January 18, 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -039 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ उनतालीसवाँ अध्याय सत्ययुग, त्रेतायुग तथा द्वापरयुग का वर्णन, द्वापर में वेदसंहिता के विभाजन का एवं कल्पभेद से विविध पुराणों के अनुक्रम का वर्णन श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः चतुर्युगधर्माणां वर्णनं नन्दीश्वर बोले — [हे सनत्कुमार!] इन्द्र का कथन सुनकर मेरे पिता महामुनि शिलाद ने दोनों हाथ जोड़कर देवेश इन्द्र को प्रणाम करके उनसे पुनः पूछा ॥ १ ॥ शिलाद बोले — हे भगवन्! हे शक्र ! हे सर्वज्ञ! हे सर्वदेवनमस्कृत ! हे शचीपते ! हे जगन्नाथ ! हे सहस्राक्ष! हे महेश्वर! भगवान् पद्मयोनिने युगधर्म किस प्रकार कल्पित किये ? आप इस विषय में सब कुछ मुझ शरणागत को बताने की कृपा करें ॥ २-३ ॥ शैलादि बोले — [ हे सनत्कुमार ! ] महात्मा शिलाद का वह वचन सुनकर इन्द्र ने जैसा देखा था, उन युगधर्मो का विस्तार से वर्णन करना प्रारम्भ किया ॥ ४ ॥ इन्द्र बोले — हे मुने! आदि में सत्ययुग, फिर त्रेतायुग, द्वापर तथा कलियुग – ये ही चार युग होते हैं; ऐसा आप संक्षेप में जान लीजिये ॥ ५ ॥ सत्ययुग को सत्त्वगुणरूप, त्रेतायुग को रजोगुणरूप, द्वापरयुग को रज-तमगुणरूप और कलियुग को तमोगुणरूप जानना चाहिये। इस प्रकार विभिन्न युगों में अलग-अलग युग-वृत्ति होती है ॥ ६ ॥ सत्ययुग में ध्यान, त्रेतायुग में यज्ञ, द्वापर में भजन तथा कलियुग में विशुद्ध दान को श्रेष्ठ कहा गया है ॥ ७ ॥ वह सत्ययुग चार हजार दिव्य वर्षों के प्रमाणवाला है। उसकी सन्ध्या चार सौ दिव्य वर्षों की होती है तथा उसका सन्ध्यांश भी उसी प्रकार चार सौ दिव्य वर्षों का होता है ॥ ८ ॥ हे शिलाद! हे सुव्रत! इस सत्ययुग में प्रजाओं की आयु चार हजार मनुष्य वर्ष के बराबर जानिये ॥ ९ ॥ सत्ययुग तथा इसके सन्ध्यांश बीत जाने पर समग्र युग-धर्म का एक चरण घट जाता है। पुन: उत्तम त्रेतायुग प्रवृत्त होता है, जो तीन हजार दिव्य वर्षों का होता है। सत्ययुग आधे प्रमाण के बराबर द्वापर को जानिये तथा उसके (द्वापर के) आधे के बराबर कलियुग का प्रमाण कहा जाता है। हे मुने! उसी तरह त्रेतायुग की सन्ध्या तीन सौ दिव्य वर्ष, द्वापर की सन्ध्या दो सौ दिव्य वर्ष तथा कलियुग की सन्ध्या एक सौ दिव्य वर्ष की होती है । सभी का सन्ध्यांश भी सन्ध्याकाल के समान ही जानना चाहिये। प्रत्येक कल्प में आने वाले युगों में यही स्थिति होती है ॥ १०-१२ ॥ सनातन धर्म आरम्भ के सत्ययुग में चार चरणों वाला, त्रेता में तीन चरणों वाला, द्वापर में दो चरणों वाला तथा कलियुग में मात्र एक चरण वाला होकर अधिष्ठित रहता है ॥ १३१/२ ॥ सत्ययुग में स्त्री-पुरुष के संयोग से उत्पत्ति होती है तथा उनकी वृत्ति मधुर रसों से सम्पन्न होती है। उस युग में समस्त प्रजाएँ सभी प्रकार के आनन्दों एवं भोगों से पूर्ण तृप्त रहती हैं। उनमें अधमता तथा उत्तमता का कोई भेद नहीं रहता है और सभी प्रजाएँ शुभ लक्षणों से सम्पन्न रहती हैं ॥ १४-१५ ॥ उस सत्ययुग में वे प्रजाएँ समान आयु, सुख तथा रूपवाली होती हैं । उनमें परस्पर द्वेष, द्वन्द्व एवं अवसाद नहीं रहता है, अपितु वे एक-दूसरे से प्रेम करती हैं ॥ १६ ॥ सत्ययुग में वे प्रजाएँ घर का आश्रय न लेकर पर्वतों तथा समुद्रों के सान्निध्य में निवास करती हैं। सभी लोग शोकरहित, पराक्रमसम्पन्न एवं एकान्तप्रिय होते हैं ॥ १७ ॥ कृतयुग में वे प्रजाएँ निष्काम कर्मों में प्रवृत्त रहने वाली तथा सदा प्रसन्न मन वाली होती हैं। वे कर्मों के पाप और पुण्य की भावना से रहित होती हैं । उस समय वर्णाश्रम- व्यवस्था रहती है, किंतु वर्णसंकर दोष विद्यमान नहीं रहता है ॥ १८१/२ ॥ हे द्विज ! कालयोग से त्रेतायुग में रसों का प्रादुर्भाव समाप्त होने लगता है । उस युग में सिद्धि के नष्ट हो जाने पर अन्य सिद्धि उत्पन्न होती है ॥ १९१/२ ॥ जल की अल्पता हो जाने पर भगवान् मेघात्मा गर्जनयुक्त मेघों के माध्यम से जल बरसाते हैं और एक बार में ही उस वृष्टि से पृथ्वीतल के संयुक्त हो जाने पर वृक्ष उत्पन्न हो जाते हैं; इस प्रकार वे वृक्ष ही प्रजाओं के गृहरूप बन जाते हैं। उन प्रजाओं की सम्पूर्ण वृत्ति तथा उपभोग उन्हीं वृक्षों पर आश्रित रहता है। इस प्रकार त्रेतायुग के आरम्भ में प्रजाएँ जीवनयापन सम्बन्धी सभी व्यवहार उन्हीं वृक्षों पर आश्रित होकर करती है ॥ २०–२२१/२ ॥ तत्पश्चात् अधिक समय बीतने पर उनके [बुद्धि]-विपर्यय से उन प्रजाओं में अकस्मात् राग तथा लोभ से युक्त भाव उत्पन्न हो जाते हैं ॥ २३१/२ ॥ उन प्रजाओं में उस समय उत्पन्न उस विपर्यय के कारण उनके गृहसंज्ञक सभी वृक्ष नष्ट हो जाते हैं ॥ २४१/२ ॥ तब उन वृक्षों के नष्ट हो जाने पर मैथुन से उत्पन्न वे प्रजाएँ भ्रमित हो जाती हैं। इसके बाद सत्य का चिन्तन करने वाले वे प्रजागण उस सिद्धि का फिर से ध्यान करते हैं ॥ २५१/२ ॥ इस प्रकार ध्यान के फलस्वरूप उनके गृहसंज्ञक वे वृक्ष फिर से उत्पन्न हो जाते हैं। वे वृक्ष प्रजाओं के लिये वस्त्र, भूषण तथा नानाविध फल उत्पन्न करते हैं ॥ २६१/२ ॥ उनके लिये उन वृक्षों के पत्ते-पत्ते में गन्ध-वर्ण- रस से युक्त, शक्तिवर्धक तथा अमाक्षिक (मक्षिकारहित) मधु पैदा होता है ॥ २७१/२ ॥ उसी मधु प्रजाएँ सुखपूर्वक सदा जीवनयापन करती हैं और वे उसी सिद्धि से सन्तापरहित होकर सर्वदा हृष्ट-पुष्ट रहती हैं ॥ २८१/२ ॥ तत्पश्चात् कालान्तर में वे प्रजाएँ पुनः लोभ के वशीभूत होकर बलपूर्वक उन वृक्षों अथवा माक्षिक मधु का हरण करती हैं ॥ २९१/२ ॥ लोभ में पड़कर उनके द्वारा किये गये इस अनाचारपूर्ण कृत्य से मधु के साथ-साथ कहीं-कहीं वे कल्पवृक्ष भी नष्ट हो जाते हैं ॥ ३०१/२ ॥ पुनः उस त्रेता में कालयोग से अवशिष्ट सिद्धियों में आवर्तन हो जानेसे द्वन्द्व उत्पन्न होने लगते हैं ॥ ३११/२ ॥ पुनः तीव्र शीत, वर्षा तथा आतप से प्रजाएँ अत्यन्त दु:खित हो जाती हैं और इन द्वन्द्वों से पीड़ित प्रजाएँ अपने आवरण का उपाय करने लगती हैं ॥ ३२१/२ ॥ द्वन्द्वों से निरन्तर प्रतिहत प्रजाएँ पर्वतों पर घर बनाने लगती हैं। इसलिये पूर्व में स्वेच्छाचारितापूर्ण वे प्रजाएँ, जो बिना घर के रहती थीं, पुनः अपने अनुकूल तथा सुविधाजनक घरों में रहने लगती हैं ॥ ३३-३४ ॥ मधु के साथ उन कल्पवृक्षों के भी नष्ट हो जाने पर पुनः उन द्वन्द्वों के प्रति उपघात करती हुई वे प्रजाएँ जीविकोपार्जन का उपाय सोचने लगती हैं ॥ ३५ ॥ वे प्रजाएँ पुनः जब विवाद से व्याकुल तथा भूख एवं प्यास से पीड़ित हो जाती हैं, तब त्रेतायुग में उनमें सिद्धि का प्रादुर्भाव पुनः होता है ॥ ३६ ॥ उनके लिये कृषि-कार्य को पूर्णतः सिद्ध करने वाली दूसरी अन्य वृष्टि होती है । वृष्टिजनित वे जल आदि नदियों के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं ॥ ३७ ॥ सतत वृष्टि होने से नदियाँ तथा जल के अन्य उद्गमस्थान हो गये। इस प्रकार दूसरे वृष्टि-सर्जन में नदियों का प्रादुर्भाव हो गया ॥ ३८ ॥ इस प्रकार पृथ्वीतल पर जो जल-बिन्दु गिरे; उन जलों तथा भूमि के संयोग से अल्प-कृष्ट एवं बिना बोये चौदह प्रकार की वन्य तथा ग्राम्य ( वन एवं ग्रामीण क्षेत्रों में उगने वाली) औषधियाँ उत्पन्न हो गयीं । ऋतुसम्बन्धी विभिन्न पुष्प, फल, वृक्ष एवं पौधे उग गये । इस प्रकार ये विभिन्न जाति के वृक्ष तथा औषध उत्पन्न हो गये और उस त्रेतायुग में प्रजाएँ उन्हीं औषधियों से ही अपना जीवन-निर्वाह करने लगीं ॥ ३९-४१ ॥ इसके बाद उन प्रजाओं में हर प्रकार से राग तथा लोभ का उदय हुआ और त्रेतायुग के प्रभाव से होने वाली अवश्यम्भाविता के कारण वे प्रजाएँ नदीक्षेत्रों तथा पर्वतों का अतिक्रमण करने लगीं और वृक्ष, गुल्मों एवं औषधियों का बलपूर्वक पुनः हरण करने लगीं। उनके इस विपरीत आचरण से चौदहों प्रकार की औषधियाँ विनष्ट हो गयीं ॥ ४२-४३१/२ ॥ अब वे औषधियाँ पृथ्वी में समा गयीं – ऐसा मानकर भगवान् विष्णु ने राजा पृथु के रूप में होकर सभी प्राणियों के कल्याणार्थ पृथ्वीरूप गाय का दोहन किया । उसी समय से हलके फाल से जुती हुई भूमि में यहाँ-वहाँ औषधियाँ उत्पन्न होने लगीं ॥ ४४-४५ ॥ इस तरह अब जीने की इच्छा रखने वाली प्रजाएँ प्रयत्नपूर्वक कृषि कार्य करने लग गयीं । कृषि में प्रयत्नपूर्वक इच्छा रखने के कारण इसे ‘वार्तावृत्ति’ कहा गया ॥ ४६ ॥ त्रेतायुग के उस अन्तिम काल में इस कृषि को छोड़कर आजीविका का कोई अन्य उपाय नहीं था। उस समय [खनित्र आदि के उपयोग बिना ही] हाथ से ही खोदकर पर्याप्त जल प्राप्त हो जाता था ॥ ४७ ॥ उस समय सभी लोग युग-प्रभाव के कारण क्रोध के वशीभूत होकर बलपूर्वक एक-दूसरे के पुत्र, स्त्री, धन आदि का हरण कर लेते थे ॥ ४८ ॥ वह सम्पूर्ण स्थिति देखकर मर्यादा की प्रतिष्ठा करने के लिये तथा दुःख से रक्षा करने के लिये भगवान् कमलयोनि ने क्षत्रियों की उत्पत्ति की ॥ ४९ ॥ विश्वात्मा भगवान् ने अपने तेज से वर्णाश्रम व्यवस्था स्थापित की तथा उन्होंने स्वधर्मानुसार जीविका द्वारा जीवन का निर्माण (परिपालन) स्वयं किया ॥ ५० ॥ इसी प्रकार त्रेतायुग में क्रम से यज्ञ-अनुष्ठान आदि आरम्भ हुआ। सभी की व्रतों में निष्ठा थी तथा कोई भी मनुष्य पशु-यज्ञ नहीं करते थे ॥ ५१ ॥ उस समय व्यापक दृष्टि वाले भगवान् विष्णु ने अपने सामर्थ्य से क्रमपूर्वक यज्ञ सम्पन्न किये। हे मुने! उस समय द्विज लोग हिंसा न करने वाले की प्रशंसा करते थे ॥ ५२ ॥ द्वापर में भी लोगों में मन-वचन-कर्म से बुद्धि- भेद उत्पन्न होते हैं । कष्टपूर्वक कृषिकार्य भी सम्पन्न होते हैं ॥ ५३ ॥ उस समय शारीरिक क्लेशवश सभी लोगों में लोभ, भृति, वाणिज्य कर्मों में विवाद तथा चित्त-कालुष्य के कारण यथार्थ वस्तुओं के प्रति सन्देह उत्पन्न होने लगता है ॥ ५४ ॥ उस समय शाखाओं के रूप में वेदों का विभाग होता है तथा धर्मो के संकर अर्थात् अन्य धर्म की प्रवृत्ति होने लगती है। उस द्वापर में ब्राह्मण आदि वर्णों एवं ब्रह्मचर्य आदि आश्रमों का लगभग विनाश हो जाता है। लोगों में वासना, द्वेष, राग, लोभ तथा मद प्रवृत्त हो जाते हैं । द्वापर आदि कालों में व्यासों के द्वारा एक वेद चार भागों में विभक्त किया जाता है। ऋक् आदि चार पादों से युक्त एक वेद संहिता का इस भूलोक में त्रेता आदि कालों में अध्ययन किया जाता है; वही वेद द्वापर आदि कालों में आयुसंक्षय के कारण विभाजित कर दिया जाता है ॥ ५५-५७ ॥ इसके आगे ऋषिपुत्रों के द्वारा अपनी दृष्टि से विभाजन पुनः किया जाता है। दृष्टिविभ्रम (अलग-अलग विचार रखने वाले) मनीषियों ने समानरूप से विभाजित की गयी ऋक्, यजुः तथा साम नामक संहिताओं को स्वर – वर्णों के भेद मन्त्र और ब्राह्मणभाग के स्वरूप में पुनः अलग-अलग विभाजित किया ॥ ५८-५९ ॥ इस प्रकार मनीषियों ने ब्राह्मणभाग, कल्पसूत्र तथा मीमांसा – न्याय के सूत्रों की रचना की। कुछ मनीषी इतने विभाजन को पर्याप्त मानकर इसी पर स्थिरमति हो गये, किंतु अन्य मनीषी इस विभाजन को न्यून मानकर इसके विस्तार में प्रवृत्त हुए ॥ ६० ॥ अनेक कल्पों के भेद से इतिहास, पुराण आदि के भी विशिष्ट भेद होते हैं। ब्रह्मपुराण, पद्मपुराण, विष्णुपुराण, शिवपुराण, भागवतपुराण, भविष्यपुराण, नारदपुराण, मार्कण्डेयपुराण, अग्निपुराण, ब्रह्मवैवर्तपुराण, लिङ्गपुराण, वाराहपुराण, वामनपुराण, कूर्मपुराण, मत्स्यपुराण, गरुड़पुराण, स्कन्दपुराण तथा ब्रह्माण्डपुराण — ये उन पुराणों के भेद कहे जाते हैं। इनमें ग्यारहवाँ पवित्र लिङ्गपुराण द्वापर में विभक्त किया गया है ॥ ६१–६३१/२ ॥ मनु, अत्रि, विष्णु, हारीत, याज्ञवल्क्य, उशना, अंगिरा, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, पराशर, व्यास, शंख, लिखित, दक्ष, गौतम, शातातप तथा वसिष्ठ आदि बहुत-से मुनि धर्मशास्त्रों का विस्तार करने वाले हैं ॥ ६४-६५१/२ ॥ अवृष्टि, अकालमरण, रोग, विघ्न एवं मन- वचन – कर्मजनित दुःखों से निर्वेद उत्पन्न होता है । निर्वेद से उन प्रजाओं के मन में दुःखों से छूटने का विचार पैदा होता है। उस विचार से वैराग्य तथा वैराग्य से सांसारिक क्रियाकलापों में दोष दिखायी देने लगते हैं। और उन दोषों के दर्शन से द्वापर में ज्ञान उत्पन्न हो जाता है ॥ ६६–६८ ॥ द्वापर में रजोगुण तथा तमोगुण से युक्त इस प्रकार की वृत्ति कही गयी है। आदि सत्ययुग में एकमात्र धर्म ही सर्वत्र रहता है, वह त्रेता में प्रेरणा से प्रवृत्त होता है वह धर्म द्वापर में व्याकुल होकर स्थित रहता है तथा फिर कलियुग में नष्ट हो जाता है ॥ ६९-७० ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘चतुर्युगधर्मवर्णन’ नामक उनतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३९ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe