January 25, 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -070 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ सत्तरवाँ अध्याय महेश्वर से होने वाली आदिसृष्टि का स्वरूप, नवविध सर्ग वर्णन एवं प्राजापत्य सर्ग निरूपण तथा भगवती सती की देह से अनेक देवियों का प्रादुर्भाव श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सप्ततितमोऽध्यायः सृष्टिविस्तार ऋषिगण बोले — हे सूतजी ! हे सुव्रत ! आपने आदिसृष्टि का परिचय मात्र दिया, उस पर प्रकाश नहीं डाला; अब आप [इसे] विस्तार से बताने की कृपा कीजिये ॥ १ ॥ सूतजी बोले — हे मुनीश्वरो ! परमात्मा देव महेश्वर महादेव प्रकृति तथा पुरुष से परे हैं। उन्हीं ईश्वर से परम कारणस्वरूप अव्यक्त उत्पन्न हुआ, जिसे तत्त्वचिन्तक प्रधान तथा प्रकृति कहते हैं । यह गन्ध-वर्ण- रस से हीन, शब्द – स्पर्श से रहित, अजर, स्थिर, अविनाशी, शाश्वत, अपनी आत्मा में स्थित, जगत् की उत्पत्ति का स्रोत, महाभूत, सनातन, परब्रह्म, सभी प्राणियों का विग्रह (शरीर), ईश्वर की आज्ञा से प्रेरित, आदि-अन्त से रहित, अजन्मा, सूक्ष्म, तीनों गुणों से युक्त, उत्पत्ति का स्रोत तथा अव्यय है; सर्ग के आदि काल में अव्यक्त तथा अविज्ञेय यह ब्रह्मरूप ही था। उस समय तमोमय अविभाग के रहने पर एवं गुणों के समभाव में रहने पर शिव की इच्छा से इस [ अव्यक्त ] के स्वरूप से यह सम्पूर्ण [ उत्पद्यमान ] जगत् व्याप्त था ॥ २-७ ॥ सृष्टिकाल में क्षेत्रज्ञ (पुरुष)- के द्वारा अधिष्ठित प्रधान के गुणभाव से प्रेरित होता हुआ महत्तत्त्व उत्पन्न हुआ। पहले यह जगत् सूक्ष्म तथा महान् अव्यक्त से आच्छादित था। इसके बाद सत्तामात्र का प्रकाशक सत्त्वगुण-प्रधान महत्तत्त्व प्रकट हुआ। महत्तत्त्व को मन के रूप में जानना चाहिये; यह सृष्टि का कारण कहा गया है। लिङ्ग-मात्र यह [ महत्तत्त्व] जीवों से अधिष्ठित होकर उत्पन्न हुआ ॥ ८–१० ॥ यह महान् (महत्तत्त्व) सृष्टि की इच्छा से ईश्वर के द्वारा प्रेरित होकर सृष्टि को तथा सृष्ट जीवों के परमार्थ कारणभूत वेदों, धर्म आदि रूपों को विस्तारित करता है ॥ ११ ॥ वे महेश्वर ही मन, महान्, मति, ब्रह्म, पूः, बुद्धि, ईश्वर, प्रज्ञा, ख्याति, कहे गये हैं ॥ १२ ॥ चिति, स्मृति, संविद् तथा विश्वेश वे समस्त जीवों का कर्मफल जानते हैं और इस मन के द्वारा सूक्ष्मता के कारण उस कर्मफल से जगत् विभक्त है, इसलिये इन्हें ‘मन’ कहा जाता है ॥ १३ ॥ ये सभी तत्त्वों से पहले उत्पन्न हुए हैं और परिमाण में सत्त्व आदि गुणों से भी अधिक महान् हैं, इसलिये वे ‘महान्’ कहे गये हैं ॥ १४ ॥ वे पुरुष [ ईश्वर ] भोगसम्बन्ध के कारण सबका पोषण करते हैं, सम्पूर्ण प्रमाण को जानते हैं तथा समस्त भेद मानते हैं, इसलिये वे ‘मति’ कहे गये हैं ॥ १५ ॥ वे [महेश्वर] बृहत् होने, सबके पोषक होने तथा भावों का सम्पूर्ण आश्रय होने के कारण [समस्त] भावों को धारण करते हैं, इसलिये उन्हें ‘ब्रह्म’ कहा जाता है ॥ १६ ॥ वे [महेश्वर] सभी देवताओं को [अपने] अनुग्रहों से परिपूर्ण करते हैं तथा उन्हें तत्त्वभाव प्राप्त कराते हैं, इसलिये वे ‘पूः’ कहे जाते ॥ १७ ॥ वे ईश्वर इस ब्रह्माण्ड में समस्त भावों तथा हित (धर्म)-को [स्वयं] जानते हैं एवं [जीवों को] बोध कराते हैं, इसलिये उन्हें ‘बुद्धि’ कहा जाता है ॥ १८ ॥ ज्ञाननिष्ठा के कारण [ विषय सम्बन्धी ] सुख की ख्याति (प्रशंसा) तथा भोग की प्राप्ति उन्हीं ईश्वर से प्रवर्तित होती है, इसलिये वे ‘ख्याति’ कहे गये हैं । [ आकाश आदि के शब्द आदि ] गुणों के द्वारा तथा ज्ञान आदि के द्वारा सत्पुरुष उनकी प्रशंसा करते हैं, इसलिये भी उन महान् (पूज्य) ईश्वर का नाम ‘ख्याति’ कहा जाता है ॥ १९-२० ॥ महात्मा शिव सम्पूर्ण जगत् को प्रत्यक्ष रूप से जानते हैं, इसलिये ‘ईश्वर’ कहे जाते हैं और [ स्वयं ] ज्ञानरूप हैं, इसलिये ‘प्रज्ञा’ कहे जाते हैं ॥ २१ ॥ वे [जीवों को] भोगों की प्राप्ति के लिये ज्ञान आदि रूपों तथा अनेक विध कर्मफलों का विस्तार करते हैं, इसलिये वे ‘चिति’ कहे जाते हैं ॥ २२ ॥ वे [ महेश्वर] वर्तमान, भूत तथा भविष्य के भी समस्त कार्यों का स्मरण करते हैं अर्थात् उनका ज्ञान रखते हैं, इसलिये वे ‘स्मृति’ कहे जाते हैं ॥ २३ ॥ वे सम्पूर्ण ज्ञान तथा उत्तम माहात्म्य को जानते हैं, इसलिये वे ‘विन्द्’ तथा ‘विद्’ धातु से व्युत्पन्न रूप भी कहे जाते हैं । हे श्रेष्ठ मुनियो ! ‘संविद्’ वे सर्वत्र विद्यमान हैं और भक्त उन [ शिव] में ही सब कुछ प्राप्त करता है, इसलिये वे महात्माओं द्वारा ‘संविद्’ कहे गये हैं ॥ २४-२५ ॥ ‘ज्ञा’ धातु से ‘ज्ञान’ शब्द कहा गया है। ज्ञान समुद्र भगवान् शिव बन्धन आदि का तिरस्कार करने के कारण विद्वानों द्वारा ‘ईश्वर’ कहे गये हैं ॥ २६ ॥ इस प्रकार महेश्वर के उत्तम भावों का चिन्तन करने वाले तत्त्ववेत्ताओं ने अनेक अर्थों का प्रतिपादन करने वाले शब्दों के द्वारा आदि ( सबसे पहले उत्पन्न ) सर्वोत्तम ‘शिव’ नामक तत्त्व का वर्णन किया है ॥ २७ ॥ सृष्टि करने की इच्छा से प्रेरित होकर ‘महत्’ सृष्टिकार्य को विस्तारित करता है। संकल्प तथा अध्यवसाय — ये उसकी दो वृत्तियाँ कही गयी हैं ॥ २८ ॥ रजोगुणप्रधान त्रिगुण के कारण वह [ उत्पद्यमान ] सर्ग, भूत आदि तथा अहंकार महत् के द्वारा बाहर से ढके हुए थे। उसी तमोगुणप्रधान अहंकार से शब्द-स्पर्श आदि तन्मात्राओं का आकाश आदि तामस सर्ग हुआ। सृष्टि का विस्तार करते हुए भूतादि ने शब्दमात्र आकाश का सृजन किया; उससे शब्दलक्षण वाला सुषिर (पुष्कर नामक) आकाश उत्पन्न हुआ। शब्दतन्मात्रा वाले आकाश ने स्पर्शतन्मात्रा वाले वायु को आच्छादित किया । सृष्टि को आगे बढ़ाते हुए वायु ने रूपतन्मात्रा वाले अग्नि को उत्पन्न किया। वायु से जो ज्योति [अग्नि] उत्पन्न होती है, वह वायु के ही रूप तथा गुणवाली कही जाती है। इस प्रकार स्पर्शतन्मात्रा वाले वायु ने रूपतन्मात्रा वाली अग्नि को आच्छादित किया। सृष्टि को विस्तारित करती हुई ज्योति [अग्नि]-ने रसतन्मात्रा को उत्पन्न किया; उससे सर्वरसमय जल उत्पन्न हुआ। रूपतन्मात्रा वाली अग्नि ने उस रसतन्मात्रात्मक जल को आच्छादित किया । पुनः सृष्टि को आगे बढ़ाते हुए जल ने गन्धतन्मात्रा का सृजन किया, उससे पृथ्वी उत्पन्न हुई; उसका गुण गन्ध माना गया है । वे शब्द आदि गुण अपने-अपने धर्मियोंमात्र में ही स्थित रहते हैं । अतः उनमें तन्मात्रता कही गयी है ॥ २९–३६ ॥ वे [शब्द आदि] अविशेष के वाचक होने के कारण तन्मात्र शब्द का प्रतिपादक होने के कारण तथा प्रशान्त ( सात्त्विक ), घोर ( राजस) और मूढ़ ( तामस ) होने के कारण अविशेष कहे गये हैं। इसे परस्पर (पंच) भूतों की तन्मात्राओं का सर्ग (सृष्टि) जानना चाहिये । वैकारिक [ राजस] अहंकार से और सत्त्वप्रधान सात्त्विक अहंकार से वह वैकारिक सर्ग एक साथ प्रवर्तित होता है ॥ ३७-३८१/२ ॥ पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा पाँच कर्मेन्द्रियाँ – ये इन्द्रियाँ साधनस्वरूप हैं और उनके दस राजस अधिष्ठाता देवता हैं। जो ग्यारहवाँ मन है, वह अपने गुण से उभयात्मक (ज्ञान-कर्मेन्द्रियात्मक) है। कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा तथा पाँचवीं नासिका — ये इन्द्रियाँ शब्द आदि की प्राप्ति के लिये ज्ञानयुक्त होती हैं। दोनों पैर, गुदा, जननेन्द्रिय, दोनों हाथ तथा दसवीं वाणी है; क्रमशः गति, विसर्ग (मलत्याग), आनन्द, शिल्प तथा बोलना उनका कार्य है ॥ ३९-४२ ॥ शब्दतन्मात्रा वाला आकाश स्पर्शतन्मात्रा में प्रविष्ट हुआ, अतः वायु शब्द तथा स्पर्शरूप दो गुण वाला हुआ। शब्द एवं स्पर्श — ये दोनों ही गुण रूपतन्मात्रा में प्रविष्ट हुए, अतः शब्द – स्पर्श- रूपयुक्त वह अग्नि तीन गुणों वाला हुआ। शब्द – स्पर्श-रूपसहित अग्नि रसतन्मात्रा में प्रविष्ट हुआ, इसलिये रसमय जल को चार गुणों वाला जानना चाहिये । शब्द, स्पर्श, रूप तथा रस – ये गन्धतन्मात्रा में प्रविष्ट हुए । अतः गन्धतन्मात्रा के साथ इस पृथ्वी में इनके प्रवेश करने पर पृथ्वी पाँच गुणों वाली हुई, इसलिये यह स्थूलरूपा भूमि [पाँचों] भूतों में श्रेष्ठ कही जाती है । अतः [अधिक गुण के कारण] वे शब्द आदि गुण शान्त, घोर तथा मूढ़ तीन गुण वाले हैं; इसी कारण से वे विशेष कहे गये हैं । परस्पर प्रवेश करने के कारण वे एक- दूसरे को धारण करते हैं। भूमि के भीतर यह सब लोकालोक पर्वत से आवृत है ॥ ४३–४८ ॥ वे विशेष ( शब्द आदि) नियतत्व के कारण इन्द्रिय-ग्राह्य कहे गये हैं। पूर्व सर्ग (आकाश आदि) -गुण को उत्तरोत्तर वायु आदि प्राप्त करते हैं । उन शब्द आदि में जितनी मात्रा में जो गुण होता है, उतनी ही मात्रा में उसे कहा गया है। जल में गन्ध का अनुभव होने पर कुछ लोग कहते हैं कि यह जल का गुण है। पृथ्वी में उस गन्ध को जल तथा वायु के संयोग से जानना चाहिये । महान् आत्मा वाले ये सातों [ महत्तत्त्व, अहंकार, शब्द आदि पाँच गुण] एक- दूसरे के आश्रय से रहते हैं। महत्तत्त्व से लेकर [शब्द आदि ] विशेष तक पुरुष से अधिष्ठित होने के कारण तथा अव्यक्त [ परमेश्वर]-के अनुग्रह से ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करते हैं ॥ ४९-५२ ॥ जल में बुलबुले की भाँति एक विशाल अण्ड उन विशेषों (शब्द आदि)-से एक ही बार में उत्पन्न हुआ; वह जल में स्थित था । वह अण्ड [ अपने से] दस गुना विस्तार वाले जल से बाहर से घिरा था; यह जल दस गुना विस्तार वाले तेज (अग्नि) – से बाहर से घिरा था, तेज दस गुना विस्तार वाले वायु से बाहर से घिरा था और वायु भी दस गुना विस्तार वाले आकाश से बाहर से घिरा था, जिस आकाश से वायु आवृत था, वह आकाश भूत आदि से घिरा था। भूत आदि महत्तत्त्व से घिरे थे और महत्तत्त्व [उस] अव्यक्त से घिरा था ॥ ५३-५६ ॥ हे सुव्रतो! शर्व [उस] अण्ड के कपाल पर स्थित हैं और भव जल में स्थित हैं; रुद्र अग्नि में तथा भगवान् उग्र वायु में [ स्थित ] कहे गये हैं; भीम पृथ्वी के मध्य में स्थित हैं, महेश्वर अहंकार में स्थित हैं, भगवान् ईश बुद्धि में स्थित हैं और परमेश्वर सर्वत्र स्थित हैं ॥ ५७-५८ ॥ अण्ड इन सात प्राकृत आवरणों से आवृत है और एक-दूसरे को आवृत करके ये आठ प्रकृतियाँ (मूर्तियाँ) स्थित हैं। इस प्रकार स्थित होकर ये प्रसर्गकाल में एक- दूसरे को ग्रसती हैं और सृष्टिकाल में साथ-साथ उत्पन्न होकर एक-दूसरे को धारण करती हैं। वे विकार आधार-आधेयभाव से विकारियों में रहते हैं। महेश्वर अव्यक्त से परे हैं । अण्ड अव्यक्त से उत्पन्न हुआ है। सूर्य के समान प्रभा वाले वे पुरुष परमेश्वर ही अण्ड उत्पन्न हुए; उन पुरुष में [ उत्पद्यमान] सृष्टि का उत्पादन अपनी इच्छा से हुआ। वे ही प्रथम शरीरधारी और वे ही पुरुष कहे जाते है। सभी देवताओं से नमस्कृत [ भगवान् ] विष्णु देवी लक्ष्मी के साथ शिव की इच्छा से उनके बायें अंग से उत्पन्न हुए और जगद्गुरु ब्रह्मा सरस्वती के साथ [ उनके] दाहिने अंग से उत्पन्न हुए ॥ ५९-६४ ॥ उस अण्ड में ये लोक और यह सम्पूर्ण जगत् स्थित है। नक्षत्रों, ग्रहों तथा वायुसहित सूर्य-चन्द्रमा भी इसी में हैं। दोनों लोकालोक [पर्वत ] तथा सब कुछ इस अण्ड में स्थित है। हे द्विजो! अब मैं सृष्टि में कहे गये कालान्तर को बताता हूँ । इस कालान्तर को परमेश्वर का दिन जानना चाहिये और [उन] परमेश्वर की पूर्णरूप से उतने ही काल की रात जाननी चाहिये। जो सृष्टि हैं, वही उनका दिन है और प्रलयकाल को उनकी रात कहा गया है। ऐसा मानना चाहिये कि न तो उनका दिन है और न उनकी रात; [केवल ] लोकों के हित की कामना से [उनके द्वारा ] रात-दिन का ऐसा उपचार किया जाता है ॥ ६५–६८१/२ ॥ इन्द्रियाँ, इन्द्रियों के विषय, पाँच महाभूत, सभी प्राणी तथा बुद्धि — ये सब देवताओं के साथ बुद्धिमान् परमेश्वर के दिन के समय विद्यमान रहते हैं और दिन के अन्त में विलीन हो जाते हैं। रात्रि का अन्त होने पर पुनः विश्व की उत्पत्ति होती है । उस समय व्यक्त के अपनी आत्मा में स्थित होने पर तथा विकार के विलीन हो जाने पर प्रधान एवं पुरुष अपने लक्षणों के साथ होते हैं। तम, सत्त्व तथा रज से युक्त वे दोनों समत्व से व्यवस्थित होकर एक-दूसरे में मिलकर ओत-प्रोत हो जाते हैं । गुणों की साम्यस्थिति में लय को जानना चाहिये और वैषम्य की स्थिति में सृष्टि कही जाती है। जैसे तिल में तेल तथा दूध में घी स्थित होता है, उसी प्रकार तम- सत्त्व-रज में जगत् स्थित रहता है ॥ ६९-७४ ॥ पूरी रात परात्पर माहेश्वरी की उपासना करके दिन का आरम्भ होने पर प्रकृति से उत्पन्न परमेश्वर सृष्टि के लिये प्रवृत्त होते हैं। वे परमेश्वर महेश्वर (शिव) प्रधान तथा पुरुष में प्रवेश करके श्रेष्ठ योग के द्वारा क्षोभ उत्पन्न करते हैं। तब शाश्वत, परम गुह्य, सर्वात्मा तथा शरीर- धारी तीन देवता [ उन] जगदीश महेश्वर से उत्पन्न होते हैं ॥ ७५–७७ ॥ ये ही तीनों [ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर] देवता, ये ही तीनों गुण, ये ही तीनों लोक तथा ये ही तीनों अग्नियाँ हैं। ये देवता एक-दूसरे का आश्रय लेकर एक-दूसरे का अनुसरण करते हुए एक-दूसरे से व्यवहार करते हैं और एक-दूसरे को धारण करते हैं । ये परस्पर संयोग करते हैं तथा एक-दूसरे के उपजीवी हैं; क्षणभर के लिये इनका वियोग नहीं होता है, ये एक-दूसरे का त्याग [ कभी] नहीं करते हैं ॥ ७८- ८० ॥ महेश्वर सर्वश्रेष्ठ देवता हैं, विष्णु महत् से परे हैं और ब्रह्मा रजोगुण से युक्त होकर सृष्टिकार्य में प्रवृत्त होते हैं। उस पुरुष को ‘पर’ जानना चाहिये और वह प्रकृति ‘परा’ कही गयी है ॥ ८१-८२ ॥ महेश्वर के द्वारा अधिष्ठित वह प्रकृति सभी ओर से सृष्टिकार्य में प्रवृत्त होती है और उस समय चिरस्थायी होने के कारण महत्तत्त्व ऐश्वर्य के विषय को स्वयं धारणकर इस प्रकृति का अनुगमन करता है ॥ ८३ ॥ सबसे पहले ईश्वर से अधिष्ठित तथा सत्- असत्स्वरूप उस प्राकृत गुणवैषम्य के कारण सृष्टि का काल प्रवर्तित होता है। अपने तेज से अनुपम, बुद्धिमान्, अव्यक्त तथा सम्यक् प्रकाश करने वाले रुद्र सबसे पहले कार्य करने में तत्पर हुए। वे ही प्रथम शरीरधारी हैं और वे ही पुरुष कहे जाते हैं। चार मुख वाले तथा प्रजाओं के स्वामी भगवान् ब्रह्मा उन्हीं से उत्पन्न हुए और सृष्टिकार्य करने में समर्थ हुए। इस प्रकार वे एक ही महादेव तीन रूपों में व्यवस्थित हैं। वे [ महादेव ] अनुकूल ज्ञान तथा ऐश्वर्य से युक्त हैं और वे तीनों देवता भी अनुकूल धर्म तथा वैराग्य से युक्त हैं ॥ ८४-८८ ॥ वशीभूत होने तथा सापेक्ष होने के कारण उन देवताओं के मन में जो-जो त्रिगुणात्मक सृष्टि विषय की अभिलाषा थी, वह स्वभाव से ही अव्यक्त से उत्पन्नहुई ॥ ८९ ॥ वे परमेश्वर ही ब्रह्मा के रूप में चार मुख वाले तथा काल के रूप में संहार करने वाले कहे गये हैं । वे ही हजार सिरों वाले पुरुष विष्णु भी हैं। इस प्रकार स्वयम्भू [परमेश्वर]- की तीन अवस्थाएँ हैं । ब्रह्मा के रूप में वे लोकों का सृजन करते हैं, काल के रूप में उनका संहार भी करते हैं और पुरुष के रूप में उदासीन रहते हैं; उन प्रजापति की तीन अवस्थाएँ हैं । ब्रह्मा कमलगर्भ की आभा वाले हैं, रुद्र कालाग्नि के समान हैं तथा पुरुष [ विष्णु ] कमल के समान नेत्रवाले हैं – यह उन परमात्मा का रूप है ॥ ९०-९२ ॥ वे महेश्वर एक, दो, तीन तथा अनेक प्रकार के शरीर धारण करते हैं और उन्हें नष्ट भी कर देते हैं । वे महेश्वर अपनी लीला से अनेक आकृति, क्रिया, रूप तथा नाम वाले शरीरों को धारण करते हैं और उन्हें नष्ट भी कर देते हैं ॥ ९३-९४ ॥ वे [परमेश्वर] लोक में तीन रूपों में विद्यमान हैं, इसलिये वे तीन गुणों वाले कहे जाते हैं और चार भागों में विभक्त होने के कारण ‘चतुर्व्यूह’ कहे गये हैं ॥ ९५ ॥ ये विषयों को प्राप्त करते हैं, ग्रहण करते हैं और उनका भक्षण कर जाते हैं; ऐसा इनका शाश्वत भाव है, इसलिये ये ‘आत्मा’ कहे जाते हैं ॥ ९६ ॥ सर्वत्र गमन करने के कारण ये ऋषि हैं; वे परमेश्वर इस शरीर के प्रभु हैं तथा इस पर उनका पूर्ण स्वामित्व है; अतः वे शरीरी हैं और सर्वत्र प्रवेश करने के कारण वे विष्णु हैं ॥ ९७ ॥ वे ऐश्वर्यमय भाव से युक्त होने के कारण ‘भगवान्’ तथा निर्मल होने के कारण ‘शिव’ कहे गये हैं। वे विशिष्ट होने के कारण ‘परम’ तथा रक्षा करने के कारण ‘ओम्’ कहे गये हैं। वे सब कुछ सम्यक् जानने के कारण ‘सर्वज्ञ’ हैं तथा सर्वमय होने के कारण ‘सर्व’ हैं; वे अपने को तीन रूपों में विभक्त करके तीनों लोकों का संचालन करते हैं; वे तीन रूपों से स्वयं [ जगत् का ] सृजन करते हैं, पालन करते हैं तथा संहार करते हैं ॥ ९८-९९१/२ ॥ वे आदि (प्रारम्भ ) – में प्रकट होने के कारण ‘आदिदेव’ तथा अजन्मा होने के कारण ‘अज’ कहे गये हैं। वे समस्त प्रजाओं की रक्षा करते हैं, इसलिये ‘प्रजापति’ कहे गये हैं । वे देवताओं में [ सबसे] महान् देवता हैं, इसलिये ‘महादेव’ कहे गये हैं । वे सर्वव्यापी होने तथा किसी के वश में न होने के कारण देवताओं के भी ‘ईश्वर’, बृहत् होने के कारण ‘ब्रह्मा’ तथा अपने भूतत्व ( अस्तित्व ) – के कारण ‘भूत’ कहे जाते हैं । वे क्षेत्रों का ज्ञान रखने के कारण ‘क्षेत्रज्ञ’ तथा एकमात्र होने के कारण ‘केवल’ कहे गये हैं। चूँकि वे पुरी (शरीर) – में शयन करते हैं, इसलिये ‘पुरुष’ कहे जाते हैं। वे अनादि होने तथा [ सबसे] पहले होने के कारण ‘स्वयम्भू’ कहे गये हैं । वे यजन के योग्य होने के कारण ‘यज्ञ’ तथा इन्द्रियों से न दिखायी देने वाली वस्तुओं को भी देखने के कारण ‘कवि’ कहे जाते हैं ॥ १००-१०४ ॥ वे क्रमणीय (पहुँच के योग्य) होने के कारण ‘क्रमण’, [सबका] पालन करने के कारण ‘पालक’, कपिलवर्ण होने के कारण ‘आदित्य’ और सबसे पहले उत्पन्न होने के कारण ‘अग्नि’ कहे गये हैं ॥ १०५ ॥ हिरण्यमय अण्ड इनसे उत्पन्न हुआ और ये भी हिरण्यमय अण्ड से उत्पन्न हुए, अतः इस पुराण में उन्हें ‘हिरण्यगर्भ’ कहा जाता है ॥ १०६ ॥ अतीत विश्वात्मा स्वयम्भू का जो काल है, उसकी गणना सौ वर्षों में भी नहीं की जा सकती है। वर्तमान ब्रह्मा की कालसंख्या को परार्ध कहा गया है। उतने ही परिमाण वाला इनका काल [द्वितीय परार्ध] शेष रहता है; उसके अन्त में जगत् का संहार हो जाता है। कल्पों के हजारों करोड़ जो दिन व्यतीत हो गये हैं, उतने ही दूसरे अभी शेष हैं ॥ १०७-१०८१/२ ॥ जो यह वाराहकल्प चल रहा है, उसके विषय में सुनिये। हे द्विजो! यह वर्तमान कल्प उनमें प्रथम [कल्प ] है, जिसमें स्वायम्भुव आदि चौदह मनु व्यवस्थित हैं। बीत चुके, वर्तमान तथा अभी होने वाले जो मनु हैं, उन महेश्वर मनुओं द्वारा अपनी तपस्या से प्रजाओं के साथ सातों द्वीपों तथा पर्वतों सहित सम्पूर्ण पृथ्वी का पालन पूरे हजार वर्षों तक किया जाता है; अब उनका विस्तृत वर्णन सुनिये ॥ १०९-११२ ॥ [ हे ऋषियो !] एक मन्वन्तर के वर्णन से सभी मन्वन्तरों का तथा एक कल्प के वर्णन से दूसरे कल्प का भी वर्णन हो जायगा । अपने वंश के राजाओं के साथ बीते हुए कल्प जिस रूप में होते हैं, विद्वान् को वैसा ही तर्क ( अनुमान) अनागत (भविष्य) कल्पों के विषय में भी कर लेना चाहिये ॥ ११३-११४ ॥ पृथ्वीतल के नष्ट हो जाने पर सबसे पहले जल प्रादुर्भूत हुआ; विनष्ट नक्षत्रों से युक्त तथा उस विस्तृत जलमय ब्रह्माण्ड में कुछ भी नहीं मालूम पड़ता था । उस एकार्णव (प्रलयसागर)-में [ समस्त ] स्थावर-जंगम के विनष्ट हो जाने पर हजार नेत्रों वाले, हजार पैर वाले, हजार सिर वाले तथा स्वर्णिम रंग वाले अतीन्द्रिय ब्रह्मा पुरुषरूप में प्रकट हुए। उस समय नारायणसंज्ञक वे ब्रह्मा जल में सोये हुए थे। पुनः सत्त्वगुण के उद्रेक के कारण जगे हुए उन ब्रह्मा ने लोक को शून्य देखा। लोग उन नारायण प्रति इस श्लोक को उदाहृत करते हैं – जल का अर्थ है ‘नार’ तथा ‘सूनु’–हम लोग जल के ये दो नाम सुनते हैं। उस जल से पूरित करके उन्होंने अपना ‘अयन’ (निवास स्थान) बनाया और वे जल में सोते हैं, इसलिये ‘नारायण’ कहे गये हैं ॥ ११५–११९१/२ ॥ हजार चतुर्युगी तक जल में निवास करने के पश्चात् रात्रि के अन्त में उन्होंने सृष्टि करने के उद्देश्य से ब्रह्मा का रूप धारण किया। ब्रह्माजी वायु होकर उस जल में विचरण करने लगे, जैसे कि वर्षाऋतु में रात्रि में खद्योत विचरण करता है । तदनन्तर ज्ञानसम्पन्न उन ब्रह्मा ने अनुमानपूर्वक पृथ्वी को जल के भीतर गयी हुई जानकर पहले के कल्पों में जैसा रूप धारण किया था, उस अन्य रूप को धारण कर पृथ्वी का उद्धार करने का निश्चय किया। तत्पश्चात् महात्मा भगवान् [ ब्रह्मा] उस दिव्य रूप का चिन्तन करने लगे। सभी ओर से जल से व्याप्त पृथ्वी को देखकर उन्होंने सोचा कि मैं कौन-सा रूप धारण करके इस पृथ्वी का उद्धार करूँ ॥ १२०-१२४१/२ ॥ उन्होंने जलक्रीड़ा के अनुरूप, सभी प्राणियों से अजेय, वेदमय तथा ब्रह्मसंज्ञक वाराहरूप धारण किया और पृथ्वी का उद्धार करने के लिये रसातल में प्रवेश किया। उन [ वाराहरूपधारी ] प्रजापति ने जल से घिरी हुई पृथ्वी के पास पहुँचकर उसे उठा लिया और समुद्र के जल को समुद्रों में तथा नदियों के जल को नदियों में समाविष्ट कर दिया। इस प्रकार उन प्रभु ने लोक-कल्याण के लिये रसातल में गयी हुई तथा समुद्रतल में डूबी हुई पृथ्वी को अपने दंष्ट्रा पर उठा लिया। इसके बाद उन धरणीधर ने पृथ्वी को उसके [मूल] स्थान में लाकर के पूर्व की भाँति रखकर छोड़ दिया। वह पृथ्वी उस जलराशि के ऊपर विशाल नौका की भाँति स्थित हो गयी और उसी के समान विशाल देह होने के कारण पृथ्वी [पुनः ] डूब न सकी ॥ १२५–१३०१/२ ॥ तत्पश्चात् कमल के समान नेत्र वाले भगवान् ने उसे उठा करके जगत् की स्थापना की इच्छा से पृथ्वी का विभाग करने के लिये मन में निश्चय किया। उन्होंने पृथ्वी को समतल करके पृथ्वी पर पर्वतों को संग्रहीत किया । संवर्तक अग्नि द्वारा पूर्व सृष्टि के दग्ध कर दिये जाने पर उस समय बहुत विस्तार वाले वे पर्वत उस अग्नि से विशीर्ण हो गये थे। उस एकार्णव में वायुप्रवाह के द्वारा एकत्रित होकर शीत के कारण वे जहाँ-जहाँ जम गये, वहाँ-वहाँ पर्वत बन गये। वे चलायमान न होने के कारण ‘अचल’, पर्वों से युक्त होने के कारण ‘पर्वत’, निगीर्ण होने के कारण ‘गिरि’ तथा [ भूमि पर ] शयन करने के कारण ‘शिलोच्चय’ कहे गये हैं। इस प्रकार [ भगवान् ] विश्वकर्मा प्रत्येक कल्प में उन करोड़ों पर्वतों के [ इधर-उधर ] बिखर जाने पर बार-बार उनका विभाग करते हैं ॥ १३१–१३६ ॥ तदनन्तर उन्होंने समुद्रों, सातों द्वीपों तथा पर्वतों सहित पृथ्वी को, भूः आदि चारों लोकों को बनाया। इसके बाद लोकों की रचना करके उन्होंने प्रजासर्ग की रचना की, विविध प्रजाओं की सृष्टि करने की इच्छा वाले स्वयम्भू भगवान् [ब्रह्मा]-ने उसी प्रकार की सृष्टि की रचना की, जैसा उन्होंने पहले के कल्पों में किया था । सृष्टि के समय बुद्धिपूर्वक सर्ग का चिन्तन करते हुए उन ब्रह्मा की बुद्धि से तमोमय [अविद्यात्मक] सर्ग उत्पन्न हुआ; वह तम, मोह, महामोह, तामिस्र तथा अन्ध — इन नामों वाला है। इस प्रकार पाँच पर्वों वाली यह अविद्या उन महात्मा से उत्पन्न हुई। ध्यान करते हुए अभिमानी ब्रह्मा का वह सर्ग पाँच प्रकार से अवस्थित हुआ। वह तम से आवृत, बीजांकुर की भाँति ढका हुआ, बाहर तथा भीतर से प्रकाशरहित, स्तब्ध तथा निःसंज्ञ (चेतनाशून्य) था ॥ १३७-१४२ ॥ [पर्वतों ] -की बुद्धि ढँकी हुई थी और उनके दुःख तथा क्रिया-कलाप भी ढँके हुए थे, अतः संवृतात्मा (आवृत आत्मा वाले) वे नग (पर्वत) प्रथम उत्पन्न (मुख्य) कहे गये हैं ॥ १४३ ॥ उस प्रकार के प्रथम सर्ग को कार्य हेतु व्यर्थ समझकर वे ब्रह्मा अप्रसन्नचित्त हो गये। तब वे अन्य सर्ग का विचार करने लगे। ऐसा चिन्तन करते हुए उन ब्रह्मा से तिर्यक्स्रोत (बहिर्मुख इन्द्रियप्रवाह वाला) – सर्ग उत्पन्न हुआ। वह [सर्ग] तिर्यक् प्रवृत्ति वाला था, इसलिये उसे तिर्यक् स्रोत कहा गया है। हे द्विजो ! वे उत्पथग्राही पशु-पक्षी आदि के रूप में प्रसिद्ध हुए। इसके बाद अन्य सर्ग का ध्यान करते हुए उन ब्रह्मा से ऊर्ध्वस्रोत (ऊर्ध्व इन्द्रियप्रवाह वाला) तीसरा सात्त्विक सर्ग उत्पन्न हुआ; वह ऊर्ध्वरूप से व्यवस्थित था। चूँकि यह ऊर्ध्वभाव से कार्य करता था, अतः यह [ सर्ग] ऊर्ध्वस्रोत कहा गया है । वे सुख- प्रीति की अधिक प्रवृत्ति वाले, बाहर तथा भीतर से संवृत और बाहर तथा भीतर से प्रकाशमय थे, इसलिये वे ऊर्ध्वस्रोत से उत्पन्न कहे गये हैं । वे सत्त्वगुण के योग से सृजित किये गये, इसलिये वे सत्त्वोद्भव कहे गये हैं । ऊर्ध्वस्रोत नामक वह तीसरा सर्ग देवसर्ग कहा गया है। बाहर तथा भीतर प्रकाश से युक्त रहने के कारण वे ऊर्ध्वस्रोत से उत्पन्न कहे गये हैं। ऊर्ध्वस्रोत के रूप में ज्ञेय वे लोग विद्वानों के द्वारा सन्तुष्ट आत्मा वाले कहे गये हैं ॥ १४४-१५० ॥ ऊर्ध्वस्रोत वाले देवताओं के सृष्ट हो जाने पर वर प्रदान करने वाले प्रभु भगवान् ब्रह्मा प्रसन्न हो गये और उसके बाद वे दूसरी सृष्टि का विचार करने लगे। तब प्रभु ब्रह्मा ने अन्य साधक सर्ग का सृजन किया। उस समय ध्यान करते हुए उन सत्य के अभिध्यायी व्यक्त ब्रह्मा से अर्वाक् स्रोत (बाहर तथा भीतर से इन्द्रियप्रवाह वाला) साधक सर्ग उत्पन्न हुआ। इस सृष्टि के लोग अर्वाक् रुप से कार्य प्रवृत्त हुए, इसलिये वे अर्वाक् स्रोता कहे गये हैं । वे प्रकाशबाहुल्य वाले, तमोगुण से युक्त तथा रजोगुण की अधिकता वाले थे, इसलिये वे बहुत दुःख से युक्त थे तथा बार-बार कर्म करने वाले थे। बाहर तथा भीतर से संवृत वे लोग साधक (कार्य साधन में तत्पर) मनुष्य थे; वे तारक आदि लक्षणों के द्वारा आठ प्रकार से व्यवस्थित हुए। सिद्ध आत्मा वाले वे मनुष्य गन्धर्वों के समान गुणधर्म वाले थे। इस अर्वाक् स्रोत सृष्टि को ‘तैजस’ सर्ग कहा गया है ॥ १५१-१५६ ॥ पाँचवाँ सर्ग ‘अनुग्रह’ है; यह विपर्यय, शक्ति, सिद्धि तथा तुष्टि के द्वारा चार प्रकार से व्यवस्थित है । स्थावरों (वृक्ष आदि) – में विस्तार के कारण भेद होता है, पशु आदि में सामर्थ्य से होता है, मनुष्य प्रारब्धजन्य सिद्धि से युक्त होते हैं और ऋषियों तथा देवताओं में सम्पूर्ण तुष्टि के द्वारा चतुर्थ भेद होता है। चार प्रकार वाला यह प्राकृत (प्रकृतिनिरूपण विषय वाला) तथा विकार को प्राप्त अनुग्रह [नामक] सर्ग श्रेष्ठ कहा गया है ॥ १५७-१५८१/२ ॥ मनु आदि का सर्ग भूतों का छठा सर्ग कहा जाता है। उन उत्पद्यमान भूतों के प्राक्कर्म, वर्तमान तथा भविष्य को वे भूतादिक निश्चित रूप से जानते हैं। भूतादिक भूतों (मनुष्यों) का सातवाँ सर्ग है । [पूर्वोक्त] आस्वादन करने वाला तथा अशील जानना चाहिये । उन सभी भूतादिकोंको निःस्पृह, दानशील, कर्मफलका भूतादि (अहंकार) अज्ञानसे तथा विष्णुमायासे व्यवस्थित होता है॥ १५९–१६११/२ ॥ महत् से होने वाले सर्ग को ब्रह्मा का प्रथम सर्ग कहा गया है। तन्मात्राओं का जो दूसरा सर्ग है, वह भूतसर्ग कहा जाता है। वैकारिक तीसरा सर्ग ऐन्द्रियसर्ग कहा गया है। यह सब प्राकृत सर्ग है, जो बुद्धिपूर्वक हुआ है। चौथा मुख्य सर्ग है; सभी स्थावर मुख्य कहे गये हैं। इसके बाद [तिर्यक्स्रोत, ऊर्ध्वस्रोत तथा अर्वाक्स्रोत के क्रम से] अर्वाक्-स्रोतों का सर्ग है; उनमें सातवाँ जो अर्वाक्स्रोतों का सर्ग है, वह मानुषसर्ग है। आठवाँ अनुग्रहसर्ग है; वह सात्त्विक, तामस तथा राजस भेदों वाला होता है [ सात्त्विक को देवताओं में, तामस को पशुओं में तथा राजस को मनुष्यों में जानना चाहिये ] | इस प्रकार ये पाँच वैकृत सर्ग तथा तीन प्राकृत सर्ग कहे गये हैं। [सनक आदि का] जो नौवाँ सर्ग है, वह प्राकृत तथा वैकृत [ दोनों रूपों वाला] कहा गया है। ब्रह्मा के जो तीन प्राकृतसर्ग कहे गये हैं, वे अबुद्धिपूर्वक प्रवर्तित हुए हैं और जो [शेष] छः सर्ग हैं, वे बुद्धिपूर्वक प्रवर्तित हुए हैं ॥ १६२-१६७ ॥ [ हे ऋषियो!] अब मैं विस्तृत अनुग्रहसर्ग का वर्णन कर रहा हूँ; आप लोग उसे जान लें। वह सभी भूतों में पूर्णरूप से चार प्रकार से अवस्थित है। ये जो प्राकृत तथा वैकृत [कुल] नौ सर्ग कहे गये हैं, उन्हें विद्वानों ने कारणों के द्वारा एक-दूसरे से अनुरक्त (सम्बद्ध) बताया है ॥ १६८-१६९ ॥ आरम्भ में ब्रह्माजी ने अपने ही सदृश मानस पुत्रों का सृजन किया। उनमें से सबसे पहले उत्पन्न तथा सभी पूर्वज ऋभु तथा सनत्कुमार — ये दोनों ऊर्ध्वरेता (ब्रह्मचारी) थे। आठवाँ कल्प व्यतीत होने पर प्राचीन एवं लोकसाक्षी वे दोनों वाराहकल्प में [अपने] तेज को संक्षिप्त करके पृथ्वीलोक में अधिष्ठित हुए । मोक्ष के लिये कर्मपरायण वे दोनों [मानसपुत्र] आत्मा को अपने में स्थिर करके प्रजा, धर्म तथा काम का त्याग करके वैराग्य में स्थित हो गये। सनत्कुमार जिस रूप में उत्पन्न हुए थे, वैसे ही कुमार- रूप में विद्यमान कहे जाते हैं, इसलिये इनका नाम ‘सनत्कुमार’ प्रसिद्ध हुआ । इसी प्रकार ब्रह्मा ने [जिन] सनन्द, सनक तथा विद्वान् सनातन को उत्पन्न किया था, वे विशेष ज्ञान के द्वारा सांसारिकता से निवृत्त रहे । महान् ओज वाले वे सब अविद्यापरिकल्पित भेद के प्रति सम्बुद्ध होकर अर्थात् उसे मिथ्या समझकर प्रवृत्ति से रहित योगी हुए । प्रजाओं की सृष्टि किये बिना ही वे मोक्ष को प्राप्त हुए ॥ १७०-१७५१/२ ॥ उन सबके मोक्ष को प्राप्त हो जाने पर ब्रह्मा ने अपने स्थान के अभिमानी तथा कार्यक्षम अन्य मानस पुत्रों का सृजन किया, जिन्होंने प्रलयपर्यन्त इस पृथ्वी को धारण किया। इसके बाद ब्रह्मा ने जल, अग्नि, पृथ्वी, वायु, अन्तरिक्ष, स्वर्ग, समुद्रों, नदियों, पर्वतों, वनस्पतियों, औषधियों, वल्लियों, वृक्षों, झाड़ियों, लताओं, काष्ठाओं, कलाओं, मुहूर्ती, सन्धियों, रात्रि, दिन, पक्षों, मासों, अयनों, वर्षों तथा युगों का सृजन किया। अपने स्थानों के अभिमानी वे सब अपने स्थानों के नाम वाले कहे गये हैं ॥ १७६-१८० ॥ अब मैं महान् देवताओं तथा ऋषियों के विषय में बता रहा हूँ; आप लोग उन्हें जान लें । उन [ ब्रह्मा] – ने मरीचि, भृगु, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, अत्रि तथा वसिष्ठ — इन नौ मानस पुत्रों का भी सृजन किया । ये लोग पुराण में नौ ब्रह्मा के रूप में निर्धारित किये गये हैं। ब्रह्मा ने पूर्व की भाँति ब्रह्मा के स्वरूप वाले तथा ब्रह्मवादी उन सभी के लिये स्थानों को कल्पित किया । इसके बाद उन्होंने सुख देने वाले धर्म एवं संकल्प का भी सृजन ‘ किया। सभी लोकों के पितामह देव महेश्वर ने व्यवसाय से धर्म का तथा संकल्प के द्वारा संकल्प का सृजन किया। प्रभु ब्रह्मा के मन से [ प्रजापति ] रुचि नामक मानसपुत्र भी उत्पन्न हुआ ॥ १८१-१८५ ॥ ब्रह्माजी ने [अपने] प्राण से दक्ष का तथा दोनों नेत्रों से मरीचि का सृजन किया। ऋषि भृगु जल में जन्म लेने वाले ब्रह्मा के हृदय से उत्पन हुए। उन्होंने सिर से अंगिरा को, कान से अत्रि को, उदानवायु से पुलस्त्य को तथा व्यानवायु से पुलह को उत्पन्न किया । वसिष्ठ उनके समानवायु से उत्पन्न हुए। उन्होंने अपानवायु से क्रतु का सृजन किया। ये [संकल्प, धर्म, मरीचि, भृगु, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, अत्रि, वसिष्ठ] ब्रह्मा के ग्यारह दिव्य पुत्र कहे गये हैं ॥ १८६-१८८ ॥ प्रथम उत्पन्न धर्म आदि ब्रह्माजी के पुत्र हैं, जो भृगु आदि नौ [मानस पुत्र ] सृजित किये गये, वे ब्रह्मवादी हुए । वे प्राचीन गृहस्थ थे और उन्हीं के द्वारा धर्म प्रवर्तित हुआ। उनके दिव्य, देवगुणसम्पन्न, क्रियावान्, सन्तान वाले तथा महर्षियों से अलंकृत बारह वंश हुए ॥ १८९-१९०१/२ ॥ उनसे पहले उत्पन्न हुए थे और सभी के पूर्वज थे। ऋभु तथा सनत्कुमार – ये दोनों ब्रह्मचारी थे; ये आठवें कल्प के व्यतीत होने पर प्राचीन तथा लोकों के साक्षी वे दोनों [अपने] तेज को संक्षिप्त करके लोक में प्रतिष्ठित होकर विराजमान हुए। योगकर्मपरायण वे दोनों आत्मा को अपने में आरोपित करके प्रजा, धर्म तथा काम का त्याग करके वैराग्य में स्थित हो गये। वे सनत् जिस रूप में उत्पन्न हुए थे, वैसे ही सदा रहने के कारण इस लोक में ‘कुमार’ कहे जाते हैं और इसीलिये उनका ‘सनत्कुमार’ – यह नाम प्रसिद्ध हो गया ॥ १९१–१९४१/२ ॥ इसके बाद ध्यान करते हुए उन ब्रह्मा की मानस प्रजाएँ (सन्तानें) उत्पन्न हुईं। पुनः उनके शरीर से उत्पन्न उन कार्यों तथा कारणों के साथ बुद्धिमान् ब्रह्मा के अंगों से क्षेत्रज्ञ उत्पन्न हुए। इसके बाद देवता, असुर, पितर, मनुष्य — इन चार अम्भों की सृष्टि करने की इच्छा वाले ब्रह्मा ने अपने मन को विचारयुक्त किया। तदनन्तर मन को विचारयुक्त करते हुए तथा प्रयत्नपूर्वक तमोमात्र से उत्पन्न होने वाले सर्ग का चिन्तन करते हुए उन प्रजापति की जंघा से सर्वप्रथम असुरपुत्र उत्पन्न हुए। विप्रो ! ‘असुः’ को प्राण कहा गया है; इसलिये उससे जन्म लेने के कारण वे असुर हुए। जिस शरीर से उन्होंने सभी असुरों को उत्पन्न किया था, उस शरीर को छोड़ दिया। तब उनके द्वारा त्यक्त वह शरीर तत्काल रात्रि हो गयी। वह रात्रि अन्धकार की अधिकता से युक्त होती है, अतः वह नियामिका (सबको शयन कराने वाली) है। प्रजाएँ रात में अन्धकार से आवृत हो जाती हैं, इसलिये वे सोती हैं ॥ १९५–२०१ ॥ तत्पश्चात् असुरों का सृजन करके उन्होंने अन्य अव्यक्त तथा सत्त्वबहुल शरीर धारण किया; इसलिये उन्होंने उसकी पूजा की। तब उस शरीरको धारण करने वाले उन ब्रह्मा को प्रसन्नता हुई। इसके बाद क्रीड़ा करते हुए ब्रह्मा के मुख से देवता उत्पन्न हुए । चूँकि क्रीड़ा करते हुए इन ब्रह्मा से वे उत्पन्न हुए, इसलिये वे देवता कहे गये हैं। जो ‘दिव्’ धातु कही गयी है, वह क्रीड़ा के अर्थ में जानी जाती है। उन ब्रह्मा से वे क्रीड़ा करते हुए उत्पन्न हुए, इसलिये देवता कहे जाते हैं ॥ २०२-२०४१/२ ॥ देवताओं का सृजन करके देवेश ने अन्य शरीर धारण किया और उनके द्वारा छोड़ा गया वह [ पहलेवाला] शरीर शीघ्र ही दिन बन गया । इसलिये देवता लोग धर्मयुक्त दिन की उपासना करते हैं। उन्होंने उस अन्य सत्त्वगुणमय शरीर की भी पूजा की। पिताके समान मानते हुए तथा उन [उत्पद्यमान ] पुत्रोंका ध्यान करते हुए प्रभु (ब्रह्मा) – [ दाहिने – बाएँ] दोनों पार्श्वभागसे दिन तथा रातके बीच पितर उत्पन्न हुए, इसलिये वे पितर देवता हैं और उनमें पितृत्व है ॥ २०५-२०८ ॥ उन्होंने जिस काया से पितरों का सृजन किया था, उस काया को त्याग दिया। उनके द्वारा त्यक्त वह काया शीघ्र ही सन्ध्या हो गयी। चूँकि दिन देवताओं का होता है और जो रात है, वह आसुरी कही गयी है; अतः उन दोनों के मध्य जो पैत्री (पितरों की) काया है, वह सबसे श्रेष्ठ है। इसी कारणसे सभी देवता, असुर, ऋषि तथा मनुष्य प्रसन्नता से युक्त होकर रात्रि तथा दिन के मध्य की काया (सन्ध्या) की उपासना करते हैं ॥ २०९-२११ ॥ इसके बाद ब्रह्मा ने अन्य शरीर धारण किया। उन प्रभु ने उस राजस तनु से मानसिक सृजन करना आरम्भ किया। उन्होंने रजोगुणप्रिय मानस पुत्रों का सृजन किया। तब उनके मनस्वी मानवपुत्र उत्पन्न हुए। उन सन्तानों की सृष्टि करके उन्होंने पुनः उस काया का त्याग कर दिया । तब उनके द्वारा त्यक्त वह काया तुरंत ज्योत्स्ना हो गयी; इसीलिये ज्योत्स्ना का उद्भव होने पर प्रजाएँ प्रसन्न हो जाती हैं ॥ २१२–२१४१/२ ॥ इस प्रकार उन महात्मा [ ब्रह्मा] ने जब इन शरीरों का त्याग किया, तब तुरंत रात, दिन, सन्ध्या तथा ज्योत्स्ना उत्पन्न हो गये । ज्योत्स्ना, सन्ध्या तथा दिन — ये तीनों सत्त्वमात्रात्मक हैं। रात्रि तमोमात्रात्मिका है, इसलिये वह निशास्वरूपिणी है । अतः देवता लोग दिन के तनु से सुखपूर्वक ब्रह्मा के मुख से सृजित हुए। चूँकि उनका जन्म दिन में हुआ, इसलिये वे दिन में बलशाली होते हैं । प्रभु ने अपने शरीर के द्वारा जघन से असुरों को रात में उत्पन्न किया था, अतः प्राणों से रात में जन्म लेने वाले वे [असुर] रात में बलवान् होते हैं। ये ही समय बीते हुए तथा आगे आने वाले समस्त मन्वन्तरों में होने वाले देवताओं, असुरों, पितरों एवं मानवों के निमित्त (कारणभूत) होते हैं ॥ २१५–२२० ॥ ज्योत्स्ना, रात्रि, दिन, सन्ध्या – ये चारों अम्भस्वरूप हैं; वे भासित होते हैं, इसलिये अम्भ हैं । विद्वानों ने ‘भा’ धातु को दीप्ति (प्रकाश) अर्थ में कहा है, उसीसे यह ‘अम्भ’ शब्द व्युत्पन्न है । उन ब्रह्मा ने इन अम्भों का सृजन करके पुनः अपने शरीर से विविध देवताओं, मनुष्यों, दानवों तथा पितरों का सृजन किया था ॥ २२१-२२२१/२ ॥ इसके बाद प्रभु [ब्रह्मा]-ने उस ज्योत्स्नामय शरीर का त्याग करके अन्य तमोमय तथा रजोमय शरीर धारण करके पुनः इसका पूजन किया। उन प्रभु ने अन्धकार में क्षुधापीड़ित अन्य लोगों का सृजन किया । उनके द्वारा सृजित ये क्षुधायुक्त लोग [उन] अम्भों को ग्रहण करने के लिये उद्यत हुए। उनमें जिन्होंने कहा — ‘हम इन अम्भों की रक्षा करते हैं’ वे राक्षस नाम वाले हुए; क्योंकि वे क्षुधापीड़ित तथा रात्रि में विचरण करने वाले थे। उनमें से प्रसन्न होकर जिन्होंने परस्पर यह कहा — ‘हम इन अम्भों का भक्षण करते हैं’ वे अपने उस कर्म के कारण यक्ष तथा गूढ़ कर्म के कारण गुह्यक हुए। ‘रक्ष’ यह धातु पालन अर्थ में जानी जाती है और इसी प्रकार ‘यक्षति’ धातु भक्षण अर्थ में कही जाती है ॥ २२३-२२७१/२ ॥ उस सृष्टि को देखकर अप्रसन्नता से युक्त उन बुद्धिमान् ब्रह्मा के बाल शीर्ण हो गये। वे शीर्ण बाल [पुनः ] ऊपर उठ गये और उन्होंने प्रभु को अवरुद्ध कर दिया। वे बाल सिर से हीन हो गये थे, इसलिये [ नीचे की ओर] अपसर्पण करने वाले हो गये; वे बाल व्यालस्वरूप कहे गये । वे हीन होने के कारण ‘अहि’, गिरने के कारण ‘पन्नग’ और अपसर्पण करने के कारण ‘सर्प’ कहे गये हैं। उनके क्रोध से उत्पन्न जो महाभयंकर विषमय अग्निगर्भ था, वह साथ में उत्पन्न हुए सर्पों में प्रविष्ट हो गया ॥ २२८-२३१ ॥ तब सर्पों को देखकर ब्रह्माजी क्रुद्ध हुए और उन्होंने क्रोधमय स्वरूपवालों को उत्पन्न किया। वे कपिश वर्ण, अत्यन्त उग्र तथा मांस का भक्षण करने वाले भूत थे। वे भूतत्व के कारण ‘भूत’ तथा मांसभक्षण करने के कारण ‘पिशाच’ कहे गये हैं । प्रसन्नतापूर्वक गान करते हुए उन ब्रह्मा से गन्धर्व उत्पन्न हुए थे। ‘धयति’ – यह धातु गान अर्थ में पढ़ी जाती है; वे वाणी का गान करते हुए उत्पन्न हुए, इसलिये ‘गन्धर्व’ इन आठ देवयोनियों को सृजित करने के अनन्तर कहे गये हैं ॥ २३२–२३४ ॥ उन प्रभु ने स्वच्छन्दतापूर्वक अपनी आयु से अन्य पक्षियों का सृजन किया । पुनः उन्होंने स्वच्छन्दतापूर्वक स्वेच्छा से विचरण करने वाले पक्षियों का सृजन किया। इस प्रकार उन देवेश ने पशुओं की सृष्टि करके पक्षि समुदाय का भी सृजन किया था ॥ २३५-२३६ ॥ ब्रह्मा ने [ अपने] मुख से बकरियों का तथा वक्ष (छाती) से भेड़ों का सृजन किया। उन्होंने उदर से तथा पार्श्व भागों से गायों की रचना की। उन्होंने [ अपने] पैरों से घोड़ों, हाथियों, गधों, आवयों, मृगों, ऊँटों और खच्चरों का सृजन किया; इसी प्रकार अन्य जातियाँ भी उत्पन्न हुई। उनके रोमों से फल तथा मूलवाली औषधियाँ उत्पन्न हुई। इस प्रकार पशुओं तथा औषधियों का सृजन करके वे प्रभु यज्ञ में लग गये ॥ २३७–२३९ ॥ गाय, अज, पुरुष (मनुष्य), मेष, अश्व, खच्चर तथा गधे – इन्हें ग्राम्य पशु कहा गया है। [नरमेध में पशुत्व की कल्पना के कारण मनुष्य को पशुकोटि में माना गया है] अब जंगली पशुओं को जान लीजिये । श्वापद (व्याघ्र आदि), द्विखुर ( गवय आदि), हाथी, वानर, पाँचवाँ पक्षी, छठाँ आदक पशु तथा सातवाँ सरीसृप — ये जंगली पशु हैं। इनके अतिरिक्त महिष, गवय, हिरण, प्लवंग, शरभ, वृक तथा सातवाँ सिंह — ये जंगली पशु कहे गये हैं ॥ २४०–२४२ ॥ ब्रह्मा ने [ अपने] प्रथम (पूर्व) मुख से गायत्री छन्द, ऋग्वेद, [गीयमान ] त्रिवृत् साम, रथन्तर साम तथा यज्ञों में मुख्य अग्निष्टोम [^1] की रचना की। उन्होंने दक्षिण मुख से यजुर्वेद, त्रिष्टुप् छन्द, पंचदशावृत्त साम, बृहत्साम तथा उक्थ्यकी रचना की। उन्होंने पश्चिम मुखसे साम, जगतीछन्द, सप्तदशावृत्त स्तोम, वैरूपसाम तथा अतिरात्रयज्ञकी रचना की। उन्होंने उत्तर मुखसे इक्कीस अथर्व प्रार्थना – मन्त्रों, आप्तोर्यामाण, अनुष्टुप् छन्द तथा वैराज छन्दकी रचना की। भगवान् ब्रह्मा कल्पके आरम्भमें विद्युत्, वज्र, मेघों, रोहित वर्णवाले इन्द्रधनुषों तथा तेजोंकी रचना की। प्रजाओंकी सृष्टि करते हुए उन प्रजापति ब्रह्माके अंगोंसे उच्च तथा निम्न भूत (प्राणी) उत्पन्न हुए ॥ २४३–२४८ ॥ पहले देवता, असुर, मनुष्य तथा पितर- इन चारोंकी सृष्टि करके उन्होंने स्थावर तथा जंगम भूतों का सृजन किया; उन्होंने यक्षों, पिशाचों, गन्धर्वों, अप्सरागणों, मनुष्यों, किन्नरों, राक्षसों, पक्षियों, पशुओं, मृगों और सर्पों तथा अव्यय एवं व्यय; जो भी स्थावर-जंगम हैं-उन सबका सृजन किया। पूर्व सृष्टिमें उनके जो कर्म थे, बार-बार सृजित किये जाते हुए वे प्राणी उन्हीं कर्मोंको प्राप्त करते हैं। वे अपने लिये अनुकूल हिंसा-अहिंसा, मृदुता – क्रूरता, धर्म-अधर्म तथा मिथ्या – सत्य में प्रवृत्त होते हैं; इसीलिये वे उनमें आनन्दका अनुभव करते हैं। महाभूतों, इन्द्रिय-विषयों तथा उनके स्वरूपों की सृष्टि हो जानेपर स्रष्टा ने स्वयं उन भूतों का विनियोग किया ॥ २४९–२५३१/२ ॥ कुछ लोग होने वाली घटनाओं का कारण पुरुषार्थ को बताते हैं तथा कुछ श्रेष्ठ मनुष्य कर्म को उसका कारण बताते हैं । हे विप्रो ! अन्य लोग दैव (भाग्य) – को और कुछ तत्त्वचिन्तक स्वभाव को उसका कारण बताते हैं । इस प्रकार पुरुषार्थ, कर्म, दैव तथा स्वभाव को कारण माना गया है। कर्ममार्ग का अनुसरण करने वाले जीव जगत् की विषमता प्रति पूर्वोक्त चार कारणों में से किसी एक को कारण न मानकर उनके समुच्चय को कारण मानते हैं; क्योंकि वे इन चारों से भी परे सकलनियन्ता महेश्वर को नहीं जानते हैं । सत्त्वगुण में स्थित समदर्शी लोग जगत् के मायामय होने के कारण पूर्वोक्त कारणचतुष्टयों में से नामभेद के रूप में न तो किसी एक को और न किन्हीं दो को कारण मानते हैं ॥ २५४-२५६१/२ ॥ उन [ब्रह्मरूपी] महेश्वर ने पूर्वकल्प के भूतों के नाम, रूप तथा प्रपंच को सर्ग के आदि में वेद के शब्दों से ही निर्मित किया । ब्रह्माजी रात्रि के अन्त में (प्रलय समाप्त होने पर) उत्पन्न ऋषियों के नाम एवं उनकी जो वृत्तियाँ वेदों में हैं, उन सबको उन्हें प्रदान करते हैं। अव्यक्त से जन्म लेने वाले ब्रह्मा की इस प्रकार की सृष्टियाँ होती हैं । [ ब्रह्मा की ] रात्रि के अन्त में मानसी सिद्धि का आश्रय लेकर सृजित किये गये इस प्रकार के स्थावर-जंगम प्राणी दिखायी देते हैं ॥ २५७-२६० ॥ हे सत्तमो ! जब उनकी वे सृजित प्रजाएँ वृद्धि को प्राप्त नहीं हुईं; तब तमोमात्रा से आवृत ब्रह्मा शोक से दुःखित हो उठे। इसके बाद उन्होंने अर्थ का निश्चय करने वाली बुद्धि को धारण किया और सत्त्व तथा रजोगुणों का परित्याग करके अपने धर्म से वर्तमान नियामिका तमोमात्रा को अपने अन्दर देखा। तब वे जगत्पति उस दुःख से बहुत दुःखित हुए ॥ २६१-२६३ ॥ तदनन्तर उन्होंने तमोगुण को प्रेरित किया; उस तम ने रज तथा सत्त्व को आवृत किया। इस प्रकार प्रेरित हुआ वह तम ही दो रूपों में उत्पन्न हुआ ॥ २६४ ॥ तम से अधर्म उत्पन्न हुआ और शोक से हिंसा उत्पन्न हुई। तब भयानक रूप वाले उस मिथुन (अधर्म और हिंसा)-के प्रादुर्भूत होने पर भगवान् [ब्रह्मा] प्राणहीन हो गये और प्रीति ने इनकी सेवा की। इसके बाद ब्रह्मा ने अपने उस दीप्त शरीर को अपोहित कर लिया ॥ २६५-२६६ ॥ अपने देह को दो भागों में करके वे आधे शरीर से पुरुष हो गये और उनके आधे शरीर से नारी शतरूपा उत्पन्न हुईं। ब्रह्मा ने प्राणियों की धात्री उस प्रकृति को कामनापूर्वक उत्पन्न किया था; वे अपनी महिमा से स्वर्ग तथा पृथ्वी को व्याप्त करके अधिष्ठित हैं । ब्रह्मा का वह पूर्व शरीर स्वर्ग को आवृत करके स्थित है। सृजन करने वाले ब्रह्मा के आधे शरीर से जो नारी शतरूपा उत्पन्न हुई थीं, उन्होंने नियुत ( दस लाख ) वर्षों तक अत्यन्त कठोर तप करके दीप्त यशवाले पुरुष को पतिरूप में प्राप्त किया ॥ २६७-२७० ॥ वे पूर्वपुरुष ही स्वायम्भुव मनु कहे जाते हैं। उनका इकहत्तर चतुर्युगी मन्वन्तर कहा जाता है। उस पुरुष ने अयोनिजा शतरूपा को पत्नीरूप में प्राप्त किया। वे उनके साथ रमण करते हैं, अतः वे ‘रति’ कही जाती हैं । कल्प के आदि में [यह] पहला परस्पर संयोग हुआ। ब्रह्मा ने विराट् को उत्पन्न किया था; वे पुरुष ही विराट् थे। शतरूपा और वे वैराज ( विराट्पुत्र) मनु को सम्राट् कहा गया है। उन वैराज पुरुष मनु ने प्रजासर्ग का सृजन किया। शतरूपा ने वीर वैराज पुरुषसे प्रियव्रत तथा उत्तानपाद [ नामक ] दो लोकमान्य पुत्रों को उत्पन्न किया। उन्होंने दो महाभाग्यशालिनी कन्याओं को भी उत्पन्न किया, जिनसे ये प्रजाएँ उत्पन्न हुई हैं। वे दोनों देवी आकूति तथा प्रसूति नाम वाली थीं ॥ २७१-२७६ ॥ प्रभु स्वायम्भुव मनु ने प्रसूति को दक्ष को अर्पित कर दिया। दक्ष को प्राण जानना चाहिये और मनु को संकल्प कहा जाता है। उन्होंने आकूति को रुचिप्रजापति को दिया। ब्रह्मा के मानसपुत्र रुचि की मिथुन ( जुड़वाँ ) सन्तानें आकूति से उत्पन्न हुईं। यज्ञ तथा दक्षिणा – ये जुड़वाँ सन्तानें हुईं। दक्षिणा से यज्ञ के बारह पुत्रों ने जन्म लिया । वे देवगण, स्वायम्भुव मन्वन्तर में ‘याम’ – इस नाम से प्रसिद्ध हुए; वे इस यज्ञ के पुत्र थे, इसलिये वे ‘याम’ कहे गये हैं। ब्रह्मा ने अजित तथा शुक्र – इन दो गणों को उत्पन्न किया था। पूर्व में जो ‘याम’ उत्पन्न हुए थे, वे देवता हुए ॥ २७७–२८१ ॥ प्रभु दक्ष ने स्वायम्भुव [ मनु] की पुत्री उस प्रसूति से चौबीस कन्याएँ उत्पन्न कीं; वे लोकमाताएँ हुईं। वे सभी महाभाग्यशालिनी, कमल के समान नेत्र वाली, भोगवती, योगमाताएँ, ब्रह्मवादिनी तथा विश्व की माताएँ थीं। उनमें जो श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, तुष्टि, पुष्टि, मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, शान्ति, सिद्धि एवं कीर्ति — तेरह [पुत्रियाँ] थीं, उन दक्षकन्याओं को प्रभु धर्म ने पत्नी के रूप में ग्रहण कर लिया। स्वायम्भुव ने इन सबको उन धर्म की पत्नी बनाया। उन सभी से कनिष्ठ जो शिष्ट तथा सुन्दर नेत्रोंवाली ग्यारह [ कन्याएँ] थीं, वे सती, ख्याति, सम्भूति, स्मृति, प्रीति, क्षमा, सन्नति, अनसूया, ऊर्जा, स्वाहा एवं स्वधा [ नामवाली ] थीं। उन्हें अन्य महर्षियों ने प्राप्त किया; वे रुद्र, भृगु, मरीचि, अंगिरा, पुलह, क्रतु, पुलस्त्य, अत्रि, वसिष्ठ, पितर तथा अग्नि थे ॥ २८२–२८८१/२ ॥ उन्होंने सती को भव (रुद्र) को तथा ख्याति को भृगु को दे दिया। इसके बाद उन्होंने सम्भूति को मरीचि को और स्मृति को अंगिरा को प्रदान कर दिया। उन्होंने प्रीति को पुलस्त्य को, क्षमा को पुलह को सन्नति को क्रतु को, अनसूया को अत्रि को तथा ऊर्जा को वसिष्ठ को अर्पित कर दिया और स्वाहा को अग्नि को तथा स्वधा को पितरों को सौंप दिया । अब उनसे उत्पन्न सन्तानों को जान लीजिये ॥ २८९–२९११/२ ॥ ये समस्त महाभाग्यवती कन्याएँ सभी मन्वन्तरों में प्रलयपर्यन्त प्रजाओं के सृजन में लगी रहती थीं । श्रद्धा ने काम को उत्पन्न किया। दर्प लक्ष्मी का पुत्र कहा गया है । धृति का पुत्र नियम, तुष्टि का पुत्र सन्तोष, पुष्टि का पुत्र लोभ तथा मेधा का पुत्र श्रुत है । क्रिया से दण्ड तथा समय [ नामक] पुत्र उत्पन्न हुए। बुद्धि से बोध तथा प्रमाद [ नामक] पुत्र उत्पन्न हुए। लज्जा से विनय नामक पुत्र हुआ । वसु का पुत्र व्यवसाय तथा शान्ति का पुत्र क्षेम है। सिद्धि से सुख [नामक पुत्र] उत्पन्न हुआ। कीर्ति का पुत्र यश है। ये सब धर्म के पुत्र हैं। काम का पुत्र हर्ष देवी प्रीति से उत्पन्न हुआ। धर्म का यह सुतोदर्क सर्ग बता दिया गया ॥ २९२–२९७१/२ ॥ हिंसा ने अधर्म से निकृति [नाम की कन्या] तथा अनृत पुत्र को उत्पन्न किया। निकृति से भय तथा नरक [दो पुत्र] उत्पन्न हुए और इनकी [पत्नियाँ] माया तथा वेदना जुड़वाँ कन्याएँ हुईं। इसके बाद माया ने प्राणियों का हरण करने वाले मृत्यु को जन्म दिया और वेदना से रौरव के द्वारा पुत्ररूप में ‘दुःख’ उत्पन्न हुआ। मृत्यु से व्याधि, जरा, शोक, क्रोध तथा असूया उत्पन्न हुए। उत्तरोत्तर दुःख देने वाले ये सभी पुत्र अधर्म के लक्षणों से युक्त थे । इन सबको भार्याएँ तथा पुत्र नहीं थे; ये सभी परिग्रह स्वभाव वाले थे । इस प्रकार यह धर्मनियामक तामस सर्ग उत्पन्न हुआ ॥ २९८–३०२ ॥ ब्रह्मा ने नीललोहित शिव से कहा था — ‘प्रजाओं का सृजन कीजिये ।’ तब उन्होंने [ अपनी ] भार्या सती का ध्यान करके पुत्रों का सृजन किया। उन्होंने न अधिक, न कम, अपने ही समान तथा व्याघ्रचर्म धारण किये हुए हजारों-हजार मानसपुत्रों [ रुद्रगणों] को उत्पन्न किया । उन्होंने रूप-तेज-बल-ज्ञान में अपने ही सदृश, पिंगलवर्ण वाले, निषंगयुक्त, जटाजूटधारी, लोहितवर्ण वाले, विशिष्ट, हरित केश वाले, देखने मात्र से नाश करने वाले, कपालधारी, विशाल रूप वाले, विकृत रूप वाले, विश्वरूप, स्वरूपवान्, रथारूढ़, ढाल-कवच-वरूथ धारण किये हुए, लाखों भुजाओं वाले, स्वर्ग-पृथ्वी-अन्तरिक्ष में गमन करने वाले, स्थूल सिर वाले, आठ दाढ़ों वाले, दो जीभों वाले, तीन नेत्रों वाले, अन्न खाने वाले, मांस भक्षण करने वाले, घृत पीने वाले, सोमपान करने वाले, सुन्दर, बड़े-बड़े कपाल वाले, नीले कण्ठ वाले, ऊर्ध्वरेता (ब्रह्मचारी), हव्य खाने वाले, वेदपरायण, धार्मिक, मोरपंख से सुशोभित, कुछ बैठे हुए, कुछ दौड़ते हुए, पाँच भूतों वाले, कुछ अध्यापन करने वाले, कुछ अध्ययन करने वाले, कुछ जप करते हुए, कुछ योगाभ्यास करते हुए, कुछ धूमयुक्त, कुछ दीप्तिमान्, गंगा को धारण किये हुए, अत्यन्त कान्तिमान्, वृद्ध, बुद्धि सम्पन्न, ब्रह्मिष्ठ, शुभ दर्शन वाले, नीलग्रीवा (कण्ठ)-वाले, हजार नेत्रों वाले, क्षमा की निधि, सभी प्राणियों से अदृश्य, महान् योग वाले, महातेजस्वी, भ्रमण करते हुए, इधर-उधर भागते हुए, कूदते हुए तथा अयातयाम — इन हजारों-हजार उत्तम रुद्रदेवताओं को उत्पन्न किया ॥ ३०३-३१३ ॥ इन्हें देखकर ब्रह्माजी ने इन [नीललोहित ] – से कहा — ‘ऐसी प्रजाओं का सृजन मत कीजिये; अपने सदृश प्रजाओं की सृष्टि आपको नहीं करनी चाहिये । हे देव! आपको नमस्कार है । आपका कल्याण हो । आप मृत्युयुक्त अन्य प्रजाओं का सृजन कीजिये; क्योंकि मृत्युरहित प्रजाएँ कार्यों का आरम्भ नहीं करेंगी ‘ ॥ ३१४-३१५ ॥ ब्रह्मा के द्वारा ऐसा कहे गये रुद्र ने उनसे कहा — मैं मृत्यु तथा जरा से युक्त प्रजाओं का सृजन नहीं करूँगा । आपका कल्याण हो । अब मैं [ शान्त होकर ] बैठता हूँ और आप ही सृजन कीजिये। जिन हजारों-हजार विरूप नीललोहित रुद्रों को मैंने सृजित किया है, वे मेरी आत्मा से निकली हुई प्रजाएँ हैं। ये रुद्र नाम वाले महाबली देवता होंगे। ये पृथ्वी, आकाश तथा सभी दिशाओं में व्याप्त रहेंगे। इनमें समान आत्मा वाले सौ रुद्र याज्ञिक होंगे; वे सभी देवताओं के साथ यज्ञभाग ग्रहण करने वाले होंगे। सभी मन्वन्तरों में जो देवता भेदपूर्वक यहाँ पर होंगे, उनके साथ पूजित होते हुए वे सभी रुद्र युगक्षयपर्यन्त यहाँ स्थित रहेंगे ॥ ३१६–३२० ॥ बुद्धिमान् महादेवजी के द्वारा इस प्रकार कहे गये प्रजापति ब्रह्माजी प्रसन्न होकर प्रणाम करके उनसे बोले — ‘हे विभो! आपने जैसा कहा है, वैसा ही हो; आपका कल्याण हो।’ ब्रह्मा के ऐसा कहने के बाद सब कुछ उसी प्रकार से हुआ ॥ ३२१-३२२ ॥ उसी समय से देवताओं के स्वामी शिव ने प्रजाओं का सृजन नहीं किया और वे प्रलयपर्यन्त स्थाणुवत् स्थित रहे तथा ब्रह्मचारी बने रहे। चूँकि उन्होंने कहा था कि ‘मैं स्थित हूँ’ — इसलिये वे ‘स्थाणु’ कहे गये। ये भगवान् महादेव पुरुषस्वरूप, सूर्य के समान तेज वाले, अपने तेज अग्नि समान प्रतीत होने वाले तथा आधा भाग नर और आधा भाग नारी के शरीर वाले हैं। वे अपनी इच्छा से दो भागों में अलग-अलग स्त्री तथा पुरुषरूप में विभक्त हुए । वे परमेश्वर आधे भाग से ग्यारह रूपों में स्थित हैं । उसमें जो शंकर की अर्धांगिनी महाभागा महादेवी कही गयी हैं; वे ही भगवती पूर्वकाल में दक्ष के द्वारा आराधित होकर जगत् के हित के लिये सती के रूप में आविर्भूत हुई थीं। सृष्टिकार्य के लिये उनका दाहिना भाग श्वेत तथा बायाँ भाग कृष्ण था। जब भगवान् शम्भु ने उनसे कहा कि अपने को विभक्त करो, तब हे द्विजो ! उनके ऐसा कहने पर वे शुक्ल तथा कृष्ण दो रूपों में विभक्त हो गयीं। अब मैं उनके नाम बताऊँगा; आपलोग एकाग्रचित्त होकर सुनिये ॥ ३२३–३२९ ॥ स्वाहा स्वधा महाविद्या मेधा लक्ष्मीः सरस्वती । सती दाक्षायणी विद्या इच्छाशक्तिः क्रियात्मिका ॥ ३३० ॥ अपर्णा चैकपर्णा च तथा चैवैकपाटला । उमा हैमवती चैव कल्याणी चैकमातृका ॥ ३३१ ॥ ख्यातिः प्रज्ञा महाभागा लोके गौरीति विश्रुता । गणाम्बिका महादेवी नन्दिनी जातवेदसी ॥ ३३२ ॥ एकरूपमथैतस्याः पृथग्देहविभावनात् । सावित्री वरदा पुण्या पावनी लोकविश्रुता ॥ ३३३ ॥ आज्ञा आवेशनी कृष्णा तामसी सात्त्विकी शिवा । प्रकृतिर्विकृता रौद्री दुर्गा भद्रा प्रमाथिनी ॥ ३३४ ॥ कालरात्रिर्महामाया रेवती भूतनायिका । द्वापरान्तविभागे च नामानीमानि सुव्रताः ॥ ३३५ ॥ गौतमी कौशिकी चार्या चण्डी कात्यायनी सती । कुमारी यादवी देवी वरदा कृष्णपिङ्गला ॥ ३३६ ॥ बर्हिध्वजा शूलधरा परमा ब्रह्मचारिणी । महेन्द्रोपेन्द्रभगिनी दृषद्वत्येकशूलधृक् ॥ ३३७ ॥ अपराजिता बहुभुजा प्रगल्भा सिंहवाहिनी । शुम्भादिदैत्यहन्त्री च महामहिषमर्दिनी ॥ ३३८ ॥ अमोघा विन्ध्यनिलया विक्रान्ता गणनायिका । देव्या नामविकाराणि इत्येतानि यथाक्रमम् ॥ ३३९ ॥ भद्रकाल्या मयोक्तानि सम्यक् फलप्रदानि च । ये पठन्ति नरास्तेषां विद्यते न च पातकम् ॥ ३४० ॥ अरण्ये पर्वते वापि पुरे वाप्यथवा गृहे । रक्षामेतां प्रयुञ्जीत जले वाथ स्थलेऽपि वा ॥ ३४१ ॥ व्याघ्रकुम्भीनचोरेभ्यो भयस्थाने विशेषतः । आपत्स्वपि च सर्वासु देव्या नामानि कीर्तयेत् ॥ ३४२ ॥ आर्यकग्रहभूतैश्च पूतनामातृभिस्तथा । अभ्यर्दितानां बालानां रक्षामेतां प्रयोजयेत् ॥ ३४३ ॥ स्वाहा, स्वधा, महाविद्या, मेधा, लक्ष्मी, सरस्वती, सती, दाक्षायणी, विद्या, इच्छा, शक्ति, क्रियात्मिका, अपर्णा, एकपर्णा, एकपाटला, उमा, हैमवती, कल्याणी, एकमातृका, ख्याति, प्रज्ञा, महाभागा, लोकप्रसिद्ध गौरी, गणाम्बिका, महादेवी, नन्दिनी तथा जातवेदसी – ये नाम हैं। पृथक् देह धारण करने से पहले इनका एक ही रूप था। सावित्री, वरदा, पुण्या, पावनी, लोकविश्रुता, आज्ञा, आवेशनी, कृष्णा, तामसी, सात्त्विकी, शिवा, प्रकृति, विकृता, रौद्री दुर्गा, भद्रा, प्रमाथिनी, कालरात्रि, महामाया, रेवती, भूतनायिका – हे सुव्रतो! द्वापर युग अन्त में ये उनके नाम हुए। इसी प्रकार गौतमी, कौशिकी, आर्या, चण्डी, कात्यायनी, सती, कुमारी, यादवी, देवी, वरदा, कृष्णपिंगला, बर्हिध्वजा, शूलधरा, परमा, ब्रह्मचारिणी, महेन्द्रोपेन्द्रभगिनी, दृषद्वती, एकशूलधृक्, अपराजिता, बहुभुजा, प्रगल्भा, सिंहवाहिनी, शुम्भादिदैत्यहन्त्री, महामहिषमर्दिनी, अमोघा, विन्ध्यनिलया, विक्रान्ता, गणनायिका – मैंने देवी भद्रकाली के इन नाम विकारों को यथाक्रम बता दिया, जो सम्यक् फल प्रदान करने वाले हैं। जो लोग इनका पाठ करते हैं, उनका पाप शेष नहीं रह जाता है । जंगल में, पर्वत पर, नगर में, घर में, जल अथवा स्थल कहीं भी रक्षा के लिये इनका प्रयोग करना चाहिये । विशेष रूप से बाघ, हाथी तथा चोरों से भय के स्थान में और सभी प्रकार की विपत्तियों में देवी के नामों को पढ़ना चाहिये । बुरे ग्रहों, भूतों, पूतना तथा मातृगणों से पीड़ित शिशुओं की रक्षा के लिये इन नामों का प्रयोग करना चाहिये ॥ ३३०-३४३ ॥ ‘प्रज्ञा’ तथा ‘ श्री’—ये महादेवी की दो कलाएँ कही गयी हैं। इन दोनों से हजारों देवियाँ उत्पन्न हुई हैं, जिनके द्वारा सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है। देवदेव महेश्वर परमेश्वर रुद्र सभी लोकों के हित के लिये इन सती के साथ [सर्वदा ] विद्यमान रहते हैं। रुद्र पशुपति हैं । इन्होंने ही पूर्वकाल में त्रिपुर को दग्ध किया था। उन्हीं के तेज से सभी देवता पशु [जीव] हुए। जो [ व्यक्ति ] आदिसृष्टि के शुभ क्रम को पढ़ता है अथवा सुनता है अथवा उत्तम द्विजों को सुनाता है, वह ब्रह्मलोक को जाता है ॥ ३४४–३४७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘सृष्टिविस्तार’ नामक सत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७० ॥ [^1]: अग्निष्टोम एक प्रकार का वैदिक यज्ञ है, जिसे ज्योतिष्टोम भी कहा जाता है और यह पांच दिनों तक चलता है। यह सभी सोमयागों का प्राकृतिक और आधारभूत यज्ञ है। इसमें अग्नि की स्तुति की जाती है और ‘सोम रस’ मुख्य आहुति का द्रव्य होता है। इस यज्ञ में इंद्र और वायु जैसे देवता प्रमुख हैं। यह अनुष्ठान ऋत्विजों (पुरोहितों) की १६ संख्या के साथ किया जाता है, जिसमें से कुछ के नाम ब्रह्मा, उद्गाता और अध्वर्यु हैं। यह यज्ञ राजसूय तथा अश्वमेध यज्ञ करने वाले व्यक्तियों के लिए आवश्यक समझा जाता था। इस यज्ञ का विस्तृत विवरण ऐतरेय ब्राह्मण में मिलता है, जिसमें इसके चालीस अध्याय हैं, और पहले सोलह अध्यायों में ऋग्वेदीय पुरोहितों के कर्तव्यों का विवरण है। भारद्वाज सूत्र की हस्तलिखित प्रतियों में और प्रकाशित संस्करण में भी वह ज्योतिष्टोम के मध्य में दिया गया है। इस प्रकार भारद्वाज सूत्र में प्रवर्ग्य विधि स्वतन्त्र प्रश्न में वर्णित है। प्रतीत होता है कि किसी हस्तलेख के लेखक ने अपनी सुविधा के लिए उसे ज्योतिष्टोम के मध्य में रख दिया, जिसका अनुसरण अन्य लोगों ने किया, क्योंकि वस्तुत: प्रवर्ग्य का स्थान ज्योतिष्टोम के अन्त में होना चाहिए, न कि अनुष्ठान–क्रम को खण्डित करते हुए मध्य में। Content is available only for registered users. 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