January 18, 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -037 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ सैंतीसवाँ अध्याय नन्दी के जन्म का वृत्तान्त, ब्रह्मा तथा विष्णु का परस्पर संवाद और शिव द्वारा दोनों पर अनुग्रह करना श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सप्तत्रिंशोऽध्यायः ब्रह्मणो वरप्रदानं सनत्कुमार बोले — [ हे नन्दीश्वर ! ] आपको पार्वतीपति महादेव का सान्निध्य कैसे प्राप्त हुआ ? हे प्रभो ! मैं इससे सम्बन्धित सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनना चाहता हूँ; आप उसे बतायें ॥ १ ॥ नन्दी कहते हैं — हे महामुने ! मेरे पिता शिलाद को एक बार संतान की कामना उत्पन्न हुई और उन्होंने अन्धे होने पर भी दीर्घकाल तक कठोर तपस्या की ॥ २ ॥ तपस्या में रत उन मेरे पिता के तप से प्रसन्न होकर वज्रधारी इन्द्र ने शिलाद से कहा — मैं तुम पर अति प्रसन्न हूँ; अतएव वर माँगो ॥ ३ ॥ तब देवताओं समेत सहस्रनेत्र देवेन्द्र को प्रणाम करके मुनिश्रेष्ठ शिलाद ने दोनों हाथ जोड़कर उनसे कहा ॥ ४ ॥ शिलाद बोले — हे भगवन्! हे असुर-दलन ! हे सहस्रनयन ! हे वरप्रद! हे सुव्रत ! मैं अयोनिज तथा अमर पुत्र चाहता हूँ ॥ ५ ॥ इन्द्र बोले — हे विप्रवर! मैं तुम्हें योनिज तथा मरणधर्मा पुत्र का वर दे सकता हूँ; क्योंकि मरणहीन तो कोई भी नहीं है ॥ ६ ॥ हे महामुने! अयोनिज तथा मृत्यु से हीन पुत्र तो तुम्हें भगवान् ब्रह्मा भी नहीं दे सकते; अन्य लोगों की तो बात ही क्या ? ॥ ७ ॥ साक्षात् वे परमेश्वर ब्रह्मदेव भी मृत्युहीन नहीं हैं। महान् तेजस्वी ब्रह्मा भी योनिज है; क्योंकि उनकी भी उत्पत्ति अण्ड तथा कमल से हुई है। वे प्रभु ब्रह्मा महेश्वर एवं भवानी के पुत्र हैं। उनकी भी आयु दो परार्ध के बराबर कही गयी है। प्रथम परार्ध में हजारों करोड़ कल्प भी ब्रह्मा के दिन के रूप में व्यतीत हो चुके हैं और द्वितीय परार्ध में उतने ही कल्प शेष हैं ॥ ८-१० ॥ अतएव हे विप्रेन्द्र! अयोनिज तथा मृत्युहीन पुत्र की आशा प्रयत्नपूर्वक छोड़ दीजिये और अपने तुल्य पुत्र ग्रहण कीजिये ॥ ११ ॥ नन्दीश्वर बोले — उनका वह वचन सुनकर शिलाद नाम से लोक-विख्यात मेरे पुण्यात्मा पिता ने शचीपति इन्द्र से पुन: कहा ॥ १२ ॥ शिलाद बोले — हे भगवन्! हे महेन्द्र ! मैंने पूर्वकाल में इन ब्रह्मा के पूर्वोत्पन्न नारद नामक पुत्र द्वारा ऐसा कहते हुए सुन रखा है कि ये ब्रह्मा अण्ड, कमल और शिवजी के अंग से उत्पन्न हैं; तो हे महाबाहो ! मुझे आप शीघ्र बताइये कि ऐसा कैसे है ? दक्षप्रजापति तो पद्मयोनि ब्रह्माजी के पुत्र हैं। इस प्रकार दक्ष की पुत्री हिरण्यगर्भ ब्रह्मा की पौत्री हुईं; तो फिर वे प्रभु ब्रह्मा उन दाक्षायणी के पुत्र कैसे हुए? ॥ १३-१५ ॥ इन्द्र बोले — हे विप्र ! इस स्थिति में आपका संदेह करना युक्तिपूर्ण है; किंतु मैं आपको इसका कारण बता रहा हूँ। तत्पुरुष नामक कल्प में परमेष्ठी शिव की सृष्टि करने की इच्छा हुई और उन परमेश्वर ने ध्यान करके कलायुक्त ब्रह्माजी को उत्पन्न किया । जनार्दन जगत्पति नारायण विष्णु भगवान् मेघवाहन कल्प में हजार दिव्य वर्षों तक मेघ बनकर अत्यन्त सम्मान तथा आदर के साथ महादेव शिव के वाहन बने रहे ॥ १६–१८ ॥ महादेव शिव ने अपने में भगवान् विष्णु की भक्ति देखकर उन्हें ब्रह्माजी सहित सम्पूर्ण जगत् रचने की आज्ञा दी ॥ १९ ॥ तभी से उस कल्प को ‘मेघवाहन’ नाम से कहा जाता है। उन विष्णु को देखकर उन्हीं के देह से उत्पन्न जनार्दनपुत्र हिरण्यगर्भ ब्रह्मा ने अपनी तपस्या से शंकरजी को प्राप्तकर उनसे कहा— ॥ २०१/२ ॥ विष्णु आपके वाम अंग से उत्पन्न हैं तथा मैं आपके दायें अंग से उत्पन्न हूँ; फिर भी उन विष्णु ने मेरे साथ सम्पूर्ण जगत् की रचना की ॥ २११/२ ॥ यद्यपि जगन्मय विष्णु ने मेघ बनकर आप देवदेव जगद्गुरु महेश्वर का दिन-रात वहन किया है; फिर भी हे विभो ! हे शंकर! मैं उन नारायण से भी बढ़कर आपका भक्त हूँ । अतएव हे प्रभो ! मेरे ऊपर प्रसन्न होइये और मुझे अपना सर्वात्मत्व प्रदान कीजिये ॥ २२-२३१/२ ॥ तत्पश्चात् महादेवजी से सर्वात्मत्व की प्राप्ति करके ब्रह्माजी ने शीघ्रतापूर्वक क्षीरसागर पहुँचकर वहाँ एकार्णव में पुरुषोत्तम विष्णु को भीषण अन्धकार में मानसनिर्मित, स्वर्णरत्न- खचित, दुर्जनों द्वारा दुष्प्राप्य तथा सनक आदि पुण्यात्माओं द्वारा अगोचर शुभ्र एवं दिव्य भवन में देखा ॥ २४–२६ ॥ ब्रह्माजी ने जगत् को अपने हृदय में धारण करने वाले, सभी आभूषणों से युक्त, चन्द्र – मण्डलतुल्य आभा वाले, चारों भुजाओं में शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण करने वाले, अपने वक्षःस्थल पर ‘ श्री ‘ चिह्न धारण करने वाले, तमोगुण से युक्त होने पर कालरूप, रजोगुण से युक्त होने पर सभी लोकों की सृजन-लीला के प्रवर्तक, सत्त्वगुण से युक्त होने पर सभी प्राणियों के स्थापक, कमलनयन, प्रसन्नमुख, जनार्दन, परमपुरुष, परमात्मा, ईशान, सर्वात्मा, महात्मा, देवरूप ईश्वर विष्णु को उस अमृतमय क्षीरसागर में अनन्त शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में सोये हुए देखा; उस समय उनके रक्त-कमल-सदृश चरणों को लक्ष्मीजी अपने अरविन्द-तुल्य कोमल हाथों से दबा रही थीं ॥ २७-३११/२ ॥ भगवान् जनार्दन को देखकर ब्रह्माजी ने उनसे कहा कि जिस प्रकार पहले आपने मुझे ग्रस लिया था, उसी प्रकार शिवजी की कृपा से अब मैं आपको ग्रसूँगा ॥ ३२१/२ ॥ भगवान् विष्णु ने उठकर विस्मयपूर्ण भाव से ऊपर दृष्टि करके ब्रह्माजी को देखा और उन महाबाहु ने थोड़ा हँसकर ब्रह्माजी के भीतर प्रवेश किया। उन महात्मा ब्रह्मा ने भी उन्हें ग्रस लिया ॥ ३३-३४ ॥ तत्पश्चात् ब्रह्माजी ने अपने भ्रूमध्य से उन विष्णुजी को पुन: उत्पन्न कर दिया और इस प्रकार उनके द्वारा सृजित होकर भगवान् विष्णु उन्हें देखकर उनके पास खड़े हो गये ॥ ३५ ॥ इसी बीच पूर्वकाल में उन दोनों [ब्रह्मा, विष्णु]- को वर देने वाले सभी देवताओं तथा जगत् की उत्पत्ति करने वाले विश्वात्मा प्रभु परमेश्वर शिव विकृत रूप धारण करके ब्रह्मा एवं विष्णु पर महान् अनुग्रह करने के लिये जहाँ विष्णुजी थे, वहीं पर आ गये ॥ ३६-३७ ॥ इसके बाद उन दोनों देवों ने शिवजी के पास पहुँचकर कालाग्नितुल्य उन सभी देवताओं तथा जगत् की उत्पत्ति करने वाले महादेव का दर्शन किया ॥ ३८ ॥ उन दोनों (ब्रह्मा, विष्णु) – ने दूर से ही सम्मानपूर्वक उन शर्व (भक्तों के पापों का नाश करने वाले), कपर्दी (जटाजूटधारी), उग्र तथा वर देने वाले शिवजी को प्रणाम किया और पुनः वे उनकी स्तुति करने लगे ॥ ३९ ॥ जगत् के स्वामी भगवान् शिव पितामह ब्रह्मदेव तथा जनार्दन विष्णु पर अनुग्रह करके वहीं पर अन्तर्धान हो गये ॥ ४० ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘ब्रह्मा को वरप्रदान’ नामक सैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३७ ॥ Content is available only for registered users. 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