श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -044
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
चौवालीसवाँ अध्याय
भगवान् शिव द्वारा नन्दिकेश्वर को गणों के अधिपति के रूप में प्रतिष्ठित करना एवं सभी देवों के द्वारा नन्दिकेश्वर का अभिषेक तथा शिवनाममन्त्र की महिमा
श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः
नन्दिकेश्वराभिषेक

शैलादि बोले —  रुद्र के स्मरण करते ही गणेश्वर लोग उपस्थित हो गये। उन सभी की हजार-हजार भुजाएँ थीं, उन्होंने हाथों में हजार अस्त्र धारण कर रखे थे, उनके तीन नेत्र थे, वे महान् गण देवताओं से वन्दित हो रहे थे, वे करोड़ों कालाग्नि के समान थे, वे जटामुकुट धारण किये हुए थे, दाढ़ों के कारण वे विकराल मुख वाले थे, वे शाश्वत, शुद्ध तथा प्रबुद्ध थे, वे अपने ही समान करोड़ों-करोड़ों अनुचरों से युक्त थे — ऐसे असंख्य महात्मा गणेश्वर प्रसन्नता साथ वहाँ आये ॥ १-३ ॥ वे महान् बल से सम्पन्न गण गाते, दौड़ते, भागते, नाचते तथा अनेक मुखवाद्यों को बजाते हुए आये। वे रथों, हाथियों, घोड़ों, सिंहों और बन्दरों पर सवार थे। कुछ गण स्वर्णचित्रित विमानों पर भी आरूढ़ थे ॥ ४-५ ॥ महायोग से सम्पन्न वे गणेश्वर भेरी, मृदंग, पणव, आनक, गोमुख, पटह, एकपुष्कर, मुरज, आडम्बर, डिण्डिम, मर्दल, वेणु, वीणा, दर्दुर, तलघात, कच्छप, पणव एवं अन्य प्रकार के वाद्यों को बजाते हुए तथा विविध तालध्वनियाँ करते हुए भगवान् शिव की सभा में आये ॥ ६-८ ॥

महान् शक्ति से युक्त तथा सभी देवेश्वरों के ईश्वर उन गणेश्वरों ने महादेव एवं पार्वती को प्रणाम करके यह वचन कहा — हे भगवन्! हे देवदेवेश ! हे त्रियम्बक ! हे वृषध्वज ! आपने हम लोगों का स्मरण किसलिये किया है ? हे देव ! हे महाद्युते ! आदेश दीजिये ॥ ९-१० ॥ क्या हम लोग समुद्रों को सोख लें ? क्या यम को उनके सेवकों सहित मार डालें अथवा मृत्युपुत्री (जरा) तथा मृत्यु को मार डालें अथवा पद्मयोनि ब्रह्मा का पशु की भाँति वध कर दें। क्या अत्यन्त कुपित होकर हम लोग देवताओं सहित इन्द्र को, वायु सहित विष्णु को अथवा दानवों सहित दैत्यों को बाँधकर यहाँ ले आयें ? हमलोग आपकी आज्ञा से आज किसका घोर अनर्थ कर डालें ? हे देव! सभी कामनाओं की समृद्धि के लिये आज किसका उत्सव है ? ॥ ११–१३ ॥

भगवान् शंकर ने वैसा कहने वाले उन करोड़ों- करोड़ों सभी सर्वपूज्य गणेश्वरों का सम्मान करके उनसे कहा — हे जगत् के हितकारको! सुनिये, जिस कार्य के लिये मैंने तुम लोगों को यहाँ बुलाया है, उसे सुन करके हे शुद्धात्माओ [गणेश्वरो ] ! नि:शंक होकर कीजिये । यह नन्दी हमारा पुत्र है। यह सभी का ईश्वर है। यह समृद्धिशाली विप्र तुम लोगों का नायक तथा सेनानी । अतः मेरे आदेश से तुम सभी लोग अपना स्वामी एवं सेनानी मानकर इस महायोगपति का अभिषेक करो ॥ १४–१७ ॥

भगवान् शिव के इस प्रकार कहने पर वे सभी गणेश्वर ‘ऐसा ही होगा’  — यह कहकर आपस में परामर्श करके सामग्रियाँ एकत्र करने लगे ॥ १८ ॥ वे स्वर्णनिर्मित, दिव्य, सुन्दर, मेरुसदृश तथा मनोहर सिंहासन ले आये। उन्होंने अनेक स्तम्भों वाले, उत्तम स्वर्ण की प्रभा से युक्त, लटकती हुई मोतियों की झालरों से सुशोभित, मणियों एवं रत्नों से जटित, वैदूर्यमणि के स्तम्भों वाले, किंकिणियों से सुशोभित, सुन्दर रत्नों से समन्वित तथा सभी ओर मुख वाले एक मण्डप का निर्माण करके उसके मध्य में उस सुन्दर आसन को स्थापितकर पादप्रतिष्ठा के लिये उसके आगे नीलवज्र से जटित एक पादपीठ रखा। उसके दोनों ओर उन्होंने दो कलश रखे, जो सुगन्धित जल से भरे हुए थे तथा उनके मुख कमलपुष्पों से ढँके हुए थे। सोने, चाँदी, ताँबे और मिट्टी के हजारों कलश वहाँ रखे थे, जो सभी तीर्थों के जल से परिपूर्ण थे ॥ १९–२४ ॥

महात्मा परमेष्ठी ब्रह्मा ने दिव्य वस्त्रयुगल, दिव्य गन्ध, केयूर, कुण्डल, मुकुट, हार, सौ शलाकाओं ( तीलियों ) – वाला छत्र और एक बालव्यजन प्रदान किया ॥ २५-२६ ॥ शंख तथा मोतियों की माला के समान गौरवर्ण वाले दण्ड से सुशोभित और चन्द्रमा के समान शुभ्र व्यजन, स्वर्ण का दण्ड (मूठ) लगा हुआ चामर, भलीभाँति पूजित ऐरावत तथा सुप्रतीक – ये दो हाथी, विश्वकर्मा के द्वारा बनाया हुआ एक सोने का मुकुट, दो स्वच्छ तथा दिव्य कुण्डल, श्रेष्ठ आयुध वज्र, सोने का सूत्र तथा दो केयूर वहाँ रखे गये। देवताओं के द्वारा पूजित उन गणेश्वरों ने चारों ओर अनेक प्रकार की अन्य आवश्यक सामग्रियों को सावधान होकर वहाँ उपस्थित कर दिया ॥ २७-३० ॥

तदनन्तर इन्द्र सहित विष्णु आदि देवता, मुनिगण, भगवान् ब्रह्मा, नवब्रह्माण 1 , देवताओं सहित सभी लोकपाल प्रसन्नतापूर्वक वहाँ गये। उन सभी के वहाँ आ जाने पर भगवान् परमेश्वर ने समस्त संस्कारविधि सम्पन्न कराने के लिये पितामह ब्रह्मा को आदेश दिया ॥ ३१-३२१/२

तब उनका आदेश पाते ही भगवान् ब्रह्मा ने भी ध्यानपूर्वक सम्पूर्ण अभिषेक-कर्म सम्पन्न कराया। तत्पश्चात् भगवान् ब्रह्मा ने पूजन करके स्वयं उनका अभिषेक किया। इसके बाद शिव के आदेश से विष्णु ने, फिर इन्द्र ने और लोकपालों ने गणेन्द्र का विधिपूर्वक अभिषेक किया ॥ ३३–३५ ॥ तदनन्तर ऋषियों तथा पितामह आदि ने उनकी स्तुति की। तब उन सभी के स्तुति कर लेने पर समस्त जगत् के स्वामी विष्णु ने सिर पर अंजलि बाँधकर एकाग्र-चित्त होकर उनकी स्तुति की और हाथ जोड़े हुए झुककर जय-जयकार किया। तत्पश्चात् सभी गणेश्वरों, देवताओं और असुरों ने भी क्रम से सम्पूर्ण कृत्य किया ॥ ३६-३७१/२

इस प्रकार ब्रह्मासहित सभी देवताओं के द्वारा उनका अभिषेक तथा स्तवन हो जाने के बाद परमेष्ठी की आज्ञा से उन्होंने विवाह किया। सुयशा नामक जो मरुतों की पुत्री थी, वह उनकी भार्या हुई । उस सुयशा को चन्द्रमा के समान प्रभायुक्त और विशेष शोभासम्पन्न एक छत्र भेंट किया गया। हाथों में चामर लिये हुए स्त्रियों से युक्त उस सुयशा को दो चामर भी प्रदान किये गये। मेरे साथ उसने भी एक अत्यन्त सुन्दर सिंहासन ग्रहण किया। भगवती महालक्ष्मी ने मुकुट आदि सुन्दर आभूषणों से उसे अलंकृत किया ॥ ३८–४१ ॥ उसे देवी के गले का अति सुन्दर हार भी प्राप्त हुआ । वृषेन्द्र, श्वेत हाथी, सिंह, सिंहध्वज, रथ और चन्द्रमण्डल के समान प्रभा वाला स्वर्णछत्र भी भेंट किया गया। अब मेरे समान कहीं भी कोई प्रभु नहीं था ॥ ४२-४३ ॥ मुझको परिवार सहित लेकर सम्बन्धियों तथा बान्धवों को भी साथ लेकर देवी के साथ भगवान् महेश्वर वृषभ पर आरूढ़ हो चल पड़े ॥ ४४ ॥ तब मेरे तथा गणों के साथ शिव एवं पार्वती को देखकर मुनियों, देवर्षियों, सिद्धों और द्विजों ने शिव की आज्ञा हेतु प्रार्थना की ॥ ४५ ॥

तत्पश्चात् हिमालय की पुत्री के पति प्रभु शिव की आज्ञा से नन्दी ने उन पूजनीय लोगों के लिये शुभ पाशुपत आज्ञा प्रदान की ॥ ४६ ॥ तब मुनिश्रेष्ठ ( नन्दी) से उन शिव की आज्ञा (दीक्षा) पाकर वे मुनि लोग शिवभक्त हो गये । अतः सभी को शिव की पूजा करनी चाहिये ॥ ४७ ॥ यदि कोई मनुष्य बिना नमस्कार के ही शिव के नाम का उच्चारण करता है, तो उसे दस ब्रह्महत्या के समान घोर पाप लगता है । अत: सब प्रकार से नाम के आदि में नमस्कार (नमः) – का उच्चारण करना चाहिये। आदि में नमः अवश्य लगाना चाहिये, ऐसा करने वाला शिवत्व को प्राप्त होता है 2  ॥ ४८-४९ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘नन्दिकेश्वराभिषेक’ नामक चौवालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४४ ॥

1. मरीचि, भृगु, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, अत्रि तथा वसिष्ठ  — ये नौ ऋषि ब्रह्माजी के मन से उत्पन्न होने के कारण तथा ब्रह्मवादी और ब्रह्मात्मक होने से ‘नवब्रह्माण’ कहलाते हैं। (लिङ्गपु० पू० ७० । १८१-१८३)

2. शिवमन्त्र की दीक्षा प्राप्तकर विधिपूर्वक जप करने के लिये यह वचन है। नामजप की महिमा के अनुसार श्रद्धापूर्वक नामजप भी किया जा सकता है।

See Also :- शिवमहापुराण – शतरुद्रसंहिता – अध्याय 07

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