January 25, 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -069 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ उनहत्तरवाँ अध्याय चन्द्रवंश-वर्णन में भगवान् श्रीकृष्ण के अवतार की कथा तथा संक्षेप में कृष्णचरित का वर्णन श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे एकोनसप्ततितमोऽध्यायः सोमवंशानुकीर्तनं सूतजी बोले — [हे ऋषियो!] सत्यसम्पन्न सात्त्वत ने तेजस्वी भजन, दिव्य राजा देवावृध, महाभाग्यशाली अन्धक तथा यदुनन्दन वृष्णि — इन चार पुत्रों को उत्पन्न किया। अब उनके चारों वंशों को विस्तारपूर्वक सुनिये ॥ १-२ ॥ तेजस्वी भजन के द्वारा सृजयी से अयुतायु, शतायु तथा बलवान् हर्षकृत् उत्पन्न हुए बताये गये हैं ॥ ३ ॥ [सात्त्वत के] उन पुत्रों में राजा देवावृध ने ‘मेरे सर्वगुणसम्पन्न पुत्र उत्पन्न हो ‘ – ऐसा स्मरण करते हुए घोर तपस्या की। तब उसे बभ्रु नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो पवित्र यश वाला उत्तम राजा था । वंशपरम्परा के प्राचीन ज्ञाता महान् आत्मा वाले देवावृध के गुणों की प्रशंसा करते हुए यह गाथा गाते हैं — बभ्रु के विषय में हमलोग जैसा दूर से सुनते हैं, वैसा ही समीप से देखते हैं। देवताओं के समान देवावृध की तरह बभ्रु मनुष्यों में श्रेष्ठ है। चौदह हजार पैंसठ [ऐसे] पुरुष थे, जिन्होंने देवावृध पुत्र बभ्रु से अमृतत्व प्राप्त किया था । वह यज्ञ करने वाला, दानबुद्धि वाला, पराक्रमी, ब्राह्मणों की रक्षा करने वाला, दृढ़व्रत से युक्त, कीर्तिशाली, महातेजस्वी तथा सात्त्वतों में महारथी था । उसके वंश में देवतुल्य भोजलोग उत्पन्न हुए ॥ ४-९ ॥ गान्धारी तथा माद्री — ये वृष्णि की भार्याएँ थीं। गान्धारी ने सुमित्र तथा मित्रनन्दन को जन्म दिया। माद्री ने देवमीढुष नामक पुत्र को उत्पन्न किया, उसके बाद उसने अनमित्र तथा शिनि नामक पुत्रों को उत्पन्न किया; वे दोनों उत्तम पुरुष थे ॥ १०-११ ॥ अनमित्र का पुत्र निघ्न हुआ । निघ्न के दो पुत्र हुए – प्रसेन तथा महाभाग्यशाली सत्राजित् । सूर्य उस सत्राजित् का प्राणतुल्य मित्र था । सूर्य ने उसे स्यमन्तक नामक मणि दी थी। वह मणि पृथ्वी पर सभी रत्नों में श्रेष्ठ थी। किसी समय वह प्रसेन मणि से युक्त होकर आखेट के लिये गया हुआ था; एक महाभयंकर सिंह ने उसका वध कर दिया, उस समय वह असहाय था ॥ १२–१४१/२ ॥ वृष्णि के कनिष्ठ पुत्र शिनि से सत्यक नामक सत्यवादी तथा सत्यनिष्ठ पुत्र उत्पन्न हुआ । उसका पुत्र युयुधान था; जो सात्यकि नाम से प्रसिद्ध था। वह शिनि का प्रतापशाली नप्ता (नाती) था । युयुधान का पुत्र असंग तथा उस [असंग] – का पुत्र कुणि हुआ । कुणि का पुत्र युगन्धर हुआ। ये शिनि के वंशज कहे गये हैं ॥ १५–१७ ॥ माद्री तथा वृष्णि से पुत्र युधाजित् उत्पन्न हुआ; वह श्वफल्क नाम से विख्यात हुआ। वह तीनों लोकों का हित करने वाला था । धर्मात्मा महाराज श्वफल्क जहाँ रहते थे, वहाँ न व्याधिभय रहता था और न अनावृष्टिभय रहता था। उन श्वफल्क ने काशिराज की पुत्री को भार्या के रूप में प्राप्त किया था। काशिराज ने अपनी गान्दिनी नामक कन्या को उन्हें प्रदान किया था ॥ १८-२० ॥ वह अपनी माता के गर्भ में बहुत वर्षों तक स्थित रही और जब वहाँ निवास करती हुई उसने जन्म नहीं लिया, तब पिता ने गर्भ में विद्यमान उस [कन्या ] से कहा था — ‘तुम शीघ्र जन्म ग्रहण करो, तुम्हारा कल्याण हो, तुम [ गर्भ में ही] क्यों रुकी हुई हो ?’ तब गर्भ में स्थित उस कन्या गान्दिनी ने उनसे कहा — ‘हे पितः ! यदि आप तीन वर्षों तक प्रतिदिन एक गाय ब्राह्मण को दान में दें, तब मैं गर्भ से बाहर निकलूंगी।’ इसपर पिता ने कहा — ‘वैसा ही होगा।’ इसके बाद पिता ने उसकी कामना पूर्ण की। उसी कन्या से श्वफल्क के द्वारा अक्रूर उत्पन्न कहा गया है, जो दानी, पराक्रमी, यज्ञ करने वाला, विद्वान्, अतिथिप्रिय तथा विपुल दक्षिणा देने वाला था। शैवकी रत्ना नामक कन्या थी, उसी को अक्रूर ने [ भार्यारूप में] प्राप्त किया था। [हे ऋषियो!] उसने इस [ कन्या ] से जिन पुत्रों को उत्पन्न किया, उन्हें आप सुनिये — वे उपमन्यु, मागु, वृत, जनमेजय, गिरिरक्ष, उपेक्ष, शत्रुघ्न, अरिमर्दन, धर्मभृत् दृष्टधर्मा, गोधन, वर, आवाह तथा प्रतिवाह [ नाम वाले] थे और सुधारा नामक एक सुन्दर कन्या भी उत्पन्न हुई थी । अक्रूर को उग्रसेन की कन्या से देववान् तथा उपदेव नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए; वे कुल को आनन्द प्रदान करने वाले एवं देवतुल्य थे ॥ २१–२८१/२ ॥ सुमित्र को चित्रक नामक महायशस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ । चित्रक के विपृथु पृथु, अश्वग्रीव, सुबाहु, सुधासूक, गवेक्षण, अरिष्टनेमि, अश्व, धर्म, धर्मभृत्, सुभूमि, बहुभूमि [नामक] पुत्र उत्पन्न हुए और श्रविष्ठ तथा श्रवणा [नामक] दो कन्याएँ उत्पन्न हुईं। काशिराज की पुत्री ने अन्धक से कुकुर, भजमान, शुचि तथा कम्बलबर्हि नामक चार पुत्रों को उत्पन्न किया। कुकुर का पुत्र वृष्णि हुआ और उस वृष्णि से शूर नामक पुत्र उत्पन्न हुआ । उसका पुत्र कपोतरोमा हुआ; वह महाबलवान् था। उस [कपोतरोमा]-का पुत्र विलोमक हुआ । उसका पुत्र नल हुआ; वह तुम्बुरु (गन्धर्व) – का मित्र और विद्वान् था । वह चन्दनानकदुन्दुभि नाम से प्रसिद्ध हुआ ॥ २९-३४ ॥ उससे अभिजित् नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। उस [अभिजित्]-का पुत्र पुनर्वसु हुआ। उस श्रेष्ठ राजा ने पुत्र के लिये अश्वमेधयज्ञ किया था। उस यज्ञ में जब मन्त्रों का उच्चारण हो रहा था, तब पूजनकर्ताओं के मध्य पुनर्वसु ने जन्म लिया था। वह विद्वान्, सर्वज्ञ, दानी तथा यज्ञ करने वाला हुआ । उस अभिजित् के जुड़वाँ पुत्र भी उत्पन्न हुए; कीर्तिमानों में श्रेष्ठ वे दोनों आहुक तथा आहुकि नाम वाले कहे गये हैं। आहुक से काश्य की पुत्री को देवक एवं उग्रसेन नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए; वे दोनों देवताओं के पुत्रों के समान थे। राजा देवक के देववान्, उपदेव, सुदेव तथा देवरक्षित – ये देवतुल्य पुत्र उत्पन्न हुए। उनकी सात बहनें थीं। राजा ने उन्हें वसुदेव को दे दिया। वे वृषदेवा, उपदेवा, देव-रक्षिता, श्रीदेवा, शान्तिदेवा, सहदेवा तथा देवकी [नामवाली ] थीं। उनमें देवकी वरिष्ठ एवं परम सुन्दरी थी ॥ ३५–४१ ॥ उग्रसेन के नौ पुत्र थे; कंस उनमें ज्येष्ठ था । उन सबके सैकड़ों-हजारों पुत्र तथा पौत्र थे । देवक की पुत्री [देवकी] बुद्धिमान् वसुदेव की भार्या हुई; वह देवताओं की भी वन्दनीया तथा पूजनीया और पतिव्रता थी । बाह्लिकपुत्री पौरवी महाभाग्यशालिनी रोहिणी भी आनकदुन्दुभि (वसुदेव) – की पत्नी थी; वह देवताओं के द्वारा भी पूजाके योग्य थी ॥ ४२–४४ ॥ कंस के भय से [ स्वयं देवकी के गर्भ से निकलकर ] रोहिणी के गर्भ का आश्रय लेने वाले, बलशालियों में श्रेष्ठ, हल का आयुध धारण करने वाले तथा शान्त तेजवाले बलराम को रोहिणी ने उत्पन्न किया; परम सुन्दर छः गर्भो [^1]के [कंस द्वारा ] वध कर दिये जाने के बाद और बलराम के जन्म लेने के बाद बुद्धिमान् वसुदेव ने देवकी से श्रीकृष्ण को उत्पन्न किया । वे ही परमात्मा, देवदेव तथा जनार्दन हैं और रजत (चाँदी)-के समान कान्ति वाले हलायुध (बलराम) भगवान् अनन्त (शेष) हैं। वे जनार्दन ( श्रीविष्णु) भृगु के शाप के बहाने मानवशरीर धारण करना स्वीकार करते हुए उस देवकी से वसुदेव के पुत्ररूप में उत्पन्न हुए थे ॥ ४५-४८ ॥ उसी समय देवदेव [ श्रीविष्णु ] की आज्ञा से उमा के देह से उत्पन्न योगनिद्रा [ भगवती ] कौशिकी ने यशोदा की पुत्री के रूप में जन्म लिया था। वे ही सभी देवताओं से नमस्कृत साक्षात् प्रकृति हैं और धर्म तथा मोक्ष का फल देने वाले भगवान् कृष्ण पुरुष हैं ॥ ४९-५० ॥ उस समय कंस से अपने पुत्र की रक्षा करते हुए बुद्धिमान् वसुदेव ने चार भुजाओं वाले, विशाल नेत्रों वाले श्रीवत्स के चिह्न से युक्त, शख-चक्र-गदा-पद्म धारण करने वाले जनार्दन को यशोदा को देकर उस कन्या को ले लिया। लोकों के रक्षक तथा अपनी इच्छा से शरीर धारण करने वाले इन विष्णु को देकर उन्होंने नन्दगोप से कहा — ‘इसकी रक्षा कीजिये।’ अमित तेज वाले देवदेव शिव की कृपा से बलराम के साथ उन वरदायक, परमेश्वर, पृथ्वी का भार दूर करने के लिये अवतीर्ण तथा जगत् के गुरु [ श्रीकृष्ण ] – को प्रदान करके कहा था — ‘ इससे यादवों का सब प्रकार का कल्याण होगा। यह देवकी का वही पुत्र है, जो हम लोगों के कष्टों को दूर करेगा’ ॥ ५१–५५१/२ ॥ उसके बाद वसुदेव ने उग्रसेनपुत्र कंस से सुन्दर लक्षणों वाली उस उत्पन्न हुई कन्या के विषय में बताया — हे कंस ! हे सुव्रत ! यह देवकी का आठवाँ गर्भ ही तुम्हारा मृत्युरूप होगा; इसमें सन्देह नहीं – यह पुरातन वाणी है। तब कंस ने उसे मारना आरम्भ किया। किंतु [उसके हाथ से छूटकर] आकाश में जाकर उस अष्टभुजा देवी ने मेघ के समान गम्भीर वाणी में कहा — ‘ [हे कंस ! ] अब तुम अपने देह की रक्षा करो। मायावी कंस के स्वरूप में रहने वाले इस देह की रक्षा करते हुए तुम्हारी मृत्यु आ गयी है; अरे, मूर्ख ! तुमने कैसा अपराध कर डाला, तुम्हारा अन्त करने वाला तो उत्पन्न हो चुका है’ ॥ ५६–६० ॥ उस कंस ने भय से देवकी के आठवें गर्भ को मार डालने का प्रयत्न किया था; क्योंकि उसने स्मरण कर रखा था कि जिससे उसकी मृत्यु निर्धारित है, वह देवकी का आठवाँ पुत्र है। हे श्रेष्ठ मुनियो ! प्रतीकार करने में कंस का जो भी प्रयास था, वह व्यर्थ हो गया और [ भगवान्] श्रीहरि के प्रभाव से उस वाणी के द्वारा वह कंस जड़ कर दिया गया था। [ अन्त में] अक्लिष्ट कर्म करने वाले उन श्रीकृष्ण ने कंस को भी मार डाला और देवताओं तथा ब्राह्मणों का वध करने वाले अन्य बहुत-से दुष्टों को भी मार डाला ॥ ६१-६३ ॥ श्रीकृष्ण प्रद्युम्न आदि बहुत-से पुत्र बताये गये हैं; वे सब युद्ध में प्रवीण थे । कृष्ण के पुत्र कृष्ण के ही समान थे। श्रीकृष्ण के इन सभी पुत्रों में चारुदेष्ण आदि पुत्र विशिष्ट तथा बलवान् थे; वे रुक्मिणी के पुत्र शत्रुओं का विनाश करने वाले थे । कृष्ण की सोलह हजार एक सौ भार्याएँ थीं; उन रुक्मिणी [उनकी] ज्येष्ठ पत्नी थी। अक्लिष्ट कर्म करने वाले श्रीकृष्ण ने उस [ रुक्मिणी] के साथ बारह वर्षों तक उपवास करते हुए [केवल ] वायुभक्षण से पुत्रहेतु [ भगवान् ] शिव का पूजन किया था । [ परिणामस्वरूप ] श्रीकृष्ण ने शूलपाणि (शिव) – की कृपा से चारुदेष्ण, सुचारु, चारुवेष, यशोधर, चारुश्रवा, चारुयश, प्रद्युम्न तथा साम्ब – इन पुत्रों को प्राप्त किया था ॥ ६४–६९ ॥ रुक्मिणी के उन वीर पुत्रों को तथा रुक्मिणी को देखकर बुद्धिमान् कृष्ण की पत्नी जाम्बवती ने कृष्ण से कहा — ‘हे कमलनयन! आप प्रसन्न होकर मुझे विशिष्ट, महान् गुणी तथा शिवजी को प्रिय पुत्र प्रदान कीजिये । तदनन्तर जाम्बवती का वचन सुनकर अनिन्द्य एवं तपोनिधि जगन्नाथ श्रीहरि ने तप करना प्रारम्भ किया ॥ ७०-७२ ॥ शंख, चक्र तथा गदा धारण करने वाले उन जनार्दन नारायण श्रीकृष्ण ने मुनि व्याघ्रपाद के श्रेष्ठ आश्रम में जाकर उन अंगिरागोत्रिय ऋषि को देखकर उन्हें प्रणाम करके उनकी आज्ञा से दिव्य पाशुपतयोग प्राप्त किया ॥ ७३-७४ ॥ दाढ़ी तथा सिर को मुण्डित कराकर, शरीर को घृत से अनुलिप्तकर तथा मूँज की मेखला धारण करके [ व्रत में] दीक्षित होकर परंतप भगवान् श्रीकृष्ण तपस्या करने लगे। उन श्रीकृष्ण ने हाथों को ऊपर उठाकर, आश्रयरहित होकर तथा पैर के अँगूठे के अग्रभाग पर स्थित होकर क्रमशः फल, जल एवं वायु का आहार ग्रहण करते हुए तीन ऋतुओं तक तपस्या की ॥ ७५-७६ ॥ उनकी तपस्या से सन्तुष्ट होकर [ भगवान् ] रुद्र ने महात्मा कृष्ण को अनेक वर प्रदान किया तथा जाम्बवती से साम्ब नामक पुत्र प्राप्त होने का वर प्रदान किया। तब श्रीकृष्ण की भार्या जाम्बवती पुत्र साम्ब को प्राप्त करके उसी प्रकार परम हर्षित हुईं, जैसे अदिति आदित्य को प्राप्त करके हर्षित हुई थीं ॥ ७७-७८ ॥ हे मुनिश्रेष्ठो ! उन श्रीकृष्ण ने बुद्धिमान् रुद्र के शाप के कारण बाणासुर की हजार भुजाओं को काट डाला था। इसके बाद बलराम को सहायक बनाकर उन्होंने युद्धक्षेत्र में लीलापूर्वक [अनेक] दैत्यों का तथा दुष्ट राजाओं का वध किया ॥ ७९-८० ॥ यज्ञवराह से उत्पन्न दैत्यश्रेष्ठ नरकासुर का वध करके अतुलनीय पराक्रम वाले तथा महाबली उन श्रीकृष्ण ने ऊर्ध्वचक्र वाले वायुदेव तथा ब्रह्मापुत्र महात्मा नारद के वरदान से अपने उपभोग के योग्य सोलह हजार एक सौ कन्याओं को ग्रहण किया था ॥ ८१-८२ ॥ उन्होंने विप्रों के शाप के बहाने अपने कुल का संहार कर डाला और उस कुल का संहरण करके वे अच्युत (श्रीकृष्ण) प्रभासक्षेत्र में रहने लगे। तदनन्तर वृद्धावस्था के कष्ट का हरण करने वाले उन श्रीकृष्ण का द्वारका में रहते हुए सौ वर्ष से अधिक समय व्यतीत हुआ ॥ ८३-८४ ॥ उन्होंने [ द्वारका के समीपवर्ती] पिण्डारक क्षेत्र में निवास करने वाले विश्वामित्र, कण्व, बुद्धिमान् नारद तथा दुर्वासा के शाप तथा वचन की रक्षा की । [ व्याध के द्वारा बनाये गये ] जरकास्त्र के बहाने अपने मानव शरीर का परित्याग करके उस व्याध पर कृपा [^2] करके वे श्रीकृष्ण द्युलोक [अपने धाम ] को चले गये ॥ ८५-८६ ॥ अष्टावक्रमुनि के शाप से बुद्धिमान् श्रीकृष्ण की सभी भार्याएँ उनकी माया के प्रभाव से चोरों द्वारा अपहृत कर ली गयीं । बलराम भी अपने शरीर का त्याग करके शेषनाग का रूप धारणकर [अपने लोक] चले गये। उन श्रीकृष्ण की रुक्मिणी आदि प्रमुख कल्याणमयी सभी पटरानियाँ अक्लिष्ट कर्मवाले श्रीकृष्ण के साथ अग्नि में प्रविष्ट हो गयीं। हे विप्रो! देवी रेवती ने भी बुद्धिमान् बलभद्रजी के साथ अग्नि में प्रवेश किया और उन्होंने अपने पति मार्ग का अनुगमन किया ॥ ८७–८९१/२ ॥ तत्पश्चात् महाशक्तिशाली तथा उत्तम व्रत वाले उन अर्जुन ने श्रीकृष्ण, बलराम तथा अन्य वृष्णिवंशियों का और्ध्वदैहिक कृत्य करके द्रव्यों के अभाव के कारण कन्द-मूल-फलों के द्वारा बलि-कार्य (पिण्डदानादि श्राद्धकार्य ) किया; इसके बाद वे अर्जुन अपने भाइयों के साथ स्वयं स्वर्गलोक चले गये ॥ ९०-९११/२ ॥ इस प्रकार मैंने अक्लिष्ट कर्म वाले महात्मा श्रीकृष्ण के प्रभाव तथा अपनी इच्छा से उनके तिरोधान का वर्णन संक्षेप में कर दिया । हे द्विजो ! जो [ मनुष्य ] सोमवंशीय राजाओं के इस चरित्र को पढ़ता है या सुनता है अथवा ब्राह्मणों को सुनाता है, वह विष्णुलोक प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ ९२-९४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘सोमवंशानुकीर्तन’ नामक उनहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६९ ॥ [^1]: सुषेण, कीर्तिमान्, भद्रसेन, जारुख्य, विष्णुदास और भद्रदेह। [^2]: मा भैर्जरे त्वमुत्तिष्ठ काम एष कृतो हि मे । याहि त्वं मदनुज्ञातः स्वर्गं सुकृतिनां पदम् ॥ ( श्रीमद्भा० ११ । ३० । ३९) [ भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा — ] हे जरे ! तू डर मत, उठ उठ ! यह तो तूने मेरे मन का काम किया है। जा, मेरी आज्ञा से तू उस स्वर्ग में निवास कर, जिसकी प्राप्ति बड़े- बड़े पुण्यवानों को होती है। Content is available only for registered users. 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