January 26, 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -072 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ बहत्तरवाँ अध्याय त्रिपुरासुर वध के लिये विश्वकर्मा द्वारा एक दिव्य रथ का निर्माण तथा भगवान् महेश्वर का उस रथ पर आरूढ़ हो त्रिपुरासुर को दग्ध करना एवं ब्रह्मा द्वारा भगवान् शिव की स्तुति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे द्विसप्तितमोऽध्यायः त्रिपुरदाहे ब्रह्मस्तवं सूतजी बोले — [ हे ऋषियो!] विश्वकर्मा ने प्रयत्न के साथ आदरपूर्वक भगवान् रुद्र का रथ बनाया; वह सर्वलोकमय, दिव्य, सर्वभूतमय, सभी देवताओं से नमस्कृत, सभी देवताओं से युक्त, सुवर्णमय तथा सबके अनुकूल था । उसका दाहिना चक्र सूर्य एवं बायाँ चक्र चन्द्रमा थे । दाहिना चक्र बारह अरों वाला तथा बायाँ चक्र सोलह अरों वाला था । हे विप्रेन्द्रो ! हे सुव्रतो ! [ दाहिने चक्र के] उन अरों में बारह आदित्य थे और बायें चक्र के सोलह अरों में चन्द्रमा की [सोलह ] कलाएँ थीं । हे मुनिश्रेष्ठो ! नक्षत्रगण उस बाएँ चक्र के भूषण थे और छः ऋतुएँ उन दोनों चक्रों की नेमियाँ थीं। आकाश इसकी छत थी और मन्दर पर्वत रथ का सारथि-स्थान था । अस्ताचल तथा उदयाचल उसके दोनों स्तम्भ कहे गये हैं। महामेरु [पर्वत] उसका अधिष्ठान [ मुख्य स्थान ] था और केसर पर्वत मेरु को आश्रय देने वाले थे । संवत्सर उसका वेग था और दोनों अयन (उत्तरायण, दक्षिणायन) उसके चक्रसंगम (अक्ष के प्रान्तभाग ) थे। मुहूर्त उस रथ के बंधुर [तल्पभाग ] और कलाएँ उसकी शम्या (वर्तुल पट्टिकाएँ) कही गयी हैं। काष्ठाएँ उसकी नासिका तथा क्षण उसके अक्षदण्ड (चक्रों का आधारदण्ड) कहे गये हैं। निमेष इस रथ के अनुकर्ष (नीचे का तल) तथा लव (निमेष से भी छोटा समय) इसकी ईषा (दोनों अक्षों को जोड़ने वाला काष्ठ) कहे गये हैं ॥ १-८१/२ ॥ अन्तरिक्ष इस रथ का वरूथ (कवच ) था और स्वर्ग तथा मोक्ष इस रथ के दोनों ध्वज थे। धर्म तथा विराग इसके दण्ड थे; यज्ञ इस दण्ड को आश्रय (सहारा) देने वाले कहे गये हैं। दक्षिणाएँ उस रथ की सन्धियाँ थीं और पचासों अग्नियाँ इसकी कीलें थीं । धर्म तथा काम – ये दोनों उसके जुओं के सिरे कहे गये हैं । अव्यक्त [तत्त्व] उसका ईषादण्ड था तथा बुद्धि इसका नड्वल (अक्ष को स्निग्ध बनाने वाले द्रव्य का पात्र) थी। अहंकार इसका कोण था । पंचमहाभूतों को इसका बल बताया गया है। [सभी ] इन्द्रियाँ उसके सभी ओर लगे हुए आभूषण थे। श्रद्धा इस [रथ]-की गति थी। वेद उसके घोड़े कहे गये हैं। वेदों के पदविभाग इसके भूषण थे तथा [शिक्षा आदि] छः वेदांग इसके उपभूषण थे। हे सुव्रतो! पुराण, न्याय, मीमांसा तथा धर्मशास्त्र इसके वालाश्रय पट थीं, जो सभी लक्षणों से युक्त थे। [गायत्री आदि] मन्त्र, [क आदि] वर्ण, पाद (छन्दों के चतुर्थांश) तथा [ब्रह्मचर्य आदि] आश्रम उन पटों के घंटे कहे गये हैं। हजार फणों से विभूषित अनन्त [ शेषनाग ] उसके बन्धनरज्जु थे ॥ ९–१५ ॥ दिशाएँ तथा उपदिशाएँ इस रथ के पाद थे। पुष्कर आदि [मेघ] रत्नभूषित सुवर्णनिर्मित पताकाएँ थीं। चारों समुद्र उस रथ के बाह्य कम्बल कहे गये हैं। गंगा आदि सभी श्रेष्ठ नदियाँ समस्त आभूषणों से अलंकृत होकर [अपने] हाथों के अग्रभाग में चामर (चँवर) धारण किये हुए स्त्रीरूप से शोभित होती हुई जहाँ-तहाँ अपना स्थान बनाकर रथ को सुशोभित कर रही थीं ॥ १६-१८ ॥ आवह आदि सात वायु उसकी सुवर्णमय उत्तम सीढ़ियाँ थीं। भगवान् ब्रह्मा सारथि थे और देवता लोग रथ की रश्मियों को पकड़ने वाले कहे गये हैं। ब्रह्मदैवत प्रणव ब्रह्मा के हाथ में स्थित उसका प्रतोद ( चाबुक) था । विस्तृत लोकालोक पर्वत उसके सात वायुओं के स्कन्धरूप सोपान से युक्त था । परम सुन्दर मानस पर्वत उसमें पैर रखने का अधोभाग ( पायदान ) था । समस्त पर्वत सभी ओर इस रथ की नासा (नासिका) कहे गये हैं ॥ १९–२१ ॥ सातों तल उस रथ के मज्जन थे; उन तलों में रहने वाले सभी लोग कपोतपक्षी के समान थे। मेरु पर्वत उस रथ का महाछत्र था और मन्दर पर्वत पृष्ठवाद्य के रूप में था। शैलराज [मेरु] धनुष थे और स्वयं भुजंगपति [वासुकि] कालरात्रि तथा इन्द्रधनुष के साथ ज्या (धनुष की डोरी) थे। वेदस्वरूपिणी सरस्वती देवी [उस] धनुष की घण्टा थीं, महातेजस्वी विष्णु बाण थे और चन्द्रमा [उस] बाण के शल्य (लौहनिर्मित अग्रभाग) थे। साक्षात् प्रलयाग्नि उस बाण के तीक्ष्ण तथा अतिभयंकर विषमय अनीक (बल) थे। [आवह आदि] वायु [उस बाण के] पंख कहे गये हैं ॥ २२-२५ ॥ इस प्रकार [देवताओं के द्वारा ] दिव्य रथ, धनुष, बाण तथा जगत् के स्वामी प्रभु ब्रह्मा को सारथि बनाकर तथा [कवच, मुकुट आदि ] रणभूषणों को धारण करने वाले शिवजी सभी देवताओं सहित पृथ्वी तथा स्वर्ग को कम्पित करते हुए [उस] दिव्य रथ पर आरूढ़ हुए ॥ २६-२७ ॥ ऋषियों के द्वारा स्तुत होते हुए और बन्दीजनों तथा नृत्य करती हुई नृत्यप्रवीण अप्सराओं के द्वारा वन्दित होते हुए वे वरद शिव अत्यन्त सुशोभित हो रहे थे। सारथि की ओर देखकर उस लोकसम्भृत कल्पित रथ पर उनके आरूढ़ होते ही वेदसम्भूत घोड़े सिर के बल भूमि पर गिर पड़े। तदनन्तर वृषेन्द्र का रूप धारण किये हुए भगवान् शेष ने इस रथ को नीचे से उठाकर क्षणभर में स्थापित करना चाहा, किंतु वे वृषेन्द्र भी एक क्षण बाद घुटनों के बल पृथ्वी पर गिर पड़े। तब हाथ में लगाम पकड़े हुए सर्वव्यापी भगवान् [ ब्रह्मा ने] शिव के आदेश से घोड़ों को उद्यत ( उत्साहित ) करके [ उस] शुभ रथ को स्थापित कर दिया और उन्होंने मन तथा वायु के समान वेग वाले घोड़ों को साहसी दानवों के आकाश-स्थित पुरों को उद्देश्य करके प्रेरित किया ॥ २८-३३ ॥ इसके बाद भगवान् शंकर रुद्र ने देवताओं को देखकर कहा — ‘मुझे ही पशुओं ( जीवों) का आधिपत्य दिया गया है; अतः मैं असुरों का हनन करता हूँ। हे श्रेष्ठ देवताओ! देवों तथा असुरों के लिये पृथक्-पृथक् पशुत्व होने के कारण ही वे महादानव वध के योग्य होंगे; अन्यथा नहीं ॥ ३४-३५ ॥ बुद्धिमान् देवदेव [शिव]-का सम्पूर्ण वचन सुनकर पशुत्व के प्रति शंकित होते हुए सभी देवता विषादग्रस्त हो गये ॥ ३६ ॥ तब उनके इस भाव को जानकर शिवजी ने उनसे यह वचन कहा — ‘हे श्रेष्ठ देवताओ ! इस पशुभाव में आप लोगों को भय नहीं होना चाहिये । अब पशुभाव की मुक्ति का उपाय सुनिये और उसे कीजिये। जो दिव्य पाशुपतव्रत को करेगा, वह पशुत्व से मुक्त हो जायगा; यह सत्य तथा प्रतिज्ञात है। हे श्रेष्ठ देवताओ! एकाग्रचित्त होकर जो अन्य लोग भी मेरे पाशुपतव्रत को करेंगे, वे पशुत्व से मुक्त हो जायँगे; इसमें सन्देह नहीं है। जो निष्ठापूर्वक बारह वर्ष, उसके आधे [छ: वर्ष] अथवा तीन वर्ष तक शुश्रूषा करेगा, वह पशुत्व से मुक्त हो जायगा। अतः हे श्रेष्ठ देवताओ ! [आपलोग] इस परम दिव्य व्रत को कीजिये ‘ ॥ ३७–४१ ॥ लोकनमस्कृत शिव के ऐसा कहने पर देवताओं ने कहा — ‘ ऐसा ही होगा ।’ अतः समस्त देवता, असुर तथा मनुष्य शिवजी के पशु हैं। रुद्र पशुपति हैं और पशुपाश से मुक्त करने वाले हैं। जो पशु है, उसे इस व्रत के द्वारा पशुभाव का त्याग कर देना चाहिये; इसे करके वह पापी नहीं रह जाता है – यह शास्त्र का निश्चय है ॥ ४२-४३१/२ ॥ तत्पश्चात् अमित पराक्रम वाले बालकरूप साक्षात् विनायक देवताओं द्वारा पूजित न होने के कारण उन्हें रोकते हुए कहने लगे ॥ ४४१/२ ॥ श्रीविनायक बोले — शुभ भक्ष्य, भोज्य आदि पदार्थों के द्वारा मेरी पूजा किये बिना इस संसार में कौन मनुष्य, देवता अथवा दानव सिद्धि प्राप्त कर सकता है ? अतः हे सुरेश्वरो ! मैं देवेश क्षणभर में ही उस देवकार्य में विघ्न करूँगा; [मेरी पूजा किये बिना ] आप लोग कार्य करने में कैसे तत्पर हो गये ? ॥ ४५-४६१/२ ॥ तत्पश्चात् इन्द्रसहित सभी देवता भयभीत हो गये और भक्ष्य-भोज्य आदि पदार्थों, आटे से बने लड्डुओं तथा मोदकों से उन प्रभु की विधिवत् पूजा करके वे गणेश्वर से बोले — हम लोगों का कार्य सदा निर्विघ्न सम्पन्न हो’ ॥ ४७-४८ ॥ उस समय समस्त सुरेश्वरों में मुख्य शिव ने भी [अपने] पुत्र गणेश का आलिङ्गन करके उनका सिर सूँघकर अनेक प्रकार के सुगन्धित पुष्पों, भक्ष्य-भोज्य पदार्थों तथा उत्तम रसों से उनकी पूजा की ॥ ४९ ॥ इसके बाद वे मेरुधन्वा शिवजी देवताओं के साथ ईश्वरों के नायक पूजनीय विनायक की पूजा करके तीनों पुरों को जलाने के लिये गणेश्वरों के साथ चल पड़े ॥ ५० ॥ उस समय सभी देवता, सिद्ध, भूतगण, नन्दी आदि गणेश्वर तथा अन्य ईश्वर अपने-अपने वाहनों से उन देवदेव ईश महेश्वर के पीछे-पीछे चले ॥ ५१ ॥ हिमालय सदृश विमान पर चढ़कर नन्दी [ सभी ] देवताओं तथा गणेश्वरों के आगे होकर त्रिपुर पर प्रहार करने के लिये चले, मानो भगवान् शिव मृत्यु पर प्रहार हेतु चले हों ॥ ५२ ॥ उस समय जाते हुए शिलादपुत्र [ नन्दी ] के पीछे सभी देवता, गणेश्वर तथा गणलोग विशाल हाथियों, बैलों और घोड़ों पर आरूढ़ होकर हाथों में अपने शस्त्र तथा चिह्न धारण किये हुए चले ॥ ५३ ॥ महाशक्तिशाली गरुड़ध्वज [ विष्णु ] गिरीन्द्रसदृश पक्षिराज [गरुड़ ]-पर आरूढ़ होकर लोकों के हितार्थ तीनों पुरोंको दग्ध करनेके लिये शिवजी के बायें होकर शीघ्रतापूर्वक चले ॥ ५४ ॥ सभी देवता तीक्ष्ण शक्ति (बर्छा), टंक, गदा, त्रिशूल, खड्ग आदि उत्तम आयुधों से युक्त होकर देवलोक के नाथ, देवताओं तथा असुरों के स्वामी और अप्रमेय उन शिव के पीछे-पीछे सभी ओर से चले ॥ ५५ ॥ कमलपत्र के समान वर्ण वाले गरुड़वाहन भगवान् विष्णु देवताओं के मध्य ऐसे सुशोभित हो रहे थे, मानो सुमेरु [पर्वत] – के शिखर पर आरूढ़ हजार किरणों वाले भगवान् सूर्य हों ॥ ५६ ॥ गजेन्द्र (ऐरावत) – पर आरूढ़ होकर देवताओं के प्रमुख सहस्र नेत्रवाले [ इन्द्र ] रुद्र के दाहिनी ओर होकर त्रिपुर का नाश करने के लिये चले; मानो गरुड़ सर्पों का नाश करने के लिये चल दिये हों ॥ ५७ ॥ सिद्ध, गन्धर्व, श्रेष्ठ देवता तथा अन्य वीर देवताओं के स्वामी प्रभु उन इन्द्र की स्तुति कर रहे थे और वे श्रेष्ठ पुष्पवृष्टि के साथ कामनाओं की पूर्ति करने वाले इन्द्र की जय-जयकार कर रहे थे ॥ ५८ ॥ उस समय स्वर्ग में स्थित देवताओं ने अहल्या के उपपति, देवताओं के ईश, जगत् के स्वामी, देवताओं के स्वामी तथा हजार नेत्रों वाले इन्द्र को देखकर लीलापूर्वक उसी प्रकार प्रणाम किया, जैसे माता पार्वती पुत्र कार्तिकेय को प्रणाम करती हैं ॥ ५९ ॥ यम, अग्नि, कुबेर, वायु, निर्ऋति, वरुण तथा शिवजी के पीछे-पीछे चले ॥ ६० ॥ ईशान भी युद्ध में प्रवीण वीरभद्र वृषभेन्द्र पर आरूढ़ होकर रथ के नैर्ऋत्यकोण (दक्षिण-पश्चिम) – में होकर त्रिपुर का नाश करने के लिये चले; अपने रोमज संज्ञक बाणों से घिरे हुए वे देवदेव त्रियम्बक की सेवा कर रहे थे। दूसरे महादेव के समान प्रतीत होने वाले महातेजस्वी महाकाल रथ के वायव्यकोण (उत्तर-पश्चिम ) – में होकर गणों के साथ रथ की सेवा कर रहे थे ॥ ६१-६३ ॥ गिरिराज के समान प्रतीत होने वाले तथा अग्नि से उत्पन्न षडानन भी सिद्धों, चारणों एवं देवसेना के साथ शिव के गणों से आवृत होकर के हाथी पर सवार होकर चले ॥ ६४ ॥ विघ्नेश्वर भगवान् गणेश भी असुरेश्वरों का विघ्नं करके तथा देवताओं का अविघ्न करके विघ्नगणों के साथ उस देश (त्रिपुर ) – की ओर शिवजी के पीछे-पीछे चले ॥ ६५ ॥ उस समय हाथ में कालरात्रि के समान प्रकाशमान त्रिशूल धारण किये, कपाल के आभूषण वाली, बड़े-बड़े असुरों के रक्तरूपी मधु के पान से मत्त, मतवाले हाथी के समान चाल वाली, मद से चंचल नेत्रों वाली, मतवाले हाथियों के चर्मरूपी वस्त्र से वेष्टित अंगों वाली काली देवताओं को कम्पित करती हुई मत्तपिशाचों तथा मतवाले गणों के साथ गणेशजी के आगे-आगे चलीं ॥ ६६-६७ ॥ सिद्धों, गन्धर्वों, पिशाचों, यक्षों, विद्याधरों, सर्पों तथा प्रमुख देवताओं ने उन देवी पार्वती को प्रणाम किया, उच्च स्वर से उनकी स्तुति की तथा उनका जयकार किया ॥ ६८ ॥ इसी प्रकार देवशत्रुओं का संहार करने वाली तथा देवताओं के द्वारा आदरपूर्वक पूजित देवमाताएँ सभी ओर ध्वज धारण किये हुए अपने-अपने गणों के साथ अपने-अपने वाहनों से माता के पीछे-पीछे चलीं ॥ ६९ ॥ बालरूपा होते हुए भी अमित पराक्रम वाली तथा [सबके द्वारा ] अनतिक्रमणीय भगवती दुर्गा सिंह पर सवार होकर [ अपनी] भुजाओं में अंकुश, शूल, पाश, परशु, चक्र, खड्ग, शंख आदि आयुध धारण किये हुए और मध्याह्नकालीन सूर्य तथा हजार अग्नियों के समान [देदीप्यमान] नेत्रों से मार्ग को जलाती हुई [उन] दैत्यों पर प्रहार करने के लिये चलीं ॥ ७० ॥ उस समय इन्द्र तथा सूर्य के समान कान्ति वाले मुख्य गणेश्वर त्रिपुर का नाश करने के लिये हाथियों, घोड़ों, उत्तम सिंहों, रथों तथा वृषभों पर सवार होकर उन भगवान् शिव के पीछे चले ॥ ७१ ॥ हलों, फालों, मुसलों, लौहनिर्मित गदाओं तथा पर्वतशिखरों को धारण किये हुए गिरिसदृश वे सुरेश्वर, भूत तथा गणेश्वर महेश्वर के आगे-आगे चले ॥ ७२ ॥ इन्द्र, ब्रह्मा, विष्णु आदि देवता और [ सभी ] गणेश्वर अपने मुकुटों को अंजलि पर टिकाकर [ प्रणाम करते हुए] चारों ओर से वाणी द्वारा ईश भगवान् गणेश की जय बोल रहे थे ॥ ७३ ॥ हाथ में दण्ड लिये हुए जटाधारी सभी मुनियों ने नृत्य किया और आकाशचारी सिद्धों तथा चारणों ने पुष्पवर्षा की। हे विप्रेन्द्रो ! त्रिपुर चारों ओर से गूँज उठा ॥ ७४ ॥ सभी गणेश्वरों में श्रेष्ठ योगपरायण भृंगी देवताओं से घिरे हुए इन्द्र की भाँति गणेश्वरों से घिरे होकर विमान पर चढ़कर त्रिपुर का नाश करने के लिये चले ॥ ७५ ॥ हे द्विजो ! केश, विगतवास, महाकेश, महाज्वर, सोमवल्ली, सवर्ण, सोमप, सेनक, सोमधृक्, सूर्यवाच, सूर्यपेषण, सूर्याक्ष, सूरिनामा, सुर, सुन्दर, प्रकुद, ककुदन्त, कम्पन, प्रकम्पन, इन्द्र, इन्द्रजय, महाभी, भीमक, शताक्ष, पंचाक्ष, सहस्राक्ष, महोदर, यमजिह्व, शताश्व, कण्ठन, कण्ठपूजन, द्विशिख, त्रिशिख, पंचशिख, मुण्ड, अर्धमुण्ड, दीर्घ, पिशाचास्य, पिनाकधृक्, पिप्पलायतन, अंगारकाशन, शिथिल, शिथिलास्य, अक्षपाद, अज, कुज, अजवक्त्र, हयवक्त्र, गजवक्त्र, ऊर्ध्ववक्त्र तथा अन्य लक्ष्यलक्षण – वर्जित गणेश्वर एक साथ मिलकर अपने गणसमुदायों के साथ उन शिवजी को घेरकर चले। इसी प्रकार [अपने] करोड़ों-करोड़ गणों से घिरे हुए हजारों-हजार रुद्र तीनों पुरों को दग्ध करने के लिये महादेव देवदेव महेश्वर को घेरकर चले ॥ ७६-८४ ॥ [ वसु, रुद्र, आदित्य आदि ] तैंतीस देवता; ब्रह्मा, विष्णु, महेश – ये तीनों देवता और उनके भेदरूप तीन सौ तथा तीन हजार तीन अन्य देवता सभी ओर से वहाँ गये ॥ ८५ ॥ सभी लोकों की माताएँ, गणों की माताएँ तथा भूतों की माताएँ शिवजी के पीछे-पीछे चलीं ॥ ८६ ॥ रथ के मध्य [विराजमान ] गणेश्वर गणों के बीच उसी तरह प्रतीत हो रहे थे, जैसे निर्मल नक्षत्रों वाले आकाश में ताराओं के बीच चन्द्रमा ॥ ८७ ॥ उस समय शिव के प्रभाव ( सामर्थ्य ) – के कारण ही जगन्मयी पार्वती देवी [उन] शिव के वामभाग में स्थित होकर सुशोभित हो रही थीं। उस समय सुवर्णकमल के समान वर्ण वाली देवी शुभावती (पार्वती की सखी) हाथ के अग्रभाग में चँवर लिये हुए उनके बगल में स्थित होकर सुशोभित हो रही थीं ॥ ८८-८९ ॥ सर्वव्यापी देवेश्वर शिव का भस्म से दीप्यमान अतिस्वच्छ विग्रह उन पार्वती के साथ उसी प्रकार प्रतीत हो रहा था, जैसे आकाश में विद्युत् के साथ श्वेत बादल ॥ ९० ॥ सुवर्णमय धनुष से युक्त तथा चन्द्रमा की प्रभा वाला शंकरजी का सौम्य शरीर इन्द्रधनुष से युक्त आकाश अथवा मेरुपर्वत युक्त जगत् की भाँति प्रतीत हो रहा था ॥ ९१ ॥ रत्नों की किरणों से मिश्रित शिवजी का श्वेत छत्र उदयकाल में चन्द्रमा के पूर्णमण्डल के समान प्रतीत हो रहा था ॥ ९२ ॥ शिवजी के गले में रेशमी वस्त्रसहित लटकती हुई रत्नमयी मोतियों की माला उनके छत्र के पास आकाश से गिरती हुई गंगा के समान प्रतीत हो रही थी ॥ ९३ ॥ इस प्रकार महेन्द्र, ब्रह्मा, अग्नि आदि के द्वारा वन्दित चरणकमल वाले शिवजी ने समस्त संसार के हित के लिये उन पार्वती के साथ त्रिपुर के लिये प्रस्थान किया ॥ ९४ ॥ त्रिशूलधारी पिनाकी (शिव) मन से ही क्षणभर में इस सम्पूर्ण चराचर जगत् को दग्ध करने में समर्थ हैं, तो फिर वे त्रिपुर को जलाने के लिये गणों के साथ वहाँ क्यों जा रहे हैं? तीनों पुरों को जलाने के लिये उन अलुप्त शक्तिवाले शम्भु को रथ से, उत्तम बाण से, गणों से तथा देवताओं से क्या प्रयोजन है — ब्रह्मा, इन्द्र आदि प्रमुख देवों ने ऐसा कहा । हमलोग तो समझते हैं कि पिनाकधारी भगवान् [शिव] – लीला के लिये यह सब करने के लिये प्रवृत्त हैं; अन्यथा [ इस ] आडम्बर से इन्हें दूसरा कौन-सा लाभ है ? ॥ ९५–९७ ॥ इस त्रिपुर के समीप स्थित नन्दी, नन्दिकेश्वर आदि सुरेश्वरों के साथ, गणेशजी गणों के साथ तथा मेरुपर्वत आठ शिखरों के साथ जिस प्रकार सुशोभित हो रहे थे, उसी प्रकार जगद्रथ (शिव) देवी [ पार्वती ] – के साथ शोभायमान थे ॥ ९८ ॥ इसके बाद गणों तथा पार्वती सहित सुरेश्वर शिव को देखकर त्रिपुर के युद्धक्षेत्र में उपस्थित देवसमूह ने स्वयं उनका अनुगमन किया ॥ ९९ ॥ हे मुनीश्वरो ! युद्धकाल में तीन प्रकार के दैत्यों से युक्त तीनों पुर राजाओं, [सिद्ध आदि ] गणों तथा देवताओं से युक्त तीनों लोक के समान प्रतीत हो रहे थे ॥ १०० ॥ इसके बाद धनुष पर डोरी चढ़ाकर उसपर बाण रखकर उसे पाशुपत- अस्त्र से युक्त करके शिवजी ने त्रिपुर का चिन्तन किया ॥ १०१ ॥ धनुष ताने हुए उन महादेव के खड़े होने पर उसी समय तीनों पुर शीघ्र ही आपस में जुड़ गये। तीनों पुरों के एक में मिल जाने पर तथा समीप में आ जाने पर महान् आत्मा वाले [इन्द्र आदि] देवताओं को परम हर्ष हुआ ॥ १०२-१०३ ॥ तदनन्तर सभी देवगण, सिद्ध तथा महर्षिगण अष्टमूर्ति [शिव]-की स्तुति करते हुए उनकी जय बोलने लगे ॥ १०४ ॥ इसके बाद पुष्य नक्षत्र का योग प्राप्त होने पर भगवान् ब्रह्मा ने भग के नेत्र का विनाश करने वाले लीलासक्त उमापति से कहा — हे महादेव ! हे परमेश्वर ! हे प्रभो ! इस स्थान पर आपकी यह भावना है कि दैत्य तथा देवता आपके लिये समान हैं, फिर भी देवता धर्मनिष्ठ हैं और दैत्य पापी हैं; अतः हे जगन्नाथ ! आप यहाँ अपनी लीला का त्याग करें। हे ईश ! हे प्रभो! तीनों पुरों को दग्ध करने के लिये आपको रथ, ध्वज, बाण, भूतगणों, विष्णु तथा मुझ [ ब्रह्मा] से क्या प्रयोजन है? पुष्य योग प्राप्त होने पर आप कृपा करके त्रिपुर को दग्ध कर दीजिये। हे देवेश ! जब तक ये तीनों पुर अलग-अलग न हो जायँ, तबतक आप इन्हें जला दीजिये ॥ १०५–१०९१/२ ॥ तदनन्तर सब कुछ जानने वाले तथा विरूपाक्ष (त्रिलोचन) भगवान् महादेव ने त्रिपुर की ओर देखा और उसी क्षण उसे भस्म कर दिया। तब उनके बाण में स्थित चन्द्र, भगवान् विष्णु, कालाग्नि तथा वायु — इन सभी ने उन शिवजी को प्रणाम करके कहा — हे देवेश ! आपके देखनेमात्र से त्रिपुर दग्ध हो गया, फिर भी हे देवेश ! हम लोगों के हित के लिये आप बाण को छोड़ दीजिये ॥ ११०-११२१/२ ॥ हे विप्रेन्द्रो ! इसके बाद धनुष की डोरी चढ़ाकर उसे कान तक खींचकर त्रिपुर का नाश करने वाले शिव ने हँसते हुए बाण छोड़ दिया । त्रिपुर का नाश करने वाला वह बाण उसी क्षण त्रिपुर को जलाकर देवदेव के पास आकर उन्हें प्रणाम करके व्यवस्थित हो गया ॥ ११३-११४१/२ ॥ उस बाण के द्वारा सैकड़ों-करोड़ दैत्योंसहित दग्ध किया गया वह त्रिपुर कल्प के अन्त में रुद्र के द्वारा दग्ध किये गये त्रिलोक के समान प्रतीत हो रहा था। वहाँ [त्रिपुर में] भी जिन दैत्यों ने बान्धवों के साथ रुद्र का पूजन किया, उन्होंने शम्भु की पूजाविधि के प्रभाव से गाणपत्य (गणपति पद ) प्राप्त किया ॥ ११५-११६१/२ ॥ इन्द्र-विष्णुसहित सभी देवता तथा गणेश्वर शिव तथा हिमालयपुत्री देवी [पार्वती]-की ओर देखकर भयवश कुछ नहीं बोले। तब देवताओं की सेना को भयभीत देखकर देवश्रेष्ठ [ शिव] ने देवताओं से कहा — ‘क्या बात है ?’ इसपर वे सभी ओर से उन्हें केवल प्रणाम करते रहे। देवताओं ने इन्दुभूषण नन्दी को प्रणाम किया, पर्वतराज की पुत्री [ पार्वती ] को प्रणाम किया, पार्वतीपुत्र [गणेश ]-को प्रणाम किया और प्रभु महेश्वर को प्रणाम किया। इसके बाद ब्रह्माजी एकाग्रचित्त होकर देवताओं तथा विष्णु के साथ त्रिपुरशत्रु भगवान् भव ईश्वर की हृदय से स्तुति करने लगे ॥ ११७- १२१ ॥ ॥ पितामहकृतं शिवस्तोत्रम् ॥ ॥ श्रीपितामह उवाच ॥ प्रसीद देवदेवेश प्रसीद परमेश्वर । प्रसीद जगतां नाथ प्रसीदानन्ददाव्यय ॥ १२२ ॥ पञ्चास्यरुद्ररुद्राय पञ्चाशत् कोटिमूर्तये । आत्मत्रयोपविष्टाय विद्यातत्त्वाय ते नमः ॥ १२३ ॥ शिवाय शिवतत्त्वाय अघोराय नमोनमः । अघोराष्टकतत्त्वाय द्वादशात्मस्वरूपिणे ॥ १२४ ॥ विद्युत् कोटिप्रतीकाशमष्टकाशं सुशोभनम् । रूपमास्थाय लोकेऽस्मिन् संस्थिताय शिवात्मने ॥ १२५ ॥ अग्निवर्णाय रौद्राय अंबिकार्धशरीरिणे । धवलश्यामरक्तानां मुक्तिदायामराय च ॥ १२६ ॥ ज्येष्ठाय रुद्ररूपाय सोमाय वरदाय च । त्रिलोकाय त्रिदेवाय वषट्काराय वै नमः ॥ १२७ ॥ मध्ये गगनरूपाय गगनस्थाय ते नमः । अष्टक्षेत्राष्टरूपाय अष्टतत्त्वाय ते नमः ॥ १२८ ॥ चतुर्धा च चतुर्धा च चतुर्धा संस्थिताय च । पञ्चधा पञ्चधा चैव पञ्चमन्त्रशरीरिणे ॥ १२९ ॥ चतुःषष्टिप्रकाराय अकाराय नमोनमः । द्वात्रिंशत्तत्त्वरूपाय उकाराय नमो नमः ॥ १३० ॥ षोडशात्मस्वरूपाय मकाराय नमो नमः । अष्टधात्मस्वरूपाय अर्धमात्रात्मने नमः ॥ १३१ ॥ ओङ्काराय नमस्तुभ्यं चतुर्धा संस्थिताय च । गगनेशाय देवाय स्वर्गेशाय नमो नमः ॥ १३२ ॥ सप्तलोकाय पाताल नरकेशाय वै नमः । अष्टक्षेत्राष्टरूपाय परात्परतराय च ॥ १३३ ॥ सहस्रशिरसे तुभ्यं सहस्राय च ते नमः । सहस्रपादयुक्ताय शर्वाय परमेष्ठिने ॥ १३४ ॥ नवात्मतत्त्वरूपाय नवाष्टात्मात्मशक्तये । पुनरष्टप्रकाशाय तथाष्टाष्टकमूर्तये ॥ १३५ ॥ चतुःषष्ट्यात्मतत्त्वाय पुनरष्टविधाय ते । गुणाष्टकवृतायैव गुणिने निर्गुणाय ते ॥ १३६ ॥ मूलस्थाय नमस्तुभ्यं शाश्वतस्थानवासिने । नाभिमण्डलसंस्थाय हृदि निःस्वनकारिणे ॥ १३७ ॥ कन्धरे च स्थितायैव तालुरन्ध्रस्थिताय च । भ्रूमध्ये संस्थितायैव नादमध्ये स्थिताय च ॥ १३८ ॥ चन्द्रबिम्बस्थितायैव शिवाय शिवरूपिणे । वह्निसोमार्करूपाय षट्त्रिंशच्छक्तिरूपिणे ॥ १३९ ॥ त्रिधा संवृत्य लोकान् वै प्रसुप्तभुजगात्मने । त्रिप्रकारं स्थितायैव त्रेताग्निमयरूपिणे ॥ १४० ॥ सदाशिवाय शान्ताय महेशाय पिनाकिने । सर्वज्ञाय शरण्याय सद्योजाताय वै नमः ॥ १४१ ॥ अघोराय नमस्तुभ्यं वामदेवाय ते नमः । तत्पुरुषाय नमोऽस्तु ईशानाय नमो नमः ॥ १४२ ॥ नमस्त्रिंशत् प्रकाशाय शान्तातीताय वै नमः । अनन्तेशाय सूक्ष्माय उत्तमाय नमोऽस्तु ते ॥ १४३ ॥ एकाक्षाय नमस्तुभ्यमेकरुद्राय ते नमः । नमस्त्रिमूर्तये तुभ्यं श्रीकण्ठाय शिखण्डिने ॥ १४४ ॥ अनन्तासनसंस्थाय अनन्तायान्तकारिणे । विमलाय विशालाय विमलाङ्गाय ते नमः ॥ १४५ ॥ विमलासनसंस्थाय विमलार्थार्थरूपिणे । योगपीठान्तरस्थाय योगिने योगदायिने ॥ १४६ ॥ योगिनां हृदि संस्थाय सदा नीवारशूकवत् । प्रत्याहाराय ते नित्यं प्रत्याहाररताय ते ॥ १४७ ॥ प्रत्याहाररतानां च प्रतिस्थानस्थिताय च । धारणायै नमस्तुभ्यं धारणाभिरताय ते ॥ १४८ ॥ धारणाभ्यासयुक्तानां पुरस्तात्संस्थिताय च । ध्यानाय ध्यानरूपाय ध्यानगम्याय ते नमः ॥ १४९ ॥ ध्येयाय ध्येयगम्याय ध्येयध्यानाय ते नमः । ध्येयानामपि ध्येयाय नमो ध्येयतमाय ते ॥ १५० ॥ समाधानाभिगम्याय समाधानाय ते नमः । समाधानरतानां तु निर्विकल्पार्थरूपिणे ॥ १५१ ॥ दग्ध्वोद्धृतं सर्वमिदं त्वयाद्य जगत्त्रयं रुद्र पुरत्रयं हि । कः स्तोतुमिच्छेत्कथमीदृशं त्वां स्तोष्ये हि तुष्टाय शिवाय तुभ्यम् ॥ १५२ ॥ भक्त्या च तुष्ट्याद्भुतदर्शनाच्च मर्त्या अमर्त्या अपि देवदेव । एते गणाः सिद्धगणैः प्रणामं कुर्वन्ति देवेश गणेश तुभ्यम् ॥ १५३ ॥ निरीक्षणादेव विभोऽसि दग्धुं पुरत्रयं चैव जगत्त्रयं च । लीलालसेनाम्बिकया क्षणेन दग्धं किलेषुश्च तदाथ मुक्तः ॥ १५४ ॥ कृतो रथश्चेषुवरश्च शुभ्रं शरसनं ते त्रिपुरक्षयाय । अनेकयत्नैश्च मयाथ तुभ्यं फलं न दृष्टं सुरसिद्धसङघैः ॥ १५५ ॥ रथो रथी देववरो हरिश्च रुद्रः स्वयं शक्रपितामहौ च । त्वमेव सर्वे भगवन् कथं तु स्तोष्ये ह्यतोष्यं प्रणिपत्य मूर्ध्ना ॥ १५६ ॥ अनन्तपादस्त्वमनन्तबाहुरनन्तमूर्धान्तकरः शिवश्च । अनन्तमूर्तिः कथमीदृशं त्वां तोष्ये ह्यतोष्यं कथमीदृशं त्वाम् ॥ १५७ ॥ नमो नमः सर्वविदे शिवाय रुद्राय शर्वाय भवाय तुभ्यम् । स्थूलाय सूक्ष्माय सुसूक्ष्मसूक्ष्म सूक्ष्माय सूक्ष्मार्थविदे विधात्रे ॥ १५८ ॥ स्रष्ट्रे नमः सर्वसुरासुराणां भर्त्रे च हर्त्रे जगतां विधात्रे । नेत्रे सुराणामसुरेश्वराणां दात्रे प्रशास्त्रे मम सर्वशास्त्रे ॥ १५९ ॥ वेदान्तवेद्याय सुनिर्मलाय वेदार्थविद्भिः सततं स्तुताय । वेदात्मरूपाय भवाय तुभ्यमन्ताय मध्याय सुमध्यमाय ॥ १६० ॥ आद्यन्तशून्याय च संस्थिताय तथा त्वशून्याय च लिङ्गिने च । अलिङ्गिने लिङ्गमयाय तुभ्यं लिङ्गाय वेदादिमयाय साक्षात् ॥ १६१ ॥ रुद्राय मूर्धाननिकृन्तनाय ममादिदेवस्य च यज्ञमूर्तेः । विध्वान्तभङ्गं मम कर्तुमीश दृष्ट्वैव भूमौ करजाग्रकोट्या ॥ १६२ ॥ अहो विचित्रं तव देवदेव विचेष्टितं सर्वसुरासुरेश । देहीव देवैः सह देवकार्यं करिष्यसे निर्गुणरूपतत्त्व ॥ १६३ ॥ एकं स्थूलं सूक्ष्ममेकं सुसूक्ष्मं मूर्तामूर्तं मूर्तमेकं ह्यमूर्तम् । एकं दृष्टं वाङ्मयं चैकमीशं ध्येयं चैकं तत्त्वमत्राद्भुतं ते ॥ १६४ ॥ स्वप्ने दृष्टं यत्पदार्थं ह्यलक्ष्यं दृष्टं नूनं भाति मन्ये न चापि । मूर्तिर्नो वै दैवकीशान देवैर्लक्ष्या यत्नैरप्यलक्ष्यं कथं तु ॥ १६५ ॥ दिव्यः क्व देवेश भवत् प्रभावो वयं क्व भक्तिः क्व च ते स्तुतिश्च । तथापि भक्त्या विलपन्तमीश पितामहं मां भगवन् क्षमस्व ॥ १६६ ॥ श्रीपितामह बोले — हे देवदेवेश ! प्रसन्न हो जाइये। हे परमेश्वर ! प्रसन्न हो जाइये। हे जगन्नाथ ! प्रसन्न हो जाइये। हे आनन्ददाता ! हे अव्यय ! हे पंचमुख ! प्रसन्न हो जाइये । [ यम आदि] रुद्रों को भी रुलाने वाले, पचास करोड़ मूर्ति वाले, [विश्व-प्राज्ञ- तैजस] तीन रूपों में स्थित रहने वाले तथा विद्याओं में मुख्य कारणस्वरूप आपको नमस्कार है। शिव, शिवतत्त्व, अघोर, भैरवाष्टक के कारणरूप तथा द्वादश आत्मास्वरूपी को बार-बार नमस्कार है ॥ १२२-१२४ ॥ करोड़ों विद्युत् के समान तथा पृथिवी आदि में प्रकाशमान अत्यन्त सुन्दर रूप धारण करके इस लोक में विराजमान शिवस्वरूप को नमस्कार है ॥ १२५ ॥ अग्नि के समान वर्णवाले, भयानक, अम्बिका को अपने आधे शरीर में धारण करने वाले ( अर्धनारीश्वर ), रुद्र-विष्णु-ब्रह्मा को मुक्ति देने वाले, मृत्युरहित, ज्येष्ठ, भयंकर रूप वाले, सोमस्वरूप, वर प्रदान करने वाले, त्रिलोकस्वरूप, त्रिदेवस्वरूप तथा वषट्कारस्वरूप शिव को नमस्कार है ॥ १२६-१२७ ॥ हृदयकमल के मध्य गगनसदृशरूप वाले तथा गगन में स्थित आपको नमस्कार है । [ सूर्य आदि] आठ स्थानों में [ रुद्र आदि ] आठ रूपों वाले तथा पृथ्वी आदि आठ तत्त्वों वाले आपको नमस्कार है। चारों वेदरूप से, चारों आश्रमरूप से तथा चतुर्व्यूहरूप से अवस्थित, आकाश आदि पंचभूत प्रकार से, सद्योजात आदि पाँचरूप से अवस्थित, सद्योजात आदि पंचमन्त्ररूप शरीर वाले शिव को नमस्कार है ॥ १२८-१२९ ॥ चौंसठ प्रकार के शिक्षोक्त वर्णरूप वाले अकार को बार-बार नमस्कार है । बत्तीस मातृकारूप वाले उकार को बार-बार नमस्कार है। सोलह तत्त्व रूप वाले मकार को बार-बार नमस्कार है। आठ प्रकार के आत्मस्वरूप वाले अर्धमात्रात्मक नादरूप को नमस्कार है। [ अकार, उकार, मकार, अर्धमात्रात्मक नादरूप] चार प्रकार से स्थित आप ओंकार ( प्रणवरूप ) – को नमस्कार हैं। आकाश के स्वामी तथा स्वर्ग के स्वामी शिव को बार-बार नमस्कार है ॥ १३०-१३२ ॥ सात लोकस्वरूप, पाताल तथा नरक के स्वामी, [पृथ्वी आदि] आठ क्षेत्रों के रूप में आठ स्वरूपों वाले तथा परात्परतर (सर्वोत्कृष्ट) शिव को नमस्कार है ॥ १३३ ॥ हजार सिरों वाले, हजार रूपों वाले, हजार पैरों से युक्त आप शर्व परमेष्ठी को नमस्कार है। [ पुरुष, प्रकृति, व्यक्त, अहंकार, नभ, अनिल, ज्योति, आप (जल), पृथ्वी ] नौ आत्मतत्त्वमय स्वरूप वाले, सत्रह आत्मशक्तियों वाले, अष्टप्रकाशस्वरूप (उर आदि स्थानों में वर्णों को अभिव्यंजित करने वाले), आठ मूर्तियों वाले, चौंसठ योगिनियों के प्राणतत्त्वरूप, भव आदि आठ नामों वाले, आठ गुणों से युक्त, [सत्त्व, रज, तम ] तीनों गुणों से युक्त तथा गुणों से शून्य आप [ शिव]-को नमस्कार है ॥ १३४–१३६ ॥ मूलाधारचक्र में विराजमान, शाश्वत स्थान में निवास करने वाले, नाभिमण्डल में स्थित तथा हृदय में प्राणवायु ध्वनि करने वाले आप [शिव] – को नमस्कार है । ग्रीवा में स्थित, तालुछिद्र में स्थित, भौहों के मध्य में स्थित, नाद मध्य में स्थित, चन्द्रबिम्ब में स्थित, कल्याणकारी, शिवस्वरूप, अग्नि-चन्द्र-सूर्यरूप वाले, छत्तीस शक्तिरूप वाले, तीन प्रकार के [सत्त्व, रज, तम] गुणों से लोकों को वेष्टित कर सोये हुए सर्परूप [कुण्डलिनीरूप] – वाले, [गार्हपत्य, आहवनीय तथा दक्षिणाग्नि] तीन रूप से स्थित त्रेताग्निमय रूप वाले, सदाशिव, शान्तस्वभाव वाले, महेश्वर, पिनाकधारी, सब कुछ जानने वाले तथा शरण देने वाले सद्योजात को नमस्कार है। आप अघोर को नमस्कार है। आप वामदेव को नमस्कार है । तत्पुरुष को नमस्कार है। ईशान को बार-बार नमस्कार है ॥ १३७–१४२ ॥ तीसों मुहूर्तों में सदा प्रकाशमान रहने वाले को नमस्कार है। शान्तातीत को नमस्कार है। आप अनन्तेश, सूक्ष्म तथा उत्तम को नमस्कार है। आप एकाक्ष ( एकमात्र ज्ञानरूपी नेत्र वाले) को नमस्कार है। आप अद्वितीय रुद्र को नमस्कार है। आप त्रिमूर्ति, श्रीकण्ठ तथा शिखण्डी को नमस्कार है ॥ १४३-१४४ ॥ अनन्त (शेष ) – रूपी आसन पर स्थित, अनन्तस्वरूप, अन्त करने वाले, विशुद्ध, विशाल तथा स्वच्छ अंगों वाले आपको नमस्कार है। विमल आसन पर विराजमान, विमल ज्ञान के अर्थस्वरूप, योगपीठ के मध्यस्थित योगी, योग प्रदान करने वाले, नीवार (जंगली धान्य) – के शूक (सूक्ष्म अग्रभाग) – की भाँति योगियों के हृदय में सदा स्थित रहने वाले आपको नमस्कार है। प्रत्याहारस्वरूप, प्रत्याहार में निरत, प्रत्याहार में रत लोगों के हृदय में विराजमान, धारणास्वरूप तथा धारणा में निरत आपको नमस्कार है ॥ १४५–१४८ ॥ धारणा के अभ्यास में लगे हुए लोगों के सामने [सदा] विराजमान, ध्यान, ध्यानरूप तथा ध्यानगम्य आपको नमस्कार है। ध्येय, ध्येयगम्य, ध्यान करने योग्य, ध्यान वाले आपको नमस्कार है। ध्यान योग्य [ ब्रह्मा, विष्णु आदि ] – के भी ध्येय तथा सबसे अधिक ध्यान योग्य आपको नमस्कार है। समाधान के द्वारा प्राप्य, समाधानस्वरूप, समाधान ( ध्यान ) – में रत लोगों के लिये निर्विकल्प अर्थस्वरूप आपको नमस्कार है ॥ १४९-१५१ ॥ रुद्र ! त्रिपुर को दग्ध करके आपने तीनों लोकों का उद्धार कर दिया। ऐसे प्रभावशाली आपकी स्तुति करने का सामर्थ्य कौन रखता है; फिर भी [ स्वयं] सन्तुष्ट रहने वाले आप शिव की मैं स्तुति करता हूँ ॥ १५२ ॥ हे देवदेव ! आपकी भक्ति, तुष्टि तथा अद्भुत दर्शन के कारण ये मानव, देवता तथा सिद्धगणों सहित समस्त गण आपको प्रणाम करते हैं । हे देवेश ! हे गणेश! आपको नमस्कार है ॥ १५३ ॥ हे विभो! आप तो देखने मात्र से ही तीनों पुरों तथा तीनों लोकों को जला देने में समर्थ हैं। अम्बिका के साथ लीलासक्त आपने क्षणभर में त्रिपुर को जला दिया और [सोम आदि के प्रार्थना करने पर ] उस समय बाण को भी मुक्त कर दिया ॥ १५४ ॥ आपके द्वारा त्रिपुर के नाश के लिये मैंने अनेक यत्नों से रथ, श्रेष्ठ बाण तथा सुन्दर धनुष आपके लिये निर्मित किया था; किंतु देवताओं तथा सिद्धजनों द्वारा युद्ध रूपी फल को नहीं जाना जा सका अर्थात् परम महिमा वाले आपने क्षणभर में त्रिपुर का नाश कर दिया ॥ १५५ ॥ रथ, रथी, देवश्रेष्ठ विष्णु, स्वयं रुद्र, इन्द्र, ब्रह्मा – ये सब आप ही हैं। हे भगवन्! मैं आप तोष्य (स्तुति न किये जा सकने वाले) – की स्तुति कैसे करूँ; अतः सिर झुकाकर [केवल ] प्रणाम करता हूँ ॥ १५६ ॥ आप अनन्त चरणों वाले, अनन्त भुजाओं वाले, अनन्त सिर वाले, अनन्त रूपों वाले, संहार करने वाले तथा कल्याण करने वाले हैं — ऐसे प्रभाव वाले आपकी स्तुति कैसे करूँ; आप अतोष्य की स्तुति कैसे करूँ ? ॥ १५७ ॥ आप सर्ववेत्ता, शिव, रुद्र, शर्व, भव, स्थूल, सूक्ष्म, अत्यन्त सूक्ष्म से भी सूक्ष्म, सूक्ष्म अर्थो को जानने वाले तथा विधाता को नमस्कार है ॥ १५८ ॥ सभी देवताओं तथा असुरों के स्रष्टा, लोकों का सृजन – पालन-संहार करने वाले, देवताओं तथा असुरों के नायक, सब कुछ देने वाले और मुझ पर तथा सभी पर शासन करने वाले को नमस्कार है ॥ १५९ ॥ वेदान्त के द्वारा जानने योग्य, परम शुद्ध, वेदार्थ के ज्ञाताओं द्वारा निरन्तर स्तुत, वेद के आत्मास्वरूप, भव, अन्त, मध्य तथा सुमध्यम आपको नमस्कार है ॥ १६० ॥ आदि तथा अन्त से रहित, सर्वत्र विद्यमान, शून्यत्व से रहित, लिङ्गी, अलिङ्गी, लिङ्गमय, लिङ्गस्वरूप तथा साक्षात् वेदादिमय (प्रणवरूप) आपको नमस्कार है ॥ १६१ ॥ मेरे भी आदिदेव यज्ञमूर्ति विष्णु के तथा मुझ ब्रह्मा के अज्ञानान्धकार का नाश करने के लिये अपराध स्थान में देखकर [अपने] नाखून के अग्रभाग से मेरे मस्तक का छेदन करने वाले हे ईश ! आप रुद्र को नमस्कार है ॥ १६२ ॥ हे देवदेव! हे समस्त देवताओं तथा असुरों के ईश ! आपका क्रिया-कलाप विचित्र है। हे निर्गुणरूपतत्त्व! आप देवताओं के साथ देहधारी की भाँति देवों का कार्य करेंगे ॥ १६३ ॥ इस ब्रह्माण्ड में आपका एक स्थूल रूप (पृथ्वीरूप), एक सूक्ष्म रूप (जलरूप), एक सुसूक्ष्म रूप (अग्निरूप), मूर्तामूर्त रूप ( क्षय वृद्धि के आश्रय के कारण चन्द्ररूप), एक मूर्तरूप (सूर्यरूप), एक अमूर्तरूप (वायुरूप), एक दृष्ट वाङ्मयरूप ( शब्दगुण से ज्ञात गगनरूप) और एक ध्येय अद्भुत ईशरूप है ॥ १६४ ॥ स्वप्न में जो पदार्थ दिखायी देता है, वह प्रत्यक्ष की भाँति प्रतीत होता है; उसे मैं अलक्ष्य नहीं मानता हूँ । वैसे ही हे ईशान ! देवताओं के द्वारा प्रयत्नपूर्वक देखा गया आपका विग्रह हमारे लिये निर्गुण तथा अलक्ष्य कैसे हो सकता है ? ॥ १६५ ॥ हे देवेश ! कहाँ आपका दिव्य प्रभाव और कहाँ हमलोग, कहाँ हमारी भक्ति और कहाँ आपकी [ यह ] स्तुति; फिर भी हे देवेश ! हे भगवन्! भक्तिपूर्वक विलाप करते हुए मुझ ब्रह्मा को क्षमा कीजिये ॥ १६६ ॥ सूतजी बोले — हे द्विजश्रेष्ठो ! पृथ्वी पर जो भी शिव को प्रणाम करके त्रिपुर के शास्ता भगवान् शिव की इस स्तुति को सुनता अथवा पढ़ता है, वह भवभक्ति के द्वारा पापबन्धन से मुक्त हो जाता है ॥ १६७ ॥ तब ब्रह्मा के द्वारा भक्तिपूर्वक स्तुत हुए मन्दरशिखरवासी तथा महान् भुजाओं वाले शिवजी उस स्तुति को सुनकर पार्वती की ओर देखकर महानुभाव ब्रह्मा से हँसते हुए कहने लगे – ॥ १६८ ॥ शिवजी बोले — हे पद्मयोने! भक्तिपूर्वक की गयी आपकी इस स्तुति से मैं प्रसन्न हूँ । आप यथेष्ट वर माँगिये; आपका तथा देवताओं का कल्याण हो ॥ १६९ ॥ सूतजी बोले — तत्पश्चात् पद्मयोनि ब्रह्माजी देवेश को प्रणाम करके हाथ जोड़कर प्रसन्नचित्त होकर यह [वचन] कहने लगे – ॥ १७० ॥ श्रीपितामह बोले — ‘हे भगवन्! हे देवदेवेश! हे त्रिपुरविनाशक ! हे शंकर! आपमें अपनी परम भक्ति चाहता हूँ । हे परमेश्वर ! अब प्रसन्न हो जाइये। सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले हे ईश्वर ! आपमें सभी देवताओं की भक्ति हो; मेरे भक्तियोग से तथा सारथीरूप से आप सदा प्रसन्न रहें’ ॥ १७१-१७२ ॥ भगवान् विष्णु ने भी पार्वतीसहित त्रिनेत्र शिव को प्रणाम करके हाथ जोड़कर उनसे कहा — ‘हे ईशान! मैं [वृषभ आदि रूप से] सदा आपका वाहन होने की अभिलाषा करता हूँ और हे देवेश ! आपमें [अपनी ] भक्ति चाहता हूँ । हे देवदेव ! आपको नमस्कार है । हे वरद ! हे शंकर! आप ईश्वर को सदा वहन करने का सामर्थ्य, सर्वज्ञत्व तथा सर्वत्र गमन करने की शक्ति मुझे प्रदान कीजिये ॥ १७३-१७५ ॥ सूतजी बोले — उन दोनों की प्रार्थना सुनकर महादेव परमेश्वर शिव ने उन्हें सारथि तथा वाहन होने का वर प्रदान किया ॥ १७६ ॥ इस प्रकार दैत्यों को दग्ध करके और उन ब्रह्मा तथा विष्णु को वर प्रदान करके देवदेव महात्मा शिव देवी [पार्वती], नन्दी तथा भूतगणों सहित अन्तर्धान हो गये ॥ १७७ ॥ इसके बाद युद्धभूमि से गणों सहित शिव के चले जाने पर श्रेष्ठ देवता लोग अतिविस्मित हुए। हे मुनीश्वरो ! शिव तथा पार्वती को प्रणाम करके दुःखरहित होकर सुरेश्वर, गणेश्वर तथा आदित्यगण अपने-अपने वाहनों से स्वर्ग चले गये ॥ १७८-१७९ ॥ हे द्विजो ! जो [ व्यक्ति ] पूर्वकाल में ब्रह्मा के द्वारा निर्मित किये गये त्रिपुरशत्रु [शिव] के इस पवित्र स्तोत्र को श्राद्ध के समय अथवा देवकार्य में भक्तिपूर्वक पढ़ता है अथवा द्विजों को सुनाता है, वह ब्रह्मलोक को जाता है । हे द्विजश्रेष्ठो ! इस शुभ अध्याय को सुनकर प्राणी मानसिक, वाचिक तथा शारीरिक पापों से; स्थूल, सूक्ष्म तथा अतिसूक्ष्म पापों से; घोर अपराध से होने वाले पापों से तथा अल्प अपराध से होने वाले पापों से मुक्त हो जाता है; उसके शत्रु नष्ट हो जाते हैं, वह संग्राम में विजयी होता है, सभी रोग उसे बाधा नहीं पहुँचाते, आपदाएँ उसे स्पर्श तक नहीं करतीं और वह धन – आयु-यश-विद्या तथा अतुलनीय प्रभाव प्राप्त करता है ॥ १८०-१८४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में त्रिपुरदाहप्रसंग में ‘ब्रह्मस्तव’ नामक बहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७२ ॥ Content is available only for registered users. 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