अग्निपुराण – अध्याय 346 अग्निपुराण – अध्याय 346 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ छियालीसवाँ अध्याय काव्य गुण-विवेक काव्यगुणविवेकः अग्निदेव कहते हैं — द्विजश्रेष्ठ ! गुणहीन काव्य अलंकारयुक्त होने पर भी सहृदय के लिये प्रीतिकारक नहीं होता, जैसे नारी के यौवनजनित लालित्य से [^1] रहित शरीर पर हार भी भारस्वरूप हो जाता… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 345 अग्निपुराण – अध्याय 345 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ पैंतालीसवाँ अध्याय शब्दार्थोभयालंकार निरुपण शब्दार्थालङ्काराः अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! ‘शब्दार्थालंकार’ शब्द और अर्थ दोनों को समानरूप से अलंकृत करता है; जैसे एक ही अङ्ग में धारण किया हुआ हार कामिनी के कण्ठ एवं कुचमण्डल की कान्ति… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 344 अग्निपुराण – अध्याय 344 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ चौवालीसवाँ अध्याय अर्थालंकारों का निरूपण अर्थालङ्कारनिरूपणं अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! अर्थों का अलंकरण [^1] अर्थालंकार’ कहा जाता है। उसके बिना शब्द-सौन्दर्य भी मन को आकर्षित नहीं करता है। अर्थालंकार से हीन सरस्वती विधवा के समान शोभाहीन… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 343 अग्निपुराण – अध्याय 343 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ तैंतालीसवाँ अध्याय शब्दालंकारों का विवरण शब्दालङ्काराः अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ पद एवं वाक्य में वर्णों की आवृत्ति को ‘अनुप्रास’ [^1] कहते हैं। वृत्त्यनुप्रास के वर्णसमुदाय दो प्रकार के होते हैं — एकवर्ण और अनेकवर्ण[^2] ॥ १ ॥… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 342 अग्निपुराण – अध्याय 342 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ बयालीसवाँ अध्याय अभिनय और अलंकारों का निरूपण अभिनयादिनिरूपणम् अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! ‘काव्य’ अथवा ‘नाटक’ आदि में वर्णित विषयों को जो अभिमुख कर देता सामने ला देता, अर्थात् मूर्तरूप से प्रत्यक्ष दिखा देता है, पात्रों के… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 341 अग्निपुराण – अध्याय 341 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ इकतालीसवाँ अध्याय नृत्य आदि में उपयोगी आङ्गिक कर्म नृत्यादावङ्गकर्म्मनिरूपणम् अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! अब मैं ‘अभिनय’ [^1] में नृत्य आदि के समय शरीर से होने वाली विशेष चेष्टा को तथा अङ्ग प्रत्यङ्ग के कर्म को बताता हूँ।… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 340 अग्निपुराण – अध्याय 340 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ चालीसवाँ अध्याय रीति-निरूपण रीतिनिरूपणम् अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! अब मैं ‘वाग्विद्या’ (काव्यशास्त्र) के सम्यक् परिज्ञान के लिये ‘रीति’ का वर्णन करता हूँ। उसके भी चार भेद होते हैं — पाञ्चाली, गौडी, वैदर्भी तथा लाटी। इनमें ‘पाञ्चाली रीति’… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 339 अग्निपुराण – अध्याय 339 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ उनतालीसवाँ अध्याय शृङ्गारादि रस, भाव तथा नायक आदि का निरूपण शृङ्गारादिरसनिरूपणं अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! वेदान्तशास्त्र में जिस अक्षर (अविनाशी), सनातन, अजन्मा और व्यापक परब्रह्म परमेश्वर को अद्वितीय, चैतन्यस्वरूप और ज्योतिर्मय कहते हैं, उसका सहज (स्वरूपभूत) आनन्द… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 338 अग्निपुराण – अध्याय 338 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ अड़तीसवाँ अध्याय नाटकनिरूपण नाटकनिरूपणम् अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! ‘रूपक ‘के सत्ताईस भेद माने गये हैं [^1] — नाटक, प्रकरण, डिम, ईहामृग, समवकार, प्रहसन, व्यायोग, भाण, वीथी, अङ्क, त्रोटक, नाटिका, सट्टक, शिल्पक, कर्णा, दुर्मल्लिका, प्रस्थान, भाणिका, भाणी, गोष्ठी,… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 337 अग्निपुराण – अध्याय 337 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ सैंतीसवाँ अध्याय काव्य आदि के लक्षण काव्यादिलक्षणं अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! अब मैं ‘काव्य’ और ‘नाटक’ आदि के स्वरूप तथा ‘अलंकारों का वर्णन करता हूँ। ध्वनि, वर्ण, पद और वाक्य यही सम्पूर्ण वाङ्मय माना गया है।[^1]… Read More