January 21, 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -054 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ चौवनवाँ अध्याय ज्योतिः सन्निवेश वर्णन में लोकपालों की पुरियों का वर्णन, सूर्य की स्थिति तथा उसकी गति से होने वाले अयन एवं ऋतुओं की स्थिति, ध्रुवस्थान तथा मेघों का स्वरूप और वृष्टि का प्रादुर्भाव श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ज्योतिश्चक्रे सूर्यगत्यादिकथनं सूतजी बोले — [हे ऋषियो ! ] देवक्षेत्रों को देखकर मैं ग्रहों की गति के ज्ञान के लिये अण्ड में ज्योतिर्गणों (ग्रहों) की गति का संक्षेप में वर्णन करता हूँ ॥ १ ॥ मेरु के पूर्व में मानस पर्वत पर महेन्द्र की पुरी स्थित है । दक्षिण में सूर्यपुत्र यम की, पश्चिम में वरुण की और उत्तर में सोम की विशाल पुरी है। उनमें दिग्पाल रहते हैं । वे पुरियाँ क्रम से अमरावती, संयमनी, सुखा तथा विभा [नाम वाली ] हैं ॥ २-३ ॥ लोकपालों की पुरियों के ऊपर सभी ओर दक्षिणायन में बाण के समान गति वाले सूर्य की जो गति है, उसे [आप लोग] जानिये। दक्षिणायन में सूर्य बाण की तरह गमन करते हैं, वे नक्षत्र चक्र को साथ लेकर निरन्तर परिभ्रमण करते हैं ॥ ४-५ ॥ द्विज ! जब प्रभु सूर्य इन्द्र की पुरी में प्रवेश करते हैं, तब संयमनीपुरी के सभी लोग सूर्य का उदय देखते हैं; जब वे सूर्य संयमनीपुरी में होते हैं, तब [पश्चिम में ] सुखावतीपुरी में प्रातःकाल होता है । उस समय विश्व के नेत्रतुल्य भगवान् सूर्य विभापुरी में अस्त होते हैं ॥ ६-७ ॥ जिस प्रकार मैंने अमरावती में सूर्य की गति को कहा है, उसी प्रकार ये सूर्य संयमनी को पाकर ‘सुखा’ तथा ‘विभा’ को भी प्राप्त करते हैं ॥ ८ ॥ हे द्विजो ! जब आग्नेय ( दक्षिण-पूर्व ) भाग में अपराह्न होता है, तब नैर्ऋत (दक्षिण-पश्चिम) भाग में पूर्वाह्न, उस समय वायव्य (उत्तर-पश्चिम ) भाग में भयानक रात्रि का उत्तरार्ध और उत्तर-पूर्व भाग में रात्रि का प्रथम काल होता है । सब प्रकार से यही गति होती है। इसी प्रकार जब जल को सोखने वाले सूर्य आकाश के मध्य में संचरण करते हैं, तब वे एक मुहूर्त में पृथ्वी पर तीस अंश चलते हैं। एक मुहूर्त में सूर्य के द्वारा पार की गयी दूरी को योजन परिमाण में सुनिये ॥ ९–११ ॥ वह संख्या इकतीस लाख पचास हजार योजन कही गयी है। यह महात्मा भास्कर की एक मुहूर्त की गति है। जब सूर्य इस गति से दक्षिण दिशा की ओर जाते हैं, तब [ वहाँ छ: माह भ्रमण करने के बाद ] पुनः उत्तरायण काल में उत्तर दिशा की ओर लौटते हैं। दक्षिणायन के समय महातेजस्वी सूर्य मानसोत्तर पर्वत पर पुष्कर के मध्य भ्रमण करते हैं । वे सूर्य एक सौ अस्सी मण्डल से गुजरते हैं। उत्तरायण तथा दक्षिणायन को बाह्य एवं आभ्यन्तर कहा गया है। सूर्य प्रतिदिन उन्हीं मण्डलों पर भ्रमण करते हैं। जैसे कुम्हार के चाक का बाहरी भाग शीघ्रतापूर्वक चारों ओर घूमता है, वैसे ही सूर्यदेव दक्षिणायन में तेजी से भ्रमण करते हैं। इसलिये वे थोड़े समय में ही [ अपेक्षाकृत ] अधिक भूमि पर पहुँचते हैं। दक्षिणायन में सूर्य मात्र बारह मुहूर्तों में शीघ्रतापूर्वक दिन में साढ़े तेरह नक्षत्र चलते हैं, जबकि रात्रि में अठारह मुहूर्तों में उतनी ही नक्षत्र की दूरी को तय करते हैं ॥ १२-१९ ॥ जैसे कुम्हार के चाक का मध्यभाग मन्द गति से चलता है, उसी प्रकार सूर्य उत्तरायण में मन्दगति से भ्रमण करते हैं। इसलिये वे अधिक समय में थोड़ी भूमि पर पहुँचते हैं। सूर्य का वह रथ आदित्यों, मुनियों, गन्धर्वों, अप्सराओं, ग्रामणियों, सर्पों तथा राक्षसों से अधिष्ठित रहता है। हजार किरणों वाले वे सूर्य आगे से, पीछे से, नीचे से तथा ऊपर से किरण छोड़कर ब्रह्मा की अत्युत्तम सभा को प्रकाशित करते हुए सन्ध्या-वन्दन के समय मुनियों तथा ब्राह्मणों के द्वारा [ अर्घ्य हेतु] छोड़े गये जल से पास आने वाले राक्षसों को मार-मारकर आगे बढ़ते रहते हैं ॥ २०–२३१/२ ॥ उत्तरायण के पश्चिम भाग में दिन अठारह मुहूर्त का होता है, उस समय सूर्य मन्दगति वाले होकर चलते हैं। सूर्य रात में बारह मुहूर्त में साढ़े तेरह नक्षत्र दूरी को तय करते हैं और दिन में चलते हुए वे उतनी ही नक्षत्र की दूरी अठारह मुहूर्तों में तय करते हैं ॥ २४-२५ ॥ जिस प्रकार नाभि में चक्र अधिक मन्द गति से घूमता है, उसी प्रकार [चक्र के मध्य स्थित] मिट्टी के पिण्ड की भाँति मध्य में स्थित ध्रुव घूमता है। प्राचीन विद्या के वेत्ता कहते हैं कि दिन और रात [ मिलकर ] तीस मुहूर्त के बराबर होते हैं। दोनों दिशाओं के बीच में मण्डलों में सूर्य घूमता है। जैसे कुलालचक्र की नाभि उसी स्थान पर रहती है और घूमती है, उसी प्रकार ग्रहों में श्रेष्ठ ध्रुव भी ग्रहों के साथ घूमते हैं । मुनियों तथा नक्षत्रों का समूह उसी के मन के अनुसार चलता है । उसी [ध्रुव]-के द्वारा अधिष्ठित सूर्यदेव वायु के साथ सभी ओर से अपनी किरणों के द्वारा जल ग्रहण करते हैं। उत्तानपाद के पुत्र को ध्रुवपद भगवान् विष्णु की कृपा से सुलभ हुआ और ध्रुव ने इसे अपने पिता के कारण प्राप्त किया था ॥ २६-३०१/२ ॥ सूर्य के द्वारा ग्रहण किया गया वह जल क्रम से चन्द्रमा को प्राप्त होता है और पुनः वह जल चन्द्रमा से मेघों को प्राप्त होता है। इसके बाद वायु द्वारा आघात करने पर मेघों का समूह पृथ्वी पर वृष्टि करता है। सूर्य सबको भासित करते हैं, इसलिये वे भास्कर [नाम वाले] हैं। जल का कभी नाश नहीं होता, वही जल पुनः परिवर्तित हो जाता है । भगवान् शिव ने सभी प्राणियों के कल्याण के लिये जल की इस गति का निर्माण किया है। जल ही भूः भुवः स्वः, अन्न तथा अमृत है। जल सभी लोकों का प्राण है। अधिक कहने से क्या लाभ-सभी प्राणी, समस्त भुवन एवं यह चराचर जगत् जल से बना हुआ है। भगवान् भी शिवरूपी जल के आधिपत्य में व्यवस्थित हैं । भगवान् शिव जल के अधिपति कहे गये हैं। यह सम्पूर्ण जगत् शिवमय है-इसमें आश्चर्य क्या है ? सर्वव्यापी विष्णुदेव को नारायण पद जल से ही प्राप्त हुआ । विष्णु सम्पूर्ण जगत् के निवास स्थान हैं और जल उनका निवासस्थान है ॥ ३१–३७ ॥ चराचर समस्त प्राणियों के वायु द्वारा उत्तेजित अग्नि से जल जाने पर धुएँ के रूप में जो-जो निकलता है और वायु द्वारा ऊपर ले जाया जाता है, उन्हीं को अभ्र कहा गया है । अतः धूम, अग्नि तथा वायु के संयोग को अभ्र कहा जाता है। जो जल की वर्षा करता है, वह अभ्र है । हजार नेत्रों वाले इन्द्र अभ्र के स्वामी हैं ॥ ३८-३९ ॥ यज्ञ के धुएँ से उत्पन्न अभ्र (मेघ) सदा द्विजों का हित करने वाला होता है और दावानल के धूम से उत्पन्न अभ्र वन के लिये हितकर कहा गया है। मृत प्राणियों के जलाने पर उठे हुए धूम से उत्पन्न अभ्र अशुभ के लिये होता है और हे द्विजो ! अभिचाराग्नि के धूम से उत्पन्न अभ्र प्राणियों के नाश के लिये होता है। इस प्रकार अलग-अलग धूमों से संसार का हित तथा अहित होता है । अतः मनुष्य को चाहिये कि अभिचारकर्म से उत्पन्न धूम को ढँक दे। यदि कोई द्विज धूम को ढँके बिना अभिचारकर्म करता है, तो यह संसार के विनाश का कारण हो जाता है ॥ ४०-४३ ॥ हे सुव्रतो ! जल के भण्डारस्वरूप मेघ वायु की आज्ञा से जगत् के हित के लिये इस लोक में छः महीने वृष्टि करते हैं। मेघ का गर्जन वायु के द्वारा, विद्युत् के द्वारा तथा अग्नि द्वारा होता है। हे मुनिश्रेष्ठो ! उन मेघों की उत्पत्ति तीन प्रकार से होती है। ‘अभ्र’ शब्द का अर्थ है ‘जो नष्ट नहीं होता है।’ ‘मेहन’ शब्द से ‘मेघ’ व्युत्पन्न कहा गया है । काष्ठ, वाह्न, वैरिंच्य तथा पक्ष – ये विभिन्न प्रकार के मेघ होते हैं। घृत का काष्ठ से संयोग होने पर अग्नि से जो धूम निकलता है, उससे प्रथम प्रकार का मेघ बनता है। दूसरे प्रकार के मेघ की उत्पत्ति ब्रह्मा की श्वासवायु से होती है । इन्द्र के द्वारा पर्वतों के काटे गये पक्षों से तीसरे प्रकार के मेघ उत्पन्न होते हैं । अग्नि से उत्पन्न मेघ शुभ होते हैं और वे आवह नामक वायु के स्थान में जाते हैं । ब्रह्मा के श्वास से उत्पन्न सभी मेघ प्रवह नामक वायु के स्कन्ध पर रहते हैं । पुष्कर आदि मेघ पक्ष से उत्पन्न होते । ये जब बरसते हैं, तब क्रम से शान्त, ध्वनि करने वाले तथा विनाशकारी होते हैं; इनके द्वारा यथाक्रम यह कृत्य होता है । कुछ मेघ अल्प वृष्टि करने वाले होते हैं और कुछ मेघ दीर्घ काल तक शीतल वायु वाले होते हैं। कुछ मेघ जीवक होते हैं। कुछ मेघ क्षीण होते हैं और वे विद्युत् तथा ध्वनि से रहित होते हैं। कुछ मेघ पृथ्वीतल से एक कोस के भीतर आकाश में इधर-उधर रहते हैं । पर्वत पर रहने वाले सभी मेघ आधे कोस की दूरी में होते हैं। द्विजो ! पृथ्वीतल से योजन-मात्र की दूरी वाले विद्युत्- युक्त मेघ साध्य होने के कारण पृथ्वी पर अधिक जल- वृष्टि करने वाले होते हैं। उन मेघों का तीन प्रकार का वृष्टिसर्ग बता दिया गया है ॥ ४४–५३ ॥ पर्वतों के [कटे हुए] पक्षों से उत्पन्न मेघ कल्पज होते हैं और वे अति महान् होते हैं। वे कल्प के अन्त में विनाश के लिये रात्रि में बरसते हैं। पुष्कर आदि पक्षजनित मेघ जब बरसते हैं, तब सम्पूर्ण जगत् सागरमय हो जाता है और उसमें भगवान् रात में शयन करते हैं । हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! अग्नि से उत्पन्न, [ ब्रह्मा के] श्वास से उत्पन्न तथा [कटे हुए पर्वतों के] पक्ष से उत्पन्न मेघों का धूम सदा आप्यायन कहा गया है ॥ ५४-५६ ॥ समस्त पौण्ड्र (पुण्ड्र देश में होने वाली) वृष्टि विद्युन्मय, शीतल तथा अन्न प्रदान करने वाली होती है । पुण्ड्र देश के मेघ बर्फ के समान शीतल होते हैं और वे हाथी के सूँड़ से गिरते हुए जल के छिड़काव की भाँति प्रतीत होते हैं । गांग नामक मेघ गंगा के जल से उत्पन्न होते हैं। ये परावहसंज्ञक वायु द्वारा पर्वतों, नदियों और दिग्गजों को व्याकुल कर देते हैं। मेघों से अलग हुआ जल एक पर्वत से दूसरे पर्वत पर पहुँचता है। परावह नामक जो वायु है, वह मेघों को हिमालय (अम्बिकागुरु) पर्वत की ओर ले जाती है । द्विज ! पुन: मेनापति हिमालय से आगे बढ़कर ये मेघ समुद्र के मध्य देशों की वृद्धि के लिये भारतवर्ष में भारी वर्षा करते हैं ॥ ५७–६० ॥ वस्तुओं की वृद्धि के लिये होने वाली वृष्टियाँ दो प्रकार की कही गयी हैं। मैं बुद्धि के अनुसार उन दोनों का संक्षेप में वर्णन करता हूँ । संसार के नेत्रस्वरूप महातेजस्वी भगवान् सूर्य वृष्टियों का सृजन करने वाले हैं। हे द्विजश्रेष्ठो ! वे भी साक्षात् ईशान परमेश्वर शिव ही हैं। हे विप्रो ! वे ही तेज, ओज, बल, यश, नेत्र, श्रोत्र, मन, मृत्यु, आत्मा, मन्यु (क्रोध), दिशाएँ और विदिशाएँ हैं। वे ही सत्य, ऋत, वायु, आकाश, ग्रह, लोकपाल, विष्णु, ब्रह्मा, रुद्र तथा साक्षात् महेश्वर हैं । वे हजार किरणों वाले, श्रीमान्, आठ भुजाओं वाले, परम कल्याणकारी, अर्धनारीश्वर, तीन नेत्रों वाले तथा देवताओं के अधिपति हैं ॥ ६१–६५ ॥ हे द्विजो ! इन्हीं की कृपा से नाना प्रकार की वृष्टि होती है। ये हजार गुना जल देने के लिये अपनी किरणों से जल ग्रहण करते हैं। विचारपूर्वक देखा जाय तो इस जल का नाश अथवा वृद्धि होती ही नहीं । ध्रुव के द्वारा अधिष्ठित वायु वृष्टि का पुनः हरण कर लेती है। तदनन्तर यह सूर्यग्रह से निकलकर सम्पूर्ण नक्षत्रमण्डल में फैलती है। उसके बाद ध्रुव के द्वारा अधिष्ठित यह वृद्धि पुनः सूर्य में प्रवेश करती है ॥ ६६-६८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘ज्योतिश्चक्रमें सूर्यगत्यादिकथन’ नामक चौवनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५४ ॥ Content is available only for registered users. 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