अग्निपुराण – अध्याय 256 अग्निपुराण – अध्याय 256 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ छप्पनवाँ अध्याय पैतृक धन के अधिकारी; पत्नियों का धनाधिकार; पितामह के धन के अधिकारी; विभाज्य और अविभाज्य धन; वर्ण क्रम से पुत्रों के धनाधिकार; बारह प्रकार के पुत्र और उनके अधिकार पत्नी पुत्री आदि के, संसृष्टी के धन… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 255 अग्निपुराण – अध्याय 255 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ पचपनवाँ अध्याय साक्षी, लेखा तथा दिव्यप्रमाणों के विषय में विवेचन दिव्यानि प्रमाणानि ‘साक्षी-प्रकरण’ अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ। तपस्वी, कुलीन, दानशील, सत्यवादी, कोमल हृदय, धर्मात्मा, पुत्रयुक्त, धनी, पञ्चयज्ञ आदि वैदिक क्रियाओं से युक्त अपनी जाति और वर्ग के… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 254 अग्निपुराण – अध्याय 254 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ चौवनवाँ अध्याय ऋणादान तथा उपनिधि सम्बन्धी विचार व्यवहारः अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! यदि ऋण लेने वाले पुरुष के अनेक ऋणदाता साहु हों और वे सब के-सब एक ही जाति के हों तो राजा उन्हें ग्रहणक्रम के… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 253 अग्निपुराण – अध्याय 253 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ तिरपनवाँ अध्याय व्यवहारशास्त्र तथा विविध व्यवहारों का वर्णन व्यवहारः अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! अब मैं व्यवहार का वर्णन करता हूँ, जो नय और अनय का विवेक प्रदान करने वाला है। उसके चार चरण, चार स्थान और चार… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 252 अग्निपुराण – अध्याय 252 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ बावनवाँ अध्याय तलवार के बत्तीस हाथ, पाश, चक्र, शूल, तोमर, गदा, परशु, मुद्गर, भिन्दिपाल, वज्र, कृपाण, क्षेपणी, गदायुद्ध तथा मल्लयुद्धके दाँव और पैंतरों का वर्णन धनुर्वेदकथनम् अग्निदेव कहते हैं — ब्रह्मन् । भ्रान्त, उद्घान्त,आविद्ध, आप्लुत, विप्लुत, प्लुत (या… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 251 अग्निपुराण – अध्याय 251 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ इक्यावनवाँ अध्याय पाश के निर्माण और प्रयोग की विधि तथा तलवार और लाठी को अपने पास रखने एवं शत्रु पर चलाने की उपयुक्त पद्धति का निर्देश धनुर्वेदकथनम् अग्निदेव कहते हैं — ब्रह्मन् ! जिसने हाथ, मन और दृष्टि… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 250 अग्निपुराण – अध्याय 250 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ पचासवाँ अध्याय लक्ष्यवेध के लिये धनुष-बाण लेने और उनके समुचित प्रयोग करने की शिक्षा तथा वेध्य के विविध भेदों का वर्णन धनुर्वेदकथनम् अग्निदेव कहते हैं — ब्रह्मन् ! द्विज को चाहिये कि पूरी लम्बाईवाले धनुष का निर्माण कराकर,… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 249 अग्निपुराण – अध्याय 249 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ उनचासवाँ अध्याय धनुर्वेद [^1] का वर्णन – युद्ध और अस्त्र के भेद, आठ प्रकार के स्थान, धनुष, बाण को ग्रहण करने और छोड़ने की विधि आदि का कथन धनुर्वेदः अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! अब मैं चार… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 248 अग्निपुराण – अध्याय 248 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ अड़तालीसवाँ अध्याय विष्णु आदि के पूजन में उपयोगी पुष्पों का कथन पुष्पादिपूजाफलम् अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! पुष्पों से पूजन करने पर भगवान् श्रीहरि सम्पूर्ण कार्यों में सिद्धि प्रदान करते हैं। मालती, मल्लिका, यूथिका, गुलाब, कनेर, पावन्ती, अतिमुक्तक,… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 247 अग्निपुराण – अध्याय 247 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ सैंतालीसवाँ अध्याय गृह के योग्य भूमि; चतुःषष्टिपद वास्तुमण्डल और वृक्षारोपण का वर्णन वास्तुलक्षणम् अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! अब मैं वास्तु के लक्षणों का वर्णन करता हूँ। वास्तुशास्त्र में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के लिये क्रमशः… Read More