January 2, 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -012 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ बारहवाँ अध्याय रक्तकल्प में शिवस्वरूप भगवान् वामदेव का प्रादुर्भाव तथा उनकी महिमा श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे द्वादशोऽध्यायः वामदेवमाहात्म्यं सूतजी बोले — तीसवाँ कल्प रक्तकल्प के नाम से प्रसिद्ध है। महान् तेजस्वी ब्रह्मा ने उस कल्प में रक्तवर्ण धारण किया था ॥ १ ॥ पुत्र की कामना से ध्यानरत परमेष्ठी ब्रह्माजी के समक्ष एक महातेजस्वी तथा प्रतापी कुमार प्रकट हुआ। वह रक्तवर्ण के भूषण, रक्तवर्ण की माला तथा रक्तवर्ण के वस्त्र धारण किये हुए था तथा उसके नेत्र भी रक्तवर्ण के थे ॥ २१/२ ॥ लाल वस्त्र धारण किये उस महात्मा कुमार को देखकर ब्रह्माजी ने परम ध्यानयोग से यह जान लिया कि यह कुमार तो साक्षात् देवेश्वर है ॥ ३१/२ ॥ उन्हें प्रणाम करके आत्मजित् भगवान् ब्रह्मा ने वामदेवसंज्ञक उन परमेश्वर को साक्षात् ब्रह्मस्वरूप कल्पित किया ॥ ४१/२ ॥ तत्पश्चात् ब्रह्माजी के द्वारा अनेकविध स्तुति किये जानेपर प्रसन्नहृदय परमेश्वर महादेव ने उन पितामह से यह कहा ॥ ५१/२ ॥ हे पितामह! पुत्र की कामना से ध्यानपरायण आपने मेरा दर्शन प्राप्त किया और परम भक्ति से ब्रह्म अर्थात् ‘वामदेवाय’ मन्त्र पूर्व में लगाकर अनेक स्तुतियों से मेरा स्तवन किया। अतएव आप प्रयत्नपूर्वक ध्यानबल का आश्रय लेकर कल्प-कल्प में मुझ सर्वश्रेष्ठ तथा लोक के आधारस्वरूप परमेश्वर को भलीभाँति जानेंगे ॥ ६-७१/२ ॥ इसके अनन्तर ब्रह्माजी के विरजा, विबाहु, विशोक तथा विश्वभावन नामवाले चार और कुमार उत्पन्न हुए । वे सभी कुमार महान्, विशुद्ध आत्मावाले तथा ब्रह्मतेज से सम्पन्न थे ॥ ८-९ ॥ वे सभी कुमार ब्रह्मनिष्ठ, ब्रह्मातुल्य, वीर तथा अध्यवसायी थे। वे रक्तवर्ण के वस्त्र तथा रक्तवर्ण की माला से विभूषित थे। उनके शरीर में लाल कुमकुम तथा लाल भस्म लगा हुआ था ॥ १०१/२ ॥ तत्पश्चात् एक हजार वर्ष के अनन्तर ब्रह्मभाव में लीन वे सभी ब्रह्मप्रिय महात्मा कुमार उस वामदेवरूप ब्रह्म का चिन्तन करते हुए लोक के अनुग्रह तथा शिष्यों के कल्याण की कामना से सम्पूर्ण धर्मों का उपदेश करके पुनः शाश्वत महादेव रुद्र में समाविष्ट हो गये ॥ ११-१३ ॥ श्रेष्ठ द्विजो ! इसी प्रकार परमेश्वरपरायण अन्य जो भी भक्त समाधि से ध्यान करके ब्रह्मरूप परमेश्वर वामदेव का दर्शन करेंगे; विमल आत्मा वाले ब्रह्मनिष्ठ वे सभी भक्त पाप से छूटकर उस रुद्रलोक को प्राप्त होंगे, जहाँ से जीव का पुनः संसार में आगमन नहीं होता ॥ १४-१५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘वामदेवमाहात्म्य’ नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe