श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -029
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
उनतीसवाँ अध्याय
देवदारुवन का वृत्तान्त, अतिथि माहात्म्य में सुदर्शन मुनि का आख्यान तथा संन्यास धर्म का वर्णन
श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे एकोनत्रिंशोऽध्यायः
देवदारुवनवृत्तान्तवर्णनं

सनत्कुमारजी बोले —  हे विभो ! प्राचीनकाल में दारुवन में तपस्या से भावित आत्मा वाले उन वनवासी मुनियों के साथ जो भी घटित हुआ, उसे मैं इस समय सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥ ऊर्ध्वरेता दिगम्बर भगवान् शिव विकृत रूप धारण करके दारुवन में क्यों गये ? उस वन में परमात्मा रुद्र के साथ क्या हुआ ? उन देवाधिदेव शिव के क्रिया- कलापों का भी यथार्थ रूप से वर्णन करने की कृपा कीजिये ॥ २-३ ॥

सूतजी बोले —  [ ऋषिगण !] उन सनत्कुमार का यह वचन सुनकर श्रुतिसारविदों में वरिष्ठ शिलादपुत्र भगवान् नन्दिकेश्वर कुछ-कुछ हँसते हुए उनसे कहने लगे ॥ ४ ॥

शैलादि बोले —  एक बार घने देवदारुवन में देवाधिदेव रुद्र की प्रसन्नता के लिये अपने स्त्री-पुत्रादिसहित पंचाग्नि का सेवन करते हुए मुनिगण कठोर तप कर रहे थे ॥ ५ ॥ उनके तप से प्रसन्न जगन्नाथ, चेकितान, वृषध्वज, धूर्जटि, परमेशान, नीललोहित भगवान् रुद्र दारुवन में निवास करने वाले उन मुनियों के प्रवृत्ति-लक्षण तथा ज्ञान की जानकारी करने के लिये एवं उनमें श्रद्धाभाव की परीक्षा करने के लिये और साथ ही प्रवृत्तिज्ञान से युक्त चित्त वाले उन देवदारुवनवासी मुनियों में निवृत्ति-लक्षण तथा ज्ञान स्थापित करने के निमित्त लीलापूर्वक विकृत रूप धारण करके अलौकिक दारुवन में पहुँचे ॥ ६-८ ॥

उस समय शंकरजी कृष्ण वर्ण वाले, दो भुजाओं वाले, तीन आँखों वाले, दिगम्बर तथा मोहक स्वरूप वाले थे ॥ ९ ॥ अत्यन्त सुन्दर रूप वाले भगवान् शिव मन्द मुसकान तथा भ्रूविलास करते हुए गीत गाकर स्त्रियों में कामभावना उत्पन्न कर रहे थे ॥ १० ॥ कामदेव का संहार करने वाले तथा अत्यन्त मोहक आकृति वाले भगवान् शिव वहाँ नारीसमूह को बार-बार देखकर उनके भीतर कामभावना को बढ़ा रहे थे ॥ ११ ॥

वन में उस विकृत तथा नीललोहित वर्ण वाले पुरुष को देखकर पतिव्रता स्त्रियाँ भी प्रेमपूर्वक उनके पीछे-पीछे चलने लगीं ॥ १२ ॥ आरण्यक कुटीरों के द्वार तक आयी हुई स्त्रियों के वस्त्र एवं अलंकार शिथिल हो गये । वे मूर्च्छित-सी हो गयीं, उन लीलामय शिव के मुखारविन्द की मोहक मुसकान को पाकर वृक्षों के आश्रय में रहने वाली वे नारियाँ उनके पीछे-पीछे चल दीं ॥ १३ ॥ शिवजी को देखकर प्रौढ़ावस्थावाली होने पर भी कुछ स्त्रियाँ मदमत्त होकर आँखें घुमाने लगीं तथा भौंहों का संचालन करने लगीं ॥ १४ ॥ तदनन्तर शिव को देखकर दूसरी स्त्रियाँ मुसकानयुक्त मुख वाली हो गयीं, उनके वस्त्र कुछ शिथिल से हो गये, कांचीबन्धन भी ढीले हो गये; वे मिलकर गाने लगीं ॥ १५ ॥

उस समय शिव को विपिन में देखकर कुछ ऋषिपत्नियाँ तो शिथिल नूतन वस्त्रों तथा अपने-अपने विचित्र वलयों को फेंककर मदान्वित हो स्वजनों के पास पहुँचीं ॥ १६ ॥ उस समय शिथिल वस्त्रवाली कोई तो शिव को देखकर विशिष्ट वासनायुक्त हो गयी तथा अन्य स्त्रियाँ मतवाली-सी होकर विचित्र शाखा वाले प्रसिद्ध वृक्षों को एवं घनिष्ठ बन्धुजनों तक को नहीं पहचानती थीं ॥ १७ ॥

हे द्विजश्रेष्ठो ! कुछ स्त्रियाँ उनके पास जाकर नाचने लगीं और जमीन पर गिर पड़ीं। कुछ स्त्रियाँ हाथी की भाँति बैठ गयीं। कोई दूसरी स्त्री कुछ बोलने लगी ॥ १८ ॥ मुसकराते हुए एक-दूसरे को देखकर वे परस्पर आलिंगन करने लगीं। वे सभी ओर से शिवजी का मार्ग रोककर अनेक प्रकार के हाव-भाव दर्शाने लगीं ॥ १९ ॥ कुछ स्त्रियाँ उनसे कहने लगीं कि ‘आप कौन हैं ? बैठिये । अन्य स्त्रियाँ भी प्रसन्नचित्त होकर कहने लगीं — आप कहाँ जा रहे हैं ? आप हम सबपर प्रसन्न होइये’॥ २० ॥ भगवान् शंकर की माया के प्रभाव से अपने पतियों के सम्मुख ही पतिव्रता स्त्रियों के वस्त्रपरिधान, केश आदि अस्त-व्यस्त हो गये और वे कामुक स्त्रियों की भाँति स्वेच्छाचारितापूर्ण व्यवहार प्रदर्शित करने लगीं ॥ २१ ॥ उन स्त्रियों के हाव-भाव देखकर तथा उनके वचन सुनकर निर्विकार परमेश्वर शिव शुभ अथवा अशुभ कुछ भी नहीं बोले ॥ २२ ॥

उस प्रकार की चेष्टा वाली नारियों के समूह को देखकर वे विप्र मुनीश्वर दिगम्बरवेशधारी शिव को उस अवस्था में देखकर [शंकरजी के प्रति ] अत्यन्त कठोर वचन कहने लगे। किंतु उनकी सभी तपस्याएँ शंकरजी के सम्मुख उसी प्रकार निष्फल सिद्ध हुईं, जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश से आकाश-मण्डल में स्थित तारागण निस्तेज हो जाते हैं ॥ २३-२४ ॥

ऐसा सुना जाता है कि महात्मा ब्रह्मा का सभी समृद्धियों तथा कल्याणों का उत्पत्ति स्थल स्वरूप यज्ञ ऋषि के शाप से विनष्ट हो गया था ॥ २५ ॥ भृगुमुनि के शाप से परम ऐश्वर्यशाली विष्णु को भी दस अवतार लेने पड़े तथा अनेक दुःख सहने पड़े ॥ २६ ॥ हे धर्मज्ञ सनत्कुमार! क्रुद्ध ऋषि गौतम ने शाप से इन्द्र का अण्डकोषसहित गुह्यांग काटकर पृथ्वी पर गिरा दिया था ॥ २७ ॥ मुनि वसिष्ठ के शाप से वसुओं को गर्भ में वास करना पड़ा, अगस्त्य आदि ऋषियों के शाप से राजा नहुष को सर्प होना पड़ा था ॥ २८ ॥

भगवान् विष्णु का निवासस्थान तथा अमृत का आधारस्वरूप वह क्षीरसागर ब्राह्मणों के द्वारा सदा के लिये दूसरे अपेय जल वाले समुद्र के रूप में कर दिया गया था ॥ २९ ॥ जनार्दन भगवान् विष्णु ने वाराणसीपुरी में पहुँचकर अविमुक्तेश्वर देवाधिदेव त्र्यम्बकेश्वर का दूध से अभिषेक करके परम श्रद्धा से युक्त होकर देहसंस्पर्शजन्य अमृतस्वरूप क्षीर द्वारा स्वयं उन मधुसूदन ने ब्रह्माजी एवं मुनियों के साथ भगवान् शिव को अभिषिक्त करके पूर्ववत् क्षीरसागर को अपना निवासस्थान बनाया ॥ ३०-३२ ॥ महात्मा माण्डव्य ने धर्म को शापित किया तथा श्रीकृष्ण की प्रेरणा से दुर्वासा आदि महात्माओं के द्वारा वृष्णिवंशी शापित हुए थे ॥ ३३ ॥ महान् आत्मा वाले दुर्वासामुनि ने लक्ष्मणसहित श्रीराम को शाप दे दिया और श्रीवत्स (श्रीयुक्त वक्ष:स्थलवाले) विष्णु को भृगुमुनि का चरण- प्रहार सहना पड़ा ॥ ३४ ॥ देवाधिदेव विरूपाक्ष उमापति शिव को छोड़कर ये तथा अन्य बहुत से लोग भी विप्रों (ब्राह्मणों) – के वशवर्ती हुए हैं ॥ ३५ ॥

उन्हीं शिव की माया से मोहित होने के कारण वे मुनिगण शंकर को नहीं जान पाये और अत्यन्त कठोर वचन बोलने लगे, फिर भगवान् शिव भी अन्तर्धान हो गये ॥ ३६ ॥ तत्पश्चात् व्याकुल चित्तवाले वे मुनिगण प्रातः काल होते ही उस दारुवन से ब्रह्माजी के पास पहुँचे। वहाँ श्रेष्ठ आसन पर विराजमान महात्मा ब्रह्मा से उस सुन्दर दारुवन में रहने वाले क्षीण चेतना वाले मुनियों ने शंकर का सारा वृत्तान्त कह सुनाया ॥ ३७-३८ ॥ उन ब्रह्माजी ने भी क्षणभर में ही मन में सोचकर पवित्र दारुवन में उनका पूर्वघटित सम्पूर्ण वृत्तान्त जान लिया ॥ ३९ ॥

अपने आसन से तत्काल उठकर और दोनों हाथ जोड़कर ब्रह्माजी ने मन-ही-मन शिवजी को प्रणाम करके दारुवन में रहने वाले उन मुनियों से कहा — हे विप्रो ! विनाश को प्राप्त तुम सभी को धिक्कार है; क्योंकि सर्वोत्तम निधि प्राप्त करके भी तुम अभागों ने उसे गँवा दिया ॥ ४०-४१ ॥ तुम अलिंगियों ने उस दारुवन में जिस विकृत आकार वाले पुरुष को देखा था; वे साक्षात् परमेश्वर शिव ही थे ॥ ४२ ॥ विप्रो ! गृहस्थों को अतिथियों की निन्दा कभी नहीं करनी चाहिये; वे अतिथि विकृत रूपवाले, सुन्दर रूपवाले, मलिन तथा मूर्ख – चाहे जैसे भी हों ॥ ४३ ॥

पूर्वकाल में पृथ्वी पर द्विजों में अग्रणी सुदर्शनमुनि ने अतिथि पूजा के प्रभाव से साक्षात् कालमृत्यु को भी जीत लिया था ॥ ४४ ॥ भवसागर से पार होने तथा आत्मशुद्धि के लिये अतिथि पूजा को छोड़कर गृहस्थों एवं श्रेष्ठ द्विजों के लिये लोक में अन्य कोई भी उपाय नहीं है ॥ ४५ ॥ पूर्वकाल में सुदर्शन नाम से विख्यात गृहस्थ मुनि ने मृत्यु पर विजय प्राप्त करने की प्रतिज्ञा की और अपनी संतानयुक्त पतिव्रता पत्नी से कहा — ॥ ४६ ॥

हे सुव्रते ! हे सुन्दर भौहोंवाली ! हे सौभाग्यवति ! सुनो, तुम पूर्ण प्रयत्न के साथ अतिथियों का सदा सत्कार करना और कभी भी उनका निरादर न करना ॥ ४७ ॥ अतिथि साक्षात् पिनाकधारी शिव का ही स्वरूप होता है, अतएव सब कुछ अर्पित करके भी अतिथि की पूजा करो। सुदर्शन ने पुन: कहा — हे आर्ये! अतिथि साक्षात् शिव होता है; शिवस्वरूप अतिथि को सब कुछ प्रदान करना चाहिये। अतः सभी अतिथियों की सदा पूजा करनी चाहिये ॥ ४८–५०१/२

पति के ऐसा कहने पर वह पातिव्रतपरायण मुनिभार्या पति की आज्ञा को देवप्रतिमा के समक्ष अर्पित किये गये पुष्प आदि की भाँति शिरोधार्य करके अतिथि सत्कार में प्रवृत्त हो गयी ॥ ५११/२

हे श्रेष्ठ द्विजो ! उन दोनों की श्रद्धा की परीक्षा करने के लिये एक सुन्दर ब्राह्मण का रूप धारण करके साक्षात् धर्म मुनि के घर पधारे। उस ब्राह्मण को देखकर विशुद्ध हृदय वाली उस मुनिभार्या ने अर्घ्य आदि से उस ब्राह्मण का पूजन किया ॥ ५२-५३ ॥ उस स्त्री के द्वारा भलीभाँति पूजित होकर ब्राह्मण- वेषधारी साक्षात् धर्म ने उससे कहा — हे कल्याणि ! तुम्हारे बुद्धिसम्पन्न पति सुदर्शन कहाँ हैं ? तत्पश्चात् अपने पति द्वारा कही गयी बात का स्मरण करती हुई उस स्त्री ने पति की आज्ञा को ध्यान में रखकर धर्मरूप उस ब्राह्मण के लिये आतिथ्य – सेवा करने का मन में निश्चय किया ॥ ५४-५६१/२

इसी बीच उस स्त्री के पति प्रज्ञासम्पन्न सुदर्शन घर के द्वार पर आ गये। मुनिवर सुदर्शन ने अपनी भार्या को आवाज दी — हे भद्रे ! तुम कहाँ चली गयी हो ? तब साक्षात् धर्मरूप अतिथि उनसे बोले —  हे महाभाग सुदर्शन ! मैं इस समय तुम्हारी इस भार्या के आतिथ्य से परम सन्तुष्ट हूँ ॥ ५७–६०१/२

तदनन्तर धर्मराज ने अपना वास्तविक रूप उन्हें दिखाया और मनोवांछित वर देकर महान् कान्ति वाले धर्म ने उनसे कहा — हे विप्रेन्द्र ! मैं यहाँ केवल तुम्हारी श्रद्धा की परीक्षा करने के निमित्त आया हूँ । हे सुव्रत ! तुमने अपने एकमात्र अतिथिपूजारूप धर्म से मृत्यु तक को जीत लिया है ॥ ६१–६३ ॥ ‘अहो, इस तपस्वी का ऐसा ओज’ — इस प्रकार कहकर धर्म वहाँ से चले गये । [ हे मुनियो ! ] इसलिये सभी अतिथियों की सदा पूजा करनी चाहिये । हे अभागे मुनीश्वरो ! अब अधिक कहने से क्या लाभ? तुम लोग शीघ्र ही उन्हीं महादेव की शरण में जाओ ॥ ६४-६५ ॥

उन ब्रह्माजी का वह वचन सुनकर व्याकुल नेत्रों वाले द्विजश्रेष्ठ दुःखित होकर ब्रह्माजी से प्रार्थना करते हुए कहने लगे ॥ ६६ ॥

विप्रगण बोले —  हे महाभाग ! स्त्रियाँ तो विकार- युक्त होती ही हैं, जिनके लिये हम लोगों ने अपना जीवन नष्ट कर डाला। जिन अनिन्द्य महादेव ने कृपा करके हम लोगों को दर्शन दिया था, उन्हीं का हम लोगों ने अनादर किया ॥ ६७ ॥ हमने उन सर्वव्यापी, शूलधारी, पिनाकी तथा नीललोहित वर्ण वाले शिवजी को अज्ञानता से शाप दे दिया; किंतु उनके देखने मात्र से हमारे शाप की शक्ति कुण्ठित हो गयी ॥ ६८ ॥ हे देवेश ! अब आप कृपा करके हमें संन्यास-धर्म के विषय में क्रम से बताइये; जिससे हम लोग उन देवाधिदेव, उग्र, भीम तथा कपर्दी शिव का दर्शन करने में समर्थ हो सकें ॥ ६९ ॥

पितामह बोले — हे श्रेष्ठ मुनियो ! सर्वप्रथम श्रद्धापूर्वक गुरु से निरन्तर वेद का अध्ययन करे, उसका अर्थ समझे और धर्मों का ज्ञान करे ॥ ७० ॥ इस प्रकार विद्वान् को चाहिये कि बारह वर्षों तक वेदाध्ययन करने के अनन्तर वेदव्रत नामक स्नान से संस्कारित होकर विवाह करके पुनः सदाचारी पुत्र उत्पन्न करके उन पुत्रों के अनुकूल वृत्ति का उपाय करके उनमें धनादि का विभाजन कर दे। तत्पश्चात् अग्निष्टोम आदि यज्ञों से यज्ञेश्वर विभु का यजन करके मुनि को वन में आकर अग्नि में परमेश्वर की पूजा करनी  चाहिये ॥ ७१-७२१/२

वन में रहते हुए मुनि को बारह वर्ष तक या एक वर्ष (बारह माह) – तक या बारह पक्ष (छ: माह ) – तक अथवा बारह दिन तक दुग्ध का सेवन करते हुए शान्ति तथा संयमपूर्वक सभी देवताओं की पूजा करनी चाहिये ॥ ७३-७४ ॥ इस प्रकार यजन-पूजन के अनन्तर यज्ञसम्बन्धी काष्ठपात्र मन्त्रपूर्वक अग्नि में हवन कर दे, मिट्टी के पात्र जल में छोड़ दे तथा धातु के पात्र गुरु को अर्पित कर दे और निष्कपट भाव से अपना सम्पूर्ण धन ब्राह्मणों को देकर गुरु को दण्डवत् प्रणाम करके विरक्त यति संन्यासधर्म का आचरण करे ॥ ७५-७६ ॥ शिखासहित बालों को कटवाकर तथा यज्ञोपवीत त्याग कर विद्वान् यति को ‘भूः स्वाहा’ इस मन्त्र से जल में पाँच आहुति देनी चाहिये ॥ ७७ ॥

इसके पश्चात् यति को शिवसायुज्यरूपी विमुक्ति के लिये आगे की भी साधना करनी चाहिये । इसके लिये छः माह अथवा वर्षपर्यन्त यति अनशन करे अथवा जल पीकर या पत्ते खाकर या दूध पीकर या फल खाकर जीवन – निर्वाह करे। ऐसा करने पर यदि मृत्यु नहीं हुई और वह जीवित रहता है, तो उसे अपने देह के प्रस्थान आदि अर्थात् स्थूल शरीर के त्याग का प्रयास करना चाहिये। ऐसा आचरण करते हुए वह यति अपने कर्म से भी शिवसायुज्य प्राप्त कर लेता है ॥ ७८-८० ॥ परंतु हे दृढव्रती मुनियो ! शिवजी में भक्ति रखने वाला प्राणी शीघ्र ही मुक्ति प्राप्त कर लेता है। महादेवजी के भक्त को त्याग, विधि, महान् व्रतों, यज्ञों, विविध प्रकार के दानों, होमों, विविध शास्त्रों तथा वेदों से क्या प्रयोजन! महान् आत्मा वाले श्वेतमुनि ने महादेव की भक्ति से ही मृत्यु तक को जीत लिया था। अतएव परमेश्वर महादेव शिवजी के प्रति आप लोग भी भक्तिपरायण हों ॥ ८१-८३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘देवदारुवनवृत्तान्तवर्णन’ नामक उनतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २९ ॥

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