December 23, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -006 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ छठा अध्याय अग्नि तथा पितरों के वंश का वर्णन, ब्रह्माजी से रुद्रों का प्रादुर्भाव, परमेष्ठी सदाशिव की महिमा श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे षष्ठोऽध्यायः शङ्कर माहात्म्य सृष्टि वर्णनं सूतजी बोले — अग्नि[^1] के वे तीन पुत्र पवमान, पावक तथा शुचि नाम से विख्यात हुए । अरणी आदि में घर्षण से पवमान, विद्युत् से पावक तथा सूर्य-प्रभा से शुचि का आविर्भाव हुआ। ये तीनों स्वाहा के पुत्र हैं। अब यहाँ पुत्रों तथा पौत्रों को मिलाकर इनकी संख्या संक्षेप में बतायी जाती है ॥ १-२ ॥ आदि में सप्तक का त्याग करके कुल उनचास अग्नियाँ कही गयी हैं । ये यज्ञों में आराधित की जाती हैं ॥ ३ ॥ ये सभी तपस्वी, व्रतधारी, प्रजाओं के पति तथा रुद्रस्वरूप कहे गये हैं ॥ ४ ॥ अयज्वा तथा यज्वा — ये दो प्रकार के प्रसन्न मन वाले पितर हैं। उनमें यज्वा (यज्ञ करने वाले) पितरों को अग्निष्वात्त तथा अयज्वा पितरों को बर्हिषद कहा जाता है ॥ ५ ॥ स्वधा ने उन अग्निष्वात्त पितरों से मेना नामक मानसी कन्या उत्पन्न की। अग्निष्वात्त पितरों की वह मानसी पुत्री मेना लोक में अतीव प्रसिद्ध हुई ॥ ६ ॥ मेना ने मैनाक, क्रौञ्च, उसकी अनुजा उमा तथा शिवजी के अंग-श्लेष के कारण ( मस्तक पर विराजमान रहने के कारण) जगत् को पवित्र करने का गुण रखने वाली हैमवती गंगा को उत्पन्न किया ॥ ७ ॥ कमल के समान मुखवाली मेरुराजपत्नी स्वधा ने यज्ञानुष्ठान में प्रवृत्त रहने वाली धरणी नामक मानसी पुत्री को जन्म दिया। यहाँ अमृतपान करने वाले पितरों तथा ऋषियों के कुल का विस्तार दिया जा रहा है; आप लोग उसे विस्तारपूर्वक सुनिये ॥ ८-९ ॥ अब मैं आप सबसे पूर्वनिरूपित विषय का पुनः पृथक् अध्याय में वर्णन करता हूँ । दक्षकन्या सती का विवाह रुद्र के साथ हुआ और वे उनके साथ चली गयीं। फिर इन्हीं सती ने दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करके अपना देहत्याग कर दिया। इसके बाद पार्वतीरूप में पुनः शिवजी को पति के रूप में प्राप्त किया ॥ १०१/२ ॥ हे मुनिशार्दूलो ! उन (पार्वती) – का ध्यान करके ब्रह्माजी की प्रार्थना पर नीललोहित महादेवजी ने क्षण- भर में लीलापूर्वक अपने ही तुल्य तथा समस्त लोकों के वन्दनीय अनेक रुद्र उत्पन्न कर दिये। उन रुद्रों ने सभी चौदह भुवनों[^2] को पूर्णरूपेण व्याप्त कर लिया ॥ ११-१२१/२ ॥ जरा-मरण से मुक्त तथा निर्मल आत्मा वाले उन विविध नीललोहित रुद्रों को देखकर पितामह ब्रह्माजी ने उनसे कहा — ॥ १३१/२ ॥ हे त्रिनेत्रधारी नीललोहित महादेवो ! आप सभी को नमस्कार है। आप सभी सर्वज्ञ हैं, सर्वव्यापी हैं, दीर्घ- ह्रस्व-वामन (बौना)-रूप धारण करने वाले हैं, शुभ हैं, हिरण्यकेश हैं, दृष्टिघ्न हैं, नित्य हैं, चेतनायुक्त हैं, निर्मल आत्मावाले हैं, द्वन्द्वरहित हैं, वीतराग हैं, विश्व की आत्मा हैं तथा शिवजी के आत्मज हैं। इस प्रकार उन रुद्रों की अनेकविध स्तुति करके कनकाण्डज (हिरण्यगर्भ ) भगवान् ब्रह्मा ने शिवजी की प्रदक्षिणा कर उन भवरूप शिव से कहा — ॥ १४–१६ ॥ हे महादेव! आपको नमस्कार है । हे प्रभो ! हे शंकर! आपने तो अमर प्रजाओं को उत्पन्न कर दिया; ऐसी मृत्युहीन प्रजा की सृष्टि उचित नहीं है। अतएव हे विभो ! अब आप मरणधर्मा प्रजाओं का सृजन करने की कृपा करें ॥ १७ ॥ तब भगवान् शंकर ने ब्रह्मा से कहा — हे प्रभो ! उस प्रकार की (मरणधर्मा) सृष्टि करने की मेरी स्थिति नहीं है । अतएव आप ही मृत्यु से युक्त रहने वाली प्रजा का अपने इच्छानुसार सृजन कीजिये ॥ १८ ॥ भगवान् शंकर की ऐसी आज्ञा प्राप्तकर चतुरानन ब्रह्मा ने जरा-मरण से युक्त इस सम्पूर्ण स्थावर-जंगम जगत् की रचना की ॥ १९ ॥ भगवान् शंकर भी उस समय रुद्रों (रुद्रात्मक सृष्टि सृजन) – से निवृत्त आत्मावाले होकर अधिष्ठित हो गये। हे विप्रो ! निष्कल आत्मा वाले तथा अपनी इच्छा से शरीर धारण करने वाले उन महात्मा शंकर का स्थाणुत्व हो गया। इसीलिये वे भगवान् रुद्र दयार्द्र होकर सभी प्राणियों का कल्याण करते हैं ॥ २०-२१ ॥ भगवान् शंकर की आत्मा बिना प्रयत्न के हो कल्याण करने वाली है। वे योगविद्या के द्वारा वैराग्य में स्थित रहते हैं। विरक्त पुरुष की मुक्ति को ही कल्याण कहा जाता है ॥ २२ ॥ स्वल्प विषयों का त्याग करके प्राणी सांसारिक भय से मुक्त होकर क्रम से वैराग्य को प्राप्त होता है और उस वैराग्य से उस विरागी पुरुष को अन्त में शिवजी का साक्षात् दर्शन प्राप्त होता है ॥ २३ ॥ संसार-निवर्तक आत्मानात्म-विवेकरूप विशिष्ट ज्ञान का विचार किये बिना जो क्षणिक विषयत्याग है, वह ज्ञानरहित होने से अस्थायी है, अतएव विमुख्य [ अप्रशंस्य ] है । उस सत् असत् वस्तु – विवेकरूप विचार तथा इस (सांसारिक) विषयों के त्याग का एक साथ होना परमेष्ठी सदाशिव के कृपाप्रसाद से ही सम्भव है ॥ २४ ॥ इस लोक में धर्म, ज्ञान, वैराग्य तथा ऐश्वर्य शिवजी की कृपा से प्राप्त होते हैं। वे कल्याण करने के कारण शंकर हैं, पिनाक नामक धनुष धारण करने के कारण पिनाकी हैं तथा उनका कण्ठ नीला एवं देह लाल होने के कारण नीललोहित हैं ॥ २५ ॥ जो प्राणी शंकरजी का आश्रय ग्रहण करते हैं अर्थात् उनके शरणागत होते हैं, वे सभी मुक्ति प्राप्त करते हैं। भगवान् शंकर के आश्रित महान् पापी भी अत्यन्त भयावह नरक को नहीं प्राप्त होते हैं । वे शिवजी के शाश्वत पद को पा जाते हैं। इस विषय में कोई भी संदेह नहीं है ॥ २६१/२ ॥ ऋषिगण बोले — अहंकार (घोर) – से लेकर मायापर्यन्त विभिन्न प्रकार के कुल अट्ठाईस करोड़ नरक हैं; उनमें जाकर पापी प्राणी अपने द्वारा किये गये कर्मों के फल भोगते हैं । ये वही प्राणी होते हैं, जो शिव, रुद्र, शंकर, नीललोहित, सभी प्राणियों के आश्रय, अव्यय, जगत्पति, विराट् पुरुष, परमात्मा, पुरुहूत, पुरुष्टुत, तमोगुण की प्रधानता होने पर कालरुद्ररूप, रजो- गुण की प्रधानता होने पर ब्रह्मारूप, सत्त्वगुण की प्रधानता होने पर सर्वव्यापी विष्णुरूप तथा गुणरहित होने पर महेश्वर-रूप भगवान् महादेवजी का आश्रय ग्रहण नहीं किये होते हैं ॥ २७-३० ॥ हे महामते ! अब हम लोगों की यह सुनने की उत्कट अभिलाषा है कि किन-किन कर्मों के करने अथवा न करने से मनुष्य नरक को प्राप्त होते हैं ॥ ३१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘शंकरमाहात्म्यवर्णन’ नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६ ॥ [^1]: अग्निवंश के लिए वायु प्रथम 29; ब्रह्मांड प्रथम 1.10; मार्कंडेय 52.20-21, विष्णु 1.10.14-17 देखें । लिंग (11.12-33) के अनुसार, सृष्टिकारक शक्ति जो ब्रह्मांडीय अंडे में व्याप्त है और सृष्टि का कार्य करती है , वह है उनतालीस अग्नियाँ (द्वितीय 12.35), जो रुद्र (1.6.4) के विभिन्न रूप हैं, जबकि हरिवंश के अनुसार वे रुद्र के सेवक (2.122. 17-40) हैं। [^2]: ब्रह्माण्ड चौदह लोकों से बना है, जिनमें से सात पृथ्वी के ऊपर और सात पृथ्वी के नीचे स्थित हैं। ऊर्ध्व लोक:— सत्यलोक, तपोलोक, जनलोक, महर्लोक, स्वर्लोक, भुवर्लोक, भूर्लोक (पृथ्वी), और अधो लोक:— अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल, और पाताल। Content is available only for registered users. 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