January 21, 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -055 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ पचपनवाँ अध्याय शिवस्वरूप भगवान् सूर्य के रथ तथा चैत्रादि बारह मासों में रथ के साथ भ्रमण करने वाले देवता, मुनि, नाग, गन्धर्व आदि का वर्णन श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः सूर्यरथनिर्णय सूतजी बोले — [हे ऋषियो ! ] मैं संक्षेप में सूर्य के रथ और चन्द्रमा तथा अन्य ग्रहों के विषय में बताऊँगा और जिस प्रकार जल का शोषण करने वाले सूर्य गति करते हैं, उसका भी वर्णन करूँगा ॥ १ ॥ हे श्रेष्ठ द्विजो ! ब्रह्मा के द्वारा विशेष प्रयोजन के लिये निर्मित वह सूर्यरथ संवत्सर के अवयवों से कल्पित किया गया है। तीन नाभि तथा पाँच अरों वाले चक्र से युक्त यह सूर्यरथ सुवर्णमय है और सभी देवताओं का निवासस्थान है। यह लम्बाई तथा चौड़ाई में नौ हजार योजन वाला कहा गया है। इसका ईषादण्ड प्रमाण (माप)-में रथोपस्थ से दुगुना है। जहाँ चक्र है, वहाँ स्थित अन्तरिक्षगामी घोड़ों से वह युक्त (जुता हुआ) है। उसके सातों घोड़े वेद के सात छन्दों [गायत्री, बृहती, उष्णिक्, जगती, त्रिष्टुप्, अनुष्टुप् और पंक्ति]-से निर्मित हैं। वे चक्र के बगल में बँधे हुए हैं। ध्रुव में [रथ का] अक्ष लगा हुआ है। वह रथ घोड़ों तथा चक्रसहित घूमता है और ध्रुव अक्ष के साथ घूमता है ॥ २-६ ॥ वह अक्ष ध्रुव से प्रेरित होकर एक ही चक्र के साथ घूमता है। बुद्धिमान् ध्रुव वायुकिरणों के द्वारा ज्योतिर्गणों ( ग्रह, नक्षत्र आदि)-को प्रेरित करता है। दो रश्मियाँ (किरणें ) रथ के जुए तथा अक्ष के अग्रभाग में बँधी हुई हैं और [उन] जुए तथा अक्ष में रश्मियों से निबद्ध वह सूर्यरथ ध्रुव के द्वारा भ्रमण करता है ॥ ७-८ ॥ इस प्रकार भ्रमण करते हुए आकाश में विचरण करने वाले रथ के अनेक मण्डल होते हैं। वे [रश्मिनिबद्ध ] जुए तथा अक्ष की कोटियाँ उस रथ के दाहिनी ओर होती हैं। रज्जुओं द्वारा ध्रुव से प्रगृहीत अरुण, चक्र तथा घोड़े और वे दोनों रश्मियाँ घूमते हुए ध्रुव का अनुगमन करते हैं ॥ ९-१० ॥ इस रथ की वायुलहरीरूपा युगाक्षकोटि (जुए तथा अक्ष की कोटि) कील में बँधी हुई रस्सी की भाँति सभी दिशाओं में घूमती है। उत्तरायण में मण्डलों में घूमते हुए उस सूर्य की दोनों रश्मियाँ बढ़ जाती हैं और दक्षिणायन में मण्डलों में घूमते हुए सूर्य के द्वारा वे रश्मियाँ खिंच जाती हैं। जब वे [रश्मियाँ] ध्रुव के द्वारा प्रेरित की जाती हैं, तब [ रथ के] भीतर स्थित सूर्य मण्डलों में घूमता है। उस समय सूर्य दोनों दिशाओं के एक सौ अस्सी मण्डलों का चक्कर लगाता है ॥ ११–१३१/२ ॥ पुनः ध्रुव के द्वारा किरणों के छोड़े जाने पर उसी भाँति सूर्य मण्डलों के बाहर भ्रमण करता है; वह मण्डलों को घेरते हुए वेगपूर्वक चलता है ॥ १४-१५ ॥ देवता तथा मुनिगण नित्य दिन-रात भवस्वरूप ईश्वर सूर्यदेव का निरन्तर पूजन करते हैं। वह रथ देवताओं, आदित्यों, मुनियों, गन्धर्वों, अप्सराओं, ग्रामणियों, सर्पों तथा राक्षसों के द्वारा अधिष्ठित है । ये लोग सूर्य में दो-दो महीने क्रम से निवास करते हैं और कल्याणकारी आदित्य भास्कर को अपने तेजों से तृप्त करते हैं ॥ १६–१८ ॥ मुनिगण अपने वचनों से ग्रथित स्तुतियों के द्वारा सूर्य का स्तवन करते हैं; गन्धर्व तथा अप्सराएँ गान एवं नृत्य के द्वारा उनकी उपासना करते हैं; ग्रामणी, यक्ष तथा भूतगण किरणों का संग्रह करते हैं; सर्पगण सूर्य का वहन करते हैं; यातुधान (राक्षसगण ) उनका अनुगमन करते हैं और बालखिल्य [नामक ऋषिगण] उदयकाल से प्रारम्भ करके चारों ओर से घेरकर सूर्य को अस्ताचल की ओर ले जाते हैं। ये सब दो-दो महीने सूर्य में निवास करते हैं ॥ १९-२१ ॥ हे विप्रेन्द्रो! मधु (चैत्र), माधव (वैशाख), शुक्र (ज्येष्ठ), शुचि (आषाढ़), नभ (श्रावण), नभस्य (भाद्रपद), इष (आश्विन), ऊर्ज (कार्तिक), सह (मार्गशीर्ष), सहस्य (पौष), तपस्य (माघ) तथा तप (फाल्गुन) — ये बारह महीने मानव वर्ष में होते हैं। हे द्विजो ! वसन्त, ग्रीष्म, शुभ वर्षा, शरद, हिम ( हेमन्त ) तथा शिशिर — ये ऋतुएँ कही गयी हैं ॥ २२-२४ ॥ धाता, अर्यमा, मित्र, वरुण, इन्द्र, विवस्वान्, पूषा, पर्जन्य, अंशु, भग, त्वष्टा, विष्णु — ये बारह आदित्य हैं; पुलस्त्य, पुलह, अत्रि, वसिष्ठ, अंगिरा, बुद्धिमानों में श्रेष्ठ भृगु, भारद्वाज, गौतम, कश्यप, क्रतु, जमदग्नि तथा कौशिक — ये बारह ऋषि हैं; हे द्विजो ! वासुकि, कंकणीकर, तक्षक, नाग, एलापत्र, शंखपाल, ऐरावत, धनंजय, महापद्म, कर्कोटक, कम्बल तथा अश्वतर — ये बारह सर्प कहे गये हैं; हे मुनिश्रेष्ठो ! तुम्बुरु, नारद, हाहा, हूहू, श्रेष्ठ विश्वावसु, उग्रसेन, सुरुचि, परावसु, चित्रसेन, महातेजस्वी ऊर्णायु, धृतराष्ट्र तथा सूर्यवर्चा — ये बारह गन्धर्व हैं; हे सुव्रतो! साक्षात् देवी कृतस्थला, सुन्दर मुखवाली-उत्तम श्रोणिवाली दिव्य पुंजिकस्थला, मेनका, सहजन्या, पवित्र मुसकान वाली प्रम्लोचा, अनुम्लोचा, घृताची, विश्वाची, उर्वशी, पूर्वचित्ति, साक्षात् देवी तिलोत्तमा तथा कमल के समान मुखवाली रम्भा — ये बारह अप्सराएँ कही गयी हैं; रथकृत्, शुभ रथौजा, रथचित्र, सुबाहु, रथस्वन, वरुण, सुषेण, शुभ सेनजित्, तार्क्ष्य, अरिष्टनेमि, क्षतजित् तथा सत्यजित् — ये बारह ग्रामणी हैं; हेति, प्रहेति, पौरुषेय, वध, सर्प, व्याघ्र, आप, वात, विद्युत्, दिवाकर, ब्रह्मोपेत और राक्षसराज यज्ञोपेत — ये बारह यातुधान (राक्षस) हैं — ये सभी देवता आदि क्रम से सूर्य में निवास करते हैं। बारह की संख्या वाले ये सात गण अपने स्थान का अभिमान करने वाले हैं ॥ २५–३७१/२ ॥ धाता से लेकर विष्णुपर्यन्त जो बारह देवता (आदित्य) कहे गये हैं, वे अपने तेज से परम भानु को सन्तृप्त हैं। श्रेष्ठ मुनियो ! पुलस्त्य से लेकर कौशिक तक [ कहे गये] बारह मुनिगण यथाक्रम स्तुतियों के द्वारा सूर्य का स्तवन करते हैं। इसी प्रकार वासुकि से लेकर अश्वतरतक [ कहे गये ] बारह शुभ नाग यथाक्रम महादेव (सूर्य)-का वहन करते हैं। तुम्बुरु से लेकर सूर्यवर्चा तक [ कहे गये] बारह उत्तम गन्धर्व क्रम से गीतों के द्वारा इन सूर्य की उपासना करते हैं। कृतस्थला से लेकर रम्भा-पर्यन्त लेकर [ कही गयी ] सभी दिव्य अप्सराएँ यथाक्रम सरस नृत्यों के द्वारा सूर्य की उपासना करती हैं । रथकृत् से सत्यजित् पर्यन्त [ कहे गये] बारह दिव्य ग्रामणी क्रम से इस सूर्य की रथरश्मियों का संग्रह करते हैं। रक्षोहेति से लेकर यज्ञोपेत तक [ कहे गये ]-ये प्रमुख बारह राक्षस शस्त्र धारण करके क्रम से [ सूर्य के] पीछे-पीछे चलते हैँ ॥ ३८–४४१/२ ॥ धाता तथा अर्यमा [दो आदित्य ], प्रजापति पुलस्त्य तथा पुलह [ दो ऋषि ], वे दोनों नाग वासुकि एवं कंकणीक, गान करने वालों में श्रेष्ठ गन्धर्व तुम्बुरु तथा नारद, कृतस्थला एवं पुंजिकस्थला अप्सराएँ, वे दोनों ग्रामणी रथकृत् तथा रथौजा और यातुधान कहे गये राक्षस हेति तथा प्रहेति — यह समुदाय चैत्र एवं वैशाख महीनों में सूर्य में निवास करता है ॥ ४५-४८ ॥ इसी प्रकार ग्रीष्म ऋतु के दो महीनो में भी ये लोग निवास करते हैं । [ दो आदित्य ] मित्र तथा वरुण, ऋषि अत्रि एवं वसिष्ठ, [सर्प] तक्षक तथा नाग, [ दो अप्सराएँ] मेनका और सहजन्या, दो गन्धर्व हाहा तथा हूहू, रथचित्र एवं सुबाहु नामक वे दोनों ग्रामणी और यातुधान कहे गये पौरुषेय तथा वध-ये सब शुक्र (ज्येष्ठ) तथा शुचि ( आषाढ़ ) महीनों में सूर्य में निवास करते हैं ॥ ४९-५१ ॥ इसके बाद अन्य देवता सूर्य में निवास करते हैं । [आदित्य] इन्द्र तथा विवस्वान्, [ऋषि] अंगिरा तथा भृगु, वे दोनों सर्प एलापत्र एवं शंखपाल, [ गन्धर्व ] विश्वावसु तथा उग्रसेन, [ ग्रामणी] वरुण एवं रथस्वन, विख्यात प्रम्लोचा तथा अनुम्लोचा — वे दोनों और वे दोनों यातुधान सर्प तथा व्याघ्र-यह समुदाय अप्सराएँ नभ (श्रावण) तथा नभस्य (भाद्रपद) महीनों में सूर्य में निवास करता है ॥ ५२-५४१/२ ॥ [आदित्य] पर्जन्य तथा पूषा, [ऋषि] भरद्वाज एवं गौतम, [सर्प] धनंजय तथा इरावान् (ऐरावत), [गन्धर्व] सुरुचि तथा परावसु, अप्सराओं में श्रेष्ठ घृताची तथा परम सुन्दर विश्वाची, वे दोनों ग्रामणी-सेनानी सेनजित् तथा सुषेण और यातुधान कहे गये वे दोनों आप तथा वात — ये सब इष (आश्विन ) तथा ऊर्ज (कार्तिक) महीनों में सूर्य में निवास करते हैं ॥ ५५-५७१/२ ॥ इसी प्रकार हेमन्त ऋतु के दो महीनों में भी ये लोग सूर्य में निवास करते हैं। ये दोनों [आदित्य ] अंशु तथा भग, [ऋषि] कश्यप तथा क्रतु, भुजंग महापद्म तथा सर्प कर्कोटक, वे दोनों गन्धर्व चित्रसेन तथा ऊर्णायु, दोनों अप्सराएँ उर्वशी तथा पूर्वचित्ति, ग्रामणी – सेनानी तार्क्ष्य तथा अरिष्टनेमि और यातुधान कहे गये दोनों विद्युत् तथा दिवाकर — ये सब सह (मार्गशीर्ष) तथा सहस्य (पौष) महीनों में सूर्य में निवास करते हैं ॥ ५८- ६१ ॥ इसके बाद [आदित्य] त्वष्टा तथा विष्णु, [ ऋषि ] जमदग्नि तथा विश्वामित्र, कद्रू के पुत्र दोनों नाग कम्बल तथा अश्वतर, गन्धर्व धृतराष्ट्र तथा सूर्यवर्चा, मनोहर अप्सरा देवी रम्भा तथा तिलोत्तमा, लोक में प्रसिद्ध ग्रामणी रथजित् तथा सत्यजित् और ब्रह्मोपेत तथा यज्ञोपेत – जो यातुधान कहे गये हैं — ये सब शिशिर ऋतु के दो महीनों (माघ और फाल्गुन )-में [ सूर्य में] निवास करते हैं ॥ ६२-६५ ॥ ये देवतागण क्रम से दो-दो महीने सूर्य में निवास करते हैं। बारह की संख्या में ये सात समूह अपने स्थान का अभिमान करने वाले हैं। ये सब तेज के द्वारा उत्तम तेज वाले सूर्य को सन्तृप्त करते हैं । मुनिगण अपने द्वारा विरचित स्तुतियों से सूर्य का स्तवन करते हैं, गन्धर्व तथा अप्सराएँ नृत्य – गानों से उनकी उपासना करते हैं, ग्रामणी-यक्ष-भूत रथरश्मियों को पकड़े रहते हैं, सर्पगण सूर्य का वहन करते हैं, यातुधान पीछे-पीछे चलते हैं और बालखिल्य [ ऋषिगण ] चारों ओर से घेरकर सूर्य को उदय से अस्त की प्राप्ति कराते हैं ॥ ६६-६९ ॥ इन्हीं देवताओं का जैसा तेज, जैसा तप, जैसा योग, जैसा मन्त्र, जैसा धर्म तथा जैसा बल होता है, उनसे समृद्ध होकर वे सूर्य तेजयुक्त होकर तपते हैं । ये सभी सूर्य में दो-दो महीने निवास करते हैं। ऋषिगण, देवता, गन्धर्व, सर्प, अप्सराओं के समूह, ग्रामणी, यक्ष तथा यातुधान (राक्षस) ये ही मुख्यरूप से तपते हैं, बरसते हैं, प्रकाश करते हैं, सृजन करते हैं और आराधित होकर प्राणियों के अशुभ कर्म का नाश करते हैं। ये लोग दुरात्मा मनुष्यों के शुभ का नाश करते हैं और कहीं-कहीं सज्जनों के पाप का हरण करते हैं ॥ ७०-७४ ॥ ये इच्छानुसार चलने वाले तथा वायुवेग से गमन करने वाले दिव्य विमान में स्थित होकर सूर्य के साथ पूरे दिन भ्रमण करते हैं। हे द्विजो ! ये वर्षा करते हुए, तपते और [को] आह्लादित करते हुए सभी प्राणियों को एक मन्वन्तर पर्यन्त विनाश से बचाते हैं ॥ ७५-७६ ॥ अतीत तथा अनागत (भविष्य में होने वाले) स्थानाभिमानियों का तथा इस समय जो विद्यमान हैं, उन सभी का यह स्थान सभी मन्वन्तरों में हुआ करता है। ये चौदह गण सात-सात समूह में सभी चौदह मन्वन्तरों में सूर्य में निवास करते हैं ॥ ७७-७८ ॥ श्रेष्ठ मुनियो ! मैंने बुद्धिमान् देवदेव के क्रिया-कलाप का संक्षेप में तथा विस्तार से वर्णन कर दिया, जैसा घटित हुआ था और जैसा मैंने सुना था । ये देवता दो-दो महीने क्रम से सूर्य में निवास करते हैं । बारह-बारह देवताओं के ये सात समूह अपने स्थान (पद)-का अभिमान करने वाले हैं ॥ ७९-८० ॥ इस प्रकार ये दिवाकर सूर्य हरितवर्ण के [सात] अविनाशी अश्वों द्वारा खींचे जाते हुए एक चक्र वाले रथ से वेगपूर्वक चलते हैं। ये सूर्य एक चक्र वाले रथ से [उक्त ] सात समूहों के साथ आकाश में दिन-रात भ्रमण करते हुए सात द्वीपों तथा समुद्रों वाली पृथ्वी के ऊपर भ्रमण करते हैं ॥ ८१-८२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘सूर्यरथनिर्णय’ नामक पचपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५५ ॥ See Also :- 1. भगवान् के अङ्ग, उपाङ्ग और आयुधों का रहस्य तथा विभिन्न सूर्यगणों का वर्णन 2. सूर्यदेव के रथ एवं उसके साथ भ्रमण करनेवाले देवता-नाग आदि का वर्णन Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe