January 26, 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -071 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ इकहत्तरवाँ अध्याय तारकासुर के पुत्रों — विद्युन्माली, तारकाक्ष तथा कमलाक्ष का वृत्तान्त एवं तपस्या द्वारा इन्हें कामचारी तीन पुरों की प्राप्ति, त्रिपुरासुर के विनाश के लिये देवताओं का उद्योग तथा भगवान् शंकर का उन पर अनुग्रह श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे एकसप्ततितमोऽध्यायः पुरदाहे नन्दिकेश्वरवाक्यं ऋषिगण बोले — [हे सूतजी !] आपने संक्षेप में तथा विस्तार से शुभ सर्ग का निरूपण कर दिया। पशुपति महेश्वर ने पुर को कैसे दग्ध किया और ब्रह्मासहित सभी देवता प्रभु के पशु कैसे हो गये ? मय की तपस्या के द्वारा पूर्वकाल में उत्तम दुर्गमय पुर निर्मित किया गया था। हमने सुना है कि देवदेव [ शिव] – ने सोने, चाँदी तथा लोहे से निर्मित दिव्य, उत्तम तथा सुन्दर दुर्ग को जला दिया था। भग के नेत्र का नाश करने वाले भगवान् शिव ने केवल एक बाण के प्रक्षेप से उसे कैसे जला दिया और विष्णु के द्वारा उत्पन्न किये गये भूतगण उन तीनों पुरों को क्यों नहीं जला सके ? हम लोगों ने [उस ] पुर की उत्पत्ति तथा सम्पूर्ण वर-प्राप्ति के विषय में पहले ही सुन लिया हैं; अब हे सुव्रत ! [ पुर के] दहन के विषय में पूर्णरूप से बताने की कृपा कीजिये ॥ १-५१/२ ॥ तब उनका वचन सुनकर पौराणिकों में उत्तम सूतजी समस्त अर्थों के सूचक व्यासजी से [ इस विषय में ] जैसा सुना था, उसे बताया ॥ ६१/२ ॥ सूतजी बोले — [ हे ऋषियो ! ] इस त्रिलोकी के मन-वाणी- शरीरजन्य शाप के कारण स्कन्द (कार्तिकेय)- द्वारा प्रयत्नपूर्वक बान्धवों सहित ‘तारपुत्र दैत्य तारक के मार दिये जाने पर उसके महाबली पुत्रों विद्युन्माली, तारकाक्ष तथा पराक्रमी कमलाक्ष ने तप किया। महान् बल तथा पराक्रम वाले वे महात्मा कठोर तप में लीन होकर परम नियम में स्थित थे । उन श्रेष्ठ दानवों ने तपस्या के द्वारा अपने शरीरों को दुर्बल बना दिया। तब उन पर प्रसन्न होकर वरदाता ब्रह्माजी ने उन्हें वर प्रदान किया ॥ ७–१०१/२ ॥ दैत्य बोले — ‘सभी प्राणियों से सर्वदा हम सभी का अवध्यत्व हो’ — उन सभी ने एक साथ सभी लोकों के पितामह से यह वर माँगा । तब लोकों के स्वामी अव्यय देव ब्रह्मा ने उनसे कहा — ‘ हे असुरो ! सभी को अमरत्व नहीं हुआ करता, अत: इसे छोड़ो और दूसरा वर माँगो, जो तुम लोगों को अच्छा लगता हो ‘ ॥ ११–१३ ॥ तदनन्तर उन दैत्यों ने मिलकर आपस में विचार करके जगद्गुरु ब्रह्मा को प्रणाम करके कहा — हे लोकेश ! हे जगद्गुरो ! तीन पुर स्थापित करके हम लोग आपकी कृपा से इस पृथ्वी पर विचरण करें। हम लोग एक हजार वर्ष में आपस में मिलें और हे अनघ ! ये तीनों पुर एकीभाव को प्राप्त हों । हे भगवन्! जो इन इकट्ठे हुए पुरो को एक ही बाण से नष्ट कर दे, वह देव हम लोगों का मृत्युस्वरूप हो ॥ १४-१७ ॥ ‘ऐसा ही हो’ — उनसे यह कहकर ब्रह्मदेव स्वर्गलोक चले गये। इसके बाद वीर [ दानव] मय ने अपनी तपस्या के द्वारा तीन पुरों का निर्माण किया। उन महात्माओं का सुवर्णमय पुर स्वर्ग में, रजत (चाँदी) – मय पुर अन्तरिक्ष में तथा लौहमय पुर पृथ्वी पर था। उनमें से प्रत्येक पुर लम्बाई तथा चौड़ाई में एक सौ योजन वाला और एक समान था। सोने का पुर तारकाक्ष का, चाँदी का पुर कमलाक्ष का और लोहे का पुर विद्युन्माली का था; तीनों प्रकार के दुर्ग उत्तम थे । बलशाली मय दैत्यों तथा दानवों से पूजित था; वह बलवान् मय वहाँ स्वर्णमय, रजतमय एवं काले लौहमय पुर में अपना भवन बनाकर रहा करता था ॥ १८-२२ ॥ हे सुव्रतो! हे विप्रेन्द्रो ! इस प्रकार दैत्यों के सुदृढ़ किलों से युक्त वे तीनों पुर दूसरे त्रिलोकी के समान थे। तब तीनों पुरों के [निर्मित] हो जाने पर वे सभी दैत्य तीनों पुरों में प्रवेश करके तीनों लोकों में अत्यधिक बलशाली हो गये ॥ २३-२४ ॥ उनके तीनों पुर कल्पवृक्षों से भरे हुए, हाथी- घोड़ों से परिपूर्ण, अनेक भवनों से सुशोभित, मणियों के जालों से घिरे हुए, सभी ओर द्वारों वाले, सूर्यमण्डल सदृश विमानों से युक्त, पद्मरागमय चन्द्र सदृश उज्ज्वल महलों से सुशोभित और कैलास शिखर के समान दिव्य तथा अत्युत्तम फाटकों से पृथक्-पृथक् मण्डित थे । हे श्रेष्ठ द्विजो ! वे पुर दिव्य स्त्रियों, गन्धर्वों, सिद्धों एवं चारणों से भरे हुए थे । प्रत्येक घर में रुद्रालय थे और अग्निहोत्र होता था । वे पुर सभी ओर बावलियों, कुओं, तालाबों और बड़ी-बड़ी झीलों से युक्त थे; मत्त हाथियों के झुण्डों, अति सुन्दर घोड़ों, चारों ओर मुख वाले अनेक प्रकार के अद्भुत रथों, सभाभवनों, पानीय (जल) की शालाओं तथा क्रीड़ास्थलों से पृथक्-पृथक् समन्वित थे। वे पुर चारों ओर अनेक विध वेदाध्ययनशालाओं से युक्त थे और मय [ दानव] – की माया से अन्य लोगों द्वारा मन से भी अलंघ्य थे ॥ २५–३१ ॥ हे मुनिश्रेष्ठो ! वे पुर सर्वत्र पतिव्रता स्त्रियों के द्वारा सेवित थे। हे द्विजो! वे पुर बड़े-बड़े पाप करके भी शंकरजी की पूजा के कारण पापरहित, श्रौतस्मार्त धर्मो ज्ञाता तथा अपने धर्म के प्रति परायण भार्या सहित महाभाग्यशाली दैत्यों से सदा समन्वित थे; महादेव के अतिरिक्त अन्य देवता को छोड़कर उन [शिव]-के अर्चन में स्थित, चौड़ी छाती वाले, बैल के समान कंधे वाले, सर्वदा समस्त आयुध धारण करने वाले, सदा उपवास करने वाले, दावानल के समान नेत्रों वाले, उनमें कुछ शान्त तथा कुछ कुपित, कुबड़े, बौने, नील कमलदल की आभा के सदृश, काले एवं घुँघराले बालों वाले, नीलपर्वत तथा मेरु के समान प्रतीत होने वाले, मेघ के समान गर्जन करने वाले, मय के द्वारा रक्षित तथा शिक्षित और युद्ध की तीव्र इच्छा वाले दैत्यों से परिपूर्ण थे । इस प्रकार वे पुर सदा युद्धपरायण, भलीभाँति शिव के चरणों की पूजा के द्वारा प्राप्त पराक्रम वाले, सूर्य – वायु – इन्द्रसदृश, देवताओं का दमन करने वाले तथा अत्यन्त दृढ़ दैत्यों से सेवित थे ॥ ३२–३७ ॥ हे द्विजश्रेष्ठो ! दैत्यों के वैभव के कारण तीनों पुरों की अग्नि से इन्द्रसहित देवतागण उसी प्रकार दग्ध हो गये, जैसे दावाग्नि से वृक्ष दग्ध हो जाते हैं ॥ ३८ ॥ इस प्रकार उन दग्ध देवताओं ने अतुलनीय तेज वाले देवेश्वर विष्णु को प्रणाम करके उनको [ यह सब ] बताया ॥ ३९ ॥ तब उन श्रीमान् प्रभु भगवान् नारायण ने मन में सोचा कि देवताओं के कार्य के विषय में क्या किया जाना चाहिये। इसके बाद यज्ञभोक्ता, यज्ञकर्ता, यज्ञकर्ताओं को फल प्रदान करने वाले तथा यज्ञमूर्ति प्रभु जनार्दन ने यज्ञदेव का स्मरण किया ॥ ४०-४१ ॥ तदनन्तर देवताओं के कार्य की सिद्धि के लिये उनके द्वारा स्मरण किये गये यज्ञदेव उपस्थित हुए । तब उन देवताओं ने यज्ञदेव को प्रणाम किया और उनकी स्तुति की। इसके बाद सनातन यज्ञ को देखकर पुनः इन्द्रसहित देवताओं की ओर देखकर सनातन भगवान् अच्युत (विष्णु) उनसे कहने लगे ॥ ४२-४३ ॥ श्रीविष्णु बोले — हे देवताओ ! तीनों पुरों के विनाश के लिये तथा तीनों लोकों की समृद्धि के लिये इन [ उपस्थित ] उपसद नामक यज्ञ के द्वारा परमेश्वर का यजन कीजिये ॥ ४४ ॥ सूतजी बोले — उन बुद्धिमान् देवदेव का वचन सुनकर महान् सिंहनाद करके देवतागण [उन] यज्ञेश की स्तुति करने लगे ॥ ४५ ॥ इसके बाद स्वयं विचार करके देवताओं के स्वामी वे भगवान् जनार्दन पुनः सभी देवताओं से बोले — प्राणियों को मारकर तथा जलाकर और अन्यायपूर्वक भोग-विलास करके भी यदि कोई महादेव की पूजा करे, तो वह पापरहित हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ४६-४७ ॥ ‘निष्पाप लोगों की हत्या नहीं की जानी चाहिये; केवल पापियों की ही हत्या पूर्ण प्रयत्न से की जानी चाहिये; इसमें सन्देह नहीं है। हे श्रेष्ठ देवताओ ! पापी होते हुए भी दुर्मद असुर महाबली देवताओं के द्वारा वध्य कैसे हो सकते हैं? क्योंकि परमेष्ठी रुद्र के प्रभाव के कारण वे वध्य नहीं हैं। हे देवताओ ! प्रभु [शिव]- की कृपा के बिना मैं कौन हूँ, ब्रह्मा कौन हैं, दैत्य कौन हैं, देवशत्रुओं के विनाशक कौन हैं और महात्मा मुनिगण कौन हैं ? ॥ ४८-५० ॥ जो सत्ताईस तत्त्वों से युक्त, शाश्वत, महान् से भी महत्तर, प्रभुतासम्पन्न, सम्पूर्ण देवताओं के स्वामी, वन्दनीय, विश्व के आधार, महेश्वर, सर्वदेवेश तथा सबके स्वामी हैं; उन हर शंकर ने ही [अपनी ] लीला से देवताओं एवं दैत्यों का विभाजन किया है ॥ ५१-५२ ॥ उनके एक अंश (लिङ्गरूप) – की पूजा करके देवताओं ने देवत्व प्राप्त किया है, ब्रह्मा ने ब्रह्मत्व प्राप्त किया है और मुझ विष्णु ने विष्णुत्व प्राप्त किया है। उनकी पूजा किये बिना इस जगत् में कौन व्यक्ति सिद्धि प्राप्त कर सकता है ? अतः लिङ्गार्चन-विधि के प्रभाव से उन्हीं के द्वारा वे दैत्य हन्तव्य हैं । यद्यपि वे सभी [ दैत्य ] धर्मनिष्ठ हैं तथा श्रौत – स्मार्त विधान में स्थित हैं, फिर भी उपसद नामक रुद्रयज्ञ से यजमान के द्वारा विधिपूर्वक प्रभु रुद्र का यजन करके हम लोग महादैत्यों को जीत सकेंगे। एकमात्र त्रिनेत्र भगवान् [शिव] को छोड़कर तारकाक्षसहित [ दानव] मय के द्वारा सुरक्षित, स्वस्थ, गुप्त तथा स्फटिक के समान आभा वाले तीनों पुरों को नष्ट करने में भला कौन समर्थ है ? ॥ ५३-५६ ॥ सूतजी बोले — इस प्रकार उपसद [ नामक ] यज्ञ के द्वारा प्रभु [शिव] – का यजन करके बैठे हुए विष्णु ने हजारों भूत समुदायों को देखा। तब शूल-शक्ति-गदा से युक्त हाथों वाले, टंक – उपल-शिला को आयुध के रूप में धारण किये हुए, अनेक प्रकार के प्रहार योग्य अस्त्रों से समन्वित, अनेक वेषों को धारण किये हुए, कालाग्नि रुद्र के समान प्रतीत होने वाले तथा कालरुद्र के सदृश उन उपस्थित भूतों को प्रणाम करके साक्षात् प्रभु विष्णुदेव कहने लगे ॥ ५७–५९ ॥ विष्णु बोले — हे वीरो ! उस [त्रिपुर] दैत्य के तीनों पुरों में जाकर सभी को जलाकर, छिन्न-भिन्न करके और उनका भक्षण करके पुनः आप लोग जैसे आये हैं, वैसे ही भूतल पर चले जायँ ॥ ६० ॥ तत्पश्चात् देवेश को प्रणाम करके तीनों पुरों में प्रवेश करके वे भूतगण उसी तरह नष्ट हो गये, जैसे अग्नि में प्रवेश करके शलभ (पतिंगे) नष्ट हो जाते हैं ॥ ६१ ॥ तब देवेश्वर की आज्ञा से उन सभी भूतों के नष्ट हो जाने पर हजारों दैत्य आनन्द मनाने लगे, नाचने-गाने लगे और देवेश परमात्मा ईश्वर की स्तुति करने लगे ॥ ६२१/२ ॥ तदनन्तर क्षणभर में पराजित तथा नष्ट पराक्रम वाले इन्द्रसहित देवतागण देवेश विष्णु के पास पहुँचकर भयपूर्वक खड़े हो गये। तब इन्द्रसहित उन सन्तप्त देवताओं को देखकर भगवान् पुरुषोत्तम उस समय दुःखी होकर सोचने लगे — क्या किया जाना चाहिये ? प्रयत्नपूर्वक उन दैत्यों का बल नष्ट करके मैं कैसे देवताओं का कार्य करूँगा ? विचारपूर्वक देखा जाय, तो शिव की कृपा से उन धर्मनिष्ठ दैत्यों में पाप नहीं है, अतः वे दैत्य उपसद [नामक ] यज्ञ से उत्पन्न भूतों के द्वारा वध्य नहीं हैं। धर्म से ही पाप नष्ट होता है; सब कुछ धर्म में ही प्रतिष्ठित है। धर्म से ऐश्वर्य प्राप्त होता है – यह सनातनी श्रुति है । ॥ ६३–६७१/२ ॥ [ सूतजी ने कहा — ] हे द्विजश्रेष्ठो ! तीनों पुरों में निवास करने वाले वे सभी दैत्य धर्मनिष्ठ थे, अर्थात् अनुष्ठान में तत्पर थे । अतः वे अवध्यता को प्राप्त हो गये थे; इसमें सन्देह नहीं है । बहुत बड़ा पाप करके भी जो लोग रुद्र का अर्चन करते हैं, वे सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं; जैसे जल से कमल मुक्त रहता है । हे द्विजो ! शिव की पूजा से भोगसम्पदा अवश्य प्राप्त होती है; वे दैत्य लिङ्ग-पूजा में परायण हैं, अतः वे भोगों से युक्त हैं । [ विष्णु ने कहा — ] हे देवताओ ! इसलिये मैं देवताओं के कार्य के लिये अपनी माया से दैत्यों के धर्म (अनुष्ठान) – में विघ्न डालकर क्षणभर में तीनों पुरों को जीत लूँगा ॥ ६८–७११/२ ॥ सूतजी बोले — ऐसा विचार करके भगवान् पुरुषोत्तम उन देवशत्रुओं (दैत्यों)-के धर्म में विघ्न उत्पन्न करने के लिये प्रवृत्त हुए। महातेजस्वी मायावी अच्युत ने उनके धर्मविघ्न के लिये अपने शरीर से मायामय पुरुष का सृजन किया। सबके शासक तथा स्वेच्छा से रूप धारण करने वाले मायापति [ विष्णु ] – ने देखने मात्र से विश्वास उत्पन्न करने वाले भाव से युक्त अतएव सबको मोहित करने वाले शास्त्र का निर्माण किया । षोडशलक्षक अर्थात् अत्यन्त विस्तृत श्रुति-स्मृति से विरुद्ध तथा वर्णाश्रम-धर्मों से रहित इस मायामय शास्त्र का उपदेश अपने शरीर से उत्पन्न पुरुष को करना चाहिए और स्वर्ग-नरक यहीं पर है, ऐसा विश्वास करना चाहिये, इसके अतिरिक्त कुछ नहीं — इसे प्रतिपादित करने वाले उस शास्त्र को उस पुरुष को स्वयं पढ़ाकर मायामय अच्युत विष्णु ने तीनों पुरों के विनाश हेतु उस पुरुष से कहा — [ हे पुरुष ! ] त्रिपुरवासियों के नाश के लिये तुम शीघ्र जाओ और ऐसा प्रयत्न करो, जिससे [वहाँ के] श्रौतस्मार्त धर्म नष्ट हो जायँ; इसमें संशय नहीं है ॥ ७२-७८ ॥ तत्पश्चात् उन्हें प्रणाम करके मायाशास्त्रविशारद मायावी मुनि ने उन पुरों में शीघ्र प्रवेश करके माया रची ॥ ७९ ॥ तब तीनों पुरों में निवास करने वाले वे दैत्य उसकी माया के कारण श्रौत – स्मार्त धर्मों का त्याग करके उसके शिष्य हो गये और उन्होंने महादेव परमेश्वर शंकर को छोड़ दिया ॥ ८०१/२ ॥ तत्पश्चात् मायामय प्रभु के आदेश से [ अपने] शिष्यों-प्रशिष्यों से चारों ओर से घिरे हुए मायावी नारदमुनि भी उस पुर में प्रवेश करके उस मायावी [पुरुष]-से स्वयं दीक्षित हुए। उन्होंने स्त्रियों को दुराचार फल की सिद्धि देने वाले स्त्रीधर्म का उपदेश दिया। उन स्त्रियों ने उसका सदा पालन किया और शीघ्र ही उसका फल प्राप्त कर अपने पतिदेवों की अवहेलना करके अन्य लोगों में आसक्त हो गयीं। उन नारदमुनि के गुरुत्व के कारण आज भी कलियुग में अधम स्त्रियाँ पतियों का त्याग करके व्यभिचार करती हैं ॥ ८१-८४१/२ ॥ पति ही स्त्रियों का माता-पिता, बन्धु, सखा, मित्र तथा बान्धव होता है; इसमें सन्देह नहीं है। फिर भी विष्णु की असह माया के कारण उन स्त्रियों ने वैसा किया। बड़ा-से-बड़ा पाप करके भी जो [स्त्री] पति के प्रति प्रेमयुक्त रहती है, वह परम स्वर्ग प्राप्त करती है और इससे विपरीत आचरण से नरक प्राप्त करती है। हे मुनिश्रेष्ठो ! पूर्वकाल में स्त्रियाँ सभी धर्मों, अन्य देवताओं तथा जगद्गुरुओं को त्यागकर सर्वदा पति की पूजा करती थीं; वे स्वर्गलोक प्राप्त करके निश्चिन्त होकर आनन्द मनाती थीं, [ इसके विपरीत ] अन्य स्त्रियाँ नरक जाती थीं । अतः पति ही [ स्त्रियों के लिये ] परम गति है । तथापि देवदेव प्रभु विष्णु की आज्ञा से तथा उनकी माया के कारण वे [त्रिपुरवासिनी स्त्रियाँ] अपने पतियों का त्याग करके व्यभिचारिणी हो गयीं ॥ ८५-८९१/२ ॥ उन [विष्णु] – की आज्ञा से अलक्ष्मी तीनों पुरों में चली गयीं और जो लक्ष्मी उन [ दैत्यों ] की तपस्या के द्वारा देवेश्वर ब्रह्मा से उन्हें प्राप्त थीं, वे [ उन्हीं ] प्रभु ब्रह्मा के आदेश से [त्रिपुर को] छोड़कर बाहर चली गयीं । इस प्रकार धर्मविघ्न के लिये उन दैत्यों को उस प्रकार का विष्णुमाया – निर्मित बुद्धि मोह देकर भगवान् [पुरुष] और उन स्त्रियों को विपरीत आचरण का उपदेश देकर मायावी नारद – ये दोनों अव्यय देव निराकुल होकर सुखपूर्वक बैठ गये ॥ ९०-९२१/२ ॥ इस प्रकार परम उत्तम श्रौतस्मार्त धर्म के नष्ट हो जाने पर, विश्वकर्ता उन विष्णु के द्वारा [ वहाँ ] पाखण्ड स्थापित कर दिये जाने पर दैत्यों के द्वारा महेश्वर का त्याग कर दिये जाने पर तथा लिङ्गपूजा का परित्याग कर दिये जाने पर, सम्पूर्ण स्त्रीधर्म के नष्ट हो जाने पर और दुराचार स्थापित हो जाने पर देवेश [ विष्णु ] कृतार्थ हो गये और वे पुरुषोत्तम सभी देवताओं के साथ तपस्या द्वारा सर्वज्ञ उमापति को प्राप्त करके उनकी स्तुति करने लगे ॥ ९३–९५१/२ ॥ श्रीभगवान् बोले — आप महेश्वर, देव, परमात्मा को नमस्कार है। आप नारायण, शर्व, ब्रह्म, ब्रह्मरूप, शाश्वत, अनन्त तथा अव्यक्त को नमस्कार है ॥ ९६-९७ ॥ सूतजी बोले — इस प्रकार भगवान् [विष्णु]-ने महादेव की स्तुति करके दण्डवत् प्रणाम करके जल में स्थित होकर एक करोड़ बार रुद्रमन्त्र का जप किया। इसके बाद वे सभी देवता इन्द्र, साध्यगण, यम, रुद्रगण तथा मरुद्गणों के साथ देव परमेश्वर की स्तुति करने लगे ॥ ९८-९९ ॥ ॥ शिवस्तोत्रम् विष्णुकृतम् ॥ ॥ देवा ऊचुः ॥ नमः सर्वात्मने तुभ्यं शङ्करायार्तिहारिणे । रुद्राय नीलरुद्राय कद्रुद्राय प्रचेतसे ॥ १०० ॥ गतिर्नः सर्वदास्माभिर्वन्द्यो देवारिमर्दनः । त्वमादिस्त्वमनन्तश्च अनन्तश्चाक्षयः प्रभुः ॥ १०१ ॥ प्रकृतिः पुरुषः साक्षात्स्रष्टा हर्ता जगद्गुरो । त्राता नेता जगत्यस्मिन् द्विजानां द्विजवत्सल ॥ १०२ ॥ वरदो वाङ्मयो वाच्यो वाच्यवाचकवर्जितः । याज्यो मुक्त्यर्थमीशानो योगिभिर्योगविभ्रमैः ॥ १०३ ॥ हृत्पुण्डरीकसुषिरे योगिनां संस्थितः सदा । वदन्ति सूरयः सन्तं परं ब्रह्मस्वरूपिणम् ॥ १०४ ॥ भवन्तं तत्त्वमित्यार्यास्तेजोराशिं परात्परम् । परमात्मानमित्याहुरस्मिञ्जगति तद्विभो ॥ १०५ ॥ दृष्टं श्रुतं स्थितं सर्वं जायमानं जगद्गुरो । अणोरल्पतरं प्राहुर्महतोऽपि महत्तरम् ॥ १०६ ॥ सर्वतः पाणिपादं त्वां सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठसि ॥ १०७ ॥ महादेवमनिर्देश्यं सर्वज्ञं त्वामनामयम् । विश्वरूपं विरूपाक्षं सदाशिवमनामयम् ॥ १०८ ॥ कोटिभास्करसङ्काशं कोटिशीतांशुसन्निभम् । कोटिकालाग्निसङ्काशं षड्विंशकमनीश्वरम् ॥ १०९ ॥ प्रवर्तकं जगत्यस्मिन् प्रकृतेः प्रपितामहम् । वदन्ति वरदं देवं सर्वावासं स्वयम्भुवम् ॥ ११० ॥ श्रुतयः श्रुतिसारं त्वां श्रुतिसारविदो जनाः ॥ १११ ॥ अदृष्टमस्माभिरनेकमूर्ते विना कृतं यद्भवताथ लोके । त्वमेव दैत्यासुरभूतसङ्घान् देवान्नरान् स्थावरजङ्गमांश्च ॥ ११२ ॥ पाहि नान्या गतिः शम्भो विनिहत्यासुरोत्तमान् । मायया मोहिताः सर्वे भवतः परमेश्वर ॥ ११३ ॥ यथा तरङ्गा लहरीसमूहा युध्यन्ति चान्योन्यमपांनिधौ च । जलाश्रयादेव जडीकृताश्च सुरासुरास्तद्वदजस्य सर्वम् ॥ ११४ ॥ ॥ सूत उवाच ॥ य इदं प्रातरुत्थाय शुचिर्भूत्वा जपेन्नरः । शृणुयाद्वा स्तवं पुण्यं सर्वकाममवाप्नुयात् ॥ ११५ ॥ देवता बोले — आप सर्वात्मा, शंकर, दुःखनाशक, रुद्र, नीलरुद्र, कद्रुद्र (प्रशस्त रुद्र) तथा प्रचेता को नमस्कार है। आप हम लोगों की गति हैं । दैत्यों का संहार करने वाले आप हम लोगों द्वारा सर्वदा वन्द्य हैं। आप आदि तथा अन्तरहित हैं; आप अनन्त (शेषरूप), अविनाशी एवं प्रभुतासम्पन्न हैं। हे जगद्गुरो ! आप प्रकृति, पुरुष, साक्षात् स्रष्टा, रक्षक तथा संहारक हैं । हे द्विजवत्सल ! आप इस जगत् में द्विजों के नेता हैं। आप वरदाता, वाणीमय, वाच्य, वाच्य – वाचक से रहित ईशान हैं; आप मुक्ति के लिये योगपरायण योगियों के द्वारा पूज्य हैं। आप योगियों के हृदयरूपी कमल के छिद्र में सदा स्थित हैं। विद्वान् लोग आपको सर्वत्र विद्यमान् श्रेष्ठ तथा ब्रह्मस्वरूप कहते हैं । हे विभो ! ऋषिगण आपको इस जगत् में तत्त्वरूप, तेजोराशि, परात्पर एवं परमात्मा कहते हैं । जगद्गुरो ! आप दृष्ट, श्रुत, स्थित तथा जायमान सब कुछ हैं। लोग आपको अणु से भी अल्पतर, महान् से भी महत्तर, सभी ओर हाथ-पैर वाला, सभी ओर नेत्र-सिर-मुख वाला तथा सभी ओर कान वाला कहते हैं। आप संसार में सभी को आच्छादित करके स्थित हैं ॥ १००-१०७ ॥ लोग आपको महादेव, अनिर्देश्य, सर्वज्ञ, अनामय, विश्वरूप, विरूपाक्ष, सदाशिव, निर्विकार, करोड़ों सूर्यों के समान [तेजस्वी ] करोड़ों चन्द्रमा सदृश [ प्रकाशमान], करोड़ों कालाग्नि के समान [प्रज्वलित ], छब्बीस तत्त्वों से युक्त, अनीश्वर, इस जगत् में प्रकृति के प्रवर्तक, प्रपितामह, सबके आवास-स्वरूप तथा स्वयम्भू (स्वयं उत्पन्न होने वाला) एवं वर देने वाला देव कहते हैं; श्रुतियाँ तथा श्रुति-तत्त्वों को जानने वाले लोग आपको वेदों का सार कहते हैं ॥ १०८-१११ ॥ हे अनेक रूपों वाले [प्रभो]! हम लोगों ने संसार में ऐसा कुछ भी नहीं देखा है, जो आपके बिना [ किसी अन्य के द्वारा] रचित हो; आपने ही दैत्यों, सुरों के भूतसमुदायों, देवताओं, मनुष्यों, स्थावर-जंगम आदि को उत्पन्न किया ॥ ११२ ॥ हे शम्भो! हम लोगों की कोई अन्य गति नहीं है; महादैत्यों का संहार करके आप [ हमारी ] रक्षा कीजिये । हे परमेश्वर ! सभी लोग आपकी माया से मोहित हैं ॥ ११३ ॥ जिस प्रकार तरंगें तथा लहरें समुद्र में परस्पर टकराती हैं और जलाश्रय से ही जड़ीभूत होकर उसीमें विलीन हो जाती हैं, उसी प्रकार ब्रह्मा की सृष्टि के देवता – असुर सभी कोई आपस में टकराते हैं और अन्त में जड़ीभूत होकर आपमें ही विलीन हो जाते हैं ॥ ११४ ॥ सूतजी बोले — जो मनुष्य प्रातः काल उठकर शुद्ध होकर इस पवित्र स्तुति को पढ़ता अथवा सुनता है, वह सभी कामनाओं को प्राप्त कर लेता है ॥ ११५ ॥ इस प्रकार देवताओं के द्वारा स्तुति किये जाने तथ विष्णु के जप से प्रसन्न हुए महेश्वर शंकर ने उमा का आलिङ्गन करके नन्दी के ऊपर हाथ रखकर देवताओं की ओर देखकर गम्भीर वाणी में मुसकराते हुए कहा — ‘ हे सुरेश्वरो ! अब मैंने इस देवकार्य को और विष्णु तथा बुद्धिमान् नारद के मायाबल को जान लिया है। हे श्रेष्ठ देवताओ! मैं अधर्म में निष्ठा रखने वाले उन दैत्यों के तीनों पुरों का विनाश [अवश्य] करूँगा’ ॥ ११६–११८१/२ ॥ सूतजी बोले — इसके बाद [वहाँ] आये हुए वे इन्द्र-ब्रह्मा-विष्णु सहित देवताओं ने प्रभु का वचन सुनकर उन्हें प्रणाम किया तथा उनकी स्तुति की। इसके अनन्तर शिव की ओर देखकर विस्मित देवी भी अपने लीला-कमल से शिवजी को मारकर (स्पर्शकर) यह वचन कहने लगीं ॥ ११९-१२०१/२ ॥ देवी बोलीं — हे विभो ! हे पुत्रवानों में श्रेष्ठ ! उत्तम आभूषणों से सुशोभित तथा सूर्य के समान प्रतीत होने वाले [अपने] इस खेलते हुए श्रेष्ठ पुत्र षडानन को देखिये । हे महादेव! मुकुटों, कटकों, कुण्डलों, सुन्दर कंगनों, नूपुरों, छन्नवारों, करधनियों, अनेक किंकिणियों, सुवर्णमय पीपल के पत्तों, कल्पद्रुम के पुष्पों से शोभित सुन्दर अलकों, पद्मराग आदि मणियों से चमत्कृत हारों तथा बाजूबन्दों, पूर्णचन्द्रमा के समान प्रभा वाले मुक्ताफलमय हारों और तिलकों से मण्डित परम सुन्दर पुत्र को देखिये । हे ईश ! कुंकुम आदि से अंकित तथा भस्मनिर्मित वृत्ताकार तिलक से ‘युक्त इसके कमलसमूह-सदृश मुखों को देखिये। हे विभो! आप इसके अत्यन्त सुन्दर नेत्रों को देखिये, गंगा आदि, कृत्तिका आदि तथा विशेष रूप से स्वाहा माताओं के द्वारा मंगल के लिये लगाये गये भव्य तथा विचित्र काजलों को देखिये ॥ १२१–१२७१/२ ॥ इस प्रकार जगज्जननी [उमा] – के वचनों से सम्बोधित किये गये ईशान शिव कार्तिकेय के मुखामृत का पान करते हुए तृप्त नहीं हुए। उन्हें दैत्यों के शस्त्रों से पीड़ित उन देवताओं का स्मरण नहीं रहा। उन्होंने स्कन्द का आलिङ्गन करके उसका सिर सूँघकर कहा — ‘हे पुत्र ! नृत्य करो।’ तब कष्ट दूर करने वाले बालकरूप प्रभु [ स्कन्द ] भी लीला करते हुए नाचने लगे। सभी गणेश्वर भी उनके साथ नृत्य करने लगे और क्षणभर में शिव की आज्ञा से सम्पूर्ण त्रिलोकी वहाँ नृत्य करने लगा। नाग और इन्द्र सहित सभी देवता भी नाचने लगे। गणेश्वरों ने स्कन्द की स्तुति की । [ उस समय ] पार्वती तथा [अन्य] माताएँ आनन्दित हुईं। गन्धर्व तथा किन्नर पुष्पवृष्टि करने लगे एवं गाने लगे। तब [ उस ] नृत्यरूपी अमृत का पान करके पार्वती तथा परमेश्वर तृप्त हो गये और नन्दी सहित गणेश्वर भी तृप्त हुए ॥ १२८–१३३ ॥ तदनन्तर सूर्य के समान कान्तिवाले शिवजी ने भी नन्दी, षडानन (स्कन्द ) तथा गिरिराजपुत्री [ पार्वती ] – के साथ दिव्य भवन में प्रवेश किया, जैसे मेघ अन्य मेघ में प्रवेश करता है ॥ १३४ ॥ वे देवता उन बुद्धिमान् शिव के द्वार के पास खड़े हो गये और कुछ-कुछ व्याकुलचित्त होकर महादेव की स्तुति करने लगे। वे व्याकुल होकर एक-दूसरे की ओर देखकर कहने लगे — ‘यह क्या, यह क्या हम लोग पापी हैं’ अन्य दूसरों ने कहा — ‘हम अभागे हैं’ अन्य सुरेश्वरों ने कहा — ‘ये महादैत्य भाग्यशाली हैं।’ कुछ ने कहा — ‘यह उनकी पूजा का फल है’ और कुछ ने कहा — ‘ऐसा नहीं है’ ॥ १३५–१३७ ॥ इसी बीच उनके अनेक शब्दों को सुनकर महातेजस्वी कुम्भोदर [नामक शिवगण] दण्ड से देवताओं को पीटने लगा। तब वे देवता भयभीत होकर ‘हा-हा’ कहते हुए भागने लगे; कुछ मुनि तथा देवता पृथ्वी तल पर गिर पड़े ॥ १३८-१३९ ॥ कश्यप आदि मुनियों ने कहा — ‘विधि का बल कैसा अद्भुत है !’ हे द्विजो ! अन्य लोगों ने कहा — ‘देव- देवेश का दर्शन करके भी असुरशत्रु देवताओं के अभाग्य से ही कार्य पूर्ण नहीं हो सका। इसके बाद वे सब हृदय में थोड़ा अर्चन करके ‘शिव को नमस्कार है’ – ऐसा कहने लगे ॥ १४०-१४१ ॥ तत्पश्चात् जटाजूट धारण किये, [ हाथ में ] त्रिशूल लिये, माला पहने हुए, हाला धारण किये हुए, कुण्डल धारण किये हुए, कंगन पहने हुए तथा गदा धारण किये हुए महादेवप्रिय मुनि नन्दीश सुन्दर श्वेत बैल पर चढ़कर उन [ शिव] की आज्ञा से वहाँ जाने लगे। तब नन्दी को देखकर कुम्भोदर [ नामक ] वह गण भी नन्दी को प्रणाम करके शीघ्रता करते हुए उनके साथ चल दिया। गणसहित वे महातेजस्वी वृषध्वज गणों के सेनापति नन्दी बैल की पीठ पर उसी तरह प्रतीत हो रहे थे, मानो मेघरूप विष्णु के पृष्ठ पर शिवजी विराजमान हों । नन्दीश्वर का दस योजन विस्तृत तथा मुक्ताजालों से अलंकृत श्वेत छत्र आकाश की भाँति प्रतीत हो रहा था । उस छत्र में भीतर से बँधी हुई मुक्ताफलों की वह श्वेत माला ऐसी लग रही थी, मानो शिवजी के सिर पर आकाश से गंगा गिर रही हों ॥ १४२-१४६१/२ ॥ हे मुनिश्रेष्ठो ! तदनन्तर गणाध्यक्ष [ नन्दी] – को देखकर इन्द्र की आज्ञा से दिव्य देवदुन्दुभियाँ बजने लगीं; सभी लोग वाणी द्वारा वांछित फल प्रदान करने वाले शुभ गणेश्वर की स्तुति करने लगे, जैसे शिव को देखकर देवता लोग प्रसन्नता से रोमांचित होकर उनकी स्तुति करते हैं ॥ १४७-१४८१/२ ॥ आकाशचारियों ने इन्द्र की आज्ञा से नन्दी के सिर पर आकाश से सुगन्धमय पुष्पवृष्टि की। तुष्टि पुष्टि से युक्त यथार्थ वृष्टि से प्रसन्न होकर नन्दी उसी तरह शोभा पा रहे थे, जैसे शिवजी गन्धजल से अभिसिंचित चन्द्रलेखा से शोभा प्राप्त करते हैं । हे सुव्रतो ! वृषभ का पृष्ठ अनेक प्रकार के पुष्पों से ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो आकाशपृष्ठ तारों से भर गया हो। हे सुव्रतो! पुष्पों से ढँके हुए नन्दी बैल की पीठ पर उसी प्रकार सुशोभित हो रहे थे, जैसे आकाशपृष्ठ पर [विराजमान ] चन्द्रमा तारों से आच्छादित होकर सुशोभित होते हैं ॥ १४९-१५२१/२ ॥ उस प्रकार की शोभा वाले उन नन्दी को देखकर इन्द्र तथा विष्णु सहित देवता साक्षात् महादेवजी की भाँति प्रतीत होने वाले गणाधिपों के स्वामी नन्दी की स्तुति करने लगे ॥ १५३१/२ ॥ ॥ देवैः कृतं गणनाथस्तोत्रम् ॥ ॥ देवा ऊचुः ॥ नमस्ते रुद्रभक्ताय रुद्रजाप्यरताय च ॥ १५४ ॥ रुद्रभक्तार्तिनाशाय रौद्रकर्मरताय ते । कूष्माण्डगणनाथाय योगिनां पतये नमः ॥ १५५ ॥ सर्वदाय शरण्याय सर्वज्ञायार्तिहारिणे । वेदानां पतये चैव वेदवेद्याय ते नमः ॥ १५६ ॥ वज्रिणे वज्रदंष्ट्राय वज्रिवज्रनिवारिणे । वज्रालङ्कृतदेहाय वज्रिणाराधिताय ते ॥ १५७ ॥ रक्ताय रक्तनेत्राय रक्ताम्बरधराय ते । रक्तानां भवपादाब्जे रुद्रलोकप्रदायिने ॥ १५८ ॥ नमः सेनाधिपतये रुद्राणां पतये नमः । भूतानां भुवनेशानां पतये पापहारिणे ॥ १५९ ॥ रुद्राय रुद्रपतये रौद्रपापहराय ते । नमः शिवाय सौम्याय रुद्रभक्ताय ते नमः ॥ १६० ॥ देवता बोले — आप रुद्रभक्त तथा रुद्रजप परायण को नमस्कार है । रुद्रभक्तों की पीड़ा का नाश करने वाले, रौद्रकर्म में संलग्न, कूष्माण्डगणों के स्वामी तथा योगियों के पति आप [ नन्दी] – को नमस्कार है। सब कुछ प्रदान करने वाले, शरण देने वाले, सब कुछ जानने वाले, कष्ट दूर करने वाले, वेदों के पति तथा वेदों से जानने योग्य आप [ नन्दी]-को नमस्कार है । वज्रधारी, वज्रतुल्य दंष्ट्रा वाले, इन्द्र के वज्र का निवारण करने वाले, वज्र से अलंकृत देह वाले तथा इन्द्र के द्वारा आराधित आप [ नन्दी] -को नमस्कार है । रक्त वर्ण वाले, रक्त नेत्र वाले, रक्त वस्त्र धारण करने वाले तथा शिव के चरणकमल में अनुरागयुक्त लोगों को रुद्रलोक प्रदान करने वाले आप [ नन्दी] – को नमस्कार है । सेना के अधिपति, रुद्रों के पति, भूतों तथा भुवनेशों के पति और पापों का हरण करने वाले आप [ नन्दी]-को नमस्कार है । रुद्र, रुद्रपति, रौद्र पापों का हरण करने वाले आप [ नन्दी ] को नमस्कार है। शिवस्वरूप, सौम्य [स्वभाव वाले] तथा रुद्रभक्त आप [ नन्दी]-को नमस्कार है ॥ १५४-१६० ॥ सूतजी बोले — [ हे ऋषियो ! ] तदनन्तर प्रसन्न हुए शिलादपुत्र गणेश्वर [ नन्दी]-ने देवताओं से कहा — ‘अब तीनों पुरों को नष्ट मानकर आप लोग शम्भु के लिये रथ, सारथि, धनुष तथा उत्तम बाण प्रयत्नपूर्वक तैयार कराइये।’ इसके बाद उन देवताओं ने अतिशीघ्रता से युक्त होकर ब्रह्मा के साथ विश्वकर्मा के द्वारा बुद्धिमान् देवदेव [शिव ] -का रथ बनवाया ॥ १६१-१६३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘पुरदाहप्रसंग में नन्दिकेश्वरवाक्य’ नामक इकहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७१ ॥ Content is available only for registered users. 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