January 21, 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -053 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ तिरपनवाँ अध्याय भुवनकोश वर्णन में प्लक्ष, शाल्मलि, क्रौंच द्वीपों के महापर्वतों, ऊर्ध्व लोकों तथा नरकों का वर्णन, सर्वत्र सदाशिव की व्यापकता एवं यक्षरूप शिव और भगवती उमा का माहात्म्य श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः भुवनकोशविन्यासनिर्णय सूतजी बोले — प्लक्ष आदि सात द्वीपों में सात पर्वत हैं, जो सीधे, लम्बे तथा प्रत्येक दिशाओं में फैले हुए हैं; वे वर्ष पर्वत के रूप में प्रतिष्ठित हैं ॥ १ ॥ मैं प्लक्ष द्वीप में स्थित सातों दिव्य महापर्वतों का वर्णन करूँगा। पहला गोमेदक तथा दूसरा चान्द्र कहा जाता है। तीसरा नारद तथा चौथा दुन्दुभि नाम वाला कहा गया है । पाँचवाँ सोमक तथा छठा सुमनस् नाम वाला कहा जाता है, उसे वैभव [ नाम वाला ] भी कहा गया है। सातवाँ पर्वत वैभ्राज नाम से प्रसिद्ध है। विशेष रूप से ये ही सात पर्वत प्लक्ष द्वीप में बताये गये हैं ॥ २-४ ॥ शाल्मलि द्वीप में भी सात पर्वत हैं, मैं क्रम से उन्हें बताऊँगा। कुमुद, उत्तम, बलाहक, द्रोण, कंक, महिष और सातवाँ ककुद्मान् कहा गया है। कुश द्वीप में भी सात उपद्वीप और कुलपर्वत हैं। मैं केवल नाम से ही संक्षेप में उन्हें बताऊँगा । पहला विद्रुम तथा दूसरा हेमपर्वत कहा गया है । तीसरा द्युतिमान् एवं चौथा पुष्पित नाम वाला बताया गया है। पाँचवाँ कुशेशय तथा छठा हरिगिरि [नाम वाला] कहा गया है। सातवाँ पर्वत शोभासम्पन्न मन्दर है, यह महादेवजी का निवास स्थान है । जलों का नाम मन्दा है; इसीलिये जलों को धारण करने से इसका नाम मन्दर है ॥ ५-९ ॥ साक्षात् भगवान् वृषभध्वज विश्वेश्वर अमलात्मा शिव वहाँ उत्तम सुवर्णगृह में पार्वती तथा नन्दी के साथ रहते हैं ॥ १० ॥ पूर्वकाल में मन्दर ने महाक्षेत्र अविमुक्त में [अपनी] तपस्या से महेश्वर को प्रसन्न किया था और उनसे महावरदान प्राप्त किया था ॥ ११ ॥ उसने महादेवजी से उमा के साथ वहाँ निवास करने के लिये प्रार्थना की, तब वे [शिव] अविमुक्तक्षेत्र से आकर नन्दी, अपने गणों तथा उमा के साथ मन्दर [पर्वत]-पर निवास करने लगे, इसीलिये वे उस पर्वत को नहीं छोड़ते हैं ॥ १२१/२ ॥ क्रौंचद्वीप में भी क्रौंच आदि सात कुलपर्वत [पहला] क्रौंच, [दूसरा ] वामन तथा तीसरा अन्धकारक पर्वत है । अन्धकारक के बाद दिवावृत् नामक पर्वत है । दिवावृत् के बाद विविन्द पर्वत कहा जाता है । विविन्द के बाद पुण्डरीक नामक महान् पर्वत है और पुण्डरीक के बाद दुन्दुभिस्वन पर्वत कहा जाता है। क्रौंचद्वीप के ये सातों पर्वत रत्नमय हैं ॥ १३-१६ ॥ शाकद्वीप में भी सात पर्वत हैं, उन्हें जानिये । हे श्रेष्ठ मुनियो ! उदय, रैवत, श्यामक, शोभासम्पन्न राजतपर्वत तथा अत्यन्त सुन्दर आम्बिकेय पर्वत हैं । आम्बिकेय के बाद सभी प्रकार की औषधियों से युक्त रम्य नामक पर्वत है। उसके बाद केसरीपर्वत कहा गया है, जहाँ से वायु उत्पन्न होती है ॥ १७-१८१/२ ॥ पुष्कर द्वीप में महाशिल नामक एक ही शोभासम्पन्न पर्वत है; यह शिला समूहों से युक्त है। यह महान् पर्वत उस द्वीप के आधे पूर्वी भाग में अद्भुत मणियों वाले शिखरों से तथा अनेक रंगों के किनारों के साथ पचास हजार योजन ऊँचा उठा हुआ है । यह महान् पर्वत [ भूतल से ] चौंतीस हजार योजन नीचे तक गया है। यह पर्वत द्वीप के आधे भाग में उत्तर की ओर मानसश्रृंखला के ऊपर फैला हुआ है। समुद्र के समीप स्थित यह पर्वत उगे हुए नवीन चन्द्रमा के समान प्रतीत होता है ॥ १९-२२ ॥ यह पचास हजार योजन ऊपर की ओर उठा हुआ है । इसकी चौड़ाई तथा चारों ओर का घेरा भी उतना ही विस्तृत है । द्वीप के पश्चिमी आधे भाग में यही पर्वत मानस नाम से प्रतिष्ठित है। यह महापर्वत एक होता हुआ भी सन्निवेश के कारण दो भागों में विभक्त हो गया है ॥ २३-२४ ॥ उस द्वीप में चाँदी के समान प्रभा वाले दो पुण्यमय तथा शुभ जनपद बताये गये हैं, जो इस मानस पर्वत को घेरे हुए हैं। मानस बाहर जो महावीत नामक वर्ष है, उसके भीतर जो जनपद है, उसे धातकीखण्ड कहा जाता है ॥ २५-२६ ॥ पुष्कर द्वीप स्वादिष्ट जल वाले सागर से घिरा हुआ है। यह [सागर ] सभी ओर पुष्कर द्वीप के विस्तार के बराबर विस्तीर्ण है। यह विस्तार में तथा घेरे में पुष्कर द्वीप के ही समान है। इस प्रकार सातों द्वीप सात समुद्रों से घिरे हुए हैं । द्वीप के अनन्तर जो समुद्र हैं, वह सातवाँ समुद्र है। इस प्रकार द्वीपों तथा समुद्रों की परस्पर वृद्धि को जानना चाहिये ॥ २७–२९ ॥ पुष्कर के बाहर उसे चारों ओर से घेरकर स्वादिष्ट जल से युक्त महान् समुद्र स्थित है। उसके बाहर महती लोकस्थिति दिखायी देती है, वहाँ की भूमि स्वर्णमयी हैं और विस्तार में दुगुनी है। सम्पूर्ण भूमि एक शिला के तुल्य है। उसके परे मर्यादामण्डल स्वरूप एक पर्वत है। इसका कुछ भाग प्रकाशमय तथा कुछ भाग अन्धकारमय रहता है, इसे लोकालोक [पर्वत ] कहा जाता है । हे द्विजो ! जितना यह दृश्य-अदृश्य पर्वत है, उतनी ही यह धरा है। उसकी (पर्वत की) ऊँचाई दस हजार योजन कही गयी है। उस लोकालोक [नामक] महापर्वत का विस्तार भी उतना ही है। उसके आधे भाग में सूर्य की किरणें पहुँचती हैं और दूसरे आधे भाग में सदा अन्धकार रहता है, इसलिये इसे लोकालोक कहा गया है । [ हे द्विजो !] इस प्रकार मैंने संक्षेप में भूलोक के विस्तार का वर्णन किया ॥ ३०-३५ ॥ श्रेष्ठ मुनियो ! भुवर्लोक सूर्य तक है और स्वर्लोक ध्रुव तक है। आवह आदि वायु की सात नेमियाँ कही गयी हैं। द्विज ! आवह, प्रवह, अनुवह, संवह, विवह, परावह और परिवह — ये वायु की सात नेमियाँ हैं । हे विप्रो ! मेघ, सूर्य, चन्द्रमा, तारागण, राशियाँ, ग्रह सप्तर्षि और ध्रुव — ये क्रम से व्यवस्थित हैं ॥ ३६-३८१/२ ॥ पृथ्वीतल से ऊपर ध्रुवलोक पर्यन्त पन्द्रह नियुत योजन की दूरी है। भूपृष्ठ से भानुमण्डल एक नियुत योजन दूर है। उसके ऊपर सूर्य का रथ सोलह हजार योजन है। मेरु पर्वत पृथ्वी तल से चौरासी हजार योजन पर है। ध्रुव से एक करोड़ योजन के बाद महर्लोक है । हे द्विजो ! महर्लोक से दो करोड़ योजन की दूरी पर जनलोक है । जनलोक से चार करोड़ योजन की दूरी पर तपो लोक कहा गया है। प्राजापत्य लोक (तपोलोक)-से छ: करोड़ योजन की दूरी छोड़कर ब्रह्मलोक स्थित है। हे ब्राह्मणो! इस प्रकार इस ब्रह्माण्ड में इन सात पुण्यलोकों को मैंने बता दिया ॥ ३९-४३ ॥ सात तलों के नीचे घोर से लेकर माया तक अट्ठाईस कोटि के नरक हैं; पापीलोग उनमें अपने-अपने कर्मों के अनुरूप दुःख भोगते हैं। उनमें से प्रत्येक में रौरव से लेकर अवीचि तक सभी विशेष रूप से पाँच नरक कहे गये हैं । मैंने आदि में अण्ड का वर्णन किया और अण्ड के आवरणों का भी वर्णन किया एवं प्रसंगवश ब्रह्मा की सृष्टि का भी विस्तार से वर्णन किया। इस प्रकार के हजारों-करोड़ों ब्रह्माण्डों को जानना चाहिये ॥ ४४–४७ ॥ प्रधान के सर्वगामी होने के कारण इन अण्डों में तिर्यक्, ऊपर तथा नीचे [सभी ओर ] चौदह भुवन हैं। हे श्रेष्ठ द्विजो ! उनमें प्रत्येक अण्ड के हेतु महेश्वर हैं । अष्टमूर्ति [शिव] अण्डों में, अण्डों के बाहर, अण्डों के आवरणों में, अन्धकार के भीतर तथा अन्धकार के परे भी विद्यमान हैं। सम्पूर्ण जगत् इन महेश्वर, महादेव, धीमान्, देहरहित परमात्मा का शरीर है। गृहस्थरूप इन अष्टमूर्ति शर्व शिव की गृहिणी दिव्य प्रकृति है, महत् आदि इनकी सन्तानें हैं और सभी देहाभिमानी पशु इनके सेवक हैं ॥ ४८-५२ ॥ वे [ शिव] ही आदि-अन्त से रहित, भगवान् अनन्त, पुरुष, प्रधान आदि (बुद्धि, अहंकार आदि ) सात तत्त्व, प्रधान मूर्ति वाले, सोलह अंगों वाले (पंचमहाभूत, दस इन्द्रियाँ, मन), अष्टमूर्ति तथा महेश्वर हैं। उन्हीं की आज्ञा के प्रभाव से पृथ्वी, पर्वत, मेघ, समुद्र, तारागण, इन्द्र आदि देवता, वैमानिक तथा स्थावर-जंगम प्राणी स्थित हैं ॥ ५३-५४ ॥ सभी लक्षणों से रहित यक्षरूपी शिव को देखकर इन्द्रसहित अग्नि आदि वे देवता ‘यहाँ यह क्या है ? ‘-ऐसा सोचकर अनिश्चय की दशा में यक्ष के समीप जाकर वे शक्तिहीन हो गये ॥ ५५ ॥ हे विप्रो ! अग्निदेव उस यक्ष के सामने तिनका भी नहीं जला सके, पवन उस तृण को उड़ाने में समर्थ नहीं हुए, उसी प्रकार अन्य समस्त श्रेष्ठ देवता भी अपने-अपने प्रभाव प्रदर्शित करने में समर्थ नहीं हुए। तब सभी श्रेष्ठ देवताओं के साथ समस्त वृत्रशत्रु उन देवेन्द्र ने कारणभूत समृद्धियों के कुतूहलचित्त होकर यक्षरूप सुरेश्वर से इस प्रकार कहा —आप कौन हैं ? ॥ ५६-५७ ॥ उसी समय यक्ष अदृश्य हो गये। तब सुन्दर मुख वाली तथा अनेक शुभ आभरणों से अत्यन्त शोभित होती हुई हैमवती अम्बिका उमा प्रकट हो गयीं ॥ ५८ ॥ इन्द्र आदि ने सुशोभित होती हुई उन हैमवती अजा उमा से पूछा — हे ईशे ! हे परम शोभायमान अम्बिके ! यक्षदेहधारी यह कौन है ? ॥ ५९ ॥ यह सुनकर उमा अम्बिका ने कहा — यह अगोचर है; तब इन्द्रसहित सभी देवताओं ने उस यक्ष को तथा सिंहगामिनी और लोहित-शुक्ल-कृष्णवर्ण वाली इन अजा उमा को प्रणाम किया ॥ ६० ॥ सभी श्रेष्ठ देवताओं से सत्कृत होकर देवताओं तथा दानवों की समस्त प्रवृत्तिरूपा उन देवी ने कहा — मैं पूर्वकाल में इस यक्षरूप [परम] पुरुष की आज्ञा के अधीन रहने वाली प्रकृति थी[^1] ॥ ६१ ॥ अतः हे द्विजो ! उन्हीं अज (शिव)-के नियोग से ब्रह्मा उत्पन्न हुए, उन ब्रह्मा से अण्ड उत्पन्न हुआ और अण्ड से ज्योतिर्गणों सहित समग्र विश्व उत्पन्न हुआ; इस प्रकार सब कुछ शिवात्मक है ॥ ६२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘भुवनकोशविन्यासनिर्णय’ नामक तिरपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५३ ॥ [^1]: परम पुरुष की सर्वोत्कृष्टता को बताने वाला यह ‘हैमवती-आख्यान’ मूलरूप से सामवेद के तलवकारब्राह्मण के अन्तर्गत प्राप्त होने वाले केनोपनिषद् में उपलब्ध होता है। Content is available only for registered users. 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