January 18, 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -036 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ छत्तीसवाँ अध्याय राजा क्षुप द्वारा विष्णु की आराधना, विष्णु द्वारा शिवभक्तों की महिमा का कथन श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे षट्त्रिंशोऽध्यायः क्षुपदधीचिसंवाद नन्दीश्वर बोले — [ हे सनत्कुमारजी!] उन राजा क्षुप की आराधना से प्रसन्न होकर देवताओं तथा दैत्यों से पूजित, हाथों में शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण किये हुए, पीत वस्त्र पहने हुए, सभी आभूषणों से सुशोभित एवं मुकुट धारण किये हुए लक्ष्मी तथा भूमिसहित गरुड़ध्वज श्रीमान् भगवान् पुरुषोत्तम ने उन क्षुप को दिव्य दर्शन दिया ॥ १-२१/२ ॥ दिव्य दर्शन के अनन्तर उन गरुड़ध्वज भगवान् विष्णु देव को प्रणाम करके राजा क्षुप अत्यन्त प्रिय वाणी में उनकी स्तुति करने लगे ॥ ३१/२ ॥ ॥ क्षुपकृतं विष्णुस्तोत्रम् ॥ तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिः प्रणम्य गरुडध्वजम् । त्वमादिस्त्वमनादिश्च प्रकृतिस्त्वं जनार्दनः ॥ ४ ॥ पुरुषस्त्वं जगन्नाथो विष्णुर्विश्वेश्वरो भवान् । योऽयं ब्रह्मासि पुरुषो विश्वमूर्तिः पितामहः ॥ ५ ॥ तत्त्वमाद्यं भवानेव परं ज्योतिर्जनार्दन । परमात्मा परं धाम श्रीपते भूपते प्रभो ॥ ६ ॥ त्वत्क्रोधसम्भवो रुद्रस्तमसा च समावृतः । त्वत्प्रसादाज्जगद्धाता रजसा च पितामहः ॥ ७ ॥ त्वत्प्रसादात्स्वयं विष्णुः सत्त्वेन पुरुषोत्तमः । कालमूर्ते हरे विष्णो नारायण जगन्मय ॥ ८ ॥ महांस्तथा च भूतादिस्तन्मात्राणीन्द्रियाणि च । त्वयैवाधिष्ठितान्येव विश्वमूर्ते महेश्वर ॥ ९ ॥ महादेव जगन्नाथ पितामह जगद्गुरो । प्रसीद देवदेवेश प्रसीद परमेश्वर ॥ १० ॥ प्रसीद त्वं जगन्नाथ शरण्यं शरणं गतः । वैकुण्ठ शौरे सर्वज्ञ वासुदेव महाभुज ॥ ११ ॥ सङ्कर्षण महाभाग प्रद्युम्न पुरुषोत्तम । अनिरुद्ध महाविष्णो सदा विष्णो नमोऽस्तु ते ॥ १२ ॥ विष्णो तवासनं दिव्यमव्यक्तं मध्यतो विभुः । सहस्रफणसंयुक्तस्तमोमूर्तिर्धराधरः ॥ १३ ॥ अधश्च धर्मो देवेश ज्ञानं वैराग्यमेव च । ऐश्वर्यमासनस्यास्य पादरूपेण सुव्रत ॥ १४ ॥ सप्तपातालपादस्त्वं धराजघनमेव च । वासांसि सागराः सप्त दिशश्चैव महाभुजाः ॥ १५ ॥ द्यौर्मूर्धा ते विभो नाभिः खं वायुर्नासिकां गतः । नेत्रे सोमश्च सूर्यश्च केशा वै पुष्करादयः ॥ १६ ॥ नक्षत्रतारका द्यौश्च ग्रैवेयकविभूषणम् । कथं स्तोष्यामि देवेशं पूज्यश्च पुरुषोत्तमः ॥ १७ ॥ श्रद्धया च कृतं दिव्यं यच्छ्रुतं यच्च कीर्तितम् । यदिष्टं तत्क्षमस्वेश नारायण नमोऽस्तु ते ॥ १८ ॥ ॥ शैलादिरुवाच ॥ इदं तु वैष्णवं स्तोत्रं सर्वपापप्रणाशनम् । यः पठेच्छृणुयाद्वापि क्षुपेण परिकीर्तितम् ॥ १९ ॥ आप आदि हैं तथा आप आदिरहित भी हैं । आप ही प्रकृति हैं, आप ही जनार्दन हैं, आप ही पुरुष हैं, आप ही जगन्नाथ, आप ही विष्णु तथा आप ही विश्वेश्वर हैं। जो ये पुरुषरूप विश्वमूर्ति पितामह हैं, वे भी आप ही हैं ॥ ४-५ ॥ हे जनार्दन ! जो आदि ज्योति है, वह आप ही हैं । हे लक्ष्मीकान्त ! हे भूपते ! आप ही परमात्मा तथा आप ही परमधाम हैं ॥ ६ ॥ तमोगुण से संलिप्त भगवान् रुद्र आपके क्रोध से आविर्भूत हैं तथा आपके ही अनुग्रह से रजोगुण से सम्पन्न जगत् सृजनकर्ता पितामह ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई है । हे कालमूर्ते! हे हरे ! हे विष्णो! हे नारायण ! हे जगन्मय ! सत्त्वगुणयुक्त साक्षात् पुरुषोत्तम विष्णु भी आपके ही अनुग्रह से अधिष्ठित हैं ॥ ७-८ ॥ हे विश्वमूर्ते ! हे महेश्वर ! महत्, पंचमहाभूतादि, पाँच तन्मात्राएँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ एवं मन – ये सब आपके ही द्वारा अधिष्ठित हैं ॥ ९ ॥ हे महादेव! हे जगन्नाथ! हे पितामह! हे जगद्गुरो ! हे देवदेवेश ! हे परमेश्वर ! आप प्रसन्न होइये, प्रसन्न होइये ॥ १० ॥ हे शरणागत को शरण प्रदान करने वाले जगन्नाथ ! हे वैकुण्ठ! हे शौरे ! हे सर्वज्ञ ! हे वासुदेव ! हे महाभुज ! आप प्रसन्न होइये ॥ ११ ॥ हे संकर्षण! हे महाभाग ! हे प्रद्युम्न ! हे पुरुषोत्तम ! हे अनिरुद्ध ! हे महाविष्णो! हे विष्णो! आपको सदा नमस्कार है ॥ १२ ॥ हे विष्णो ! हजार फणों से युक्त, तमोमूर्तिस्वरूप, पृथ्वी को धारण करने वाले, ऐश्वर्यसम्पन्न शेषनाग आपके दिव्य तथा अव्यक्त आसन के रूप में अधिष्ठित हैं ॥ १३ ॥ हे देवेश ! हे सुव्रत ! इस आसन के नीचे पाद के रूप में साक्षात् धर्म, ज्ञान, वैराग्य तथा ऐश्वर्य विराजमान हैं ॥ १४ ॥ हे विभो ! सातों पाताल आपके चरणरूप में, पृथ्वी जाँघ के रूप में, सातों समुद्र वस्त्र के रूप में, दिशाएँ विशाल भुजाओं के रूप में, अन्तरिक्ष मस्तक के रूप में, आकाश नाभि के रूप में, वायु नासिका के रूप में, दोनों नेत्र सूर्य-चन्द्र के रूप में, बाल मेघों के रूप में तथा नक्षत्र – तारे और सम्पूर्ण गगनमण्डल आपके गले के आभूषण के रूप में अधिष्ठित हैं। आप पुरुषोत्तम हैं और परम पूज्य हैं। आप देवेश्वर की स्तुति मैं किस प्रकार करूँ ? आपके विषय में जैसा सुना तथा कहा गया है, उसी दिव्य भाव को मैंने श्रद्धापूर्वक स्तुतिरूप में कह दिया। हे ईश। हे नारायण! मेरी अभिलाषा के लिये मुझे क्षमा कीजिये। आपको नमस्कार है ॥ १५–१८ ॥ नन्दीश्वर बोले — जो मनुष्य क्षुप के द्वारा की गयी सर्वपापनाशिनी इस विष्णु-स्तुति को भक्तिपूर्वक पढ़ता है या सुनता है अथवा ब्राह्मणों को सुनाता है, वह विष्णु-लोकको प्राप्त होता है ॥ १९-२० ॥ इस प्रकार इन्द्र आदि के द्वारा स्तुत किये जाने वाले अपराजेय परमेश्वर विष्णु की भक्तिपूर्वक स्तुति करके उनके चरणों में मस्तक झुकाकर प्रणाम करके उनकी ओर कातर दृष्टि से देखते हुए क्षुप ने कहा ॥ २१ ॥ राजा बोले — हे भगवन्! दधीच नाम से लोकप्रसिद्ध एक धर्मज्ञ तथा विनीत आत्मा वाले ब्राह्मण हैं, जो पहले मेरे मित्र थे । शिवजी की आराधना में सदा तत्पर रहने के कारण उनकी कृपा से वे सभी से अवध्य हैं । हे देवेश ! हे विष्णो! हे जगत्पते ! उन्होंने सभा में मेरा तिरस्कार करते हुए अपने बायें पैर से मेरे सिर पर प्रहार कर दिया और उन मदोन्मत्त ने कहा कि मैं किसी से भी नहीं डरता हूँ ॥ २२-२४ ॥ हे जगदीश्वर ! मैं उन विप्र दधीच को जीतना चाहता हूँ। हे जनार्दन ! मैं उन्हें जिस भी तरह से जीत सकूँ; आप वैसा उपाय कीजिये ॥ २५ ॥ नन्दीश्वर बोले — इस प्रकार उन विष्णु ने भी महात्मा दधीच के अवध्यत्व को जानकर तथा भगवान् शिव के अतुलित प्रभाव का स्मरण करके ब्रह्मा की छींक से उत्पन्न क्षुप से कहा — हे राजेन्द्र ! महेश्वर की भक्ति को प्राप्त विप्रों को किसी प्रकार का भय नहीं रहता । हे राजन्! विशेषरूप से रुद्र के भक्त सर्वदा भय से मुक्त रहते हैं, चाहे वे परम नीच ही क्यों न हों; फिर इन दधीचमुनि की तो बात ही क्या ? ॥ २६–२८ ॥ महाभाग ! हे भूपते ! अतः अब आपके विजय की आशा नहीं है। देवताओं सहित अपने को शापित होने के लिये मैं अब विप्र दधीच को क्रोधित करूँगा ॥ २९ ॥ हे राजेन्द्र ! उनके शाप से दक्ष के यज्ञ में सभी देवताओं सहित मेरा विनाश होगा और पुनः उत्थान होगा ॥ ३० ॥ हे भूपते ! हे राजेन्द्र ! समस्त देवताओं सहित मैं विप्रेन्द्र दधीचमुनि से आपकी विजय के लिये पूरे मन से प्रयास करूँगा ॥ ३१ ॥ नन्दीश्वर बोले — भगवान् विष्णु का यह वचन सुनकर क्षुपने उनसे कहा — आप वैसा ही कीजिये । इधर भक्तवत्सल भगवान् विष्णु ब्राह्मण का रूप धारणकर दधीचमुनि के आश्रम पहुँचे । जगद्गुरु विष्णु ने ब्रह्मर्षि दधीच को प्रणामकर उनसे कहा ॥ ३२-३३ ॥ श्रीभगवान् बोले — हे शिवाराधन में तत्पर निर्विकार ब्रह्मर्षि दधीच! मैं आपसे एक वर की याचना करता हूँ । आप मुझे वह वर देने की कृपा कीजिये ॥ ३४ ॥ दधीच ने देवदेव विष्णु के इस प्रकार प्रार्थना करने पर कहा — मैं आपके सभी भावों तथा मनोरथों को समझ गया हूँ । मुझे आपसे भी कोई भय नहीं है ॥ ३५ ॥ हे जनार्दन ! आप यहाँ ब्राह्मण का रूप धारणकर आये हुए हैं। हे देवेश! हे जनार्दन ! भगवान् शिव की कृपा से मैं भूत, भविष्य तथा वर्तमान सब कुछ जानता हूँ! आप यह विप्ररूप छोड़ दीजिये। हे देवेश ! हे मधुसूदन ! क्षुप ने अपनी कार्य सिद्धि के लिये आपकी आराधना की है ॥ ३६-३७ ॥ हे भगवन्! हे हरे! आपकी यह भक्तवत्सलता मुझे पूर्ण रूप से विदित है । हे भगवन्! हे हरे ! आज यहाँ भी आपकी वही भक्तवत्सलता विद्यमान है ॥ ३८ ॥ हे भगवन्! हे वरदाता ! हे कमलनयन ! यदि आपका ऐसा भक्तवात्सल्य है तो आप सोच-समझकर यह बताइये कि मुझ शिवाराधन तत्पर व्यक्ति को आपसे क्या भय हो सकता है ? ॥ ३९ ॥ हे जनार्दन ! मैं मिथ्या भाषण नहीं करता; इसीलिये इस जगत् में देवता, दैत्य तथा ब्राह्मण किसी से भी मैं भयभीत नहीं रहता हूँ ॥ ४० ॥ नन्दी कहते हैं — [ हे सनत्कुमार!] दधीच का वह वचन सुनकर उसी क्षण ब्राह्मणरूप छोड़कर विष्णु ने अपना रूप धारण कर लिया और हँसकर दधीच से कहा ॥ ४१ ॥ श्रीभगवान् बोले — हे सुव्रत! हे दधीच ! क्योंकि आप सर्वज्ञ हैं तथा शिवार्चनमें रत रहनेवाले हैं, इसलिये आपको सभी स्थानोंपर किसी भी प्रकारका भय व्याप्त नहीं कर सकता ॥ ४२ ॥ हे विप्रवर! आपको नमस्कार है । मेरा आग्रह है कि आप एक बार सभा में क्षुप से बोल दीजिये कि ‘मैं आपसे डरता हूँ’ ॥ ४३ ॥ इस प्रकार विष्णु भगवान् का वह विनय तथा प्रीतियुक्त वचन सुनकर महामुनि दधीच ने देवों में श्रेष्ठ उन विष्णु से कहा — मैं साक्षात् पिनाकधारी सर्वज्ञ शर्व देवदेव महादेव शिव के अनुग्रह से किसी से भी नहीं डरता ॥ ४४-४५ ॥ तत्पश्चात् उन मुनि दधीच का वचन सुनकर भगवान् विष्णु क्रोधित हो उठे और उन्होंने मुनिश्रेष्ठ दधीच को दग्ध करने की इच्छा से अपना चक्र उठाया ॥ ४६ ॥ क्षुप के सामने ही मुनि दधीच के प्रभाव से विष्णु का सुदर्शन चक्र कुण्ठित हो गया ॥ ४७ ॥ कुण्ठित अग्रभाग वाले सुदर्शन चक्र को देखकर वे दधीच मुसकराकर सत-असत् के अवभासक चक्रधारी [ विष्णु ] – से कहने लगे ॥ ४८ ॥ हे भगवन्! हे विष्णो! पूर्वकाल में आपको भी अत्यन्त प्रयत्नपूर्वक शिवकृपा से ही यह अति भयावह सुदर्शन नामक शुभ चक्र प्राप्त हुआ है । अतः यह चक्र मुझ शिवभक्त को नहीं मार सकता। अब आप ब्रह्मास्त्र आदि अन्य अस्त्रों से मुझे मारने का प्रयास कीजिये ॥ ४९-५० ॥ नन्दीश्वर बोले — [हे सनत्कुमार!] दधीच का वह वचन सुनकर तथा अपने अस्त्र को निस्तेज देखकर विष्णुजी ने समस्त प्रकार के अस्त्र उत्पन्न किये और वे चारों ओर से उनके ऊपर प्रहार करने लगे ॥ ५१ ॥ महान् बलशाली शाश्वत देवता लोग भी उस एकमात्र ब्राह्मण से युद्ध करने में प्रवृत्त उन विष्णु की सहायता करने में तत्पर हो गये ॥ ५२ ॥ तब वज्रतुल्य हड्डियों वाले इन्द्रियजित् दधीच ने एक मुट्ठी कुश लेकर भगवान् शिव का स्मरण करते हुए सभी देवताओं के ऊपर फेंक दिया ॥ ५३ ॥ वह कुश कालाग्नि के तेज के समान दिव्य त्रिशूल बन गया। उस समय दूसरी प्रलयाग्नि के तुल्य प्रतीत होने वाले दधीच ने सभी देवताओं को भस्म कर देने का निश्चय कर लिया ॥ ५४ ॥ हेमुने ! इन्द्र तथा विष्णु आदि देवताओं ने जो-जो अस्त्र दधीच के ऊपर छोड़े थे, वे सब उस त्रिशूल को प्रणाम करने लगे ॥ ५५ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ ! यह देखकर सभी देवता पराक्रमशून्य हो गये तथा व्याकुल होकर पलायन करने लगे। तब पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु ने अपने शरीर से अपने ही तुल्य करोड़ों दिव्य गण उत्पन्न किये। मुनिवर दधीच ने क्षण- भर में उन सभी को भस्मसात् कर दिया ॥ ५६-५७ ॥ तदनन्तर दधीच को विस्मित करने के निमित्त भगवान् विष्णु ने विश्वरूप धारण किया । विप्रेन्द्र दधीच ने उन विष्णु के शरीर में साक्षात् देवताओं के पृथक्-पृथक् गणों को देखा । उस समय विश्वमूर्ति विष्णु के शरीर में करोड़ों रुद्र, करोड़ों रुद्रगण तथा करोड़ों ब्रह्माण्ड विद्यमान थे ॥ ५८-५९१/२ ॥ तब च्यवन-पुत्र महामुनि दधीच वह सब कुछ देखकर विस्मित हो गये और वे विश्वरूप धारण किये हुए उन जगत्पति, लोकव्याप्त, ऐश्वर्यसम्पन्न विष्णु के ऊपर जल का छींटा मारकर उनसे कहने लगे — ॥ ६०-६१ ॥ हे महाबाहो ! माया का परित्याग कीजिये। हे माधव ! पदार्थों की भ्रमात्मक सत्ता पर विचार करने से प्रतीत होता है कि इस माया के हजारों प्रकार के दुर्विज्ञेय क्रिया-कलाप हुआ करते हैं ॥ ६२ ॥ हे अनिन्द्य ! अब आप अपने सहित ब्रह्मा, रुद्र तथा सम्पूर्ण जगत् को मुझमें देखिये । इसके लिये मैं आपको दिव्य दृष्टि प्रदान करता हूँ ॥ ६३ ॥ ऐसा कहकर मुनि दधीच ने अपने शरीर में उन्हें सम्पूर्ण जगत् दिखा दिया और फिर सभी देवताओं तथा विश्व के रचयिता भगवान् विष्णु से उन्होंने कहा ॥ ६४ ॥ हे प्रभो! हे विष्णो! इस माया से अथवा मन्त्रशक्ति से अथवा पदार्थशक्ति से अथवा ध्यानशक्ति से क्या लाभ? अतएव इस माया को छोड़कर आप मेरे साथ यत्नपूर्वक युद्ध कीजिये ॥ ६५१/२ ॥ उन दधीच का यह वचन सुनकर तथा उनका अद्भुत प्रभाव देखकर देवगण व्याकुल होकर पुन: भागने लगे। तदनन्तर जगद्गुरु ब्रह्माजी ने उन निश्चेष्ट भगवान् विष्णु को युद्ध करने से रोका ॥ ६६-६७ ॥ इसके बाद उन ब्रह्माजी का वचन सुनकर दधीच से पराजित हुए भगवान् विष्णु उन महामुनि को प्रणाम करके अपने लोक को चले गये ॥ ६८ ॥ इधर अत्यन्त दुःखित तथा व्याकुलचित्त राजा क्षुप मुनीश्वर दधीची विधिवत् पूजा करके उन्हें बार-बार प्रणाम करते हुए उनसे प्रार्थना करने लगे ॥ ६९ ॥ हे दधीच! हे देव ! मेरे द्वारा अज्ञानवश किये गये अपराध को आप क्षमा करें। हे सखे! आप- सदृश रुद्रभक्त का विष्णु तथा अन्य देवता भला क्या कर सकते हैं ? ॥ ७० ॥ द्विज ! आप प्रसन्न हो जाइये । हे भक्तों में श्रेष्ठ ! मुझ सदृश दुर्जन तथा अधम क्षत्रियों के लिये परमेश्वर महादेव की भक्ति अत्यन्त दुर्लभ है ॥ ७१ ॥ तपस्वियों में श्रेष्ठ मुनीश्वर दधीच ने राजा क्षुप की वाणी सुनकर उसके ऊपर अनुग्रह कर दिया तथा श्रेष्ठ देवताओं को शाप दे दिया कि विष्णुदेव, इन्द्र एवं मुनीश्वरोंसहित सभी देवता महान् आत्मा वाले दक्षप्रजापति के पवित्र यज्ञ में रुद्र की कोपाग्नि में दग्ध हो जायँ ॥ ७२-७३१/२ ॥ इस प्रकार देवताओं को शाप देकर द्विजश्रेष्ठ दधीच ने क्षुप की ओर देखते हुए कहा — हे राजेन्द्र! ब्राह्मण सभी देवताओं, राजाओं तथा विविध गणों के पूज्य हैं। अतः नृपश्रेष्ठ ! ब्राह्मण ही सबसे अधिक बलशाली एवं परम ऐश्वर्य से सम्पन्न होते हैं ॥ ७४-७५ ॥ ऐसा कहकर महातेजस्वी मुनि दधीच अपनी कुटी में चले गये तथा राजा क्षुप दधीच को प्रणामकर अपने घर को प्रस्थित हुए ॥ ७६ ॥ वह युद्धस्थान एक तीर्थ बन गया, जो स्थानेश्वर नाम से जाना जाता है । स्थानेश्वर तीर्थ का सेवन करने से मनुष्य शिव- सायुज्य प्राप्त कर लेता है ॥ ७७ ॥ [ नन्दीश्वर बोले — ] हे महामुने सनत्कुमार! यह मैंने आपसे संक्षेप में क्षुप- दधीच के विवाद और दधीच तथा भगवान् शिव के प्रभाव का वर्णन किया है ॥ ७८ ॥ जो मनुष्य क्षुप तथा दधीच के इस दिव्य विवाद का पठन करता है, वह अपमृत्यु को जीतकर देह का अन्त होने के अनन्तर ब्रह्मलोक को प्रस्थान करता है ॥ ७९ ॥ जो कोई भी इसका पाठ करके युद्ध-स्थल में प्रवेश करता है, उसे मृत्यु से किसी प्रकार का भय नहीं रहता है और वह संग्राम में सदा विजेता सिद्ध होता है ॥ ८० ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘क्षुप-दधीच-संवाद’ नामक छत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३६ ॥ Content is available only for registered users. 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