February 2, 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -096 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ छानबेवाँ अध्याय भगवान् महेश्वर द्वारा वीरभद्र का आवाहन और नृसिंह के तेज को शमन करने के लिये भेजना, वीरभद्र तथा नृसिंह का संवाद, भगवान् शिव का शरभावतार धारण नृसिंह तेज को शान्त करना एवं नृसिंह द्वारा शिव स्तुति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे षण्णवतितमोऽध्यायः शरभप्रादुर्भाव ऋषिगण बोले — [ हे सूतजी!] विश्व का संहार करने वाले भगवान् महादेव ने अत्यन्त भयंकर तथा विकृत शरभनामक रूप कैसे धारण किया और उन्होंने कौन-सा साहसपूर्ण कृत्य किया; यह सब पूर्णरूप से बताइये ॥ ११/२ ॥ सूतजी बोले — इस प्रकार देवताओं के प्रार्थना करने पर कृपानिधान शिव ने नृसिंहसंज्ञक तेज को नष्ट करने का निश्चय किया और इसके लिये रुद्र ने महाप्रलय करने वाले अपने भैरवरूप महाबली वीरभद्र का स्मरण किया ॥ २-३१/२ ॥ तब वे [वीरभद्र] गणों के आगे होकर हँसते हुए शीघ्र ही वहाँ आये। वे करोड़ों श्रेष्ठ गणों से घिरे हुए थे, जो अट्टहास कर रहे थे, इधर-उधर उछल रहे थे, नृसिंह रूप वाले थे तथा अत्यन्त उग्र थे । वे नृत्य करते हुए तथा महाधीर ब्रह्मा आदि के साथ गेंद की भाँति खेलते हुए प्रसन्न वीरों से घिरे हुए थे। वे वीरवन्ध [ वीरभद्र ] कभी न देखे गये अन्य वीरों से भी आवृत थे। वे [वीरभद्र] प्रलयाग्नि की ज्वाला के समान थे, वे तीन नेत्रों से विभूषित थे, वे शस्त्र धारण किये हुए थे, उनके जटाजूट में देदीप्यमान बालचन्द्रमा शोभा दे रहा था, वे बालचन्द्र के समान आकार वाले अति शुभ्र तथा तीक्ष्ण दो दाँतों से सुशोभित थे, वे इन्द्रधनुष के समान भौंहों से युक्त थे, वे अपने महाप्रचण्ड हुंकार से दिशाओं को वधिर बना दे रहे थे, वे नील मेघ तथा अंजन के समान आकार वाले भयंकर श्मश्रु (दाढ़ी) -से युक्त थे, वे अद्भुत रूप वाले थे और अपनी अपराजित भुजाओं से विवाद का शमन करने वाले त्रिशूल को बार-बार घुमा रहे थे। इस प्रकार की वीरता की शक्ति से परिपूर्ण भगवान् वीरभद्र ने स्वयं निवेदन किया — ‘ हे जगत् स्वामिन्! यहाँ पर मुझको स्मरण करने का क्या कारण है ? आज्ञा प्रदान कीजिये और मुझ पर कृपा कीजिये ॥ ४–१११/२ ॥ श्रीभगवान् बोले — हे भैरव ! असमय में देवताओं के समक्ष भय उत्पन्न हो गया है; वह नृसिंहरूपी अग्नि प्रज्वलित हो रही है; इस अति भयंकर अग्नि को शान्त करो। उसे सान्त्वना देते हुए पहले समझाओ, यदि उससे वह शान्त नहीं होती है, तब मेरे महाभयंकर भैरवरूप को दिखाओ। हे वीरभद्र ! मेरी आज्ञा से सूक्ष्मरूप को सूक्ष्म तेज से तथा स्थूलरूप को स्थूल तेज से विनष्ट करके उसके मुख तथा उसकी त्वचा को [मेरे पास ] ले आओ ॥ १२-१४१/२ ॥ इस प्रकार आज्ञा प्राप्त किये हुए गणेश्वर वीरभद्र शान्तस्वरूप धारण करके वेगपूर्वक वहाँ पहुँच गये, जहाँ नृसिंह विराजमान थे। तदनन्तर भगवान् वीरभद्र ने नृसिंहरूपधारी उन विष्णु को समझाया और जैसे पिता औरस पुत्र से कहता है, उसी प्रकार ईशान [ वीरभद्र ] उनसे यह वचन कहने लगे ॥ १५-१६१/२ ॥ ॥ वीरभद्रकृतं नृसिंहस्तोत्रम् ॥ ॥ श्रीवीरभद्र उवाच ॥ जगत्सुखाय भगवन्नवतीर्णोऽसि माधव ॥ १७ ॥ स्थित्यर्थेन च युक्तोऽसि परेण परमेष्ठिना । जन्तुचक्रं भगवता रक्षितं मत्स्यरूपिणा ॥ १८ ॥ पुच्छेनैव समाबध्य भ्रमन्नेकार्णवे पुरा । बिभर्षि कूर्मरूपेण वाराहेणोद्धृता मही ॥ १९ ॥ अनेन हरिरूपेण हिरण्यकशिपुर्हतः । वामनेन बलिर्बद्धस्त्वया विक्रमता पुनः ॥ २० ॥ त्वमेव सर्वभूतानां प्रभावः प्रभुरव्ययः । यदा यदा हि लोकस्य दुःखं किञ्चित् प्रजायते ॥ २१ ॥ तदा तदावतीर्णस्त्वं करिष्यसि निरामयम् । नाधिकस्त्वत्समोऽप्यस्ति हरे शिवपरायण ॥ २२ ॥ त्वया धर्माश्च वेदाश्च शुभे मार्गे प्रतिष्ठिताः । यदर्थमवतारोऽयं निहतः सोऽपि केशव ॥ २३ ॥ अत्यन्तघोरं भगवन्नरसिंह वपुस्तव । उपसंहर विश्वात्मंस्त्वमेव मम सन्निधौ ॥ २४ ॥ श्री वीरभद्र बोले — हे भगवन्! हे माधव ! आप तो जगत् के सुख के लिये अवतीर्ण हुए हैं; श्रेष्ठ ब्रह्मा ने [ संसार की ] स्थिति के कार्य में आपको लगाया है। पूर्वकाल में अपनी पूँछ में [नाव को] बाँधकर विशाल सागर में भ्रमण करते हुए मत्स्यरूपधारी आप भगवान् [विष्णु]-ने जीव-समुदाय की रक्षा की थी। आप कर्म रूप से जगत् को धारण करते हैं और वाराहरूप के द्वारा आपने पृथ्वी का उद्धार किया है। आपने इस सिंहरूप से हिरण्यकशिपु का वध किया है। आपने वामनरूप धारणकर तीन पगों द्वारा त्रिलोकी को मापकर बलि को बाँध लिया था ॥ १७-२० ॥ आप ही सभी प्राणियों को उत्पन्न करने वाले, सबके स्वामी और अविनाशी हैं। जब- जब संसार पर कोई विपत्ति पड़ी है, तब-तब आपने अवतार लेकर उसे दुःखरहित किया है। हे हरे ! हे शिवपरायण ! आपसे बढ़कर अन्य कोई भी नहीं है । आपने [समस्त ] धर्मों तथा वेदों को उत्तम मार्ग पर प्रतिष्ठित किया है। हे केशव ! जिसके लिये आपने यह अवतार लिया है, वह [ हिरण्यकशिपु भी] आपके द्वारा मारा जा चुका है। अतः हे भगवन्! हे विश्वात्मन्! हे नरसिंह ! आप मेरी उपस्थिति में अपने इस अत्यन्त भयानक रूप को समेट लीजिये ॥ २१-२४ ॥ सूतजी बोले — वीरभद्र के द्वारा शान्त वाणी में इस प्रकार कहे जाने पर नृसिंहरूपधारी विष्णु ने पहले से भी अधिक तथा महाभयानक कोप को प्रज्वलित किया ॥ २५ ॥ श्रीनृसिंह बोले — [ हे वीरभद्र ! ] तुम जहाँ से आये हो, वहाँ चले जाओ; हित की बात मत बोलो। मैं इस समय इस चराचर जगत् का संहार कर डालूँगा। संहारकर्ता का संहार अपने से अथवा दूसरे से भी नहीं हो सकता है। सभी जगह मेरा ही शासन है; अन्य कोई भी शासन करने वाला नहीं है । मेरी कृपा से सम्पूर्ण जगत् मर्यादायुक्त होकर क्रियाशील है; मैं ही सभी शक्तियों का प्रवर्तक तथा निवर्तक हूँ ॥ २६-२८ ॥ हे गणाध्यक्ष ! जो-जो विभूतिसम्पन्न, सत्त्वमय, श्रीयुक्त तथा ऊर्जा से परिपूर्ण है, उसे मेरे ही तेज से परिवर्धित जानो । देवताओं के परम अर्थ को जानने वाले मेरे महान् सामर्थ्य को जानते हैं । शक्तिसम्पन्न ब्रह्मा, इन्द्र आदि देवता मेरे ही अंश हैं । पूर्वकाल में चतुर्मुख ब्रह्मा मेरे नाभिकमल से उत्पन्न हुए थे और उनके ललाट से भगवान् वृषभध्वज (शिव) उत्पन्न हुए थे ॥ २९-३१ ॥ ब्रह्मा रजोगुण से अधिष्ठित हैं । रुद्र तमोगुण से युक्त कहे जाते हैं। मैं सबका नियन्ता हूँ; मुझसे श्रेष्ठ कोई देवता नहीं है । मैं सबसे बढ़कर हूँ, स्वतन्त्र सबका स्रष्टा हूँ, संहार करने वाला हूँ तथा सबका स्वामी हूँ। मेरे इस [नृसिंह नामक] परम तेज के विषय में कौन सुनना चाहता है ? अतः मेरी शरण प्राप्त करके तुम संतापरहित होकर [यहाँ से] जाओ; भूतों के महेश्वर तुम मेरे इस परम भाव को समझो ॥ ३२-३४ ॥ मैं काल हूँ, मैं काल के भी विनाश का कारण हूँ । मैं लोकों का संहार करने में प्रवृत्त हूँ । हे वीरभद्र ! तुम मुझको मृत्यु की भी मृत्यु जानो; ये देवता भी मेरी कृपा से जी रहे हैं ॥ ३५ ॥ सूतजी बोले — विष्णु का यह अहंकारपूर्ण वचन सुनकर असीम पराक्रम वाले वीरभद्र स्फुरित ओठों वाले होकर तिरस्कारपूर्ण भाव से हँसकर नृसिंह से कहने लगे ॥ ३६ ॥ श्री वीरभद्र बोले — क्या आप संहारकर्ता, पिनाकधारी विश्वेश्वर (शिव) – को नहीं जानते हैं ? मिथ्या वाद- विवाद आपके लिये केवल विनाशस्वरूप ही है। जिस किसी प्रकार आपके द्वारा लिये गये विभिन्न अवतारों में कौन शेष रह गये हैं; अब तो केवल आप ही बचे हुए हैं। आप इस दोष को देखिये, जो आप इस दशा को प्राप्त हुए हैं। संहार में दक्ष उन [शिव] के द्वारा आप क्षणभर में विनाश को प्राप्त हो जायँगे ॥ ३७-३९ ॥ आप प्रकृति हैं, रुद्र पुरुष हैं; आपमें [ सम्पूर्ण ] तेज समाहित है। पाँच मुख वाले पितामह (ब्रह्मा) आपके नाभिकमल से प्रादुर्भूत हुए हैं। घोर तपस्या में लीन उन्होंने पूर्वकाल में जगत् की सृष्टि के लिये अपने ललाट में नीललोहित शंकर का चिन्तन किया। तब सृष्टि के लिये उनके ललाट से शम्भु आविर्भूत हुए, अतः यह शिव का दूषण नहीं है । महाभैरवरूप देवदेव रुद्र का अंशस्वरूप मैं विनय तथा बल से आपके संहार के लिये नियुक्त किया गया हूँ । इस प्रकार शक्ति की कला से युक्त आप इस राक्षस को विदीर्ण करके अहंकार के वशीभूत होकर निरालस्य हो गर्जन कर रहे हैं । दुष्टों के लिये किया गया उपकार केवल अपकार के लिये होता है । हे सिंह ! यदि आप महेश्वर को अपने से बाद में उत्पन्न समझते हैं, तो यह आपका भ्रम है । आप न तो सृष्टिकर्ता हैं, न संहारकर्ता हैं और न तो किसी प्रकार स्वतन्त्र ही हैं; आप कुम्हार के चक्र की भाँति शिव के द्वारा प्रेरित हैं ॥ ४०-४५१/२ ॥ कूर्मरूपधारी आपका कपाल आज भी शिव के गले के हार के मध्य स्थित है; हे मुग्ध ! इसे आप क्यों नहीं याद कर रहे हैं? उनके अंश से उत्पन्न तारकासुरशत्रु स्कन्द के द्वारा आक्रोशपूर्वक आपके वाराह विग्रह से दाँत उखाड़ लिये जाने से आपको बहुत कष्ट हुआ था; क्या इसे भी आप भूल गये हैं? विष्वक्सेन रूप से आप उन रुद्र के त्रिशूल के अग्रभाग से छलपूर्वक जला दिये गये थे ॥ ४६–४८ ॥ मैंने दक्ष के यज्ञ में यज्ञरूपधारी आपके सिर को काट दिया था। आपके पुत्र ब्रह्मा का तमोमय कटा हुआ उनका अंशभूत पाँचवाँ सिर आज भी विद्यमान है; क्या आप उन रुद्र के उस बल को नहीं जानते हैं ? ऋषि दधीच ने सिर खुजलाते हुए आपको मरुद्गणों सहित संग्राम में पराजित कर दिया था; इसे आप कैसे भूल गये ? हे चक्रपाणे! आपका प्रिय चक्र उन्हीं के पराक्रम के कारण आपने उसे कहाँ से प्राप्त किया, उसे किसने बनाया — यह सब भी आप भूल गये! मैंने आपके सभी लोकों को छीन लिया था और उस समय आप निद्रा के वशीभूत होकर क्षीरसागर में शयन करते रहे; आप सात्त्विक (पालकमूर्ति) कैसे हो सकते हैं, आप [विष्णु]-से लेकर तृणपर्यन्त सब कुछ रुद्रशक्ति समन्वित है ॥ ४९-५३ ॥ मोह को प्राप्त आप तथा अग्नि दोनों ही रुद्र की शक्ति से सामर्थ्ययुक्त हैं; उनके तेज के प्रभाव को देखने में आप दोनों (विष्णु, अग्नि) समर्थ नहीं हैं। जो स्थूल दृष्टि वाले हैं, वे ही विष्णु के परम पद को देखते हैं। स्वर्ग – पृथ्वी के वामन रूप से, इन्द्र के जयन्त रूप से, अग्नि के कार्तिकेय-रूप से, धर्मराज के नारायण रूप से, वरुण के भृगु रूप से और चन्द्रमा के कलंकित उदर में बुध रूप से उत्पन्न होकर आप परमेश्वर के रूप में प्रतिष्ठित हैं। आप काल, महाकाल एवं काल के भी काल महेश्वर हैं; अतः आप शिव के अंश से काल के भी काल होंगे। वे स्थिर धनुष वाले शिव अनश्वर, सबसे अधिक पराक्रमी, वीर, सर्वश्रेष्ठ तथा सबके स्वामी हैं। वे रोग को नष्ट करने वाले, भयानक तथा सुवर्णमय मृगाकार पक्षी (शरभरूप) हैं। सम्पूर्ण जगत् के शासक न तो आप हैं और न चतुर्मुख ब्रह्मा । इस प्रकार सब कुछ सोचकर अपने रूप को पूर्णरूप से समेट लीजिये, अन्यथा महाभैरवरूपी रुद्र के क्रोध का शरभरूपी वज्र आपकी मृत्यु बनकर उसी तरह गिरेगा, जैसे पर्वत पर वज्र गिरता है ॥ ५४–५९१/२ ॥ सूतजी बोले — वीरभद्र के इस प्रकार कहने पर नृसिंह क्रोध से व्याकुल होकर गरजने लगे और तीव्र वेग से उसे पकड़ने का प्रयास करने लगे। इसी बीच विपक्ष में भय उत्पन्न करने वाला, महाभयंकर, गगनव्यापी तथा दुर्धर्ष शिव-तेज उत्पन्न हुआ। उस क्षण वीरभद्र का जो रूप दिखायी पड़ा; वह न सुवर्णमय था, न चन्द्रमा से उत्पन्न था, न सूर्य से उत्पन्न था, न अग्नि से उत्पन्न था, न विद्युत् के समान था और न चन्द्र के तुल्य था । वह शिव से सम्बन्धित अनुपम रूप था। उस समय सभी तेज उस शिव रूप में विलीन हो गये; इससे वह महातेज अव्यक्तरूप में स्थित हो गया और शरभ – नृसिंह — ये दो व्यक्तरूप प्रकट हुए ॥ ६०-६४ ॥ उस समय भयंकर आकृति वाला तथा रुद्र के विशिष्ट चिह्नों से युक्त रूप प्रकट हुआ। तदनन्तर वे परमेश्वर महाप्रलयकालिक रूप से व्यक्त (प्रकट) हो गये। हे द्विजो ! सभी देवताओं के देखते-देखते जयशब्द आदि मंगलों से युक्त होकर वे शिव हजार भुजाओं वाले, जटाधारी, सिर पर अर्धचन्द्र धारण किये हुए, पशु के आधा भाग शरीर से, दो पंखों से तथा चोंच से युक्त हो गये । उनके दाँत विशाल तथा अति तीक्ष्ण थे । वे वज्रतुल्य नखरूपी अस्त्र से सुशोभित हो रहे थे । उनका कण्ठ कृष्णवर्ण का था। वे चार भुजाओं वाले तथा चार पैरों वाले और अग्नि से उत्पन्न प्रतीत हो रहे थे। वे युग के अन्त में उत्पन्न मेघ के समान भयंकर तथा गम्भीर ध्वनि कर रहे थे। उनके तीनों नेत्र क्रोध से फैले हुए विशाल आग के गोले हो गये थे। उनके दाँत, अधर तथा ओष्ठ स्पष्ट दिखायी पड़ रहे थे । वे हर हुंकार से युक्त थे ॥ ६५–६९ ॥ उन्हें देखते ही विष्णु का बल तथा पराक्रम नष्ट हो गया। वे सूर्य के सम्मुख खद्योत (जुगुनू ) – के समान प्रकाश धारण किये हुए प्रतीत होने लगे। इसके बाद हररूप शरभ ने अपने पंखों से उन्हें जकड़कर नाभि तथा पैर को विदीर्ण करते हुए अपनी पूँछ से पैरों को बाँधकर भुजाओं से उनके भुजाओं को कसकर उनके वक्ष पर प्रहार करते हुए उन हरि को अपनी भुजाओं में जकड़ लिया । तदनन्तर वे भगवान् [शरभ] जैसे गरुड़ सर्प पर आक्रमण करता है, वैसे ही उड़ उड़कर उन्हें ऊपर की ओर उछालकर बार-बार उन्हें गिराकर पंखों के आघात से मूर्छित तथा डरे हुए विष्णु को लेकर देवताओं तथा महर्षियों के साथ आकाश-मण्डल में चले गये ॥ ७०–७३१/२ ॥ सभी देवता विष्णु तथा उन श्रेष्ठ [ शरभरूप] विश्वेश ईश्वर के पीछे-पीछे चलने लगे और ‘नमः’ वाक्य से उनकी स्तुति करने लगे। परवश होकर ले जाये जाते हुए विष्णु दीनमुख होकर हाथ जोड़कर ललित अक्षरों द्वारा उन परमेश्वर की स्तुति करने लगे ॥ ७४-७५१/२ ॥ ॥ श्रीनृसिंह कृत शरभेश्वर अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र ॥ ॥ श्रीनृसिंह उवाच ॥ नमो रुद्राय शर्वाय महाग्रासाय विष्णवे ॥ ७६ ॥ नम उग्राय भीमाय नमः क्रोधाय मन्यवे । नमो भवाय शर्वाय शङ्कराय शिवाय ते ॥ ७७ ॥ कालकालाय कालाय महाकालाय मृत्यवे । वीराय वीरभद्राय क्षयद्वीराय शूलिने ॥ ७८ ॥ महादेवाय महते पशूनां पतये नमः । एकाय नीलकण्ठाय श्रीकण्ठाय पिनाकिने ॥ ७९ ॥ नमोऽनन्ताय सूक्ष्माय नमस्ते मृत्युमन्यवे । पराय परमेशाय परात्परतराय ते ॥ ८० ॥ परात्पराय विश्वाय नमस्ते विश्वमूर्त्तये । नमो विष्णुकलत्राय विष्णुक्षेत्राय भानवे ॥ ८१ ॥ कैवर्ताय किराताय महाव्याधाय शाश्वते । भैरवाय शरण्याय महाभैरवरूपिणे ॥ ८२ ॥ नमो नृसिंहसंहर्त्रे कामकालपुरारये । महापाशौघसंहर्त्रे विष्णुमायान्तकारिणे ॥ ८३ ॥ त्र्यम्बकाय त्र्यक्षराय शिपिविष्टाय मीढुषे । मृत्युञ्जयाय शर्वाय सर्वज्ञाय मखारये ॥ ८४ ॥ मखेशाय वरेण्याय नमस्ते वह्निरूपिणे । महाघ्राणाय जिह्वाय प्राणापानप्रवर्तिने ॥ ८५ ॥ त्रिगुणाय त्रिशूलाय गुणातीताय योगिने । संसाराय प्रवाहाय महायन्त्रप्रवर्तिने ॥ ८६ ॥ नमश्चन्द्राग्निसूर्याय मुक्तिवैचित्र्यहेतवे । वरदायावताराय सर्वकारणहेतवे ॥ ८७ ॥ कपालिने करालाय पतये पुण्यकीर्त्तये । अमोघायाग्निनेत्राय लकुलीशाय शम्भवे ॥ ८८ ॥ भिषक्तमाय मुण्डाय दण्डिने योगरूपिणे । मेघवाहाय देवाय पार्वतीपतये नमः ॥ ८९ ॥ अव्यक्ताय विशोकाय स्थिराय स्थिरधन्विने । स्थाणवे कृत्तिवासाय नमः पञ्चार्थहेतवे ॥ ९० ॥ वरदायैकपादाय नमश्चन्द्रार्धमौलिने । नमस्तेऽध्वरराजाय वयसां पतये नमः ॥ ९१ ॥ योगीश्वराय नित्याय सत्याय परमेष्ठिने । सर्वात्मने नमस्तुभ्यं नमः सर्वेश्वराय ते ॥ ९२ ॥ एकद्वित्रिचतुःपञ्च कृत्वस्तेऽस्तु नमोनमः । दशकृत्वस्तु साहस्र कृत्वस्ते च नमो नमः ॥ ९३ ॥ नमोऽपरिमितं कृत्वानन्तकृत्वो नमो नमः । नमो नमो नमो भूयः पुनर्भूयो नमो नमः ॥ ९४ ॥ ॥ सूत उवाच ॥ नाम्नामष्टशतेनैवं स्तुत्वामृतमयेन तु । पुनस्तु प्रार्थयामास नृसिंहः शरभेश्वरम् ॥ ९५ ॥ श्रीनृसिंह बोले — शर्व, महाग्रास (जगत् जिनका ग्रास है) तथा विष्णु (सर्वव्यापी) एवं रुद्र को नमस्कार है। उग्र तथा भीम को नमस्कार है। क्रोध तथा मन्यु को नमस्कार है। आप भव, शर्व, शंकर तथा शिव को नमस्कार है । काल के भी काल, कालरूप, महाकाल, मृत्युरूप, वीर, वीरभद्र, पाप के विनाशक, शूलधारी, महादेव, महान् तथा पशुपति को नमस्कार है। एक, नीलकण्ठ, श्रीकण्ठ, पिनाकी तथा अनन्त को नमस्कार है। आप सूक्ष्म को नमस्कार है। आप मृत्युमन्यु (मृत्यु ही जिसका क्रोध है), पर, परमेश तथा परात्परतर को नमस्कार है। आप परात्पर, विश्व तथा विश्वमूर्ति को नमस्कार । विष्णुकलत्र, विष्णुक्षेत्र तथा भानु को नमस्कार है। कैवर्त (संसाररूपी सागर से तारने वाले), किरात, महाव्याध, शाश्वत, भैरव, शरण्य ( शरणदाता) तथा महाभैरवरूप को नमस्कार है। नृसिंहसंहर्ता, कामकालपुरारि (कामदेव-यम-त्रिपुर ) – के शत्रु महापाशौघ-संहर्ता, विष्णुमायान्तकारी, त्र्यम्बक (तीन नेत्रों वाले), त्र्यक्षर (भूत, भविष्य, वर्तमान में नाशरहित), शिपिविष्ट, मीढुष, मृत्युंजय, शर्व, सर्वज्ञ, मखारि, मखेश, वरेण्य, अग्निरूप, महाघ्राण, (महानासिकावाले), जिह्व (बड़ी जिह्वा वाले) तथा प्राणापानप्रवर्ती (प्राण- अपान वायु को गति देने वाले)-को नमस्कार है। त्रिगुण-त्रिशूल, गुणातीत, योगी, संसार, प्रवाह, महायन्त्रप्रवर्ती को नमस्कार है । चन्द्र-अग्नि- सूर्य, मुक्ति – विचित्र्यहेतु, वरद, अवतार (अभिमानियों का पतन करने वाले), सर्वकारणहेतु, कपाली, कराल, पति, पुण्यकीर्ति, अमोघ, अग्निनेत्र, लकुलीश शम्भु (कल्याण करने वाले), भिषक्तम, मुण्ड, दण्डी, योगरूपी, मेघवाह, देव तथा पार्वतीपति को नमस्कार है। अव्यक्त, विशोक ( शोकरहित), स्थिर, स्थिरधन्वी, स्थाणु (जगत् के आधाररूप), कृत्तिवास तथा पंचार्थहेतु को नमस्कार है। वर तथा एकपाद ( एकमात्र ज्ञानियों के द्वारा प्राप्य ) – को नमस्कार है। चन्द्रार्धमौलि को नमस्कार है। अध्वरराज तथा वयसाम्पति ( शरभरूप) – को नमस्कार है। आप योगीश्वर, नित्य, सत्य, परमेष्ठी तथा सर्वात्मा को नमस्कार है । आप सर्वेश्वर को नमस्कार है। आपको एक, दो, तीन, चार, पाँच बार नमस्कार है। आपको दस बार तथा हजार बार नमस्कार है। आपको अपरिमित बार, अनन्त बार नमस्कार है। आपको बार-बार नमस्कार है; पुनः बार- बार नमस्कार है ॥ ७६-९४ ॥ सूतजी बोले — [हे ऋषियो!] इस प्रकार नृसिंह [विष्णु] ने एक सौ आठ अमृतमय नामों से शरभरूप ईश्वर (शिव) की स्तुति करके पुनः उनसे प्रार्थना की — हे परमेश्वर! जब-जब अति अहंकार से दूषित अज्ञान मुझमें उत्पन्न हो, तब-तब आप उसे दूर करें। इस प्रकार शंकर से प्रार्थना करते हुए वे नृसिंह प्रसन्न हो गये; तब वीरभद्र ने कहा — ‘हे विष्णो! आप वास्तव में अशक्त हैं और जीवन के अन्त में पराजित हुए हैं।’ इसके बाद वीरभद्र ने क्षणभर में ही [ नृसिंहरूपधारी] विष्णु के विग्रह को बचे हुए मुख वाला करके शेष विग्रह से त्वचा खींचकर उसे मात्र हड्डियों से युक्त कर दिया और इस प्रकार वह विग्रह अति श्वेत वर्ण वाला हो गया ॥ ९५-९८ ॥ देवता बोले — हे वीरभद्र! ब्रह्मा आदि हम सभी देवता आपकी दृष्टि से उसी प्रकार जीवित हैं, जैसे वृक्ष मेघ से जीवन प्राप्त करते हैं ॥ ९९ ॥ जिसके भय से अग्नि जलती है, साक्षात् सूर्य उगता है, वायु बहती है और पाँचवीं [^1] मृत्यु दौड़ती है; वह आप ही हैं ॥ १०० ॥ हे भगवन्! ब्रह्मवादी लोग आपको ही अनिर्वाच्य, चिदाकाश, कलातीत, सदाशिव तथा भव कहते हैं ॥ १०१ ॥ आप जगदाधार के विषय में जानने में हम असमर्थ हैं। आप हमारे परमेश्वर हैं। आपके रूपलावण्यवर्णन का अन्त नहीं है — ऐसा जानिये ॥ १०२ ॥ हे गणाधिप ! सभी विपत्तियों में हम लोगों की रक्षा कीजिये। हे एकादशरुद्ररूप ! आप भगवान् हर विशिष्ट विग्रह वाले हैं ॥ १०३ ॥ हे शिव! आपके इस प्रकार के अनेक अवतारों को देखकर हमारा अज्ञान हममें कदाचित् सन्देह न उत्पन्न करे तथा आपका ध्यान नष्ट न हो। जैसे गुंजा के महान् पर्वत के प्रान्तभाग से गुंजाओं की अमित संख्या होती है, वैसे ही आपके अनन्त रूप हैं, जिन्हें आप चारों ओर से उपसंहृत कर लीजिये। यह संसार आपके प्रवेश योग्य हो, इसका संहार मत कीजिये । वेदवेत्ता ब्राह्मण कहते हैं कि आप रुद्र के पर अपर दो शरीर हैं — एक घोर तथा दूसरा शिव ( शान्त); उनमें प्रत्येक के अनेक प्रकार हैं । हे भगवन्! कभी भी हत न होने वाले महान् बल से युक्त आप यहाँ पर हम लोगों की रक्षा कीजिये। आपने अपने ही तेज से सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त कर रखा है ॥ १०४–१०७ ॥ हे महेश्वर ! ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र-चन्द्र आदि हम प्रमुख देवतागण तथा अन्य देवता और असुर — सभी लोग आपसे उत्पन्न हुए हैं ॥ १०८ ॥ ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु, यम आदि देवता, असुर तथा भ्रान्त अन्तःकरण वाले नृसिंह हरि का निग्रह करके अपने शरीर को आठ प्रकार से [सूर्य आदि रूप में] विभाजित करके आप सभी का धारण-पोषण करते हैं; अतः हे भगवन्! अभीष्ट दानों के द्वारा हम देवताओं की रक्षा कीजिये ॥ १०९-११० ॥ तत्पश्चात् देव [वीरभद्र ] – ने उन देवताओं तथा प्राचीन ऋषियों से कह — जैसे जल में जल, दूध में दूध तथा घृत में घृत डाले जाने पर एक हो जाता है; वैसे ही विष्णु शिव में लीन हैं; इसमें सन्देह नहीं है। ये गर्वयुक्त तथा महाबली नृसिंह जगत् का संहार करने वाले रूप से प्रकट हुए हैं। मेरी भक्ति की सिद्धि की इच्छा रखने वालों को नृसिंह की पूजा करनी चाहिये; उन [नृसिंहरूपधारी विष्णु ] – को नमस्कार है ॥ १११–११३ ॥ इतना कहकर महाबली भगवान् वीरभद्र सभी देवताओं के देखते-देखते वहीं पर अन्तर्धान हो गये। उसी समय से शंकरजी नृसिंह के चर्म को वस्त्र के रूप में धारण करने लगे और [नृसिंह का ] मुण्ड उनकी मुण्डमाला में मणि के रूप में शोभा पाने लगा ॥ ११४-११५ ॥ तदनन्तर विस्मय से प्रसन्न नेत्र वाले सभी देवतागण भयरहित होकर इस कथा को कहते हुए जैसे आये थे, वैसे ही वापस चले गये ॥ ११६ ॥ जो [ मनुष्य ] इस पुण्यप्रद तथा वेदमय श्रेष्ठ आख्यान को पढ़ता अथवा सुनता है, उसके सभी दुःखों का नाश हो जाता है। यह [ आख्यान ] धन्य बनाने वाला, यश देने वाला, आयु प्रदान करने वाला, रोगरहित करने वाला, पुष्टि की वृद्धि करने वाला, सभी विघ्नों को शान्त करने वाला, सभी व्याधियों को नष्ट करने वाला, अकाल मृत्यु का शमन करने वाला, परमशान्ति प्रदान करने वाला, मंगलकारक, शत्रु- समूह का दमन करने वाला, सभी मानसिक रोगों का विनाश करने वाला, बुरे स्वप्नों का निवारण करने वाला, सभी भूत-प्रेत को दूर करने वाला, दुष्ट ग्रहों का क्षय करने वाला, पुत्र-पौत्र की वृद्धि करने वाला, योग- सिद्धि प्रदान करने वाला, भली- भाँति शिवज्ञान को प्रकाशित करने वाला, शेषलोक का सोपानस्वरूप, वांछित फलों को सिद्ध करने वाला, विष्णु माया को दूर करने वाला, देवताओं के परमार्थ को देने वाला, वांछा की सिद्धि प्रदान करने वाला और ऋद्धि, प्रज्ञा आदि देने वाला है ॥ ११७-१२२ ॥ पिनाकधारी [शिव] – के इस शरभ की आकृति वाले श्रेष्ठ रूप को स्थिर प्रज्ञा वाले उत्सुक भक्तों में प्रकाशित करना चाहिये और उन्हीं शिवसमर्पित मन वाले भक्तों के द्वारा शिव सभी उत्सवों में और अष्टमी तथा चतुर्दशी के दिन इसका पाठ तथा श्रवण किया जाना चाहिये। शिव-प्रतिष्ठा के अवसरों पर शिव की सन्निधि प्राप्त करने वाले इस स्तोत्र को पढ़ना चाहिये । अतः चोर – बाघ – सर्प -सिंह आदि से भय होने पर, राजा से भय उत्पन्न होने पर, इस लोक में अन्य उत्पात – भूकम्प – दावाग्नि, धूलवृष्टि (आँधी) होनेपर, उल्कापात होने पर, तेज हवा चलने पर, अनावृष्टि तथा अतिवृष्टि होने पर दृढ़ व्रत वाले विद्वान् शिवभक्त को इस [ शरभचरित] – को पढ़ना चाहिये। जो इस सर्वोत्तम स्तोत्र को पढ़ता अथवा सुनता है, वह रुद्रत्व प्राप्त करके रुद्र का अनुचर हो जाता है ॥ १२३-१२८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘शरभप्रादुर्भाव’ नामक छानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९६ ॥ [^1]: कठोपनिषद् २ । ३ । ३, तैत्तिरीयोपनिषद् २ । ८ । १ Content is available only for registered users. 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