January 19, 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -043 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ तैंतालीसवाँ अध्याय शिलाद द्वारा पुत्र नन्दिकेश्वर को वेदादि की शिक्षा प्रदान करना, ऋषियों द्वारा नन्दिकेश्वर की आयु अल्प बताने पर शिलाद का दुःखी होना तथा नन्दिकेश्वर द्वारा त्र्यम्बकमन्त्र का जप एवं महेश्वर- पार्वती द्वारा उन्हें अपने पुत्ररूप में अमर होने का वरदान देना श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः नन्दिकेश्वरप्रादुर्भावनन्दिकेश्वराभिषेकमन्त्र नन्दिकेश्वर बोले — महेश्वर को प्रणाम करके पिताजी मुझको साथ लेकर प्रसन्नतापूर्वक अपनी कुटी में लौट गये, जैसे निर्धन व्यक्ति निधि पाकर हर्षित हो जाता है, वैसे ही वे उस समय हर्षयुक्त थे ॥ १ ॥ हे महामुने ! जब मैं शिलाद की कुटी में गया, तब अपना दैविक (दिव्य) रूप छोड़कर मैं मनुष्यरूप में हो गया ॥ २ ॥ [ उस समय ] किसी अज्ञात कारणवश मेरी दिव्य स्मृति नष्ट हो गयी। लोकपूजित मेरे पिताजी ने मुझे मानवरूप में देखकर अपने बन्धुओं सहित दुःख से व्याकुल होकर अत्यधिक विलाप किया । पुत्रवत्सल तथा सर्वज्ञ शालंकायनपुत्र शिलाद ने मेरे जातकर्म आदि संस्कार किये ॥ ३-४१/२ ॥ हे महामुने ! उन्होंने ही मुझको ऋग्वेद तथा यजुर्वेद की शाखाओं और सामवेद की हजार शाखाओं का सांगोपांग उपदेश किया। साथ ही उन्होंने मुझे आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्वविद्या, अश्वलक्षण, हाथियों के लक्षण, मनुष्यों के लक्षण आदि की शिक्षा प्रदान की ॥ ५-६१/२ ॥ मेरा सातवाँ वर्ष पूर्ण होने पर परमेश्वर की आज्ञा से मुझे देखने के लिये तप तथा योगशक्ति से सम्पन्न मित्र- वरुण नामक दो दिव्य मुनिश्रेष्ठ उनके (मेरे पिता के) आश्रम में गये ॥ ७-८ ॥ मुझको बार-बार देखकर उन दोनों महात्माओं ने कहा — हे तात! यह नन्दी सभी शास्त्रों के ज्ञान में पारंगत होगा, किंतु यह अल्प आयु वाला है। ऐसा आश्चर्य तो कभी नहीं देखा गया है, इसकी आयु आज से मात्र एक वर्ष की है ॥ ९१/२ ॥ उनके ऐसा कहने पर पुत्र से स्नेह रखने वाले विप्रवर शिलाद मेरा आलिंगन करके दुःख से व्याकुल होकर करुण स्वर में अत्यधिक रुदन करने लगे — हा पुत्र ! हा पुत्र ! हा पुत्र ! अहो, दैवविधि तथा विधाता का ऐसा बल! [यह कहकर] वे दुःखित होकर भूमि पर गिर पड़े ॥ १०-११/२ ॥ तब उनकी दुःखभरी वाणी सुनकर आश्रमवासी इकट्ठे हो गये। वे [इस अशुभ के लिये ] विह्वल होकर मंगल रक्षाकृत्य करने लगे। उन्होंने अन्य सभी सामग्रियों सहित मधुलिप्त दस हजार दूर्वा की त्रियम्बक मन्त्र से आहुति देकर उमापति त्रियम्बक महादेव को सन्तुष्ट किया ॥ १२-१४ ॥ पिताजी संज्ञाशून्य हो गये । पितामह ने भी बहुत विलाप किया, वे भी चेतनारहित हो मृत की भाँति पड़े रहे ॥ १५ ॥ मैं मृत्यु से भयभीत हो गया और साक्षात् मृतक की भाँति [भूमि पर पड़े हुए] अपने पिता तथा पितामह को शीघ्रतापूर्वक सिर झुकाकर प्रणाम करके एवं उनकी प्रदक्षिणा करके रुद्रजप में संलग्न हो गया । त्रिनेत्र, दस भुजाओंवाले, शान्त, पाँच मुखोंवाले, सदाशिव भगवान् त्रियम्बक का अपने हृदयकमल में ध्यान करके मैं जप कर रहा था; [तब मैंने देखा कि] नदी के पुण्यतट पर स्थित हूँ और अर्धचन्द्रमा को आभूषण के रूप में धारण करने वाले महादेव उमासहित प्रसन्न होकर [ प्रकट हुए और] मुझसे कहने लगे — ॥ १६-१८१/२ ॥ हे वत्स! हे नन्दिन्! हे महाबाहो ! तुमको भला मृत्यु से भय कहाँ, मैंने ही उन दोनों विप्रों को भेजा था, तुम मेरे ही समान हो, इसमें सन्देह नहीं है। हे वत्स! वास्तव में तुम्हारा यह देह लौकिक नहीं है, यह दिव्य है। हे वत्स ! पूर्व में शिलाद, देवताओं, मुनियों, सिद्धों, गन्धर्वों तथा श्रेष्ठ दानवों ने तुम्हारे जिस शरीर का दर्शन किया था और जिसका पूजन किया था, वह दिव्य था । हे नन्दिकेश्वर ! संसार का यह स्वभाव है कि सुख- दुःख बार-बार आते रहते हैं। मनुष्यों के लिये स्त्रीभोग का परित्याग ही सर्वथा उचित है — ऐसा विवेकी पुरुष कहते हैं ॥ १९–२२१/२ ॥ मुझसे ऐसा कहकर महान् कष्टों को दूर करने वाले, सभी देवताओं के महेश्वर, भगवान् रुद्र, हर, वृषभध्वज तथा परमेश्वर महादेव ने अपने दोनों अत्यन्त शुभ हाथों से मुझे स्पर्श किया और उनका मन प्रसन्न हो गया। तदनन्तर गणेश्वरों को एवं हिमालयपुत्री पार्वती को भलीभाँति देखकर वे सुरेश्वर महादेव प्रसन्नचित्त होकर मेरी ओर देखकर कहने लगे — ॥ २३-२५ १/२ ॥ तुम अपने पिता तथा सुहृज्जनोंसहित अजर- अमर, बुढ़ापारहित, दुःख से हीन, क्षयरहित एवं अव्यय रहोगे। तुम मेरे प्रिय गणेश्वर होओ, तुम मेरे समान तेज तथा पराक्रम वाले होओ। तुम सदा मेरे इष्ट बनकर सदा मेरे समीप विराजमान रहोगे। तुम मेरे सदृश बलशाली एवं महान् योगबल से सम्पन्न होओगे ॥ २६-२८ ॥ मुझसे ऐसा कहकर गणों सहित महातेजस्वी वृषध्वज भगवान् महादेव ने कुशेशयमयी अर्थात् शतदलकमल से निर्मित अपनी माला उतारकर मेरे कण्ठ में बाँध दी। कण्ठ में बँधी हुई उस सुन्दर माला से मैं तीन नेत्रों वाले तथा दस भुजाओं वाले दूसरे शंकर के समान हो गया ॥ २९-३०१/२ ॥ तत्पश्चात् परमेश्वर ने मुझको हाथ से पकड़कर कहा — बोलो, मैं तुम्हें कौन-सा उत्तम वर प्रदान करूँ ? तब उन वृषध्वज ने अपनी जटा में समाहित अति निर्मल जल को [ हाथ में ] लेकर कहा — नदी हो जाओ — ऐसा कहकर उन्होंने जल को छोड़ दिया। तब दिव्य जलवाली, श्याम जल से परिपूर्ण, कमल तथा उत्पल के वनों से युक्त शुभ महानदी बन गयी ॥ ३१-३३१/२ ॥ तदनन्तर महादेव ने उस परम सुन्दर नदी से कहा — चूँकि तुम जटा के जल से महानदी के रूप में निकली हो, अतः तुम्हारा नाम जटोदका होगा। तुम पवित्र तथा नदियों में श्रेष्ठ होओगी। कोई भी मनुष्य तुम्हारे जल में स्नान करके सभी पापों से मुक्त हो जायगा ॥ ३४-३५१/२ ॥ तत्पश्चात् प्रभु महादेव ने ‘यह तुम्हारा पुत्र है’ — ऐसा कहकर मुझ शिलादतनय को देवी पार्वती के चरणों में डाल दिया। तब उन्होंने मेरा सिर सूँघकर दोनों हाथों से मुझे [स्नेहपूर्वक ] सहलाते हुए पुन: देवदेव शंकर की ओर देखकर पुत्रप्रेम में तीन पुत्ररूप स्रोतों के द्वारा शंख के समान श्वेतवर्णवाले जलरूप अश्रुबिन्दुओं से मुझे अभिसिंचित कर दिया। इनके वे ही तीनों स्रोत तीन नदियाँ बन गयीं । भगवान् भव महादेव ने इसे त्रिस्रोतस् (तीन धाराओं वाली) नदी की संज्ञा प्रदान की ॥ ३६–३९ ॥ उस त्रिस्रोतस् नदी को देखकर वृष ने अत्यन्त प्रसन्न होकर नाद किया, तब उस ध्वनि से एक दूसरी नदी आविर्भूत हो गयी। देवदेव शंकर ने उस नदी का नाम वृषध्वनि रखा ॥ ४०१/२ ॥ इसके बाद भगवान् वृषध्वज ने विश्वकर्मा के द्वारा निर्मित, स्वर्णमय, सभी रत्नों से जटित, अलौकिक, शुभ, अद्भुत तथा दिव्य अपने मुकुट को मेरे सिर पर बाँध दिया। उन महेश्वर महादेव ने हीरे तथा वैदूर्यमणि से मण्डित दो शुभ तथा दिव्य कुण्डल [मेरे कानों में] स्वयं पहना दिये ॥ ४१-४३ ॥ हे मुने! मुझको इस प्रकार पूजित देखकर सूर्य आकाश में मेघों के जल से मुझ नन्दी का अभिसेचन किया। तब उस अभिषेक के जल से सोने की नदी बन गयी। उस स्वर्णजल से निकलकर यह नदी बनी, इसलिये देवों के देव त्रियम्बक शिव ने उसे स्वर्णोदका (स्वर्ण जल वाली) कहा। उसी प्रकार सोने के मुकुट से दूसरी पवित्र तथा शुभ नदी उत्पन्न हुई, अतः उसे जाम्बूनदी कहा जाता है। इस प्रकार ये पाँच नदियाँ भगवान् जप्येश्वर के समीप जाने वाली हैं। जो पंचनद पर पहुँचकर इसमें स्नान करके भगवान् जप्येश्वरेश्वर की पूजा करता है, वह शिवसायुज्य प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ४४–४८ ॥ इसके बाद सभी भूतों के स्वामी भगवान् महादेव ने हिमालयपुत्री, अजन्मा, शर्वाणी, उमा देवी से कहा — हे देवि! मैं भूतों के स्वामी देव नन्दीश्वर का अभिषेचन करता हूँ और उन्हें गणेन्द्र नाम वाला कहूँगा, हे अव्यये ! [इस विषय में] तुम क्या सोचती हो ? ॥ ४९-५० ॥ उनका यह वचन सुनकर हर्षयुक्त मुख वाली भवानी ने वर प्रदान करने वाले तथा भूतों के स्वामी अपने पति शिव से मुसकराते हुए इस प्रकार कहा — हे देवेश ! शैलादि मेरा पुत्र है, अतः आप इसे सभी लोकों का स्वामित्व और गणेशत्व प्रदान करने की कृपा कीजिये ॥ ५१-५२ ॥ तत्पश्चात् सभी लोकेश्वरों के भी ईश्वर, देवों के देव, शर्व, भगवान् वृषध्वज ने अपने दिव्य गणेश्वरों का स्मरण किया ॥ ५३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘नन्दिकेश्वरप्रादुर्भाव तथा नन्दिकेश्वराभिषेकमन्त्र’ नामक तैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४३ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe