अग्निपुराण – अध्याय 306 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ छठवाँ अध्याय श्री नरसिंह आदि के मन्त्र नारसिंहादिमन्त्राः अग्निदेव कहते हैं — मुने ! स्तम्भन, विद्वेषण, उच्चाटन, उत्सादन, भ्रमण, मारण तथा व्याधि — ये ‘क्षुद्र ‘ संज्ञक अभिचारिक कर्म हैं । इनसे छुटकारा कैसे प्राप्त हो? यह बात… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 305 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ पाँचवाँ अध्याय पचपन विष्णुनाम पञ्चपञ्चाशद्विष्णुनामानि अग्निदेव कहते हैं — मुने। जो मनुष्य भगवान् विष्णु के निम्नाङ्कित पचपन नामों का जप करता है, वह मन्त्रजप आदि के फल का भागी होता है तथा तीर्थों में पूजनादि के अक्षय पुण्य… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 304 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ चारवाँ अध्याय पञ्चाक्षर-दीक्षा-विधान; पूजा के मन्त्र पञ्चाक्षरादिपूजामन्त्राः अग्निदेव कहते हैं — मेष (न) सर्गि विष — विसर्ग युक्त मकार (मः) य से पहले का अक्षर श और उसके साथ अक्षि — इकार (शि) दीर्घोदक (वा) मरुत् (य) —… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 303 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ तीनवाँ अध्याय अष्टाक्षर मन्त्र तथा उसकी न्यासादि विधि अङ्गाक्षरार्च्चनम् अग्निदेव कहते हैं — जब चन्द्रमा जन्म-नक्षत्र पर हों और सूर्य सातवीं राशि पर हो तो उसे ‘पूषा का काल’ (पौष्णः कालः) समझना चाहिये। उस समय श्वास की परीक्षा… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 302 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ दोवाँ अध्याय नाना प्रकार के मन्त्र और औषधों का वर्णन नाना मन्त्राः अग्निदेव कहते हैं — ‘ऐं कुलजे ऐं सरस्वति स्वाहा’ — यह ग्यारह अक्षरों का मन्त्र मुख्य ‘सरस्वती विद्या’ है। जो क्षारलवण से रहित आहार ग्रहण करते… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 301 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ एकवाँ अध्याय सिद्धि-गणपति आदि मन्त्र तथा सूर्य देव की आराधना सूर्य्यार्च्चनम् अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! शार्ङ्गी (गकार), दण्डी (अनुस्वारयुक्त) हो, उसके साथ पद्येश — विष्णु (ईकार) और पावक (रकार) हो तो इन चार अक्षरों के मेल… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 300 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ अध्याय ग्रहबाधा एवं रोगों को हरने वाले मन्त्र तथा औषध आदि का कथन ग्रहहृन्मन्त्रादिकम् अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! अब मैं ग्रहों के उपहार और मन्त्र आदि का वर्णन करूँगा, जो ग्रहों को शान्त करने वाले हैं। हर्ष,… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 299 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ निन्यानबेवाँ अध्याय बालादिग्रहहर बालतन्त्र बालग्रहहरबालतन्त्रम् अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! अब मैं बालादि ग्रहों को शान्त करने वाले ‘बालतन्त्र’ को कहता हूँ । शिशु को जन्म के दिन ‘पापिनी’ नाम वाली ग्रही ग्रहण कर लेती है ।… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 298 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ अट्ठानबेवाँ अध्याय गोनसादि-चिकित्सा गोनसादि चिकित्सा अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! अब मैं तुम्हारे सम्मुख गोनस आदि जाति के सर्पों के विष की चिकित्सा का वर्णन करता हूँ, ध्यान देकर सुनो। ‘ॐ ह्रां ह्रीं अमलपक्षि स्वाहा’ — इस मन्त्र… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 297 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ सत्तानबेवाँ अध्याय विषहारी मन्त्र तथा औषध विषहृन्मन्त्रौषधम् अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! ॐ नमो भगवते रुद्राय च्छिन्द-च्छिन्द विषं ज्वलितपरशुपाणये स्वाहा।’ इस मन्त्र से और ‘ॐ नमो भगवते पक्षिरुद्राय दष्टकमुत्थापयोत्थापय, दष्टकं कम्पय कम्पय जल्पय जल्पय सर्पदष्टमुत्थापयोत्थापय लल लल… Read More