अग्निपुराण — अध्याय 366 अग्निपुराण — अध्याय 366 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ छाछठवाँ अध्याय क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र-वर्ग क्षत्रविट्शूद्रवर्गाः अग्निदेव कहते हैं — मूर्धाभिषिक्त, राजन्य बाहुज, क्षत्रिय और विराट् — ये क्षत्रिय के वाचक हैं । जिस राजा के सामने सभी सामन्त— नरेश मस्तक झुकाते हैं, उसे अधीश्वर कहते हैं… Read More
अग्निपुराण — अध्याय 365 अग्निपुराण — अध्याय 365 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ पैंसठवाँ अध्याय ब्रह्म-वर्ग ब्रह्मवर्गः अग्निदेव कहते हैं — वंश, अन्ववाय, गोत्र, कुल, अभिजन और अन्वय— ये वंश के नाम हैं । मन्त्र की व्याख्या करने वाले ब्राह्मण को आचार्य कहते हैं । जिसने यज्ञ में व्रत की दीक्षा… Read More
अग्निपुराण — अध्याय 364 अग्निपुराण — अध्याय 364 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ चौसठवाँ अध्याय मनुष्य-वर्ग नृब्रह्मक्षत्रविट्शूद्रवर्गाः अग्निदेव कहते हैं — अब मैं नाम—निर्देशपूर्वक मनुष्यवर्ग, ब्राह्मण वर्ग, क्षत्रिय वर्ग, वैश्य वर्ग और शूद्रवर्ग का क्रमशः वर्णन करूँगा । ना, नर, पञ्चजन और मर्त्य — ये मनुष्य एवं पुरुष के वाचक हैं… Read More
अग्निपुराण — अध्याय 363 अग्निपुराण — अध्याय 363 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ तिरसठवाँ अध्याय भूमि, वनौषधि आदि वर्ग भूमिवनौषध्यादिवर्गाः अग्निदेव कहते हैं — अब मैं भूमि, पुर, पर्वत, वनौषधि तथा सिंह आदि वर्गों का वर्णन करूँगा । भू, अनन्ता, क्षमा, धात्री, क्ष्मा, कु तथा धरित्री — ये भूमि के नाम… Read More
अग्निपुराण — अध्याय 362 अग्निपुराण — अध्याय 362 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ बासठवाँ अध्याय नानार्थ-वर्ग नानार्थवर्गाः अग्निदेव कहते हैं — ‘नाक’ शब्द आकाश और स्वर्ग के अर्थ में तथा ‘लोक’ शब्द संसार, जन-समुदाय के अर्थ में आता है । ‘श्लोक’ शब्द अनुष्टुप् छन्द और सुयश अर्थ में तथा ‘सायक’ शब्द… Read More
अग्निपुराण — अध्याय 361 अग्निपुराण — अध्याय 361 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ एकसठवाँ अध्याय अव्यय—वर्ग अव्ययवर्गाः अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठजी ! ‘आङ्’ अव्यय ईषत् (स्वल्प), अभिव्याप्ति तथा मर्यादा (सीमा) अर्थ में प्रयुक्त होता है। साथ ही धातु से उसका संयोग होने पर जो विभिन्न अर्थ प्रकाशित होते हैं, उन… Read More
अग्निपुराण — अध्याय 360 अग्निपुराण — अध्याय 360 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ साठवाँ अध्याय स्वर्ग-पाताल आदि वर्ग स्वर्गपातालादिवर्गाः अग्निदेव कहते हैं — कात्यायन ! स्वर्ग आदि के नाम और लिङ्ग जिनके स्वरूप हैं, उन शुद्ध स्वरूप श्रीहरि का मैं वर्णन करता हूँ — स्वः [अव्यय ], स्वर्ग, नाक, त्रिदिव [… Read More
अग्निपुराण — अध्याय 359 अग्निपुराण — अध्याय 359 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ उनसठवाँ अध्याय कृदन्त शब्दों के सिद्ध रूप व्याकरणे कृत्सिद्धरूपं कुमार कार्तिकेय कहते हैं — कात्यायन ! यह जानना चाहिये कि ‘कृत्’ प्रत्यय भाव, कर्म तथा कर्ता — तीनों में होते हैं । वे इस प्रकार हैं — ‘अच्’,… Read More
अग्निपुराण — अध्याय 358 अग्निपुराण — अध्याय 358 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ अट्ठावनवाँ अध्याय तिविभक्त्यन्त सिद्धरूपों का वर्णन तिङ्विभक्तिसिद्धरूपं कुमार कार्तिकेय कहते हैं — कात्यायन ! अब मैं ‘तिङ् — विभक्ति’ तथा ‘आदेश’ का संक्षेप से वर्णन करूँगा। तिङ्—प्रत्यय भाव, कर्म और कर्ता — तीनों में होते हैं । सकर्मक… Read More
अग्निपुराण — अध्याय 357 अग्निपुराण — अध्याय 357 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ सत्तावनवाँ अध्याय उणादिसिद्ध शब्दरूपों का दिग्दर्शन व्याकरणे उणादिसिद्धरूपं कुमार स्कन्द कहते हैं — कात्यायन ! अब ‘उणादि’ प्रत्यय बताये जाते हैं, जो धातु से परे होते हैं। ‘कृवापाजिमिस्वदिसाध्यशूभ्य उण्।’ (१) — इस सूत्र के अनुसार ‘कृ’ आदि धातुओं… Read More