देवोपासना के कुछ सरल उपाय देवोपासना के कुछ सरल उपाय देवताओं की उपासना की अनेक विधियाँ शास्त्रों में दी गई है। उन विधियों का पालन करने से अपने इष्ट की कृपा सहज ही प्राप्त की जा सकती है। उनमें से ही कुछ सरल उपाय यहाँ प्रस्तुत है।- १॰ प्रत्येक मंगलवार को हनुमान जी को सिन्दूर चढ़ाना तथा उनके गले में… Read More
गणेशजी को दूर्वा, शमीपत्र तथा मोदक चढ़ाने का रहस्य गणेशजी को दूर्वा, शमीपत्र तथा मोदक चढ़ाने का रहस्य – गणेशजी को तुलसी छोड़कर सभी पत्र-पुष्प प्रिय हैं। अतः सभी अनिषिद्ध पत्र-पुष्प इन पर चढ़ाये जा सकते हैं। तुलसीं वर्जयित्वा सर्वाण्यपि पत्रपुष्पाणि गणपतिप्रियाणि। (आचारभूषण) गणपति को दूर्वा अधिक प्रिय है। अतः इन्हें सफेद या हरी दूर्वा अवश्य चढ़ानी चाहिये। दूर्वा की फुनगी में तीन या… Read More
भूतनाथ जी की महिमा भूतनाथ जी की महिमा सम्राट् अकबर के समय की घटना है । उस समय से पहले मुर्शिदाबाद और मालदा का प्रान्त गौड़ देश के अन्तर्गत था और गौड़ देश के हिन्दू राजाओं के शासन में था । यह प्रसिद्ध ही है कि अकबर गुण-ग्राही सम्राट् था और हिन्दू-मुसलमान दोनों का, गुणों के अनुसार, समान रुप… Read More
देवी भ्रमर-वासिनी देवी भ्रमर-वासिनी (‘दुर्गा-सप्तशती’ के ग्यारहवें अध्याय में महा-माया ने अपने अवतारों की सूचना दी है, उनमें से “भ्रामरी-देवी” सर्व-शेष अवतार है । देवी का कहना है कि वे शेष-अवतार के रुप में षष्टि-तम महायुग में आविर्भूत होंगी । जिस समय अरुण नामक महाऽसुर तीनों लोकों का उत्पीड़न करेगा, उस समय वे जगज्जननी भ्रामरी-रुप से प्रकट… Read More
हनुमद्-बीसा हनुमद्-बीसा ।।दोहा।। राम भक्त विनती करूँ, सुन लो मेरी बात । दया करो कुछ मेहर उपाओ, सिर पर रखो हाथ ।। ।।चौपाई।। जय हनुमन्त, जय तेरा बीसा, कालनेमि को जैसे खींचा ।।१ करुणा पर दो कान हमारो, शत्रु हमारे तत्क्षण मारो ।।२ राम भक्त जय जय हनुमन्ता, लंका को थे किये विध्वंसा ।।३ सीता खोज… Read More
देवशयनी एकादशी देवशयनी एकादशी हिंदू धर्म में एकादशी का व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशियाँ होती हैं। जब अधिकमास या मलमास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर २६ हो जाती है। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को ही देवशयनी एकादशी कहा जाता है। कहीं-कहीं इस तिथि को ‘पद्मनाभा’ भी कहते हैं। सूर्य… Read More
महाकवि श्रीहर्ष और चिन्तामणि मन्त्र महाकवि श्रीहर्ष और चिन्तामणि मन्त्र बात तो है बारहवीं शताब्दी की, किन्तु लगती है कल की जैसी। वैसा प्रखर पाण्डित्य, उतनी गहराएयों के साथ दार्शनिक अनुशीलन की शक्ति, संस्कृत भाषा पर अद्भुत अधिकार, काव्य-निर्माण की अद्वितीय अप्रतिहत प्रतिज्ञा और कारयित्री तथा भावयित्री प्रतिभाओं का अविछिन्न संगम ‘महाकवि’- “श्रीहर्ष” के रोम-रोम में प्रवाहित हो रहा था।… Read More
विंशोत्तर-शत-महा-देव-‘मकारादि’-शत-नाम-स्तोत्र विंशोत्तर-शत-महा-देव-‘मकारादि’-शत-नाम-स्तोत्र महादेवो महाकल्पो, महा-वेशो महा-बलः । महोद्योगो महोत्कर्ष, महा-भीमो महोक्षजः ।।१ महा-कालो महोत्सर्गो, महा-नागो महोत्सुकः । मोघो मोघ-बलो मेघो, मेघदो मेघ-वाहनः ।।२ मन्द-हासो महा-सेनो, मन्दाकिनि-शिरो-धरः । मुक्तिदो मोक्षमानन्दो, मोक्षो मोक्ष-प्रदो मनः ।।३… Read More
क्यों हुआ श्रीगणेश का शिरश्छेदन ? क्यों हुआ श्रीगणेश का शिरश्छेदन ? श्रीगणेश ग्रहाधिराज श्रीकृष्ण के अंश से पार्वतीनन्दन के रुप में अवतरित हुए थे, फिर भी उनका शिरश्छेदन श्रीकृष्ण-भक्त शनि की दृष्टि से कैसे हो गया ? इस सम्बन्ध में ब्रह्म-वैवर्त्त-पुराण के गणपति-खण्ड के १८वें अध्याय में एक कथा है – सूर्यदेव ने भगवान् शिव के भक्त शिवमाली और सुमाली… Read More
श्री बटुक भैरव स्तोत्र श्री बटुक भैरव स्तोत्र सभी प्रकार की आपदाओं के निवारण का एक सिद्ध प्रयोग (हिन्दी पद्यानुवाद) ।। पूर्व-पीठिका ।। मेरु-पृष्ठ पर सुखासीन, वरदा देवाधिदेव शंकर से – पूछा देवी पार्वती ने, अखिल विश्व-गुरु परमेश्वर से । जन-जन के कल्याण हेतु, वह सर्व-सिद्धिदा मन्त्र बताएँ – जिससे सभी आपदाओं से साधक की रक्षा हो, वह सुख… Read More