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शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [पंचम-युद्धखण्ड] – अध्याय 47
श्री गणेशाय नमः
श्री साम्बसदाशिवाय नमः
सैंतालीसवाँ अध्याय
शुक्राचार्य द्वारा युद्ध में मरे हुए दैत्यों को संजीवनी-विद्या से जीवित करना, दैत्यों का युद्ध के लिये पुनः उद्योग, नन्दीश्वर द्वारा शिव को यह वृत्तान्त बतलाना, शिव की आज्ञा से नन्दी द्वारा युद्ध स्थल से शुक्राचार्य को शिव के पास लाना, शिव द्वारा शुक्राचार्य को निगलना

व्यासजी बोले — उस भयानक तथा रोमांच उत्पन्न कर देनेवाले महायुद्ध में भगवान् सदाशिव ने विद्वान् दैत्याचार्य शुक्र को निगल लिया — यह बात मैंने संक्षेप में सुनी, अब आप उसे विस्तार के साथ कहिये कि शिवजी के उदर में स्थित महायोगी शुक्राचार्य ने क्या किया, शिवजी की प्रलयकालीन अग्नि के समान जठराग्नि ने उन शुक्र को जलाया क्यों नहीं ? कालरूप बुद्धिमान् तथा तेजस्वी शुक्राचार्य किस प्रकार शिवजी के जठरपंजर से बाहर निकले, उन शुक्र ने किसलिये तथा कितने समय तक आराधना की, उन्होंने मृत्यु का शमन करनेवाली उस परा विद्या को कैसे प्राप्त किया और हे तात ! वह कौनसी विद्या है, जिससे मृत्यु का निवारण हो जाता है, देवाधिदेव, लीलाविहारी भगवान् शंकर के त्रिशूल से छुटकारा पाये हुए अन्धक ने किस प्रकार गाणपत्यपद प्राप्त किया ? हे परम बुद्धिमान् तात ! कृपा कीजिये और शिवलीलामृत का पान करनेवाले मुझको यह सब विशेष रूप से बताइये ॥ १-७ ॥

शिवमहापुराण

ब्रह्माजी बोले — हे तात ! अमिततेजस्वी व्यासजी के इस वचन को सुनकर शिवजी के चरणकमल का स्मरण करके सनत्कुमारजी कहने लगे — ॥ ८ ॥

सनत्कुमार बोले — हे महाबुद्धिमान् व्यास ! आप मुझसे शिवलीलामृत का श्रवण कीजिये, आप धन्य हैं, शिवजी के परम भक्त हैं और विशेषकर मुझे तो बहुत आनन्द देनेवाले हैं । जिस समय अत्यन्त दुर्भेद्य वज्रव्यूह के अधिपति भगवान शंकर एवं गिरिव्यूह के अधिपति अन्धक में घनघोर युद्ध छिड़ा हुआ था, उस समय सर्वप्रथम बलशाली दैत्यों की विजय हुई और हे मुने ! उसके बाद शिवजी के प्रभाव से प्रमथगणों की विजय हुई ॥ ९-११ ॥
यह सुनकर महान् दैत्य अन्धकासुर अत्यन्त दुःखित हुआ और वह विचार करने लगा कि मेरी विजय किस प्रकार होगी । इसके बाद परम बुद्धिमान्, महावीर वह अन्धक संग्राम छोड़कर शीघ्र ही अकेले शुक्राचार्य के पास गया । परम नीतिज्ञ वह अन्धक रथ से उतरकर अपने गुरु शुक्राचार्य को प्रणाम करके हाथ जोड़कर विचार करके यह कहने लगा — ॥ १२–१४ ॥

अन्धक बोला — हे भगवन् ! हमलोग आपका आश्रय लेकर आपको गुरु मानते हैं, सर्वदा विजय पानेवाले हमलोग आज पराजित हो रहे हैं ॥ १५ ॥ [हे देव!] आपके प्रभाव से हमलोग सदैव शंकर. विष्णु आदि देवताओं को तथा उनके अनुचरों को क्षुद्र तृण के समान समझते हैं और आपके अनुग्रह से सभी देवता हमसे उसी प्रकार डरते रहते हैं, जैसे सिंहों से हाथी और गरुडों से सर्प डरते रहते हैं ॥ १६-१७ ॥ आपके अनुग्रह से प्रमथों की सम्पूर्ण सेना को ध्वस्तकर दैत्यों तथा दानवों ने दुर्भेद्य वज्रव्यूह में प्रवेश किया ॥ १८ ॥

हे भार्गव ! हमलोग आपकी शरण में रहकर पृथ्वी के समान सदा अविचल होकर युद्धस्थल में नि:शंक विचरण करते हैं । हे विप्र ! वीर शत्रुओं से पीड़ित होकर भागकर शरण में आये हुए असुरों की तथा मृत दैत्यों की भी आप रक्षा करें । मृत्यु को पराजित करनेवाले महापराक्रमी प्रमथगणों से मार खाकर युद्ध में गिरे हुए उन हुण्ड आदि मेरे गणों को देखिये ॥ १९-२१ ॥

आपने पूर्वकाल में सहस्रों वर्षपर्यन्त तुषाग्निजन्य धूम का पानकर जिस संजीवनी-विद्या को प्राप्त किया है, अब उसके उपयोग का समय आ गया है । हे भार्गव ! इस समय आप कृपाकर सभी असुरों को जीवित कर दें, जिससे सभी प्रमथ आपकी इस विद्या के प्रभाव को देखें ॥ २२-२३ ॥

सनत्कुमार बोले — इस प्रकार अन्धक के वचन को सुनकर परम धीर वे शुक्राचार्य दुखी मन से विचार करने लगे । मुझे इस समय क्या करना चाहिये, मेरा कल्याण कैसे हो, मेरे लिये सर्वथा अनुचित है । वह विद्या मुझे शंकरजी द्वारा प्राप्त हुई है, अतः इसका उपयोग शिवजी के अनुचर वीर प्रमथों के द्वारा रण में मारे गये दैत्यों को जीवित करने के लिये कैसे करूँ । किंतु शरण में आये हुए की रक्षा करना सर्वोपरि धर्म है, तब हृदय तथा बुद्धि से विचारकर शुक्राचार्य ने उसकी बात अंगीकार कर ली ॥ २४–२७ ॥

इसके बाद शिवजी के चरणकमलों का स्मरण करके कुछ-कुछ हँसकर स्वस्थचित्त हो शुक्राचार्य ने दैत्यराज से कहा — ॥ २८ ॥

शुक्र बोले — हे तात ! आपने जो कहा, सब सत्य ही है, मैंने सचमुच इस विद्या की प्राप्ति दानवों के लिये ही की है । मैंने सहस्रवर्षपर्यन्त तुषाग्निजन्य धूम को पीकर शिवजी से इस विद्या को प्राप्त किया था, जो बन्धुगणों को सर्वदा सुख देनेवाली है । मैं इस विद्या के प्रभाव से संग्राम में देवताओं द्वारा मारे गये इन दैत्यों को उसी प्रकार उठा दूंगा, जिस प्रकार मुरझायी हुई फसलों को मेघ जीवित कर देता है । आप अभी इसी क्षण देखेंगे कि ये दैत्य व्रणरहित एवं स्वस्थ होकर सोकर उठे हुए के समान पुनः जीवित हो गये हैं ॥ २९-३२ ॥

सनत्कुमार बोले — अन्धक से इस प्रकार कहकर शुक्राचार्य ने बड़े आदर के साथ शिवजी का स्मरणकर एक-एक दैत्य को उद्देश्य करके संजीवनी-विद्या का प्रयोग किया । उस विद्या के प्रयोगमात्र से वे समस्त दैत्य एवं दानव सोकर जगे हुए के समान शस्त्र धारण किये हुए एक साथ उसी प्रकार उठ गये, जिस प्रकार निरन्तर अभ्यस्त वेद, जैसे समय पर मेघ एवं आपत्तिकाल में श्रद्धा से ब्राह्मणों को दिया गया दान फलदायी हो जाता है ॥ ३३-३५ ॥

तब हुण्ड आदि असुरों को पुनः जीवित देखकर सभी दैत्य जलपूर्ण बादल के समान गर्जन करने लगे ॥ ३६ ॥ तत्पश्चात् विकट ध्वनि करके गरजते हुए महान् बल तथा पराक्रमवाले वे दैत्य निर्भीक होकर प्रमथगणों के साथ पुनः युद्ध करने के लिये तैयार हो गये । युद्ध में अभिमानी नन्दी आदि सभी प्रमथगण शुक्राचार्य के द्वारा जीवित किये गये उन दैत्यों तथा दानवों को देखकर अत्यन्त विस्मित हो उठे । इस सम्पूर्ण कर्म को देखकर ‘शंकरजी से निवेदन करना चाहिये’ — इस प्रकार विचारकर वे बुद्धिमान गण परस्पर कहने लगे ॥ ३७-३९ ॥

प्रमथेश्वरों के उस आश्चर्यकर युद्धयज्ञ में शुक्राचार्य के इस प्रकार के कार्य को देखकर शिलादपुत्र नन्दीश्वर अमर्षयुक्त हो शिव के समीप गये और ‘जय हो, जय हो’ —इस प्रकार कहकर जय देनेवाले एवं कनक के समान निष्कलंक शिवजी से बोले — हे देव ! युद्धस्थल में इन्द्रसहित देवों एवं गणेश्वरों ने जो अत्यन्त कठिन कार्य किया है, हे ईश ! हमारे उन सभी कार्यों को शुक्राचार्य ने व्यर्थ कर दिया, एक-एक राक्षस को उद्देश्य करके मृतसंजीवनी-विद्या का प्रयोगकर युद्ध में मरे हुए उन सारे विपक्षियों को उन्होंने बिना श्रम के जीवित कर दिया ॥ ४०-४२ ॥

इस समय यमपुरी से लौटे हुए तुहुण्ड, हुण्ड, कुम्भ, जम्भ, विपाक, पाक आदि महादैत्य [युद्धस्थल में] प्रमथगणों का विनाश करते हुए विचरण कर रहे हैं ॥ ४३ ॥ हे महेश ! यदि मारे गये श्रेष्ठ दैत्यों को शुक्राचार्य इसी प्रकार जीवित करते रहे, तो हम गणेश्वरों की विजय किस प्रकार सम्भव है और हमें शान्ति कहाँ ? ॥ ४४ ॥

सनत्कुमार बोले — प्रमथेश्वर नन्दी के इस प्रकार कहने पर प्रमथेश्वरों के ईश्वर महादेव हँसते हुए सभी गणेश्वरों में श्रेष्ठ नन्दी से कहने लगे — ॥ ४५ ॥

‘जाओ और दैत्यों के मध्य से शुक्राचार्य को इस प्रकार पकड़कर शीघ्र ले आओ, जिस प्रकार बाज लवा पक्षी के बच्चे को पकड़ लेता है’ ॥ ४६ ॥

सनत्कुमार बोले — शिवजी के द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर नन्दी सिंह के समान गर्जना करते हुए दैत्यों की सेना को चीरते हुए उस स्थान पर पहुँच गये, जहाँ भार्गववंश के दीपक शुक्राचार्य थे । बड़े-बड़े दैत्य पाश, खड्ग, वृक्ष, पाषाण, पर्वत आदि शस्त्र हाथ में लेकर उनकी रक्षा कर रहे थे । बलवान् नन्दीश्वर ने दैत्यों को विक्षुब्ध करके शुक्राचार्य को इस प्रकार पकड़ लिया, जिस प्रकार शरभ हाथी को पकड़ लेता है ॥ ४७-४८ ॥

तब ढीले वस्त्रवाले, बिखरे केशवाले एवं गिरते हुए आभूषणोंवाले शुक्राचार्य को छुड़ाने के लिये अनेक राक्षस सिंहनाद करते हुए उनके पीछे दौड़े ॥ ४९ ॥ दैत्येन्द्र नन्दीश्वर पर मेघ के समान वज्र, शूल, तलवार, परशु, तीक्ष्ण चक्र, पाषाण एवं कम्पन आदि नाना प्रकार के शस्त्रों की घोर वर्षा करने लगे ॥ ५० ॥

गणाधिराज नन्दीश्वर उन सभी शस्त्रों को अपने मुख की अग्नि से भस्म करके उस महाभयानक युद्धस्थल में शत्रुपक्ष को पीड़ित करके शुक्राचार्य को लेकर शिवजी के पास चले आये और शिवजी से यह कहने लगे — हे भगवन् ! यह वही शुक्र है । तब देवदेव शिवजी ने देवगणों के लिये अग्नि के द्वारा दी गयी आहुति के समान शुक्राचार्य को ग्रहण कर लिया । प्राणियों की रक्षा करनेवाले उन सदाशिव ने बिना कुछ बोले ही उन शुक्राचार्य को फल के समान अपने मुख में रख लिया, जिससे वे समस्त असुर ऊँचे स्वर में महान् हाहाकार करने लगे ॥ ५१-५३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराण के अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिता के पंचम युद्धखण्ड में अन्धकयुद्धोपाख्यान में शुक्रनिगीर्णनवर्णन नामक सैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४७ ॥

 

 

 

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