भगवान् नृसिंह मन्त्र प्रयोगः ॥ षडक्षर नृसिंह मन्त्र ॥ मन्त्रः- “आं ह्रीं क्ष्रों क्रौं हुं फट् ।” विनियोगः- अस्य मन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, पंक्ति छन्दः, नरसिंहो देवता सर्वेष्ट सिद्धये जपे विनियोग । मेरुतन्त्र में मन्त्रः- “आं ह्रीं ज्रों क्रों ह्रां फट्” है । ऋषिन्यासः- ॐ ब्रह्मऋषये नमः शिरसि । ॐ पंक्ति छन्दसे नमः मुखे । ॐ… Read More


भगवान् नृसिंह के चमत्कारी  मन्त्र भगवान् विष्णु के अवतारों में भगवान् नृसिंह की उपासना भीषण संकट के निवारण, शत्रु विनाश और आत्मरक्षा, कार्यों में सफलता, लक्ष्मी प्राप्ति आदि के उद्देश्य से की जाती है । शास्त्रों में भगवान् नृसिंह के अनेक मन्त्र दिए गए हैं । उनमें से कतिपय मन्त्र यहाँ प्रस्तुत हैं । 1.… Read More


॥ श्री नृसिंह कवच ॥ नृसिंह कवचम वक्ष्येऽ प्रह्लादनोदितं पुरा । सर्वरक्षाकरं पुण्यं सर्वोपद्रवनाशनं ॥ सर्वसंपत्करं चैव स्वर्गमोक्षप्रदायकम । ध्यात्वा नृसिंहं देवेशं हेमसिंहासनस्थितं॥ विवृतास्यं त्रिनयनं शरदिंदुसमप्रभं । लक्ष्म्यालिंगितवामांगम विभूतिभिरुपाश्रितं ॥… Read More


शत्रुबाधा निवारण हेतु नृसिंह कवच प्रयोग सर्वप्रथम दाहिने हाथ में जल लेकर निम्नलिखित विनियोग का पाठ करें :- विनियोगः- “ॐ अस्य श्रीनृसिंह कवच मन्त्रस्य प्रजापतिर्ऋषिः गायत्रीश्छन्दः नृसिंह देवता, क्ष्रौं बीजं, मम सर्वारिष्ट च शत्रुक्षयाय पूर्वकं ममाभीष्ट सिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ॥” ध्यान :- हाथ में पुष्प लेकर भगवान् नृसिंह का निम्नलिखित श्लोक से ध्यान करें :… Read More


जानकी नवमी से करें शीघ्र विवाह हेतु जानकी मंगल प्रयोग शीघ्र विवाह के लिए जहाँ गौरी और शंकर की पूजा की जाती है, वहीं दूसरी ओर जानकी और श्रीराम की भी पूजा-उपासना की जाती है । माता जानकी की कृपा से न केवल शीघ्र विवाह होता है, वरन् अच्छे वर की भी प्राप्ति होती है… Read More


श्रीजानकी-मंगल – हिन्दी भावार्थ सहित ( प्रातः स्मरणीय गोस्वामी तुलसीदास जी ने जगज्जननी आद्याशक्ति भगवती श्री जानकी जी तथा परात्पर पुर्ण पुरूषोत्तम भगवान् श्रीराम के परम मंगलमय विवाहोत्सव का बड़े ही मधुर शब्दों में वर्णन किया है। जनक पुर मे स्वयंवर की तैयारी से आरंभ करके विश्वामित्र के अयोध्या जाकर श्रीराम -लक्ष्मण को यज्ञ रक्षा… Read More


॥ श्रीहरिः ॥ ॥ श्रीमद्भागवतकी आरती ॥ आरति अतिपावन पुरान की । धर्म-भक्ति-विज्ञान-खान की ॥ आरति अतिपावन पुरान की ॥ महापुरान भागवत निरमल । शुक-मुख-विगलित निगम-कल्प-फल । परमानन्द-सुधा-रसमय कल । लीला-रति-रस रस-निधान की ॥ आरति अतिपावन पुरान की ॥ कलि-मल-मथनि त्रिताप-निवारिनि । जन्म-मृत्युमय भव-भय-हारिनि । सेवत सतत सकल सुखकारिनि । सुमहौषधि हरि-चरित-गान की ॥ आरति… Read More


श्रीमद्भागवत-पाठके विभिन्न प्रयोग भागवत-महिमा श्लोकार्द्धं श्लोकपादं वा नित्यं भागवतं पठेत् । यः पुमान् सोऽपि संसारान्मुच्यते किमुताखिलात् ॥ आधा श्लोक या चौथाई श्लोक का भी नित्य जो मनुष्य पाठ करता है, उसकी भी संसार से मुक्ति हो जाती है; फिर सम्पूर्ण पाठ करनेवाले की तो बात ही क्या है । एषा बुद्धिमतां बुद्धिर्यद् भागवतमादरात् । नित्यं… Read More


श्रीमद्भागवतमाहात्म्यम् – अध्याय ४ ॐ गणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय चौथा अध्याय श्रीमद्भागवत का स्वरूप, प्रमाण, श्रोता-वक्ता के लक्षण, श्रवणविधि और माहात्म्य शौनकादि ऋषियों ने कहा — सूतजी ! आपने हमलोगों को बहुत अच्छी बात बतायी । आपकी आयु बढे, आप चिरजीवी हों और चिरकाल तक हमें इसी प्रकार उपदेश करते रहें । आज… Read More


श्रीमद्भागवतमाहात्म्यम् – अध्याय ३ ॐ गणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय तीसरा अध्याय श्रीमद्भागवत की परम्परा और उसका माहात्म्य, भागवत-श्रवण से श्रोताओं को भगवद्धाम की प्राप्ति सूतजी कहते हैं — उद्धवजी ने वहाँ एकत्र हुए सब लोगों को श्रीकृष्ण-कीर्तन में लगा देखकर सभी का सत्कार किया और राजा परीक्षित् को हृदय से लगाकर कहा ॥… Read More