गुह्यकाली पञ्चार पूजा विधि ॥ अथ गुह्यकाली पञ्चार पूजा विधि ॥ गुह्यकाली यन्त्र में पंचकोण में पञ्चार पूजा कही गयी है । काली अपने पाँच रूप ‘‘१. सृष्टि, २. स्थिति, ३. संहार, ४. अनाख्या, ५. भासा” में सदैव पूजित है । प्रत्येक क्रम में अलग अलग काली है तथा उनके अलग अलग दिव्यौघ है –… Read More
गुह्यकालीपञ्जर न्यासः ॥ अथ गुह्यकालीपञ्जर न्यासः ॥ पञ्जरन्यास के प्रत्येक मंत्रों से बहिर्मातृका न्यास की तरह प्रत्येक अंगों में न्यास करें । १. ओं फ्रे अं निर्गुणात्मिकायै ह्रीं छ्रीं हूं चण्डयोगेश्वर्यं परापरायै स्त्रीं क्लीं खफ्रें नमः फट् ओं । २. ओं फ्रें आ सगुणात्मिकायै ह्रीं छ्रीं हूं वज्रकलापिन्यै परापरायै स्त्रीं क्लीं खफ्रें नमः फट् ओं । ३.… Read More
गुह्यकाली मन्त्रभेदाः तथा विभिन्न गायत्री मंत्राः ॥ गुह्यकाली मन्त्रभेदाः ॥ (१) नवाक्षर विद्या – क़्रीं गुह्ये कालिके क्रीं स्वाहा । (२) चतुर्दशाक्षरी मन्त्र – क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं गुह्ये कालिके स्वाहा । (३) पञ्चदशाक्षरी मन्त्र – हूं ह्रीं गुह्ये कालिके क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा । (४) षोडशाक्षरी मन्त्र – क्रीं हूं ह्रीं गुह्ये कालिके क्रीं… Read More
“ह्रीं श्रीराधायै स्वाहा” श्रीराधा-उपासना – देवी भागवत अनुसार ॥ ह्रीं श्रीराधायै स्वाहा ॥ श्रीराधा-उपासना – देवी भागवत अनुसार भगवान् नारायण कहते हैं — नारद ! सुनो, यह वेदवर्णित रहस्य तुम्हें बताता हूँ । यह सर्वोत्तम एवं परात्पर साररहस्य जिस किसी के सम्मुख नहीं कहना चाहिये । इस रहस्य को सुनकर दूसरों से कहना उचित नहीं है; क्योंकि यह अत्यन्त गुह्य रहस्य है ।… Read More
पीठ पूजनम् ॥ पीठ पूजनम् ॥ मूर्ति के आसन पर या यंत्र पर यह पूजा अवश्य करे । दैनिक पूजन में यह पीठ पूजा अपने हृदयस्थल में कर हृदय में देवता का आह्वान कर मानसिक पूजन करे । देवता के यंत्र को भद्रमंडल या कलश पर यंत्र रखकर देवता का आह्वान पूजन करते है । परन्तु यंत्र… Read More
गुह्यकाली संजीवन स्तोत्रम् ॥ अथ गुह्यकाली संजीवन स्तोत्रम् ॥ इस स्तोत्र को पढ़े बिना गुह्यकाली सहस्रनाम पठन का पूरा फल नहीं मिलता । अत: इस स्तोत्र का पाठ अवश्य करें । ॥ महाकाल उवाच ॥ इदं स्तोत्रं पुरा देव्या त्रिपुरघ्नाय कीर्तितम् । त्रिपुरघ्नोऽपि मां प्रादादुपदिश्य मनुं प्रिये ॥ १ ॥ गद्याकारं च स विभुः स्तोत्रं तस्यै चकार ह… Read More
गुह्यकाली सहस्रनाम स्तोत्रम् ॥ अथ गुह्यकाली सहस्रनाम स्तोत्रम् ॥ ॥ पूर्वपीठिका ॥ ॥ देव्युवाच ॥ यदुक्तं भवता पूर्वं प्राणेश करुणावशात् ॥ १ ॥ नाम्नां सहस्रं देव्यास्तु तदिदानीं वदप्रभो । ॥ श्री महाकालोवाच ॥ अतिप्रीतोऽस्मि देवेशि तवाहं वचसामुना ॥ २ ॥ सहस्रनामस्तोत्रं यत् सर्वेषामुत्तमोत्तमम् । सुगोपितं यद्यपि स्यात् कथयिष्ये तथापि ते ॥ ३ ॥ देव्याः सहस्रनामाख्यं स्तोत्रं पापौघमर्दनम् ।… Read More
युगलशरणागति-मन्त्र युगलशरणागति-मन्त्र सारस्वत कल्प से पच्चीसवें कल्प पूर्व की बात है, उस समय नारदजी कश्यपजी के पुत्र होकर उत्पन्न हुए थे । उस समय भी उनका नाम नारद ही था । एक दिन वे भगवान् श्रीकृष्ण का परम तत्त्व पूछने के लिये कैलास पर्वत पर भगवान् शिव के समीप गये । वहाँ उनके प्रश्न करने पर… Read More
गोपिका विरह गीत ॥ गोपिका विरह गीत ॥ एहि मुरारे कुजविहारे एहि प्रणतजनबन्धो । हे माधव मधुमथन वरेण्य केशव करुणासिन्धो । (ध्रुवपदम्) रासनिकुञ्जे गुञ्जति नियतं भ्रमरशतं किल कान्त । एहि निभृतपथपान्थ । त्वामिह याचे दर्शनदानं हे मधुसूदन शान्त ॥ १ ॥… Read More
श्रीयुगलकिशोराष्टक ॥ श्रीयुगलकिशोराष्टक ॥ श्रीरूपगोस्वामीजी द्वारा रचित श्रीयुगलकिशोराष्टक श्री रूप गोस्वामी (१४९३ – १५६४), वृंदावन में चैतन्य महाप्रभु द्वारा भेजे गए छः षण्गोस्वामी में से एक थे। वे कवि, गुरु और दार्शनिक थे। वे सनातन गोस्वामी के भाई थे। इनका जन्म १४९३ ई (तदनुसार १४१५ शक.सं.) को हुआ था। इन्होंने २२ वर्ष की आयु में गृहस्थाश्रम… Read More