श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -042
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
बयालीसवाँ अध्याय
शिलाद द्वारा तप करने से भगवान् महेश्वर का नन्दी नाम से उनके पुत्र के रूप में प्रकट होना और शिलाद द्वारा नन्दिकेश्वर शिव की स्तुति
श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे द्विचत्वारिंशोऽध्यायः
नन्दिकेश्वरोत्पत्ति

सूतजी बोले —  वर प्रदान करने वाले पुण्यशाली सहस्रनेत्र इन्द्र के चले जाने पर वे शिलाद महादेव शिव की आराधना करते हुए तप के द्वारा उन्हें सन्तुष्ट करने लगे ॥ १ ॥ इस प्रकार निरन्तर तपस्या में संलग्न उन द्विज शिलाद के एक हजार दिव्य वर्ष एक क्षण की भाँति अद्भुतरूप से व्यतीत हो गये ॥ २ ॥ उनका शरीर वल्मीक (बाँबी)-से ढँक गया, वे मुनि वज्रसूची (वज्र तथा सूई के समान) मुखवाले तथा अन्य रक्तभोजी कीटों से लिपटे शरीर वाले परिलक्षित हो रहे थे, वे मांस- रुधिर – त्वचा से विहीन होकर अस्थिमात्र शरीर वाले हो गये थे; फिर भी वे निर्लिप्त भाव से भित्ति की भाँति निश्चल खड़े थे। तब उन्हें [इस रूप में तप करते हुए] भगवान् शंकर ने जान लिया। [वहाँ प्रकट होकर ] कामरिपु शिव ने ज्यों ही अपने हाथ से मुनि का स्पर्श किया, त्यों ही मुनिश्रेष्ठ द्विज शिलाद का [ तपस्याजनित ] क्लेश समाप्त हो गया ॥ ३-५ ॥

तदनन्तर तपस्यारत उन मुनि के तप से सन्तुष्ट होकर भगवान् शंकर ने उनसे कहा — मैं अपने गणों तथा उमासहित आप पर प्रसन्न हूँ । हे महामते ! इस तपस्या से आपका क्या प्रयोजन! मैं आपको सर्वज्ञ तथा समस्त शास्त्रों के रहस्यों का पारगामी विद्वान् पुत्र प्रदान करता  हूँ ॥ ६-७ ॥ तब देवेश शिव को प्रणाम करके और उनकी स्तुति करके शिलादमुनि हर्षपूर्ण गद्गद वाणी में चन्द्रभूषण शिव से कहने लगे ॥ ८ ॥

शिलाद बोले — हे भगवन्! हे देवदेवेश ! हे त्रिपुरार्दन! हे शंकर! हे सत्तम! मैं अयोनिज तथा मृत्युहीन पुत्र चाहता हूँ ॥ ९ ॥

सूतजी बोले — पूर्व में ब्रह्माजी के द्वारा तपस्या से आराधित परमेश्वर रुद्र ने परम प्रसन्नता के साथ मुनि शिलाद से कहा ॥ १० ॥

श्रीदेवदेव शिव बोले —  हे विप्र ! हे तपोधन ! मुनियों तथा श्रेष्ठ देवताओं सहित ब्रह्माजी ने अवतार ग्रहण करने के लिये पूर्वकाल में तपस्या के द्वारा मेरी आराधना की थी । अतः मैं नन्दी नाम से तुम्हारे अयोनिज जन्म लूँगा । हे मुने! आप मुझ जगत् पिता के पुत्र के रूप में भी पिता होंगे ॥ ११-१२ ॥ ऐसा कहकर सम्मुख स्थित मुनि की ओर प्रेमपूर्वक देखकर उन्हें प्रणाम करके अमृततुल्य भगवान् शिव उमा सहित वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ १३ ॥ हे महामुने ! भगवान् रुद्र से पुत्रप्राप्ति का वरदान पाकर यज्ञविदों में श्रेष्ठ मेरे पिताजी यज्ञ करने के लिये प्रसन्नतापूर्वक विशाल यज्ञशाला में पहुँचे; तब मैं पूर्व ही भगवान् रुद्र की आज्ञा से उनके पुत्र के रूप में उस अंगण में प्रादुर्भूत हो गया, उस समय मैं प्रलयाग्नि के समान प्रभा से समन्वित था ॥ १४-१५ ॥

उस समय शिलादमुनि के पुत्ररूप में मेरे आविर्भूत होने पर पुष्कर, आवर्तक आदि मेघ बरसने लगे; किन्नर, सिद्ध, साध्य आदि गगनचारी देवतागण गान करने लगे और इन्द्र पुष्पराशिमिश्रित वृष्टि करने लगे ॥ १६ ॥ उस समय कालसूर्य के समान आभा वाले, जटा- मुकुट धारण किये, तीन नेत्रों से युक्त, चार भुजाओं वाले, हाथों में शूल- टंक- गदा धारण करने वाले, वज्र लिये हुए, हीरे के सदृश उज्ज्वल दाँतों वाले, इन्द्र के द्वारा आराधित, कानों में हीरे का कुण्डल धारण किये हुए, घोर विग्रह वाले तथा मेघसदृश गम्भीर ध्वनि से सम्पन्न मुझ बाल- शिशु को देखकर ब्रह्मा आदि, इन्द्र तथा सभी मुनीश्वर स्तुति करने लगे और सभी अप्सराएँ चारों ओर से वाद्ययन्त्र बजाने लगीं तथा नृत्य करने लगीं ॥ १७- १९ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद के माहेश्वर मन्त्रों के द्वारा आनन्दपूर्वक मेरी स्तुति करके ऋषियों ने मुझे प्रणाम किया ॥ २० ॥ ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र, साक्षात् अम्बिका शिवा, देवगुरु बृहस्पति, चन्द्रमा, महातेजस्वी सूर्य, वायु, अग्नि, ईशान, निर्ऋति, यक्ष, यम, वरुण, विश्वेदेव, सभी रुद्र, महाबली वसुगण, साक्षात् लक्ष्मी, इन्द्राणी, देवी ज्येष्ठा, सरस्वती, अदिति, दिति, श्रद्धा, लज्जा, धृति, नन्दा, भद्रा, सुरभी, सुशीला, सुमना, वृषेन्द्र, महातेजस्वी धर्म तथा धर्मपुत्र मुझे घेरकर मेरा आलिङ्गन करके मेरी स्तुति करने लगे। हे मुनिश्रेष्ठ ! उस समय पुण्य आत्मा वाले मेरे पिता मुनि शिलाद भी उस प्रकार के रूपवाले इष्टप्रद पुत्र को देखकर प्रेमपूर्वक प्रणाम करके मेरी स्तुति करने लगे ॥ २१–२५१/२

॥ शिलाद उवाच ॥
भगवन् देवदेवेश त्रियम्बक ममाव्यय ॥ २६ ॥
पुत्रोऽसि जगतां यस्मात्त्राता दुःखाद्धि किं पुनः ।
रक्षको जगतां यस्मात्पिता मे पुत्र सर्वग ॥ २७ ॥
अयोनिज नमस्तुभ्यं जगद्योने पितामह ।
पिता पुत्र महेशान जगतां च जगद्गुरो ॥ २८ ॥
वत्स वत्स महाभाग पाहि मां परमेश्वर ।
त्वयाहं नन्दितो यस्मान्नन्दी नाम्ना सुरेश्वर ॥ २९ ॥
तस्मान्नन्दय मां नन्दिन्नमामि जगदीश्वरम् ।
प्रसीद पितरौ मेऽद्य रुद्रलोकं गतौ विभो ॥ ३० ॥
पितामहश्च भो नन्दिन्नवतीर्णे महेश्वरे ।
ममैव सफलं लोके जन्म वै जगतां प्रभो ॥ ३१ ॥
अवतीर्णे सुते नन्दिन् रक्षार्थं मह्यमीश्वर ।
तुभ्यं नमः सुरेशान नन्दीश्वर नमोऽस्तु ते ॥ ३२ ॥
पुत्र पाहि महाबाहो देवदेव जगद्गुरो ।
पुत्रत्वमेव नन्दीश मत्वा यत्कीर्तितं मया ॥ ३३ ॥
त्वया तत्क्षम्यतां वत्स स्तवस्तव्य सुरासुरैः ।
यः पठेच्छृणुयाद्वापि मम पुत्रप्रभाषितम् ॥ ३४ ॥
श्रावयेद्वा द्विजान् भक्त्या मया सार्धं स मोदते ।

शिलाद बोले —  हे भगवन्! हे देवदेवेश ! हे त्रियम्बक! हे अव्यय ! आप मेरे पुत्र हैं और जगत् के रक्षक हैं, अतः अब मुझे दुःख किस बात का ! हे पुत्र ! हे सर्वग (सर्वव्यापी) ! आप जगत् के रक्षक हैं, अतः मेरे भी पिता हैं। हे अयोनिज! आपको नमस्कार है । हे जगद्योने! हे पितामह! हे पुत्र ! हे महेशान! हे जगद्गुरो ! आप जगत् के पिता हैं। हे वत्स ! हे वत्स ! हे महाभाग ! हे परमेश्वर ! मेरी रक्षा कीजिये। हे सुरेश्वर ! आपने मुझे आनन्दित किया है, अतः आप ‘नन्दी’ नाम से विख्यात होंगे; हे नन्दिन् ! मुझे आनन्द प्रदान कीजिये, मैं आप जगदीश्वर को प्रणाम करता हूँ ॥ २६-२९१/२

हे विभो ! आप प्रसन्न होइये । हे नन्दिन् ! आप महेश्वर के [मेरे यहाँ] अवतीर्ण होने पर आज मेरे माता- पिता रुद्रलोक चले गये; पितामह, प्रपितामह आदि भी रुद्रलोक चले गये । हे जगत्प्रभो ! मेरे रक्षार्थ पुत्र- रूप में आपके अवतार लेने पर आज संसार में मेरा जन्म सफल हो गया। हे सुरेशान! आपको नमस्कार है । हे नन्दीश्वर! आपको नमस्कार है। हे पुत्र ! हे महाबाहो ! हे देवदेव! हे जगद्गुरो! मेरी रक्षा कीजिये। हे नन्दीश! देवताओं तथा दानवों के द्वारा स्तुतियों से स्तवन के योग्य हे वत्स! आपके प्रति पुत्रभाव समझकर मैंने जो भी कहा है, उसे आप क्षमा करें। हे पुत्र ! जो मेरे द्वारा कहे गये इस स्तवन का भक्तिपूर्वक पाठ या श्रवण करता है अथवा द्विजों को इसे सुनाता है, वह मेरे साथ आनन्द प्राप्त करता है ॥ ३०-३४१/२

इस प्रकार बालरूप पुत्र नन्दी की स्तुति करके अत्यन्त आदरपूर्वक उन्हें प्रणामकर उत्तम व्रत धारण करने वाले मुनि शिलाद मुनीश्वरों की ओर देखकर बोले —  हे मुनिगण ! आप सभी लोग मेरे महान् अक्षुण्ण भाग्य को देख लें, जो कि मेरे यज्ञांगण में अविनाशी भगवान् महेश्वर [मेरे पुत्र होकर ] नन्दी के रूप में अवतरित हुए हैं। सम्पूर्ण जगत् में कौन मनुष्य, देवता अथवा दानव मेरे समान है; क्योंकि मेरे हितार्थ ये नन्दी मेरी यज्ञभूमि में प्रादुर्भूत हुए हैं ॥ ३५-३८ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘नन्दिकेश्वरोत्पत्ति’ नामक बयालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४२ ॥

See Also:-  शिवमहापुराण – शतरुद्रसंहिता – अध्याय 06

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