, जो अत्यन्त स्वादिष्ट हो, गर्म हो तथा अल्प न हो; मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥ ५१/२ ॥ सूतजी बोले — इस प्रकार पुत्र के द्वारा स्नेह- पूर्व कही गयी वह बात सुनकर माता आदर के साथ पुत्र का आलिंगन करके दुःखित हो गयी और अपनी निर्धनता का स्मरणकर व्याकुल होकर विलाप करने लगी। हे द्विजो ! बार-बार दूध का स्मरण करके महातेजस्वी उपमन्यु भी माता से रोते हुए यही कहते थे — ‘मुझे दो, मुझे दो’ ॥ ६-७ ॥ तत्पश्चात् उंछवृत्ति (फसल कट जाने के बाद खेत में पड़े दानों को बटोरना) – से अर्जित बीजों को स्वयं पीसकर पुन: बीज के उस आटे को जल के साथ मिलाकर मधुरभाषिणी वह माता बोली, ‘हे मेरे पुत्र ! आओ, आओ।’ इसके बाद सान्त्वनापूर्वक पुत्र को पकड़कर आलिंगन करके दुःख से व्याकुल माता ने उसे कृत्रिम दुग्ध दे दिया ॥ ८-९ ॥ तब माता के द्वारा दिये गये उस कृत्रिम दुग्ध को पीकर द्विजश्रेष्ठ [ उपमन्यु ] -ने अति विह्वल होकर माता से कहा — ‘यह दूध नहीं है ‘ ॥ १० ॥ तब दुःख से भरी हुई उस माता ने बालक की ओर देखकर उसका मस्तक सूँघकर अपने हाथों से पुत्र के कमलसदृश विशाल नेत्रों को पोंछकर कहा — ‘ [ हे पुत्र ! ] जो शिव के प्रति भक्तिरहित हैं, वे भाग्यहीन लोग रत्नों से परिपूर्ण तथा स्वर्ग – पाताल में गोचर होने वाली नदियों को नहीं देख पाते हैं। शिवजी जिनके ऊपर सदा प्रसन्न नहीं रहते हैं, वे लोग राज्य, स्वर्ग, मोक्ष और दुग्ध से बने हुए भोजन तथा अन्य प्रिय वस्तुओं को नहीं प्राप्त कर सकते हैं। शिव की कृपा से ही सबकुछ प्राप्त होता है, अन्य देवताओं की कृपा से नहीं; अन्य देवताओं में परायण रहने वाले दुःख से व्यथित होकर [ संसारचक्र में] भ्रमण करते रहते हैं। हम लोगों को दूध कैसे मिल सकता है; क्योंकि हम लोगों ने महादेव की पूजा नहीं की है। हे पुत्र! शिव को उद्देश्य करके पूर्वजन्म में जो कुछ समर्पित किया जाता है, वही प्राप्त होता है; विष्णु अथवा अन्य देवता को उद्देश्य करके देने पर कुछ नहीं प्राप्त होता है’ ॥ ११–१५१/२ ॥ तब माता का वचन सुनकर महातेजस्वी बालक उपमन्यु भी तपस्विनी माता को प्रणाम करके बोला — ‘हे महाभागे ! शोक का त्याग करो; महादेवजी चाहे कहीं भी हों, मैं शीघ्र अथवा विलम्ब से क्षीरसमुद्र को प्राप्त कर लूँगा’ ॥ १६-१७१/२ ॥ सूतजी बोले — [ हे ऋषियो ! ] उसे प्रणामकर वे [उपमन्यु] तप करने के लिये प्रवृत्त हुए । तब माता ने पुत्र से कहा — ‘ पूर्णरूप से अत्यन्त शुभ तपस्या करो । ‘ उससे आज्ञा प्राप्त करके हिमवान् पर्वत पर जाकर वायु का आहार करते हुए एकाग्रचित्त होकर वे अति कठोर तप करने लगे ॥ १८-१९१/२ ॥ उस विप्र की तपस्या से [सम्पूर्ण] जगत् तप्त हो उठा । तब सभी श्रेष्ठ देवताओं ने विष्णु को प्रणाम करके वह बात बतायी। इसके बाद उनका वचन सुनकर वे भगवान् पुरुषोत्तम ‘यह क्या है’ – ऐसा सोचकर पुनः उसका कारण जानकर महेश्वर के दर्शन की इच्छा से शीघ्रतापूर्वक मन्दर पर्वत पर गये ॥ २०-२२ ॥ शिव को देखकर उन्हें प्रणाम करके विष्णु ने हाथ जोड़कर यह कहा — ‘हे भगवन्! उपमन्यु नाम से प्रसिद्ध किसी ब्राह्मण ने दुग्ध के लिये [ अपनी] तपस्या से सबको जला डाला; आप उसे रोकिये’ ॥ २३१/२ ॥ इसके अनन्तर पिनाकधारी देव परमेश्वर ने इन्द्र का रूप धारण कर वहाँ जाने का विचार किया। तत्पश्चात् वे सदाशिव देवराज [ इन्द्र ] -का रूप धारणकर श्वेत गजराज पर आरूढ़ होकर सुरों, असुरों, सिद्धों तथा महान् नागों के साथ मुनि के तपोवन में गये ॥ २४-२५ ॥ उनके साथ ही उस हाथी पर चढ़कर सूर्यदेव [अपने] बाएँ हाथ में बालव्यजन तथा दाएँ हाथ में श्वेत छत्र लेकर शची सहित सुरेन्द्र की सेवा कर रहे थे ॥ २६ ॥ उस समय उमासहित शक्ररूपी भगवान् सदाशिव श्वेत छत्र से उसी तरह सुशोभित हो रहे थे, जैसे चन्द्रबिम्ब से मन्दर [ पर्वत ] सुशोभित होता है ॥ २७ ॥ इस प्रकार इन्द्र का स्वरूप धारण करके परमेश्वर [उस] उपमन्यु पर अनुग्रह करने के लिये उसके आश्रम में गये ॥ २८ ॥ हे मुनिवरो ! इन्द्ररूपधारी उन परमेशान शिव को देखकर सिर झुकाकर प्रणाम करके मुनि [ उपमन्यु]- ने स्वयं कहा — ‘मेरा यह आश्रम पवित्र हो गया; क्योंकि देवताओं के स्वामी, जगत्पति, भगवान् प्रभु इन्द्र सूर्य के साथ [यहाँ] स्वयं आये हुए हैं ‘ ॥ २९-३० ॥ ऐसा कहकर हाथ जोड़कर खड़े हुए द्विज को देखकर इन्द्ररूपधारी शिव गम्भीर वाणी में बोले — ‘हे सुव्रत ! मैं तुम्हारे इस तप से प्रसन्न हो गया हूँ; वर माँगो । हे [ ऋषि ] धौम्य के अग्रज ! हे महामते ! मैं [तुम्हें] समस्त अभीष्ट प्रदान करता हूँ ‘ ॥ ३१-३२ ॥ तब शक्ररूपी शिव के द्वारा ऐसा कहे जाने पर मुनिश्रेष्ठ ने हाथ जोड़कर कहा — ‘मैं शिव में भक्ति का वर माँगता हूँ’ ॥ ३३ ॥ तब मुनि का वचन सुनकर इन्द्र का रूप धारण करने वाले प्रभु ईशान कुपित की भाँति व्यग्रतापूर्वक बोले — ‘हे देवर्षे ! तीनों लोकों के अधिपति तथा सभी देवताओं से नमस्कार किये जाने वाले मुझ ईश्वर देवराज इन्द्र को क्या तुम नहीं जानते हो ? हे विप्रर्षे! तुम मेरे भक्त हो जाओ और सर्वदा मेरी ही पूजा करो, मैं तुम्हें सब कुछ प्रदान करता हूँ, तुम्हारा कल्याण हो; तुम निर्गुण शिव का त्याग कर दो’ ॥ ३४-३६ ॥ तब इन्द्र का कर्णविदारक वचन सुनकर उपमन्यु ने पवित्र पंचाक्षरमन्त्र का जप करते हुए यह कहा — ‘ अब मैं समझता हूँ कि निश्चय ही कोई अधम दैत्य स्वयं इन्द्र के स्वरूप में मेरे धर्म में विघ्न डालने के लिये यहाँ आया है; इसमें सन्देह नहीं है। शिवनिन्दापरायण आपने ही प्रसंगवश महात्मा देवदेव [ शिव] की निर्गुणता भी बतायी है। अधिक कहने से क्या लाभ; मैंने आज अनुमान किया है कि पूर्वजन्म में किया हुआ मेरा कोई महापाप अवश्य है, जिसके कारण मैंने शिव की निन्दा सुनी है। जो शिव की निन्दा सुनकर उसी क्षण उस [ शिवनिन्दक ] -को मारकर अपने शरीर को त्याग देता है, वह शिवलोक को जाता है। जो [ व्यक्ति ] वाणी शिवनिन्दा करने वाले की जीभ उखाड़ लेता है, वह [अपनी] इक्कीस पीढ़ियों का उद्धार करके शिवलोक को जाता है। दूध के लिये मेरी जो इच्छा है, वह अब दूर रहे; शिव के अस्त्र से तुझ सुराधम का वध करके मैं [अपने] इस शरीर का भी त्याग कर दूँगा । माता ने पहले जो कहा था, वह सत्य है; इसमें सन्देह नहीं है। हम लोगों ने पूर्वजन्म में शिव की पूजा नहीं की थी ‘ ॥ ३७-४४ ॥ ऐसा कहकर निडर की भाँति होकर मन्त्रवेत्ता उपमन्यु ने उन इन्द्रदेव को अथर्वास्त्र से मार देने का विचार किया। उस महातेजस्वी ने भस्म के आधार से एक मुट्ठी भस्म लेकर उसके लिये अथर्वास्त्र का सृजन किया और जोरसे ध्वनि की । तब आग्नेयी धारणा का ध्यान करके अपने देह को सूखे ईंधन की तरह जलाने के लिये वह अव्यय तेजस्वी खड़ा हो गया ॥ ४५–४७ ॥ उस विप्र के ऐसा निश्चय करने पर भग के नेत्र को नष्ट करने वाले भगवान् शिव ने सोमधारणा योग से उस योगी [उपमन्यु]-की [आग्नेयी] धारणा को रोक दिया । तब नन्दी के आदेश से चन्द्रिक [नामक गण]-ने उसके कालाग्नि-सदृश अथर्वास्त्र का संहरण कर लिया ॥ ४८-४९ ॥ इसके बाद भगवान् परमेश्वर ने बालचन्द्रमा से शोभित मस्तक वाले [अपने] स्वरूप को धारण करके विप्र को दिखाया ॥ ५० ॥ उस समय बालक [ उपमन्यु] – के चारों ओर हजारों दुग्धधाराएँ, क्षीरसागर, मधु का समुद्र, दधि का सागर, घृत का सागर, फल का सागर, [अन्य] भक्ष्य-भोज्य पदार्थों का सागर तथा अपूपों के पर्वत उपस्थित हो गये ॥ ५१-५२ ॥ तदनन्तर दयालु भगवान् [शिव] ने मुसकानयुक्त गिरिजा को देखकर तथा बन्धुजनों से घिरे हुए उपमन्यु की ओर दयापूर्वक देखकर मुसकराकर उससे कहा — ‘हे मेरे पुत्र ! तुम अपने बान्धवों के साथ इच्छानुसार भोगों का उपभोग करो। हे उपमन्यो ! हे महाभाग ! देखो, ये पार्वती तुम्हारी माता हैं। मैंने आज तुम्हें अपना पुत्र बना लिया है और तुम्हें क्षीरसागर, मधुसागर, दधिसागर, घृत तथा ओदन का सागर, फलों का सागर, लेह्य पदार्थों का सागर, अपूपों के पर्वत तथा भक्ष्यभोज्य पदार्थों का सागर प्रदान किया है। हे मुने! सभी लोकों के पिता महादेव तुम्हारे पिता हैं और जगज्जननी महाभागा पार्वती तुम्हारी माता हैं; इसमें सन्देह नहीं है। मैंने तुम्हें अमरत्व तथा शाश्वत गाणपत्य प्रदान कर दिया, अब तुम अन्य वरों को भी माँग लो, मैं तुम्हें दूँगा; इसमें तुम्हें सन्देह नहीं करना चाहिये’ ॥ ५३–५८ ॥ ऐसा कहकर महादेव विभु शिव ने उसे दोनों हाथों से उठाकर उसका सिर सूँघकर पुनः उसे देवी [ पार्वती ] को दे दिया ॥ ५९ ॥ हे श्रेष्ठ द्विजो ! तब [ अपने] पुत्र को देखकर गिरिराजपुत्री देवी [पार्वती ] ने प्रसन्न होकर उसे योगैश्वर्य तथा ब्रह्मविद्या प्रदान की ॥ ६० ॥ उसने भी उन पार्वती से वर तथा शाश्वत कुमारत्व प्राप्त करके हर्ष के कारण गद्गद वाणी से महादेव की स्तुति की और इसके बाद हाथ जोड़कर विरजेक्षण (सात्त्विकजनों पर दृष्टि डालने वाले) वरेण्य शिव को बार-बार प्रणाम करके वर माँगा — ‘हे देवदेवेश ! प्रसन्न होइए । हे महादेव ! आपमें मेरी अव्यभिचारिणी श्रद्धा रहे तथा सर्वदा आपका सान्निध्य प्राप्त हो’ ॥ ६१-६३ ॥ तब उसके ऐसा कहने पर शंकरजी हँसते हुए उस विप्र को वांछित वर प्रदान करके वहीं पर अन्तर्धान हो गये ॥ ६४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘उपमन्युचरित’ नामक एक सौ सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०७ ॥ See Also:- उपमन्यु पर अनुग्रह करने के लिये शिव के सुरेश्वरावतार का वर्णन Content is available only for registered users. 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