अग्निपुराण – अध्याय 376 अग्निपुराण – अध्याय 376 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ छिहत्तरवाँ अध्याय समाधि समाधिः अग्निदेव कहते हैं — जो चैतन्यस्वरूप से युक्त और प्रशान्त समुद्र की भाँति स्थिर हो, जिसमें आत्मा के सिवा अन्य किसी वस्तु की प्रतीति न होती हो, उस ध्यान को ‘समाधि’ कहते हैं। जो… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 375 अग्निपुराण – अध्याय 375 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ पचहत्तरवाँ अध्याय धारणा धारणा अग्निदेव कहते हैं — मुने ! ध्येय वस्तु में जो मन की स्थिति होती है, उसे ‘धारणा’ कहते हैं। ध्यान की ही भाँति उसके भी दो भेद हैं — ‘साकार’ और ‘निराकार’। भगवान् के… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 374 अग्निपुराण – अध्याय 374 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ चौहत्तरवाँ अध्याय ध्यान ध्यानम् अग्निदेव कहते हैं — मुने ! ‘ध्यै चिन्तायाम्’ — यह धातु है। अर्थात् ‘ध्यै’ धातु का प्रयोग चिन्तन के अर्थ में होता है। (‘ध्यै’ से ही ‘ध्यान’ शब्द की सिद्धि होती है) अतः स्थिरचित्त… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 373 अग्निपुराण – अध्याय 373 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ तिहत्तरवाँ अध्याय आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार का वर्णन आसनप्राणायामप्रत्याहाराः अग्निदेव कहते हैं — मुने। पद्मासन आदि नाना प्रकार के ‘आसन’ बताये गये हैं। उनमें से कोई भी आसन बाँधकर परमात्मा का चिन्तन करना चाहिये। पहले किसी पवित्र स्थान… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 372 अग्निपुराण – अध्याय 372 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ बहत्तरवाँ अध्याय यम और नियमों की व्याख्या; प्रणव की महिमा तथा भगवत् पूजन का माहात्म्य यमनियमाः अग्निदेव कहते हैं — मुने। अब मैं ‘अष्टाङ्गयोग’ का वर्णन करूँगा, जो जगत् के त्रिविध ताप से छुटकारा दिलाने का साधन है।… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 371 अग्निपुराण – अध्याय 371 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ इकहत्तरवाँ अध्याय प्राणियों की मृत्यु, नरक तथा पापमूलक जन्म का वर्णन नरकनिरूपणम् अग्निदेव कहते हैं — मुने! मैं यमराज के मार्ग की पहले चर्चा कर चुका हूँ, इस समय मनुष्यों की मृत्यु के विषय में कुछ निवेदन करूँगा… Read More
अग्निपुराण — अध्याय 370 अग्निपुराण — अध्याय 370 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ सत्तरवाँ अध्याय शरीर के अवयव शरीरावयवविभागवर्णनं अग्निदेव कहते हैं – वसिष्ठजी ! कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नासिका — ये ज्ञानेन्द्रियाँ हैं । आकाश सभी भूतों में व्यापक है । शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध – ये… Read More
अग्निपुराण — अध्याय 369 अग्निपुराण — अध्याय 369 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ उनहत्तरवाँ अध्याय आत्यन्तिक प्रलय एवं गर्भ की उत्पत्ति का वर्णन आत्यन्तिकलयगर्भोत्पत्तिनिरूपणम् अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठजी ! अब मैं ‘आत्यन्तिक प्रलय’ का वर्णन करूँगा । जब जगत् के आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक संतापों को जानकर मनुष्य को अपने… Read More
अग्निपुराण — अध्याय 368 अग्निपुराण — अध्याय 368 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ अड़सठवाँ अध्याय नित्य, नैमित्तिक और प्राकृत प्रलय का वर्णन नित्यनैमित्तिकप्राकृतप्रलयाः अग्निदेव कहते हैं — मुनिवर ! ‘प्रलय’ चार प्रकार का होता है — नित्य, नैमित्तिक, प्राकृत और आत्यन्तिक । जगत् में उत्पन्न हुए प्राणियों की जो सदा ही… Read More
अग्निपुराण — अध्याय 367 अग्निपुराण — अध्याय 367 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ सड़सठवाँ अध्याय सामान्य नाम—लिङ्ग सामान्यनामलिङ्गानि अग्निदेव कहते हैं — मुनिवर ! अब मैं सामान्यतः नामलिङ्गों का वर्णन करूँगा ( इस प्रकरण में आये हुए शब्द प्रायः ऐसे होंगे, जो अपने विशेष्य के अनुसार तीनों लिङ्गों में प्रयुक्त हो… Read More