श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-05 श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-05 ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ पाँचवाँ अध्याय दक्षप्रजापति की शिव के प्रति द्वेषबुद्धि, महर्षि दधीचि द्वारा दक्ष को समझाना तथा भगवान् शिव के माहात्म्य को बताना अथ पञ्चमोऽध्यायः श्रीशिवनारदसंवादे दक्षप्रजापतिविषादवर्णनं श्रीमहादेव जी बोले — तदनन्तर भगवान् शंकर और सती की भर्त्सना करते हुए क्षीण पुण्यवाले दक्षप्रजापति दुःख से व्याकुल होकर… Read More
श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-04 श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-04 ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ चौथा अध्याय दक्ष प्रजापति की तपस्या से प्रसन्न भगवती शिवा का “सती” नाम से उनकी पुत्री के रूप में जन्म लेना, भगवती सती एवं भगवान् शिव की परस्पर प्रीति अथ चतुर्थोऽध्यायः श्रीशिवनारदसंवादे सतीविवाहवर्णनं श्रीमहादेवजी बोले — एक बार की बात है जगत् की सृष्टि करने… Read More
श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-03 श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-03 ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ तीसरा अध्याय देवीमाहात्म्य-वर्णन, देवी द्वारा त्रिदेवों को सृष्ट्यादि के कार्यों में नियुक्त करना, आदिशक्ति का गङ्गा आदि पाँच रूपों में विभक्त होना, ब्रह्माजी के शरीर से मनु तथा शतरूपा का प्रादुर्भाव, दक्ष की कन्याओं से सृष्टि का विस्तार, आदिशक्ति द्वारा भगवान् शंकर को भार्यारूप में… Read More
श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-02 श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-02 ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ दूसरा अध्याय महामुनि जैमिनि द्वारा श्रीवेदव्यास जी से शिव-नारद-संवाद के रूप में वर्णित देवी के माहात्म्य वाले महाभागवत को सुनाने की प्रार्थना करना अथ द्वितीयोऽध्यायः श्रीव्यासजैमिनीसंवादे व्रतोपासनावर्णनं सूतजी बोले — बहुत से पौराणिक आख्यानों का श्रवण (सुनना) कर लेने के बाद मुनिश्रेष्ठ जैमिनि ने भूमि… Read More
श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-01 श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-01 ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ पहला अध्याय श्रीसूत-शौनक-संवाद में महाभागवत [ देवीपुराण ]-का प्रारम्भ। महाभागवत की रचना के लिये भगवती दुर्गा की उपासना। भगवती का प्रकट होकर अपने चरणतल में स्थित सहस्रदलकमल में परमाक्षरों में उत्कीर्ण महाभागवत [देवीपुराण]-का व्यासजी को दर्शन कराना और पुनः व्यासजी द्वारा महाभागवत की रचना अथ… Read More
श्रीमहाभागवत [देवीपुराण] – सिंहावलोकन श्रीमहाभागवत [देवीपुराण] – सिंहावलोकन यामाराध्य विरिञ्चिरस्य जगतः स्रष्टा हरिः पालकः संहर्ता गिरिशः स्वयं समभवद्धयेया च या योगिभिः । यामाद्यां प्रकृतिं वदन्ति मुनयस्तत्त्वार्थविज्ञाः परां तां देवीं प्रणमामि विश्वजननीं स्वर्गापवर्गप्रदाम् ॥ जिनकी आराधना करके स्वयं ब्रह्माजी इस जगत् के सृजनकर्ता हुए, भगवान् विष्णु पालनकर्ता हुए तथा भगवान् शिव संहार करनेवाले हुए, योगिजन जिनका ध्यान करते हैं और… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 383 अग्निपुराण – अध्याय 383 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ तिरासीवाँ अध्याय अग्नि पुराण का माहात्म्य अग्नि पुराण माहात्म्यः अग्निदेव कहते हैं — ब्रह्मन् । ‘अग्निपुराण’ ब्रह्मस्वरूप है, मैंने तुमसे इसका वर्णन किया। इसमें कहीं संक्षेप से और कहीं विस्तार के साथ ‘परा’ और ‘अपरा’ — इन दो… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 382 अग्निपुराण – अध्याय 382 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ बयासीवाँ अध्याय यमगीता यमगीताः अग्निदेव कहते हैं — ब्रह्मन् । अब मैं ‘यमगीता’ का वर्णन करूँगा, जो यमराज के द्वारा नचिकेता के प्रति कही गयी थी। यह पढ़ने और सुनने वालों को भोग प्रदान करती है तथा मोक्ष… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 381 अग्निपुराण – अध्याय 381 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ इक्यासीवाँ अध्याय गीता-सार गीतासारः अग्निदेव कहते हैं — अब मैं गीता का सार बतलाऊँगा, जो समस्त गीता का उत्तम-से-उत्तम अंश है। पूर्वकाल में भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उसका उपदेश दिया था। वह भोग तथा मोक्ष दोनों को… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 380 अग्निपुराण – अध्याय 380 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ असीवाँ अध्याय जडभरत और सौवीर नरेश का संवाद अद्वैत ब्रह्मविज्ञान का वर्णन अद्वैत ब्रह्म विज्ञानम् अग्निदेव कहते हैं — अब मैं उस ‘अद्वैत ब्रह्मविज्ञान’ का वर्णन करूँगा, जिसे भरत ने (सौवीरराज को) बतलाया था। प्राचीनकाल की बात है,… Read More