अग्निपुराण — अध्याय 356 अग्निपुराण — अध्याय 356 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ छप्पनवाँ अध्याय त्रिविध तद्धित—प्रत्यय तद्धितसिद्दरूपं कुमार स्कन्ध कहते हैं — कात्यायन ! अब त्रिविध ‘तद्धित’ का वर्णन करूँगा । ‘तद्धित ‘के तीन भेद हैं — सामान्यावृत्ति तद्धित, अव्यय तद्धित तथा भाववाचक तद्धित । ‘सामान्यावृत्ति—तद्धित’ इस प्रकार है —… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 355 अग्निपुराण – अध्याय 355 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ पचपनवाँ अध्याय समास-निरूपण समासः भगवान् कार्त्तिकेय कहते हैं — कात्यायन ! मैं छः [^1] प्रकार के ‘समास’ बताऊँगा । फिर अवान्तर- भेदों से ‘समास’ के अट्ठाईस भेद हो जाते हैं । समास ‘नित्य’ और ‘अनित्य’ के भेद से… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 354 अग्निपुराण – अध्याय 354 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ चौवनवाँ अध्याय कारकप्रकरण व्याकरणे कारकं भगवान् स्कन्द कहते हैं — अब मैं विभक्त्यर्थों से युक्त ‘कारक’ का वर्णन करूँगा [^1] । ‘ग्रामोऽस्ति’ ( ग्राम है) – यहाँ प्रातिपदिकार्थ मात्र में प्रथमा विभक्ति हुई है । विभक्त्यर्थ में प्रथमा… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 353 अग्निपुराण – अध्याय 353 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ तिरपनवाँ अध्याय नपुंसकलिङ्ग शब्दों के सिद्ध रूप व्याकरणे नपुंसकशब्दसिद्धरूपं भगवान् स्कन्द कहते हैं — नपुंसकलिङ्ग में ‘किम्’ शब्द के ये रूप होते हैं — (प्रथमा) किम्, के, कानि । (द्वितीया) किम्, के, कानि । शेष रूप पुँल्लिङ्गवत् हैं।… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 352 अग्निपुराण – अध्याय 352 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ बावनवाँ अध्याय स्त्रीलिङ्ग शब्दों के सिद्ध रूप व्याकरणे स्त्रीलिङ्गशब्दसिद्धरूपं भगवान् स्कन्द कहते हैं — आकारान्त स्त्रीलिङ्ग ‘रमा’ शब्द के रूप इस प्रकार होते हैं, — रमा (प्र० ए०), रमे (प्र०-द्वि०), रमाः (प्र० ब०), ‘रमाः शुभाः’ (रमाएँ शुभस्वरूपा है)।… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 351 अग्निपुराण – अध्याय 351 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ इक्यावनवाँ अध्याय सुबन्त-सिद्ध रूप व्याकरणे पुंलिङ्गशब्दसिद्धरूपं स्कन्द कहते हैं — कात्यायन ! अब मैं तुम्हारे सम्मुख विभक्ति-सिद्ध रूपों का वर्णन करता है। विभक्तियाँ दो हैं— ‘सुप्’ और ‘तिङ्’। ‘सुप्’ विभक्तियाँ सात हैं। ‘सु औ जस्’ — यह प्रथमा… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 350 अग्निपुराण – अध्याय 350 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ पचासवाँ अध्याय संधि के [^1] सिद्ध रूप सन्धिसिद्धरूपम् कुमार कार्तिकेय कहते हैं — कात्यायन ! अब सिद्ध संधि का वर्णन करूँगा। पहले ‘स्वरसंधि’ [^2] बतलायी जाती है — दण्डाग्रम्, साऽऽगता, दधीदम्, नदीहते, मधूदकम्, पितृषभः, लृकारः [^3] , तवेदम्,… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 349 अग्निपुराण – अध्याय 349 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ उनचासवाँ अध्याय व्याकरण-सार व्याकरणम् स्कन्द बोले — कात्यायन। अब मैं बोध के लिये तथा बालकों को व्याकरण का ज्ञान कराने के लिये सिद्ध शब्द रूप सारभूत व्याकरण का वर्णन करता हूँ; सुनो। पहले प्रत्याहार आदि संज्ञाएँ बतलायी जाती… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 348 अग्निपुराण – अध्याय 348 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ अड़तालीसवाँ अध्याय एकाक्षर कोष एकाक्षराभिधानम् अग्निदेव कहते हैं — अब मैं तुम्हें ‘एकाक्षराभिधान’ तथा मातृकाओं के नाम एवं मन्त्र बतलाता हूँ। सुनो ‘अ’ नाम है भगवान् विष्णु का। ‘अ’ निषेध अर्थ में भी आता है। ‘आ’ ब्रह्माजी का… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 347 अग्निपुराण – अध्याय 347 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ सैंतालीसवाँ अध्याय काव्य दोष विवेक काव्य दोष विवेकः अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ। ‘दृश्य’ और ‘श्रव्य’ काव्य में यदि ‘दोष’ [^1] हो तो वह सहृदय सभ्यों (दर्शकों और पाठकों) के लिये उद्वेगजनक होता है। वक्ता, वाचक एवं वाच्य… Read More