January 7, 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -017 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ सत्रहवाँ अध्याय ब्रह्मा तथा विष्णु के समक्ष ज्योतिर्मय महालिङ्ग का प्राकट्य, ब्रह्मा और विष्णु द्वारा हंस एवं वाराहरूप धारणकर लिङ्ग के मूलस्थान का अन्वेषण, लिङ्गमध्य से शब्दमय उमा- महेश्वर का प्रादुर्भाव और ईशानादि पाँच शिवरूपों की उत्पत्ति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सप्तदशोऽध्यायः लिङ्गोद्भवं सूतजी बोले — हे मुनियो ! इस प्रकार मैंने शिवजी के सद्योजात आदि अवतारों का वर्णन संक्षेप में कर दिया। जो इसे पढ़ता है, सुनता है अथवा श्रेष्ठ द्विजों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ) – को सुनाता है, वह शिवजी के अनुग्रह से ब्रह्मसायुज्य को प्राप्त होता है ॥ ११/२ ॥ ऋषिगण बोले – हे सूतजी ! लिङ्ग की उत्पत्ति किस प्रकार हुई तथा उस लिङ्ग में शंकरजी की उपासना कैसे की जानी चाहिये ? लिङ्ग क्या है तथा लिङ्गी कौन है? यह आप हमें बताइये ॥ २१/२ ॥ रोमहर्षण [ सूतजी ] बोले — हे ऋषियो ! इसी प्रकार अत्यन्त निवेदनपूर्वक देवताओं ने भी पितामह ब्रह्मा से पूछा था कि हे भगवन् ! यह लिङ्ग कैसे उत्पन्न हुआ तथा लिङ्ग में महेश्वर रुद्र का किस प्रकार पूजन होना चाहिये ? लिङ्ग क्या है तथा लिङ्गी कौन है ? इस पर वे ब्रह्मा बोले — ॥ ३-४१/२ ॥ पितामह [ ब्रह्माजी ]-ने कहा — प्रधान को लिङ्ग तथा परमेश्वर को लिङ्गी कहा गया है। हे उत्तम देवताओ! यह मेरी तथा विष्णु की रक्षा के लिये समुद्र में प्रकट हुआ था ॥ ५ ॥ जब देवताओं की सृष्टि समाप्त हो गयी, तब वे देवता ऋषियों के साथ जनलोक चले गये और पुनः स्थिति-काल के पूर्ण होने पर और इसके बाद हजार चतुर्युगी के अन्त में पुनः प्रलय के उपस्थित होने पर वे सत्यलोक चले गये ॥ ६-७ ॥ उस समय मैं ब्रह्मा बिना किसी आधिपत्य के साम्य-अवस्था को प्राप्त था । इस प्रकार अन्त में अनावृष्टि के कारण सभी स्थावर पदार्थों के सूख जाने पर सभी ओर समस्त पशु, मनुष्य, वृक्ष, पिशाच, राक्षस, गन्धर्व आदि क्रम से सूर्य की किरणों से दग्ध हो गये ॥ ८-९ ॥ तत्पश्चात् चारों ओर समुद्र-ही-समुद्र के व्याप्त हो जाने तथा घोर अन्धकार छा जाने पर योगात्मा, निर्मल, उपद्रवरहित, हजार सिरों वाले, हजार नेत्रों वाले, हजार पैरों वाले, हजार भुजाओं वाले, विश्वात्मा, सब कुछ जानने वाले, सभी देवताओं तथा संसार की उत्पत्ति करने वाले, रजोगुण से युक्त होने के कारण ब्रह्मा, तमोगुण से युक्त होने के कारण स्वयं शंकर, सत्त्वगुण से युक्त होने के कारण सर्वव्यापी विष्णु, सबकी आत्मा होने के कारण महेश्वर, कालात्मा, कालरूप नाभिवाले, शुक्ल, कृष्ण, गुणों से रहित, नारायण महान् बाहु वाले तथा सत्- असत् से युक्त सर्वात्मा जल के मध्य में शयन करने लगे ॥ १०-१३ ॥ उन्हें इस प्रकार जल-स्थित कमल पर सोते हुए देखकर मैं उस क्षण उनकी माया से मोहित हो गया और उन सनातन को हाथ से पकड़कर उठाते हुए क्रोधपूर्वक मैंने उनसे कहा — तुम कौन हो, यह मुझे बताओ ? ॥ १४१/२ ॥ तत्पश्चात् मेरे तेज तथा दृढ़ हस्त-प्रहार से शेषनाग- रूपी शय्या से उठकर इन्द्रियों को वश में रखने वाले वे प्रभु उस क्षण बैठ गये ॥ १५१/२ ॥ इसके बाद निद्रा से विक्लिन्न स्वच्छ कमलसदृश नेत्रों वाले प्रभायुक्त भगवान् हरि ने अपने सम्मुख विराजमान मुझ ब्रह्मा को देखा और उन भगवान् ने शय्या से उठकर थोड़ा हँसते हुए मुझसे मधुर मधुर वाणी में कहा — हे महाद्युते! हे वत्स! हे पितामह ! तुम्हारा स्वागत है, स्वागत है ॥ १६-१७१/२ ॥ हे श्रेष्ठ देवताओ ! उनका वह वचन सुनकर रजोगुण से युक्त होने के कारण शत्रुतापूर्ण भाव से मैंने मुसकराकर उन जनार्दन से कहा — ॥ १८१/२ ॥ हे अनघ ! सृजन तथा संहार करने वाले मुझ ब्रह्मा को तुम ‘वत्स ! वत्स!’ इस प्रकार सम्बोधित करते हुए जैसे गुरु शिष्य से कहता है, उस प्रकार से मुसकराकर क्यों बोल रहे हो ? ॥ १९१/२ ॥ जगत् के साक्षात् रचयिता, प्रकृति के प्रवर्तक, सनातन, अजन्मा, पालनकर्ता, विश्व के उत्पत्तिकारक ब्रह्मा, विश्वात्मा, विधाता तथा धारणकर्ता मुझ कमलनयन पितामह से मोहयुक्त होकर इस प्रकार क्यों बोल रहे हो ? इसका कारण शीघ्र बताओ ॥ २०-२११/२ ॥ इसपर उन्होंने भी मुझसे कहा — सम्पूर्ण जगत् का सृष्टिकर्ता, पालनकर्ता तथा संहारकर्ता मैं (विष्णु) ही हूँ, ऐसा जानो और तुमने भी मुझ शाश्वत परमेश्वर के अंग से ही अवतार ग्रहण किया है। फिर भी तुम मुझ जगत्पति, नारायण, रोग-विकाररहित, परम पुरुष, परमात्मा, सभी से आवाहित होने वाले, पुरुष्टुत, अच्युत, ऐश्वर्यसम्पन्न तथा विश्व की उत्पत्ति के कारणस्वरूप मुझ विष्णु को भूल गये हो, किंतु इसमें तुम्हारा कोई अपराध नहीं है । यह सब तो मेरी माया द्वारा रचा गया है ॥ २२-२४१/२ ॥ हे चार मुखवाले ब्रह्मन् ! तुम यह सत्य जानो कि सृष्टि का कर्ता, पालक, संहारक तथा सभी देवताओं का स्वामी मैं ही हूँ । मेरे सदृश ऐश्वर्य वाला और कोई नहीं है ॥ २५१/२ ॥ हे पितामह! मैं ही परम ब्रह्म हूँ, मैं ही परम तत्त्व हूँ, मैं ही परम ज्योति हूँ तथा मैं ही परम समर्थ परमात्मा हूँ ॥ २६१/२ ॥ हे चतुर्मुख ! इस जगत् में जो भी समस्त स्थावर- जंगम वस्तुएँ दिखायी पड़ रही हैं अथवा जिनके बारे में सुना जाता है; उन सबको मुझसे व्याप्त किया हुआ जानो ॥ २७१/२ ॥ प्राचीन काल में मैंने ही स्वयं चौबीस तत्त्वमय व्यक्त सृष्टि रची है। नित्य अन्त को प्राप्त होने वाले सूक्ष्मातिसूक्ष्म बद्धजीव, क्रोध से उत्पन्न अन्यान्य तामसी सृष्टि तथा आप (ब्रह्मा) – सहित अनेक ब्रह्माण्ड मेरी माया के प्रभाव से ही विरचित हैं ॥ २८-२९ ॥ मैंने बुद्धि की रचना की है तथा उसमें तीन प्रकार के अहंकारों (सात्त्विक, राजस, तामस) – का निर्माण किया है। इसी प्रकार अपनी माया से पाँच तन्मात्राएँ एवं मन, इन्द्रियाँ, आकाश आदि पाँच महाभूतों की सृष्टि मैंने ही की है ॥ ३०१/२ ॥ यह वचन कहने के अनन्तर रजोगुण की वृद्धि से परस्पर शत्रुता – भाव को प्राप्त हम दोनों में उस प्रलय – सागर के मध्य भीषण रोमांचकारी संग्राम होने लगा ॥ ३१-३२ ॥ इसी बीच हम दोनों के कलह को दूर करने तथा ज्ञान प्रदान करने के निमित्त एक दीप्तिमान् लिङ्ग हम लोगों के समक्ष प्रकट हुआ। वह लिङ्ग हजारों अग्नि- ज्वालाओं से व्याप्त, सैकड़ों कालाग्नि के सदृश, क्षय तथा वृद्धि से रहित, आदि-मध्य-अन्त से हीन, अतुलनीय, अवर्णनीय, अव्यक्त तथा विश्व का उत्पत्तिकर्तारूप था ॥ ३३-३४१/२ ॥ उस लिङ्ग की हजारों ज्वालाओं से भगवान् विष्णु तथा मैं — दोनों लोग मोहित हो गये। फिर विष्णु ने मुझसे कहा कि हमें अग्नि-उद्भूत इस लिङ्ग का पता लगाना चाहिये। एतदर्थ मैं इस अनुपम अग्नि-स्तम्भ के नीचे जाता हूँ और आप प्रयत्नपूर्वक शीघ्र इसके ऊपर जाइये ॥ ३५-३६१/२ ॥ हे देवताओ ! ऐसा कहकर विश्वात्मा भगवान् विष्णु ने वाराह का रूप धारण कर लिया और मैं भी शीघ्र हंस के रूप को प्राप्त हो गया। उसी समय से मुझ ब्रह्मा को विराट् रूप वाले भगवान् विष्णु ‘हंस’ कहने लगे। जो प्राणी ‘हंस-हंस’ नाम से मेरा कीर्तन करता है, वह हंसत्व को प्राप्त हो जाता है ॥ ३७-३८१/२ ॥ हे देवताओ ! उस समय मैं अत्यन्त श्वेत वर्ण का था, मेरे नेत्र अग्नि के समान थे और मैं सभी ओर से पंखों से युक्त था – इस प्रकार हंसरूप में मैं मनरूपी वायु के वेग से उड़कर ऊपर की ओर गया ॥ ३९१/२ ॥ उधर विश्वात्मा नारायण विष्णु भी दस योजन चौड़े तथा शत योजन लम्बे और नीले अंजन के समूहसदृश, मेरुपर्वत-तुल्य शरीर वाले, श्वेत तथा तीक्ष्ण दंष्ट्रांकुर एवं विशाल थूथन वाले, छोटे-छोटे पैरों वाले, विचित्र अंगों वाले, प्रलयकालीन सूर्य के समान प्रकाशमान, दृढ़, अनुपमेय, भीषण शब्द वाले तथा सर्वथा अपराजेय कृष्णवाराह का रूप धारण करके उस अग्नि-स्तम्भ (लिङ्ग)- के नीचे की ओर गये ॥ ४०-४२१/२ ॥ इस प्रकार विष्णु भगवान् एक हजार वर्ष तक वेगपूर्वक नीचे की ओर जाते रहे, किंतु वाराहरूप विष्णु इस लिङ्ग के मूल का अल्पांश भी नहीं देख सके ॥ ४३१/२ ॥ शत्रुओं का दमन करने वाला मैं ब्रह्मा भी उस लिङ्ग का अन्त जानने की इच्छा से पूरे प्रयास के साथ शीघ्रतापूर्वक ऊपर की ओर जाता रहा ॥ ४४१/२ ॥ तत्पश्चात् अहंकारपूर्वक ऊपर गया हुआ मैं उस लिङ्ग का अन्त न देखकर अत्यन्त थका हुआ नीचे लौट आया और उसी प्रकार सभी देवताओं के उद्भवकर्ता तथा महान् शरीर वाले वे भगवान् विष्णु भी थकान एवं सन्त्रास भरे नेत्रों के साथ लिङ्ग का मूल न पाकर नीचे से ऊपर आ गये ॥ ४५-४६ ॥ शंकर की माया से मोह को प्राप्त वे महामना विष्णु मेरे साथ आकर परमेश्वर को प्रणाम करके व्याकुल मन से खड़े हो गये। इसके बाद मेरे साथ पुनः परमेश्वर को पीछे से, बगल से तथा आगे से प्रणाम करके वे विचार करने लगे कि [ आदि-अन्तहीन ] यह क्या है ? ॥ ४७-४८ ॥ हे श्रेष्ठ देवताओ ! उसी समय वहाँ प्लुत स्वर से युक्त ‘ओम्-ओम्’ ऐसा अत्यन्त स्पष्ट शब्दरूप नाद सुनायी पड़ा ॥ ४९ ॥ यह तीव्र शब्द क्या है – ऐसा मेरे साथ विचार करते हुए वे विष्णु खड़े रहे। तभी उन्होंने उस ‘ओम्’ नाद के अन्त में लिङ्ग के दक्षिण भाग में सनातन आदि वर्ण अकार, उसके उत्तर भाग में उकार तथा उसके मध्य में मकार देखा ॥ ५०-५१ ॥ इस प्रकार सूर्यमण्डल के समान आदि वर्ण अकार को लिङ्ग के दक्षिण में, अग्नि के सदृश प्रतीत होने वाले उकार को उत्तर में तथा चन्द्रमण्डल के तुल्य मकार को मध्य में देखने के बाद उन पुरुषश्रेष्ठ विष्णु ने उसके ऊपर तुरीयातीत, अमृतरूप, कलारहित, विकारशून्य, निर्द्वन्द्व, अद्वितीय, शून्यस्वरूप, बाह्य तथा आभ्यन्तर से रहित, बाह्य तथा आभ्यन्तर से युक्त, बाह्य तथा आभ्यन्तर दोनों रूपों में स्थित, आदि-मध्य-अन्त से रहित तथा आनन्द के भी कारणस्वरूप शुद्ध स्फटिक के सदृश प्रकाशमान प्रभु को देखा ॥ ५२-५५ ॥ अकार, उकार और मकाररूप तीन मात्राएँ तथा बिन्दुरूप अर्धमात्रा स्वरूप वाला प्रणव ही नाद कहलाता है और वही ब्रह्म संज्ञा वाला है । ऋक् यजुः तथा सामवेद उन तीनों मात्राओं के रूप में विष्णु ही हैं ॥ ५६ ॥ उसी वेदरूप शब्द के द्वारा विष्णु ने विश्वात्मा ईश्वर शिव का चिन्तन किया। उसी समय से अतीन्द्रिय- दर्शक, परम-तत्त्वरूप कल्याणकारी वेद हुआ और उसी ऋषि (वेद)-से विष्णु ने परमेश्वर शिव को जाना ॥ ५७१/२ ॥ देव (ब्रह्मा) बोले — वाणी भी मन के साथ जिन्हें प्राप्त न करके लौट आती है, उन चिन्तारहित भगवान् रुद्र का वाचक एकाक्षर प्रणव ही है और यही एकाक्षर प्रणव उस सृष्टि के परम कारणरूप, सत्य- आनन्द तथा अमृतरूप परात्पर परम ब्रह्म का भी वाचक है 1 ॥ ५८-५९१/२ ॥ उसी एकाक्षर प्रणव से अकार संज्ञक भगवान् ब्रह्मा, उकार संज्ञक परमकारणस्वरूप विष्णु तथा मकार संज्ञक परमेश्वर नीललोहित का प्रादुर्भाव हुआ है ॥ ६०-६१ ॥ अकार संज्ञक ब्रह्मा सृष्टि के निर्माता, उकार संज्ञक विष्णु मोह करने वाले तथा मकार संज्ञक शिव उन दोनों ब्रह्मा तथा विष्णु पर सदा अनुग्रह करने वाले हैं ॥ ६२ ॥ मकाररूप भगवान् शिव बीजवान्, अकाररूप ब्रह्मा बीज तथा उकाररूप प्रधानपुरुषेश्वर विष्णु योनि कहे जाते हैं ॥ ६३ ॥ नादरूप महेश्वर शिव ही स्वयं बीजी, बीज तथा योनि — तीनों हैं। वे बीजीरूप महेश्वर स्वेच्छा से अपने को विभाजित करके प्रतिष्ठित हैं ॥ ६४ ॥ इन बीजीरूप परमेश्वर शिव के लिङ्ग से अकाररूप बीज (ब्रह्मा), उकाररूप योनि (विष्णु) – में गिरकर चारों ओर वृद्धि को प्राप्त होने लगा और वह फिर स्वर्ण का अण्ड हो गया । इसके बाद एकाक्षर प्रणव को आदि-अन्त से आवेष्टित करके वह दिव्य अण्ड बहुत वर्षों तक जल में स्थित रहा ॥ ६५-६६ ॥ तदनन्तर हजार वर्षों के बाद साक्षात् आदिरूप परमेश्वर ने जल में स्थित उस अजोद्भूत अण्ड को दो भागों में कर दिया ॥ ६७ ॥ उस अण्ड के ऊर्ध्वस्थित हेममय पवित्र कपाल से आकाश तथा नीचे के भाग से पाँच लक्षणों से सम्पन्न पृथ्वी की उत्पत्ति हुई ॥ ६८ ॥ उसी अण्ड से अकारसंज्ञक चतुर्मुख ब्रह्मा प्रादुर्भूत हुए। अतएव वही लिङ्गरूप प्रणव सभी लोकों की सृष्टि करनेवाला है तथा वही प्रणव अकार उकार – मकार रूप तीन प्रकार का ईश्वर है ॥ ६९ ॥ इस प्रकार वह प्रणव ओम् – ओम् रूप ब्रह्म कहा गया है — ऐसा यजुर्वेद के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ मनीषियों ने कहा है और उन यजुर्वेद-ज्ञाताओं के वचन सुनकर उसे ऋग्वेद की ऋचाओं तथा साममन्त्रों ने भी आदरपूर्वक स्वीकार किया है और इसी तरह सभी श्रुतियों ने उसी ‘ओम्’ को सदा हे हरे! हे ब्रह्मन् ! के रूप में सम्बोधित किया है ॥ ७०१/२ ॥ इस वेद – वाक्य आदि से शिव को यथावत् जानकर हम दोनों वैदिक मन्त्रों से महोदय देवेश्वर महादेव की स्तुति करने लगे ॥ ७११/२ ॥ हम दोनों के स्तवन से प्रसन्न होकर माया के आवरण से रहित महेश्वर दिव्य शब्दमय रूप धारणकर हँसते हुए उस लिङ्ग में प्रकट हुए ॥ ७२१/२ ॥ अकार उनका मस्तक तथा दीर्घ (आकार) उनका ललाट कहा जाता है। इकार दाहिना नेत्र, ईकार बायाँ नेत्र, उकार दाहिना कान, ऊकार बायाँ कान, ऋकार उन परमेष्ठी महेश्वर का दायाँ कपोल, ॠकार उनका बायाँ कपोल, लृ तथा ॡ क्रमशः उनके दाहिने तथा बायें – दोनों नासापुट, एकार ऊपरी ओष्ठ, ऐकार उन प्रभु का नीचे का ओष्ठ, ओकार तथा औकार क्रमशः ऊपर तथा नीचे की दन्त-पंक्तियाँ, अं तथा अः उन धीमान् देवदेव के क्रमशः ऊपर तथा नीचे के तालु, ककार आदि पाँच अक्षर (क, ख, ग, घ, ङ) उनके दाहिनी ओर के पाँच हाथ, इसी प्रकार चकार आदि पाँच अक्षर बायीं ओर के पाँच हाथ, टकार आदि पाँच अक्षर दायाँ पैर, तकार आदि पाँच अक्षर बायाँ पैर, पकार उन परमेश्वर का उदर, फकार दाहिना पार्श्व, बकार बायाँ पार्श्व, भकार उनका स्कन्ध, मकार परम योगी महादेव शंकर का हृदय, यकार से लेकर सकारपर्यन्त सात वर्ण ( य, र, ल, व, श, ष, स) उन प्रभु के सातों धातु 2 , हकार उनकी आत्मा तथा क्षकार उनका क्रोध कहा गया है ॥ ७३-८०१/२ ॥ उमा के साथ उन भगवान् महेश्वर को देखकर पुनः उन्हें प्रणाम करके जब भगवान् विष्णु ने ऊपर की ओर देखा तब उन्हें ॐ-कार से उत्पन्न, पाँच कलाओं से युक्त, बुद्धि-विवर्धक तथा सभी धर्म-अर्थ को सिद्ध करने वाला शुद्ध स्फटिक-तुल्य अत्यन्त शुभ्र तथा अड़तीस शुभ अक्षरों वाला पवित्र मन्त्र (ईशानः सर्वविद्यानाम् ० ) 3 दृष्टिगोचर हुआ। साथ ही गायत्री से उत्पन्न, चार कलाओं वाला, चौबीस अक्षरों से युक्त तथा वश्यकारक हरित वर्ण अत्युत्तम मन्त्र ( तत्पुरुषाय विद्महे० )4 ; अथर्ववेद से उत्पन्न आठ कलाओं से युक्त तैंतीस शुभ अक्षरों वाला कृष्णवर्ण तथा अत्यन्त अभिचारिक अघोर- मन्त्र (अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्य० ) 5 ; यजुर्वेद से प्रादुर्भूत, आठ कलाओं वाला, श्वेतवर्ण वाला, शान्तिकारक पैंतीस अक्षरों से युक्त पवित्र सद्योजात मन्त्र (सद्योजातं प्रपद्यामि० ) 6 एवं सामवेद से उत्पन्न, रक्तवर्ण, बाल आदि तेरह कलाओं से युक्त, जगत् का आदि स्वरूप तथा वृद्धि-संहार का कारणरूप छाछठ अक्षरों वाला उत्तम मन्त्र ( वामदेवाय नमो० ) 7 दृष्टिगत हुए। इन पाँचों मन्त्रों को प्राप्तकर भगवान् विष्णु ने इनका जप करना आरम्भ कर दिया ॥ ८१-८८ ॥ तत्पश्चात् समस्त कलाओं की कान्ति से युक्त, ऋक्-यजुः-सामस्वरूप, ईशान मन्त्ररूप मुकुट वाले, तत्पुरुष मन्त्ररूप मुख वाले, अघोर मन्त्ररूप करुणामय हृदय वाले, वामदेव मन्त्र – रूप सदा कल्याणकर गुह्यस्थान- वाले तथा सद्योजात मन्त्ररूप चरणों वाले, विशाल सर्पों का आभूषण धारण करने वाले, चारों ओर पैर – मुख – आँख धारण किये हुए, सृष्टि – पालन – संहार के कारणस्वरूप, पुरातन पुरुष महादेव ब्रह्माधिपति शिव को देखकर भगवान् विष्णु अभीष्ट स्तुतियों से उन वरदाता परमेश्वर ईशान का पुनः स्तवन करने लगे ॥ ८९-९२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘लिङ्गोद्भव’ नामक सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १७ ॥ 1. यतो वाचो निवर्तन्ते । अप्राप्य मनसा सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् । (तैत्ति० २।४।१ ) 2. रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि मज्जा और शुक्र — ये सात शरीरस्थ धातुएँ हैं । 3. ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रह्माधिपतिर्ब्रह्मणोऽधिपतिर्ब्रह्मा शिवो मे अस्तु सदाशिवोम् ॥ (नारायणोपनिषद्) 4. तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि । तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥ ( नारायणोपनिषद्) 5. अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः । सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्यः ॥ (नारायणोपनिषद्) 6. सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमो नमः । भवे भवे नाति भवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः ॥ (नारायणोपनिषद्) 7. वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः कालाय नमः कलविकरणाय नमो बलविकरणाय नमो बलाय नमो बलप्रमथनाय नमः सर्वभूतदमनाय नमो मनोन्मनाय नमः || (नारायणोपनिषद्) Content is available only for registered users. 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