महागौरी ॥ महागौरी ॥ अग्निपुराण के अनुसार गौरी पूजन तृतीया, अष्टमी या चतुर्दशी को करना चाहिये । सिंह सिद्धान्त सिन्धु में चार भुजा देवी का ध्यान दिया है एवं अग्नि पुराण में सिंहस्थ या वृकस्थ देवी का आठ या अठारह भुजा स्वरूप में पूजन करने को कहा है।… Read More
कालरात्रि ॥ कालरात्रि ॥ ॥ कालरात्रि प्रयोग विधानम् ॥ कालरात्रि का प्रयोग अचूक हैं । यह संहार व सम्मोहन दोनों की अधिष्ठात्री हैं । ब्रह्मा, विष्णु, महेश इन्हीं के प्रभाव से योगनिद्रा में रहते हुये आराधना व तपस्या में लीन रहते हैं । जब शत्रु बाधा, प्रेतादिकबाधा प्रबल हो बगला, प्रत्यंगिरा, शरभराजादि के प्रयोग शिथिल हो… Read More
श्रीराम कृत कात्यायनी स्तुति ॥ श्रीराम कृत कात्यायनी स्तुति ॥ ॥ श्रीराम उवाच ॥ नमस्ते त्रिजगद्वन्द्ये संग्रामे जयदायिनि । प्रसीद विजयं देहि कात्यायनि नमोऽस्तु ते ॥ १ ॥ सर्वशक्तिमये दुष्टरिपुनिग्रहकारिणि । दुष्टजृम्भिणि संग्रामे जयं देहि नमोऽस्तु ते ॥ २ ॥ त्वमेका परमा शक्तिः सर्वभूतेष्ववस्थिता । दुष्टं संहर संग्रामे जयं देहि नमोऽस्तु ते ॥ ३ ॥… Read More
पाण्डवाः कृत कात्यायनी स्तुति ॥ पाण्डवाः कृत कात्यायनी स्तुति ॥ ॥ पाण्डवा ऊचुः ॥ कात्यायनि त्रिदशवन्दितपादपो, विश्वोद्भवस्थितिलयैकनिदानरूपे । देवि प्रचण्डदलिनि त्रिपुरारिपनि, दुर्गे प्रसीद जगतां परमार्तिहन्त्रि ॥ त्वं दुष्टदैत्यविनिपातकरी सदैव, दुष्टप्रमोहनकरी किल दुःखहन्त्री । त्वां यो भजेदिह जगन्मयि तं कदापि, नो बाधते भवसु दुःखमचिन्त्यरूपे ॥… Read More
कात्यायनी ॥ कात्यायनी ॥ कात्यायनी दशभुजा देवी ही महिषासुर मर्दिनी है। प्रथम कल्प में उग्रचण्डा रूप में, द्वितीय कल्प में १६ भुजा भद्रकाली रूप में तथा तृतीय कल्प में कात्यायनी ने दश भुजा रूप धारण करके महिषासुर का वध किया। कात्यायनी मुनि के द्वारा स्तुति करने पर बिल्व वृक्ष के पास देवी प्रकट हुई थी। आश्विन… Read More
दुर्गम संकटनाशन स्तोत्र ॥ दुर्गम संकटनाशन स्तोत्र ॥ ॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥ त्वमेव सर्वजननी मूलप्रकृतिरीश्वरी । त्वमेवाद्या सृष्टिविधौ स्वेच्छया त्रिगुणात्मिका ॥ कार्यार्थे सगुणा त्वं च वस्तुतो निर्गुणा स्वयम् । परब्रह्मस्वरूपा त्वं सत्या नित्या सनातनी ॥ तेजःस्वरूपा परमा भक्तानुग्रहविग्रहा । सर्वस्वरूपा सर्वेशा सर्वाधारा परात्परा ॥… Read More
ब्रह्माण्डमोहनाख्यं दुर्गाकवचम् ॥ ब्रह्माण्डमोहनाख्यं दुर्गाकवचम् ॥ ॥ नारद उवाच ॥ भगवन्सर्वधर्मज्ञ सर्वज्ञानविशारद । ब्रह्माण्डमोहनं नाम प्रकृते कवचं वद ॥ १ ॥… Read More
ब्रह्माण्डविजय दुर्गा कवचम् ॥ ब्रह्माण्डविजय दुर्गा कवचम् ॥ ॥ नारायण उवाच ॥ श्रृणु नारद वक्ष्यामि दुर्गायाः कवचं शुभम् । श्रीकृष्णेनैव यद्दत्तं गोलोके ब्रह्मणे पुरा ॥ ब्रह्मा त्रिपुरसंग्रामे शंकराय ददौ पुरा । जघान त्रिपुरं रुद्रो यद् धृत्वा भक्तिपूर्वकम् ॥ हरो ददौ गौतमाय पद्माक्षाय च गौतमः । यतो बभूव पद्माक्षः सप्तद्वीपेश्वरो जयी ॥ यद् धृत्वा पठनाद् ब्रह्मा ज्ञानवान् शक्तिमान् भुवि… Read More
वंशवृद्धिकरं दुर्गाकवचम् अथवा वंशकवचम् ॥ वंशवृद्धिकरं दुर्गाकवचम् अथवा वंशकवचम् ॥ भगवन् देव देवेशकृपया त्वं जगत् प्रभो । वंशाख्य कवचं ब्रूहि मह्यं शिष्याय तेऽनघ । यस्य प्रभावाद्देवेश वंश वृद्धिर्हिजायते ॥ १ ॥… Read More
श्री चण्डिका मालामन्त्र प्रयोगः ॥ श्री चण्डिका मालामन्त्र प्रयोगः ॥ उक्तं चाथर्वणागमसंहितायाम् मंत्रों यथा — “ॐ ह्रः ॐ सौं ॐ ह्रौं ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीर्जयजय चण्डिका चामुण्डे चण्डिके त्रिदश-मुकुट-कोटि-संघट्टित-चरणारविंदे गायत्रि सावित्रि सरस्वति अहिकृताभरणे भैरव-रूप-धारिणि प्रकटित-दंष्ट्रोग्र-वदने घोरानन-नयने ज्वलज्ज्वाला-सहस्र-परिवृते महाट्टहास-धवलीकृत-दिगन्तरे सर्वयुग-परिपूर्णे कपाल-हस्ते गजाजिनोत्तरीय-भूत-वेताल-परिवृते अकंपित-धराधरे मधु-कैटभ महिषासुर-धूम्रलोचन चण्ड-मुण्ड-रक्तबीज-शुम्भनिशुम्भदैत्यनिकृन्ते कालरात्रि महामाये शिवे नित्ये ॐ ऐं ह्रीं ऐन्द्रि आग्नेयि याम्ये नैर्ऋति वारुणि वायवि… Read More