अग्निपुराण – अध्याय 246 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ छियालीसवाँ अध्याय रत्न-परीक्षण रत्नपरीक्षाः अग्निदेव कहते हैं — द्विजश्रेष्ठ वसिष्ठ ! अब मैं रत्नों के लक्षणों का वर्णन करता हूँ। राजाओं को ये रत्न धारण करने चाहिये — वज्र (हीरा), मरकत, पद्मराग, मुक्ता, महानील, इन्द्रनील, वैदूर्य, गन्धसस्य, चन्द्रकान्त,… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 245 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ पैंतीसवाँ अध्याय चामर, धनुष, बाण तथा खड्ग के लक्षण आयुधलक्षणादि अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! सुवर्णदण्डभूषित चामर उत्तम होता है। राजा के लिये हंसपक्ष, मयूरपक्ष या शुकपक्ष से निर्मित छत्र प्रशस्त माना गया है। वकपक्ष से निर्मित… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 244 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ चौवालीसवाँ अध्याय स्त्री के लक्षण स्त्रीलक्षणम् समुद्र कहते हैं — गर्गजी ! शरीर से उत्तम श्रेणी की स्त्री वह है, जिसके सम्पूर्ण अङ्ग मनोहर हों, जो मतवाले गजराज की भाँति मन्दगति से चलती हो, जिसके ऊरु और जघन… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 243 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ तैंतालीसवाँ अध्याय पुरुष के लक्षण पुरुषलक्षणम् अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! मैंने श्रीराम के प्रति वर्णित राजनीति का प्रतिपादन किया। अब मैं स्त्री-पुरुषों के लक्षण बतलाता हूँ, जिसका पूर्वकाल में भगवान् समुद्र ने गर्ग मुनि को उपदेश दिया… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 242 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ बयालीसवाँ अध्याय सेना के छः भेद, इनका बलाबल तथा छः अङ्ग राजनीतिः श्रीराम कहते हैं — छः प्रकार की सेना को कवच आदि से संनद्ध एवं व्यूहबद्ध करके इष्ट देवताओं की तथा संग्रामसम्बन्धी दुर्गा आदि देवियों की पूजा… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 241 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ इकतालीसवाँ अध्याय मन्त्रविकल्प सामादिः श्रीराम कहते हैं — ‘लक्ष्मण! प्रभावशक्ति और उत्साह–शक्ति से मन्त्रशक्ति श्रेष्ठ बतायी गयी है। प्रभाव और उत्साह से सम्पन्न शुक्राचार्य को देवपुरोहित बृहस्पति ने मन्त्र–बल से जीत लिया ॥ १ ॥ जो विश्वसनीय होने… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 240 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ चालीसवाँ अध्याय द्वादशराजमण्डल – चिन्तन [^1]  का वर्णन षाड्गुण्यम् श्रीराम कहते हैं — राजा को चाहिये कि वह मुख्य द्वादश राजमण्डल का चिन्तन करे। १. अरि, २. मित्र, ३. अरिमित्र, तत्पश्चात् ४. मित्रमित्र तथा ५. अरिमित्रमित्र — ये… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 239 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ उनतालीसवाँ अध्याय श्रीराम की राजनीति का वर्णन राजधर्माः श्रीराम कहते हैं — लक्ष्मण! स्वामी (राजा), अमात्य (मन्त्री), राष्ट्र (जनपद), दुर्ग (किला), कोष (खजाना), बल (सेना) और सुहृत् (मित्रादि) – ये राज्य के परस्पर उपकार करनेवाले सात अङ्ग कहे… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 238 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ अड़तीसवाँ अध्याय श्रीराम के द्वारा उपदिष्ट राजनीति का वर्णन रामोक्तनीतिः अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! मैंने तुमसे पुष्कर की कही हुई नीति का वर्णन किया है। अब तुम लक्ष्मण के प्रति श्रीरामचन्द्र द्वारा कही गयी विजयदायिनी नीति… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 237 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ सैंतीसवाँ अध्याय लक्ष्मीस्तोत्र और उसका फल ॥ श्रीस्तोत्र ॥ पुष्कर कहते हैं — परशुरामजी! पूर्वकाल में इन्द्र ने राज्यलक्ष्मी की स्थिरता के लिये जिस प्रकार भगवती लक्ष्मी की स्तुति की थी, उसी प्रकार राजा भी अपनी विजय के… Read More